भारतकोश
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संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
* अध्याय ३१ *४११
तं दृष्ट्वा कालवदनं शंकरं कालभैरवम्।<br>रूपलावण्यसम्पन्नं नारीकुलमगादनु ॥ ७७ ॥<br><br>गायन्ति विविधं गीतं नृत्यन्ति पुरतः प्रभोः।<br>सस्मितं प्रेक्ष्य वदनं चक्रुर्भ्रूभङ्गमेव च ॥ ७८ ॥<br><br>स देवदानवादीनां देशानभ्येत्य शूलधृक्।<br>जगाम विष्णोर्भवनं यत्रास्ते मधुसूदनः ॥ ७९ ॥<br><br>निरीक्ष्य दिव्यभवनं शंकरो लोकशंकरः।<br>सहैव भूतप्रवरैः प्रवेष्टुमुपचक्रमे ॥ ८० ॥<br><br>अविज्ञाय परं भावं दिव्यं तत्पारमेश्वरम्।<br>न्यवारयत् त्रिशूलाङ्कं द्वारपालो महाबलः ॥ ८१ ॥<br><br>शङ्खचक्रगदापाणिः पीतवासा महाभुजः।<br>विष्वक्सेन इति ख्यातो विष्णोरंशसमुद्भवः ॥ ८२ ॥<br><br>अथैनं शंकरगणो युयुधे विष्णुसम्भवम्।<br>भीषणो भैरवादेशात् कालवेग इति श्रुतः ॥ ८३ ॥<br><br>विजित्य तं कालवेगं क्रोधसंरक्तलोचनः।<br>रुद्रायाभिमुखं रौद्रं चिक्षेप च सुदर्शनम् ॥ ८४ ॥<br><br>अथ देवो महादेवस्त्रिपुरारिस्त्रिशूलभृत्।<br>तमापतन्तं सावज्ञमालोकयदमित्रजित् ॥ ८५ ॥<br><br>तदन्तरे महद्भूतं युगान्तदहनोपमम्।<br>शूलेनोरसि निर्भिद्य पातयामास तं भुवि ॥ ८६ ॥<br><br>स शूलाभिहतोऽत्यर्थं त्यक्त्वा स्वं परमं बलम्।<br>तत्याज जीवितं दृष्ट्वा मृत्युं व्याधिहता इव ॥ ८७ ॥<br><br>निहत्य विष्णुपुरुषं सार्धं प्रमथपुंगवैः।<br>विवेश चान्तरगृहं समादाय कलेवरम् ॥ ८८ ॥<br><br>निरीक्ष्य जगतो हेतुमीश्वरं भगवान् हरिः।<br>शिरो ललाटात् सम्भिद्य रक्तधारामपातयत् ॥ ८९ ॥<br><br>गृहाण भगवन् भिक्षां मदीयाममितद्युते।<br>न विद्यतेऽनाभ्युदिता तव त्रिपुरमर्दन ॥ ९० ॥अस्तु, उन कालात्मा महेश्वरके प्रमुख गण कालभैरव शंकरको रूप एवं लावण्यसे सम्पन्न देखकर नारी-समूह उनके पीछे चलने लगा। वे स्त्रियाँ प्रभुके सामने विविध प्रकारके गीत गाने लगीं और नृत्य करने लगीं तथा मन्द मुसकानके साथ उनके मुखको देखकर भौंहोंसे हाव-भाव प्रदर्शित करने लगीं ॥ ७७-७८ ॥<br><br>वे शूलधारी कालभैरव देवों तथा दानवों आदिके देशोंमें जानेके अनन्तर विष्णुके भवनमें गये, जहाँ मधुसूदन निवास करते हैं। उस दिव्य भवनको देखकर लोकोंके कल्याणकारी शंकर (कालभैरव) श्रेष्ठ भूतोंके साथ ही उसमें प्रवेश करने लगे ॥ ७९-८० ॥<br><br>उन (कालभैरव)-के दिव्य परम पारमेश्वर भावको न समझते हुए शंख, चक्र तथा गदा हाथोंमें लिये हुए, पीत वस्त्र धारण किये, महान् भुजावाले, विष्णुके अंशसे उत्पन्न विष्वक्सेन नामसे प्रसिद्ध महाबलवान् द्वारपालने त्रिशूलधारी उन कालभैरवको रोका। तब भैरवकी आज्ञासे कालवेग इस नामसे प्रसिद्ध शंकरका भयंकर गण विष्णु-समुद्भूत (विष्वक्सेन)-से युद्ध करने लगा। उस कालवेगको जीतकर क्रोधसे लाल हुए नेत्रोंवाला (द्वारपाल) रुद्र (कालभैरव)-की ओर भयंकर सुदर्शनचक्र फेंका। तब त्रिशूलधारी शत्रुजित् त्रिपुरारिदेव महादेव (कालभैरव)-ने उस आते हुए चक्रको अवज्ञापूर्वक देखा ॥ ८१-८५ ॥<br><br>उसी समय महादेव (कालभैरव)-ने त्रिशूलके द्वारा प्रलयकालीन अग्निके तुल्य अति भीषण विष्वक्सेनके वक्षःस्थलमें प्रहारकर उसे पृथ्वीपर गिरा दिया। त्रिशूलसे आहत होनेपर अपने महान् बलका त्यागकर उस विष्वक्सेनने अपने प्राणोंका उसी प्रकार परित्याग कर दिया, जैसे व्याधिसे आहत प्राणी मृत्युको देखकर अपने प्राणोंका परित्याग कर देता है ॥ ८६-८७ ॥<br><br>विष्णुके पुरुष (विष्वक्सेन)-को मारकर (उसके) कलेवर (मृत शरीर)-को लेकर श्रेष्ठ प्रमथगणोंके साथ महादेव (कालभैरव) भवनके अंदर प्रविष्ट हुए। जगत्के कारणरूप ईश्वर (कालभैरव)-को देखकर भगवान् हरिने अपने ललाटका भेदनकर रक्तकी धारा गिरायी और कहा—अपरिमेय तेजरूप भगवन्! आप मेरी भिक्षा ग्रहण करें। त्रिपुरमर्दन! आपके लिये कोई अप्रकट (अमङ्गलजनक भिक्षा) नहीं है ॥ ८८-९० ॥

४१२ * कूर्मपुराण *


न सम्पूर्णं कपालं तद् ब्रह्मणः परमेष्ठिनः।<br>दिव्यं वर्षसहस्रं तु सा च धारा प्रवाहिता ॥ ९१ ॥हजारों दिव्य वर्षोंतक वह (रक्तकी) धारा प्रवाहित होती रही, किंतु परमेष्ठी ब्रह्माका वह (कालभैरवके हाथमें विद्यमान) कपाल भरा नहीं। तब नारायण
अथाब्रवीत् कालरुद्रं हरिनारायणः प्रभुः।<br>संस्तूय वैदिकैर्मन्त्रैर्बहुमानपुरःसरम्॥ ९२ ॥प्रभु हरिने वैदिक मन्त्रोंद्वारा अत्यन्त आदरपूर्वक स्तुति कर भगवान् कालरुद्रसे कहा—आपने ब्रह्माका यह सिर किस कारणसे धारण कर रखा है? तब
किमर्थमेतद् वदनं ब्रह्मणो भवता धृतम्।<br>प्रोवाच वृत्तमखिलं भगवान् परमेश्वरः ॥ ९३ ॥परमेश्वर भगवान् (कालभैरव)-ने सम्पूर्ण वृत्तान्त बतलाया ॥ ९१-९३॥
समाहूय हृषीकेशो ब्रह्महत्यामथाच्युतः।<br>प्रार्थयामास देवेशो विमुञ्चेति त्रिशूलिनम् ॥ ९४ ॥तदनन्तर हृषीकेश देवेश भगवान् अच्युतने ब्रह्महत्याको बुलाकर प्रार्थना की—त्रिशूली (कालभैरव)-को छोड़ दो। मुरारि विष्णुद्वारा प्रार्थना करनेपर भी उसने (कालभैरवके)
न तत्याजाथ सा पार्श्वं व्याहृतापि मुरारिणा।<br>चिरं ध्यात्वा जगद्योनिः शंकरं प्राह सर्ववित् ॥ ९५ ॥पार्श्वका त्याग नहीं किया। तब जगद्योनि सर्वज्ञ (विष्णु)-ने देरतक ध्यानकर शंकर (कालभैरव)-से कहा—
व्रजस्व भगवन् दिव्यां पुरीं वाराणसीं शुभाम्।<br>यत्राखिलजगद्दोषं क्षिप्रं नाशयतीश्वरः ॥ ९६ ॥भगवन्! आप दिव्य एवं मङ्गल करनेवाली वाराणसीपुरी जायें, जहाँ ईश्वर सम्पूर्ण सांसारिक दोषोंको शीघ्र ही नष्ट कर देते हैं॥ ९४—९६॥
ततः सर्वाणि गुह्यानि तीर्थान्यायतननानि च।<br>जगाम लीलया देवो लोकानां हितकाम्यया ॥ ९७ ॥तब वे महायोगी कालभैरव अपने हाथमें (विष्णु-पार्षद विष्वक्सेनका) कलेवर लेकर वाराणसीपुरीके दर्शनकी प्रसन्नतामें नृत्य करते हुए सर्वप्रथम अति-गोपनीय सभी तीर्थों एवं देवस्थानोंमें देवताओंके हितकी
संस्तूयमानः प्रमथैर्महायोगैरितस्ततः।<br>नृत्यमानो महायोगी हस्तन्यस्तकलेवरः ॥ ९८ ॥कामनासे गये। कालभैरवके चारों ओर महायोगी प्रमथगण उनकी स्तुति करते हुए चल रहे थे। उन (कालभैरव)-का नृत्य देखनेकी लालसावाले भगवान्
तमभ्यधावद् भगवान् हरिनारायणः स्वयम्।<br>अथास्थायापरं रूपं नृत्यदर्शनलालसः ॥ ९९ ॥नारायण हरि दूसरा रूप धारणकर स्वयं उनके पीछे-पीछे चलने लगे ॥ ९७-९९॥
निरीक्षमाणो गोविन्दं वृषेन्द्राङ्कितशासनः।<br>सस्मितोऽनन्ययोगात्मा नृत्यति स्म पुनः पुनः ॥ १०० ॥श्रेष्ठ वृषभके चिह्नसे अङ्कित शासन (ध्वजा)-वाले अनन्त योगात्मरूप (शंकर) गोविन्दको देखते हुए प्रसन्नतापूर्वक बार-बार नृत्य करने लगे। तदनन्तर
अथ सानुचरो रुद्रः सहरिर्धर्मवाहनः।<br>भेजे महादेवपुरीं वाराणसीमिति श्रुताम्॥ १०१ ॥अनुचरों और हरिके सहित धर्मरूपी वृषभको वाहनके रूपमें स्वीकार करनेवाले रुद्र (कालभैरव) वाराणसी इस नामसे प्रसिद्ध महादेवकी पुरीमें पहुँचे ॥ १००-१०१ ॥
प्रविष्टमात्रे देवेशे ब्रह्महत्या कपर्दिनि।<br>हा हेत्युक्त्वा सनादं सा पाताल प्राप दुःखिता॥ १०२॥कपर्दी देवेशके वहाँ प्रवेश करते ही वह ब्रह्महत्या तीव्र स्वरसे हाहाकार करती हुई दुःखी होकर पातालमें चली गयी ॥ १०२ ॥
* अध्याय ३१ *४१३
प्रविश्य परमं स्थानं कपालं ब्रह्मणो हरः।<br>गणानामग्रतो देवः स्थापयामास शंकरः॥ १०३॥<br><br>स्थापयित्वा महादेवो ददौ तच्च कलेवरम्।<br>उक्त्वा सजीवमस्त्वीशो विष्णवे स घृणानिधिः॥ १०४॥श्रेष्ठ स्थान (वाराणसी)-में प्रविष्ट होकर देव हर शंकर (कालभैरव)-ने गणोंके सामने ब्रह्माके कपालको स्थापित किया और उन्हीं करुणानिधि ईश महादेव (कालभैरव)-ने 'जीवित हो जाय' ऐसा कहकर (विष्वक्सेनका) कलेवर विष्णु (हरि भगवान्)-को दे दिया॥ १०३-१०४॥
ये स्मरन्ति ममाजस्त्रं कापालं वेषमुत्तमम्।<br>तेषां विनश्यति क्षिप्रमिहामुत्र च पातकम्॥ १०५॥<br><br>आगम्य तीर्थप्रवरे स्नानं कृत्वा विधानतः।<br>तर्पयित्वा पितॄन् देवान् मुच्यते ब्रह्महत्यया॥ १०६॥<br><br>अशाश्वतं जगज्ज्ञात्वा येऽस्मिन् स्थाने वसन्ति वै।<br>देहान्ते तत् परं ज्ञानं ददामि परमं पदम्॥ १०७॥<br><br>इतीदमुक्त्वा भगवान् समालिङ्ग्य जनार्दनम्।<br>सहैव प्रमथेशानैः क्षणादन्तरधीयत॥ १०८॥मेरे इस कपालयुक्त उत्तम वेषका (रूपका) निरन्तर स्मरण करनेसे ऐहलौकिक तथा पारलौकिक सब पाप शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं। इस श्रेष्ठ (वाराणसीके कपालमोचन) तीर्थमें आकर स्नान करके विधिपूर्वक पितरों तथा देवताओंका तर्पण करनेसे ब्रह्महत्यासे मुक्ति मिल जाती है। संसारको अनित्य जानकर जो इस स्थानमें निवास करते हैं, उन्हें देहान्तके समयमें परम ज्ञान और परम पद प्रदान करता हूँ। ऐसा कहकर भगवान् (कालभैरव) जनार्दनका आलिंगनकर प्रमथेश्वरोंके साथ ही क्षणभरमें अन्तर्धान हो गये॥ १०५-१०८॥
स लब्ध्वा भगवान् कृष्णो विष्वक्सेनं त्रिशूलिनः।<br>स्वं देशमगमत् तूर्णं गृहीत्वा परमं वपुः॥ १०९॥वे भगवान् कृष्ण (हरि) त्रिशूलीसे विष्वक्सेनको प्राप्तकर* अपना परम रूप धारणकर शीघ्र ही अपने स्थानको चले गये॥ १०९॥
एतद् वः कथितं पुण्यं महापातकनाशनम्।<br>कपालमोचनं तीर्थं स्थाणोः प्रियकरं शुभम्॥ ११०॥<br><br>य इमं पठतेऽध्यायं ब्राह्मणानां समीपतः।<br>वाचिकैर्मानसैः पापैः कायिकैश्च विमुच्यते॥ १११॥आप लोगोंसे स्थाणु (शंकर)-को अत्यन्त प्रिय, महापातकोंको नष्ट करनेवाले, पवित्र एवं मङ्गलकारी इस कपालमोचन तीर्थके विषयमें मैंने बताया। जो ब्राह्मणोंके समीप इस अध्यायका पाठ करता है, वह कायिक, वाचिक तथा मानसिक (त्रिविध) पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ११०-१११॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे एकत्रिंशोऽध्यायः॥ ३१॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें इकतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३१॥


* इसी अध्यायके ९९वें श्लोकके अनुसार श्रीहरिने दूसरा रूप धारणकर श्रीकालभैरवके साथ वाराणसीमें प्रवेश किया था, अब अपने पार्षद विष्वक्सेनके शरीरको प्राप्तकर अपने वास्तविक स्वरूपसे अपने धाम जा रहे हैं।

४१४ * कूर्मपुराण *


बत्तीसवाँ अध्याय

प्रायश्चित्त*-प्रकरणमें महापातकोंके प्रायश्चित्तका विधान तथा अन्य उपपातकोंसे शुद्धिका उपाय

व्यास उवाचव्यासजीने कहा—सुरापान करनेवाले द्विजोत्तमको अग्निके समान वर्णवाली प्रतप्त (अति उष्ण) सुराका स्वयं पान करना चाहिये। उससे शरीरके दग्ध होनेपर वह (पापसे) मुक्त हो जाता है। अथवा अग्निके समान रंगवाला (अति उष्ण) गोमूत्र या गोबरका रस अथवा (गौका) दुग्ध, घृत या जल पीनेपर द्विज (पापसे) मुक्त हो जाता है। उस (सुरापानजन्य) पापके शमनके लिये जलसे भींगा वस्त्र धारणकर तथा प्रयत्नपूर्वक नारायण हरिका ध्यान कर पुनः ब्रह्महत्यासम्बन्धी (प्रायश्चित्त) व्रतका पालन करना चाहिये॥ १–३॥
सुरापस्तु सुरां तप्तामग्निवर्णां स्वयं पिबेत्।<br>तया स काये निर्दग्धे मुच्यते तु द्विजोत्तमः॥ १॥
गोमूत्रमग्निवर्णं वा गोशकृद्रसमेव वा।<br>पयो घृतं जलं वाथ मुच्यते पातकात् ततः॥ २॥
जलार्द्रवासाः प्रयतो ध्यात्वा नारायणं हरिम्।<br>ब्रह्महत्याव्रतं चाथ चरेत् तत्पापशान्तये॥ ३॥
सुवर्णस्तेयकृद् विप्रो राजानमभिगम्य तु।<br>स्वकर्म ख्यापयन् ब्रूयान्मां भवाननुशास्त्विति॥ ४॥सुवर्णकी चोरी करनेवाले ब्राह्मणको चाहिये कि वह राजाके पास जाकर अपने (पाप) कर्मको बताते हुए कहे—'आप मुझे दण्डित करें'। राजा मूसल लेकर स्वयं उसे एक बार मारे। इस प्रकार वध हो जानेपर ब्राह्मण चोरी-रूप (महापाप)-से शुद्ध हो जाता है अथवा तपस्या करनेसे वह शुद्ध होता है। मूसल अथवा खैरकी लकड़ीकी लाठी और दोनों ओर तीक्ष्ण धारवाली शक्ति या लोहेका दण्ड कंधेपर लेकर उस (पापयुक्त ब्राह्मण)-को राजाके पास केश खोले दौड़ते हुए जाना चाहिये और अपने उस (पापकर्म)-को बताते हुए कहना चाहिये—'मैंने यह कर्म किया है, आप मुझे दण्ड दें।' दण्डसे अथवा (यथाशास्त्र प्रायश्चित्तपूर्वक शरीर) परित्याग कर देनेसे सुवर्ण-चोर चोरी (-रूप पापकर्म)-से मुक्त हो जाता है। उसको दण्डित न करनेसे तो राजा चोरका पाप (स्वयं) प्राप्त कर लेता है। तपस्याद्वारा सुवर्णकी चोरीसे उत्पन्न पापको दूर करनेकी इच्छा रखनेवाले द्विजको चाहिये कि वह चीर (फटे-पुराने) वस्त्र धारण करके जंगलमें जाकर ब्रह्महत्या-सम्बन्धी (प्रायश्चित्त) व्रतका पालन करे॥ ४–९॥
गृहीत्वा मुसलं राजा सकृद् हन्यात् ततः स्वयम्।<br>वधे तु शुद्ध्यते स्तेनो ब्राह्मणस्तपसैव वा॥ ५॥
स्कन्धेनादाय मुसलं लकुटं वाऽपि खादिरम्।<br>शक्तिं चोभयतस्तीक्ष्णामायसं दण्डमेव वा॥ ६॥
राजा तेन च गन्तव्यो मुक्तकेशेन धावता।<br>आचक्षाणेन तत्पापमेवंकर्माऽस्मि शाधि माम्॥ ७॥
शासनाद् वा विमोक्षाद् वा स्तेनः स्तेयाद् विमुच्यते।<br>अशासित्वा तु तं राजा स्तेनस्याप्नोति किल्बिषम्॥ ८॥
तपसाऽपनुनुत्सुस्तु सुवर्णस्तेयजं मलम्।<br>चीरवासा द्विजोऽरण्ये चरेद् ब्रह्महणो व्रतम्॥ ९॥

* 'प्रायः' का अर्थ तप है। चित्तका अर्थ निश्चय है। इसलिये दृढ़-संकल्पपूर्वक तप करना ही प्रायश्चित्तका आचरण है (याज्ञ० मिता० श्लोक २७५)। मनुस्मृति अ० ११ तथा याज्ञ० स्मृ० प्रायश्चित्त-प्रकरण आदिमें इस कूर्मपुराणके अध्यायके अनुसार प्रायः सूक्ष्म विचार करके प्रायश्चित्तका निर्णय किया गया है। अपेक्षानुसार प्रायश्चित्त-निर्णय वहींसे करना चाहिये। इस अध्यायमें प्रायश्चित्तकी दिशामात्रका संक्षेपमें निर्देश है।

* अध्याय ३२ *४१५
स्नात्वाश्वमेधावभृथे पूतः स्यादथवा द्विजः।<br>प्रदद्याद् वाऽथ विप्रेभ्यः स्वात्मतुल्यं हिरण्यकम्॥ १०॥<br><br>चरेद् वा वत्सरं कृच्छ्रं ब्रह्मचर्यपरायणः।<br>ब्राह्मणः स्वर्णहारी तु तत्पापस्यापनुत्तये॥ ११॥अथवा अश्वमेधयज्ञ-सम्बन्धी अवभृथ-स्नान करनेसे द्विज पवित्र हो जाता है। या (शुद्ध होनेके लिये) ब्राह्मणोंको अपने भारके बराबर स्वर्ण-दान करना चाहिये। अथवा सुवर्णकी चोरी करनेवाले ब्राह्मणको उस पापको दूर करनेके लिये एक वर्षतक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए कृच्छ्रव्रत करना चाहिये॥ १०-११॥
गुरोर्भार्यां समारुह्य ब्राह्मणः काममोहितः।<br>अवगूहेत् स्त्रियं तप्तां दीप्तां कार्ष्णायसीं कृताम्॥ १२॥<br><br>स्वयं वा शिश्नवृषणावुत्कृत्याधाय चाञ्जलौ।<br>आतिष्ठेद् दक्षिणामाशामानिपातादजिह्मगः॥ १३॥<br><br>गुर्वर्थं वा हतः शुध्येच्चरेद् वा ब्रह्महा व्रतम्।<br>शाखां वा कण्टकोपेतां परिष्वज्याथ वत्सरम्।<br>अधः शयीत नियतो मुच्यते गुरुतल्पगः॥ १४॥<br><br>कृच्छ्रं वाब्दं चरेद् विप्रश्चीरवासाः समाहितः।<br>अश्वमेधावभृथके स्नात्वा वा शुध्यते नरः॥ १५॥<br><br>कालेऽष्टमे वा भुञ्जानो ब्रह्मचारी सदाव्रती।<br>स्थानासनाभ्यां विहरंस्त्रिरहोऽभ्युपयन्नपः॥ १६॥<br><br>अधःशायी त्रिभिर्वर्षैस्तद् व्यपोहति पातकम्।<br>चान्द्रायणानि वा कुर्यात् पञ्च चत्वारि वा पुनः॥ १७॥कामसे मोहित होकर गुरुकी भार्याके साथ गमन करनेवाले ब्राह्मणको लोहेसे बनायी गयी कृष्णवर्णकी तप्त एवं उद्दीप्त स्त्रीका आलिङ्गन करना चाहिये। अथवा स्वयं लिङ्ग एवं अण्डकोशको काटकर और अपनी अञ्जलिमें रखकर निष्कपट-भावसे दक्षिण दिशाकी ओर तबतक जाना चाहिये, जबतक शरीरपात न हो जाय। गुरुके लिये मारे जानेसे भी गुरुपत्नीगामी शुद्ध हो जाता है अथवा ब्रह्महत्या-सम्बन्धी व्रतका पालन करना चाहिये या एक वर्षतक काँटोंसे युक्त शाखाका आलिङ्गन करते हुए गुरुपत्नीसे गमन करनेवालेको नियमपूर्वक नीचे भूमिपर सोना चाहिये। इससे वह गुरुपत्नीगामी पापमुक्त हो जाता है। अथवा ब्राह्मणको चीर (कन्था) वस्त्र धारणकर समाहित होकर एक वर्षतक कृच्छ्रव्रत करना चाहिये। या अश्वमेधयज्ञके अवभृथ-स्नान करनेसे व्यक्ति शुद्ध हो जाता है। अथवा सर्वदा ब्रह्मचर्यपूर्वक व्रत धारणकर अष्टमकाल (अर्थात् चौथे दिन, सायंकाल)-में भोजन करना चाहिये। इसके पूर्व प्रयत्नपूर्वक एक ही स्थानपर एक ही आसनसे रहकर केवल जल पीते हुए तीन दिन व्यतीत करना चाहिये। ऐसा करते हुए तीन वर्षोंतक भूमिपर शयन करनेसे उस (गुरुपत्नी-गमनरूप) पापसे छुटकारा मिलता है, अथवा चार या पाँच चान्द्रायणव्रत करना चाहिये॥ १२-१७॥
पतितैः सम्प्रयुक्तानामथ वक्ष्यामि निष्कृतिम्।<br>पतितेन तु संसर्गं यो येन कुरुते द्विजः।<br>स तत्पापापनोदार्थं तस्यैव व्रतमाचरेत्॥ १८॥<br><br>तप्तकृच्छ्रं चरेद् वाथ संवत्सरमतन्द्रितः।<br>षाण्मासिके तु संसर्गे प्रायश्चित्तार्धमर्हति॥ १९॥अब पतितों (पापियों)-के साथ संसर्ग करनेवालोंके निस्तारका उपाय (प्रायश्चित्त) बतलाता हूँ। जिस पतितके साथ जो द्विज (एक वर्षतक) संसर्ग करता है, उसे उस पतितद्वारा किये गये पापको दूर करनेके लिये विहित व्रतका (एक वर्षतक) पालन करना चाहिये। अथवा वर्षभरतक आलस्यरहित होकर तप्तकृच्छ्रव्रतका पालन करना चाहिये। छः महीनोंतक संसर्ग होनेपर उपर्युक्त व्रतका आधा प्रायश्चित्त करे॥ १८-१९॥

४१६ * कूर्मपुराण *


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एभिर्व्रतैरपोहन्ति महापातकिनो मलम्।<br>पुण्यतीर्थाभिगमनात् पृथिव्यां वाथ निष्कृतिः ॥ २० ॥इन व्रतोंके द्वारा महापातकी अपने पापको दूर करते हैं। अथवा पृथ्वीके पुण्य-तीर्थोंकी यात्रा करनेसे भी निष्कृति (निस्तार) हो जाती है॥ २०॥
ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्गनागमः।<br>कृत्वा तैश्चापि संसर्गं ब्राह्मणः कामकारतः ॥ २१ ॥ब्रह्महत्या, सुरापान, चोरी तथा गुरुपत्नीके साथ गमन करनेवाले अथवा स्वेच्छापूर्वक उनके साथ संसर्ग करनेवाले ब्राह्मणको भी पुण्य-तीर्थमें समाहित होकर
कुर्यादनशनं विप्रः पुण्यतीर्थे समाहितः।<br>ज्वलन्तं वा विशेदग्निं ध्यात्वा देवं कपर्दिनम् ॥ २२ ॥अनशनव्रत करना चाहिये अथवा कपर्दी भगवान् शंकरका ध्यान करते हुए जलती हुई अग्निमें प्रवेश करना चाहिये। धर्मवादी मुनियोंने (इसके अतिरिक्त)
न ह्यान्या निष्कृतिर्दृष्टा मुनिभिर्धर्मवादिभिः।<br>तस्मात् पुण्येषु तीर्थेषु दहेद् वापि स्वदेहकम् ॥ २३ ॥दूसरा प्रायश्चित्त नहीं बतलाया है, इसलिये पुण्य-तीर्थोंमें अपना शरीर जला देना चाहिये॥ २१-२३॥
गत्वा दुहितरं विप्रः स्वसारं वा स्नुषामपि।<br>प्रविशेज्ज्वलनं दीप्तं मतिपूर्वमिति स्थितिः ॥ २४ ॥(जान-बूझकर) अपनी पुत्री, बहिन या पुत्रवधूके साथ गमन करनेवालेको जलती हुई प्रदीप्त अग्निमें प्रवेश करना चाहिये। ऐसी मर्यादा है। मौसी, मामी, फूआ
मातृष्वसां मातुलानीं तथैव च पितृष्वसाम्।<br>भागिनेयीं समारुह्य कुर्यात् कच्छातिकृच्छ्रकौ ॥ २५ ॥तथा भांजीके साथ गमन करनेपर कृच्छ्र तथा अतिकृच्छ्र नामक व्रतोंको करना चाहिये और इन पापोंकी शान्तिके
चान्द्रायणं च कुर्वीत तस्य पापस्य शान्तये।<br>ध्यायन् देवं जगद्योनिमनादिनिधनं परम् ॥ २६ ॥लिये जगद्योनि अनादिनिधन परमदेवका ध्यान करते हुए चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। भाईकी पत्नीके साथ
भ्रातृभार्यां समारुह्य कुर्यात् तत्पापशान्तये।<br>चान्द्रायणानि चत्वारि पञ्च वा सुसमाहितः ॥ २७ ॥सहवास करनेपर उस पापकी शान्तिके लिये अच्छी प्रकार समाहित-मन होकर चार अथवा पाँच चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। फूआकी लड़की, मौसीकी लड़की
पैतृष्वत्रेयीं गत्वा तु स्वस्त्रीयां मातृरेव च।<br>मातुलस्य सुतां वापि गत्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥ २८ ॥अथवा मामाकी लड़कीके साथ गमन करनेपर चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। मित्रकी पत्नी तथा सालीके साथ सहवास
सखिभार्यां समारुह्य गत्वा श्यालीं तथैव च।<br>अहोरात्रोषितो भूत्वा तप्तकृच्छ्रं समाचरेत् ॥ २९ ॥करनेपर एक अहोरात्र उपवास करके तप्तकृच्छ्रव्रत करना चाहिये। रजस्वलाके साथ गमन करनेपर विप्र
उदक्यागमने विप्रस्त्रिरात्रेण विशुध्यति।<br>चाण्डालीगमने चैव तप्तकृच्छ्रत्रयं विदुः।<br>सह सांतपनेनास्य नान्यथा निष्कृतिः स्मृता ॥ ३० ॥तीन रातमें शुद्ध होता है और चाण्डालीके साथ गमन करनेपर तीन तप्तकृच्छ्र व्रतोंके साथ सांतपनव्रत करनेसे शुद्धि होती है। अन्य किसी प्रकारसे निष्कृति (निस्तार) नहीं कही गयी है॥ २४-३०॥
मातृगोत्रां समासाद्य समानप्रवरां तथा।<br>चान्द्रायणेन शुध्येत प्रयतात्मा समाहितः ॥ ३१ ॥माताके गोत्रकी अथवा समान प्रवरवाले कुलकी स्त्रीसे समागम करनेपर इन्द्रियजयी होकर एकाग्रतापूर्वक चान्द्रायणव्रत करनेसे शुद्धि होती है। (समागमके
ब्राह्मणो ब्राह्मणीं गत्वा कृच्छ्रमेकं समाचरेत्।<br>कन्यकां दूषयित्वा तु चरेच्चान्द्रायणव्रतम् ॥ ३२ ॥अयोग्य) ब्राह्मणीके साथ समागम करनेपर ब्राह्मणको एक कृच्छ्रव्रत करना चाहिये और कन्याको दूषित करनेपर चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। अमानुषी स्त्री,
अमानुषीषु पुरुष उदक्यायामयोनिषु।<br>रेतः सिक्त्वा जले चैव कृच्छ्रं सान्तपनं चरेत् ॥ ३३ ॥रजस्वला, अयोनि तथा जलमें वीर्यपात करनेपर पुरुषको कृच्छ्रसांतपनव्रत करना चाहिये॥ ३१-३३॥
  • अध्याय ३२ * ४१७

| बन्धकीगमने विप्रस्त्रिरात्रेण विशुध्यति।<br>गवि मैथुनमासेव्य चरेच्चान्द्रायणव्रतम्॥ ३४॥<br><br>अजावीमैथुनं कृत्वा प्राजापत्यं चरेद् द्विजः।<br>पतितां च स्त्रियं गत्वा त्रिभिः कृच्छ्रैर्विशुध्यति॥ ३५॥<br><br>पुल्कसीगमने चैव कृच्छ्रं चान्द्रायणं चरेत्।<br>नटीं शैलूषकीं चैव रजकीं वेणुजीविनीम्।<br>गत्वा चान्द्रायणं कुर्यात् तथा चर्मोपजीविनीम्॥ ३६॥<br>ब्रह्मचारी स्त्रियं गच्छेत् कथञ्चित्काममोहितः।<br>सप्तागारं चरेद् भैक्षं वसित्वा गर्दभाजिनम्॥ ३७॥<br><br>उपस्पृशेत् त्रिशवणं स्वपापं परिकीर्तयन्।<br>संवत्सरेण चैकेन तस्मात् पापात् प्रमुच्यते॥ ३८॥<br><br>ब्रह्महत्याव्रतं वापि षण्मासानाचरेद् यमी।<br>मुच्यते ह्यवकीर्णी तु ब्राह्मणानुमते स्थितः॥ ३९॥<br><br>सप्तरात्रमकृत्वा तु भैक्षचर्याग्निपूजनम्।<br>रेतसश्च समुत्सर्गे प्रायश्चित्तं समाचरेत्॥ ४०॥<br><br>ओंकारपूर्विकाभिस्तु महाव्याहृतिभिः सदा।<br>संवत्सरं तु भुञ्जानो नक्तं भिक्षाशनः शुचिः॥ ४१॥<br><br>सावित्रीं च जपेच्चैव नित्यं क्रोधविवर्जितः।<br>नदीतीरेषु तीर्थेषु तस्मात् पापाद् विमुच्यते॥ ४२॥<br>हत्वा तु क्षत्रियं विप्रः कुर्याद् ब्रह्मणो व्रतम्।<br>अकामतो वै षण्मासान् दद्यात् पञ्चशतं गवाम्॥ ४३॥<br><br>अब्दं चरेत नियतो वनवासी समाहितः।<br>प्राजापत्यं सान्तपनं तप्तकृच्छ्रं तु वा स्वयम्॥ ४४॥<br><br>प्रमाप्याकामतो वैश्यं कुर्यात् संवत्सरद्वयम्।<br>गोसहस्रं सपादं च दद्यात् ब्रह्मणो व्रतम्।<br>कृच्छ्रातिकृच्छ्रैर् वा कुर्याच्चान्द्रायणमथापि वा॥ ४५॥ | व्यभिचारिणी स्त्रीके साथ गमन करनेपर ब्राह्मण तीन रातमें शुद्ध होता है। गौके साथ मैथुन करनेपर चान्द्रायणव्रतका पालन करना चाहिये। बकरी या भेड़ीके साथ मैथुन करनेवाले द्विजको प्राजापत्य-व्रत करना चाहिये। पतित स्त्रीके साथ सहवास करनेपर तीन कृच्छ्रव्रतोंसे शुद्धि होती है। पुल्कसी (शूद्रामें निषादसे उत्पन्न स्त्री)-के साथ गमन करनेपर कृच्छ्रचान्द्रायणव्रत करना चाहिये। नटी, नर्तकी धोबिन, बाँसके द्वारा तथा चर्मके द्वारा जीविका निर्वाह करनेवाली स्त्रीके साथ मैथुन करनेपर चान्द्रायणव्रत करना चाहिये॥ ३४—३६॥<br><br>कदाचित् यदि कामसे मोहित होकर ब्रह्मचारी स्त्रीके साथ गमन करता है तो उसे गदहेका चर्म धारणकर सात घरोंसे भिक्षा माँगनी चाहिये। अपने पापको प्रकट करते हुए तीनों कालोंमें स्नान करना चाहिये। इस प्रकार एक वर्षतक करनेसे वह इस पापसे मुक्त हो जाता है। अवकीर्णी (ब्रह्मचर्यव्रतसे च्युत संन्यासी या ब्रह्मचारी) ब्राह्मणके कथनानुसार संयमपूर्वक छः मासतक ब्रह्महत्या-सम्बन्धी व्रत करनेसे (इस पापसे) मुक्त हो जाता है। यदि सात अहोरात्रतक समर्थ रहनेपर भी भिक्षाचरण तथा अग्निहोत्र न करे तथा बुद्धिपूर्वक अपने शुक्र (वीर्य)-का परित्याग करे तो इस प्रकारका प्रायश्चित्त करना चाहिये—नदी-तीरमें अथवा तीर्थमें एक वर्षतक शान्तभावसे पवित्रताके साथ प्रणव एवं महाव्याहृतियोंसे युक्त सावित्री (गायत्री)-का निरन्तर जप करे और भिक्षामात्रसे प्राप्त अन्न केवल रात्रिमें ग्रहण करे। ऐसा करनेसे उपर्युक्त दोनों पापोंसे मुक्ति मिलती है॥ ३७—४२॥<br><br>बुद्धिपूर्वक क्षत्रियकी हत्या करनेपर ब्राह्मणको ब्रह्महत्या-सम्बन्धी व्रतका पालन करना चाहिये। अनचाहे क्षत्रियकी हत्या हो जानेपर छः महीनेतक पाँच सौ गायोंका दान करना चाहिये। अथवा स्वयं वनमें रहते हुए एक वर्षतक एकाग्रतापूर्वक संयमित होकर प्राजापत्य, सान्तपन अथवा तप्तकृच्छ्रव्रत करना चाहिये। अनिच्छापूर्वक वैश्यकी हत्या करनेपर दो वर्षतक ब्रह्महत्या-सम्बन्धी व्रतका पालन करना चाहिये तथा एक हजार दो सौ पचास गायोंका दान करना चाहिये अथवा कृच्छ्र या अतिकृच्छ्रव्रत एवं चान्द्रायणव्रत करना चाहिये॥ ४३—४५॥ |

४१८ * कूर्मपुराण *

संवत्सरं व्रतं कुर्याच्छूद्रं हत्वा प्रमादतः।<br>गोसहस्रार्थपादं च दद्यात् तत्पापशान्तये॥ ४६॥प्रमादवश शूद्रकी हत्या करनेपर इस पापके शमनके लिये एक वर्षतक ब्रह्महत्याका व्रत करना चाहिये और एक हजार एक सौ पचीस गौओंका दान करना चाहिये॥ ४६॥
अष्टौ वर्षाणि षट् त्रीणि कुर्याद् ब्रह्महणो व्रतम्।<br>हत्वा तु क्षत्रियं वैश्यं शूद्रं चैव यथाक्रमम्॥ ४७॥क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र—इनमेंसे किसी एकका वध करनेपर क्रमशः आठ, छः तथा तीन वर्षतक ब्रह्महत्या-सम्बन्धी व्रतका पालन करना चाहिये। ब्राह्मणीकी हत्या करनेपर ब्राह्मणको आठ वर्षतक ब्रह्महत्याके व्रतका पालन करना चाहिये। क्षत्राणीकी हत्या करनेपर छः वर्षतक और वैश्याकी हत्या होनेपर तीन वर्षतक तथा शूद्राकी हत्या होनेपर एक वर्षतक ब्रह्महत्या-सम्बन्धी व्रतका पालन करनेसे द्विजोत्तम शुद्ध हो जाता है।
निहत्य ब्राह्मणीं विप्रस्त्वष्टवर्षं व्रतं चरेत्।<br>राजन्यां वर्षषट्कं तु वैश्यां संवत्सरत्रयम्।<br>वत्सरेण विशुद्ध्येत शूद्रां हत्वा द्विजोत्तमः॥ ४८॥
वैश्यां हत्वा प्रमादेन किञ्चिद् दद्याद् द्विजातये।<br>अन्त्यजानां वधे चैव कुर्याच्चान्द्रायणं व्रतम्।<br>पराकेणाथवा शुद्धिरित्याह भगवानजः॥ ४९॥प्रमादवश वैश्यकी स्त्रीकी हत्या करनेपर द्विजको किञ्चित् दान करना चाहिये। अन्त्यजोंका वध होनेपर चान्द्रायण-व्रत करना चाहिये अथवा भगवान् ब्रह्माने पराकव्रतके द्वारा शुद्धि बतलायी है॥ ४७–४९॥
मण्डूकं नकुलं काकं दन्दशूकं च मूषिकम्।<br>श्वानं हत्वा द्विजः कुर्यात् षोडशांशं व्रतं ततः॥ ५०॥मेढक, नकुल, कौआ, दन्दशूक (हिंसक जन्तु), चूहा अथवा कुत्तेकी हत्या करनेपर द्विजको व्रतके सोलहवें अंशका पालन करना चाहिये। कुत्तेकी हत्या करनेपर सावधान होकर तीन रात्रिपर्यन्त दूधमात्र पीकर रहना चाहिये। बिल्ली अथवा नेवलेका वध हो जानेपर एक योजन (चार कोस)-तक मार्गमें (अनशनपूर्वक) चलना चाहिये। द्विजको अश्वका वध करनेपर बारह रात्रिपर्यन्त कृच्छ्रव्रत करना चाहिये। द्विजोत्तमको चाहिये कि वह सर्पको मारनेपर काले लोहेकी अभ्री (तीक्ष्ण अग्रभागवाला लोहदण्ड)-की प्रतिमा दान करे। साँड़की हत्या करनेपर एक भार धानकी भूसी तथा एक मासा सीसा दान देना चाहिये॥ ५०–५२॥
पयः पिबेत् त्रिरात्रं तु श्वानं हत्वा सुयन्त्रितः।<br>मार्जारं वाथ नकुलं योजनं वाध्वनो व्रजेत्।<br>कृच्छ्रं द्वादशरात्रं तु कुर्यादश्ववधे द्विजः॥ ५१॥
अभ्रीं कार्ष्णायसीं दद्यात् सर्पं हत्वा द्विजोत्तमः।<br>पलालभारं षण्डं च सैसकं चैकमाषकम्॥ ५२॥
घृतकुम्भं वराहं च तिलद्रोणं च तित्तिरिम्।<br>शुकं द्विहायनं वत्सं क्रौञ्चं हत्वा त्रिहायनम्॥ ५३॥वराहकी हत्या करनेपर घृतसे भरा घड़ा और तितिरकी हत्या करनेपर एक द्रोण तिल देना चाहिये। शुककी हत्या करनेपर दो वर्षतकके (गायका) बछड़ा, क्रौञ्चको मारनेपर तीन वर्षके (गायके ) बछड़ेका दान करना चाहिये। हंस, बलाका (वक-पंक्ति), बक (बगुला), मोर, वानर, बाज एवं गिद्धका वध करनेपर ब्राह्मणके लिये गौका दान करना चाहिये॥ ५३- ५४॥
हत्वा हंसं बलाकां च बकं बर्हिणमेव च।<br>वानरं श्येनभासौ च स्पर्शयेद् ब्राह्मणाय गाम्॥ ५४॥
* अध्याय ३३ *४१९

क्रव्यादांस्तु मृगान् हत्वा धेनुं दद्यात् पयस्विनीम्।
अक्रव्यादान् वत्सतरीमुष्ट्रं हत्वा तु कृष्णलम्॥ ५५॥

किञ्चिदेव तु विप्राय दद्यादस्थिमतां वधे।
अनस्थां चैव हिंसायां प्राणायामेन शुध्यति ॥ ५६ ॥
फलदानां तु वृक्षाणां छेदने जप्यमृक्शतम्।
गुल्मवल्लीलतानां तु पुष्पितानां च वीरुधाम्॥ ५७ ॥
अन्येषां चैव वृक्षाणां सरसानां च सर्वशः।
फलपुष्पोद्भवानां च घृतप्राशो विशोधनम्॥ ५८ ॥
हस्तिनां च वधे दृष्टं तप्तकृच्छ्रं विशोधनम्।
चान्द्रायणं पराकं वा गां हत्वा तु प्रमादतः।
मतिपूर्वं वधे चास्याः प्रायश्चित्तं न विद्यते॥ ५९ ॥ | मांस भक्षण करनेवाले अरण्यके पशुओं (व्याघ्र आदि)-की हत्या करनेपर पयस्विनी गौका दान करना चाहिये। मांस न खानेवाले पशुओं—हरिण, खंजरीट आदिकी हत्या करनेपर (गौकी) बछड़ीका दान करना चाहिये और ऊँटका वध करनेपर कृष्णलका (घुंघची अर्थात् एक रत्ती सुवर्णका) दान करना चाहिये। अस्थिवाले पशु-पक्षीका वध करनेपर ब्राह्मणको किञ्चित् दान करना चाहिये और बिना अस्थिवाले पशु-पक्षीका वध होनेपर प्राणायाम करनेसे शुद्धि होती है॥ ५५-५६॥
फलदार वृक्षोंके काटनेपर एक सौ ऋचाओंका जप करना चाहिये। गुल्म, वल्ली, लता तथा फूलवाले वृक्षों और अन्य सभी प्रकारके रसवाले, फल तथा पुष्प देनेवाले वृक्षोंको नष्ट करनेपर घृत-प्राशन करनेसे शुद्धि होती है। हाथीका वध करनेपर तप्तकृच्छ्रव्रत करनेसे शुद्धि होती है। प्रमादवश गौकी हत्या करनेपर चान्द्रायण अथवा पराकव्रत करना चाहिये और जान-बूझकर वध करनेपर इस हिंसाका कोई प्रायश्चित्त नहीं है॥ ५७-५९॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें बत्तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३२॥


तैंतीसवाँ अध्याय

प्रायश्चित्त-प्रकरणमें चोरी तथा अभक्ष्य-भक्षणका प्रायश्चित्त, प्रकीर्ण पापोंका प्रायश्चित्त, समस्त पापोंकी एकत्र मुक्तिके विविध उपाय, पतिव्रताको कोई पाप नहीं लगता, पतिव्रताके माहात्म्यमें देवी सीताका आख्यान, सीताद्वारा अग्निस्तुति, ज्ञानयोगकी प्रशंसा तथा प्रायश्चित्त-प्रकरणका उपसंहार

व्यास उवाच
मनुष्याणां तु हरणं कृत्वा स्त्रीणां गृहस्य च।
वापीकूपजलानां च शुध्येच्चान्द्रायणेन तु॥ १॥
द्रव्याणामल्पसाराणां स्तेयं कृत्वान्यवेश्मतः।
चरेत् सांतपनं कृच्छ्रं तन्निर्यात्यात्मशुद्धये॥ २॥
धान्यान्नधनचौर्यं तु कृत्वा कामाद् द्विजोत्तमः।
स्वजातीयगृहादेव कृच्छ्रार्धेन विशुध्यति॥ ३॥
भक्ष्यभोज्यापहरणे यानशय्यासनस्य च।
पुष्पमूलफलानां च पञ्चगव्यं विशोधनम्॥ ४॥
तृणकाष्ठद्रुमाणां च शुष्कान्नस्य गुडस्य च।
चैलचर्मामिषाणां च त्रिरात्रं स्यादभोजनम्॥ ५॥ | व्यासजीने कहा— मनुष्य, स्त्री, गृह, वापी, कूप तथा जलाशयोंका अपहरण करनेपर चान्द्रायणव्रत करनेसे शुद्धि होती है। दूसरेके घरोंसे अल्प सारवाली अर्थात् सामान्य वस्तुओंकी चोरी करनेपर उस पापसे अपनी शुद्धिके लिये कृच्छ्रसान्तपनव्रत करना चाहिये। द्विजोत्तम यदि इच्छापूर्वक अपनी जातिवाले बान्धवोंके घरसे धान्य, अन्न अथवा धनकी चोरी करे तो अर्धकृच्छ्रव्रतका पालन करनेसे शुद्ध होता है। भक्ष्य एवं भोज्य पदार्थों तथा यान, शय्या, आसन, पुष्प, मूल तथा फलोंकी चोरीकी शुद्धि पञ्चगव्य-प्राशनसे होती है। तृण, काष्ठ, वृक्ष, शुष्कान्न, गुड़, वस्त्र, चर्म तथा मांसकी चोरी करनेपर तीन रात्रितक भोजन नहीं करना चाहिये॥ १-५॥

४२० * कूर्मपुराण *


मणिमुक्ताप्रवालानां ताम्रस्य रजतस्य च।
अयःकांस्योपलानां च द्वादशाहं कणाशनम्॥ ६ ॥

कार्पासकीटजोर्णानां द्विशफैकशफस्य च।
पक्षिगन्धौषधीनां च रज्ज्वाश्चैव त्र्यहं पयः॥ ७ ॥

मणि, मोती, मूूँगा, ताँबा, चाँदी, लोहा, काँसा तथा पत्थरकी चोरी करनेपर बारह दिनतक कण (टूटे चावल)-का भक्षण करना चाहिये। कपास, रेशम, ऊन, दो खुर तथा एक खुरवाले पशु, पक्षी, गन्ध, औषधि तथा रस्सीका हरण करनेपर तीन दिनतक जलमात्र पीकर रहना चाहिये॥ ६-७॥

नरमांसाशनं कृत्वा चान्द्रायणमथाचरेत्।
काकं चैव तथा श्वानं जग्ध्वा हस्तिनमेव च।
वराहं कुक्कुटं चाथ तप्तकृच्छ्रेण शुध्यति॥ ८ ॥

क्रव्यादानां च मांसानि पुरीषं मूत्रमेव च।
गोगोमायुकपीनां च तदेव व्रतमाचरेत्।
उपोष्य द्वादशाहं तु कूष्माण्डैर्जुहुयाद् घृतम्॥ ९ ॥

नकुलोलूकमार्जारं जग्ध्वा सांतपनं चरेत्।
श्वापदोष्ट्रखराञ्जग्ध्वा तप्तकृच्छ्रेण शुध्यति।
व्रतवच्चैव संस्कारं पूर्वेण विधिनेव तु॥ १०॥

मनुष्यका मांस भक्षण करनेपर चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। कौआ, कुत्ता, हाथी, वराह और कुक्कुटका मांस खानेपर तप्तकृच्छ्रव्रतसे शुद्धि होती है। कच्चा मांस खानेवाले जानवरों, सियारों तथा बंदरोंका मांस तथा मल-मूत्र भक्षण करनेपर तप्तकृच्छ्रव्रत करना चाहिये तथा बारह दिनोंतक उपवास करके कूष्माण्ड-संज्ञक मन्त्रोंसे घीकी आहुति देनी चाहिये। नेवला, उल्लू तथा बिल्लीका मांस भक्षण करनेपर सान्तपनव्रत करना चाहिये। शिकारी पशु, ऊँट और गदहेका मांस खानेपर तप्तकृच्छ्रव्रतसे शुद्धि होती है। पहले निर्दिष्ट विधानके अनुसार व्रतके समान ही संस्कार भी करना चाहिये॥ ८-१०॥

बकं चैव बलाकं च हंसं कारण्डवं तथा।
चक्रवाकं प्लवं जग्ध्वा द्वादशाहमभोजनम्॥ ११ ॥

कपोतं टिट्टिभं चैव शुकं सारसमेव च।
उलूकं जालपादं च जग्ध्वाप्येतद् व्रतं चरेत्॥ १२॥

शिशुमारं तथा चाषं मत्स्यमांसं तथैव च।
जग्ध्वा चैव कटाहारमेतदेव चरेद् व्रतम्॥ १३॥

कोकिलं चैव मत्स्यांश्च मण्डूकं भुजगं तथा।
गोमूत्रयावकाहारो मासेनैकेन शुध्यति॥ १४॥

जलेचरांश्च जलजान् प्रतुदान् नखविष्किरान्।
रक्तपादांस्तथा जग्ध्वा सप्ताहं चैतदाचरेत्॥ १५॥

शुनो मांसं शुष्कमांसमात्मार्थं च तथा कृतम्।
भुक्त्वा मासं चरेदेतत् तत्पापस्यापनुत्तये॥ १६॥

वार्ताकं भूस्तृणं शिग्रुं खुखुण्डं करकं तथा।
प्राजापत्यं चरेज्जग्ध्वा शंखं कुम्भीकमेव च॥ १७॥

बक (बगुला), बलाक (बक-पंक्ति), हंस, कारण्डव, चक्रवाक तथा प्लव पक्षीका मांस भक्षण करनेपर बारह दिनतक भोजन (अन्न ग्रहण) नहीं करना चाहिये। कपोत, टिट्टिभ, शुक, सारस, उलूक तथा कलहंसका मांस भक्षण करनेपर भी यही व्रत (बारह दिनतक उपवास) करना चाहिये। शिशुमार, नीलकण्ठ, मछलीका मांस तथा गीदड़का मांस भक्षण करनेपर भी यही (उपर्युक्त) व्रत करना चाहिये। कोयल, मत्स्य, मेढक तथा सर्प भक्षण करनेपर एक मासतक गोमूत्रमें अधपके यवका या यवके सत्तू आदिका भक्षण करनेसे शुद्धि होती है। जलचर, जलज, प्रतुद अर्थात् चोंचद्वारा ठोकर मारकर आहार करनेवाले कौआ आदि, नखविष्किर अर्थात् तितिर आदि और लाल पैरवाले पक्षियोंका मांस भक्षण करनेपर एक सप्ताह्तक यह (उपर्युक्त) व्रत करना चाहिये। कुत्तेका मांस, सूखा मांस तथा अपने लिये बनाया मांस खानेपर उस पापको हटानेके लिये एक महीनेतक यह (ऊपर कहा गया) व्रत करना चाहिये। बैगन, भूस्तृण, सहजन, खुखुण्ड, करक, शङ्ख और कुम्भीकका भक्षण करनेपर प्राजापत्यव्रत करना चाहिये॥ ११-१७॥

* अध्याय ३३ *४२१

| पलाण्डुं लशुनं चैव भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत्।<br>नालिकां तण्डुलीयं च प्राजापत्येन शुध्यति ॥ १८ ॥<br><br>अश्मान्तकं तथा पोतं तप्तकृच्छ्रेण शुध्यति।<br>प्राजापत्येन शुद्धिः स्यात् कक्कुभाण्डस्य भक्षणे ॥ १९ ॥<br><br>अलाबुं किंशुकं चैव भुक्त्वा चैतद् व्रतं चरेत्।<br>उदुम्बरं च कामेन तप्तकृच्छ्रेण शुध्यति ॥ २० ॥ | प्याज एवं लहसुन भक्षण करनेपर चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। नालिका शाक और तण्डुलीयक (चौलाई)-का साग खानेपर प्राजापत्य व्रतसे शुद्धि होती है। अश्मान्तक तथा पोतका भक्षण करनेपर तप्तकृच्छ्रव्रत करनेसे शुद्धि होती है। ककुभके अंडेका भक्षण करनेपर प्राजापत्य-व्रतसे शुद्धि होती है। अलाबु (वर्तुलाकार अर्थात् गोल लौकी) तथा किंशुक (पलाश)-का भक्षण करनेपर भी यही व्रत करना चाहिये। इच्छापूर्वक उदुम्बर (गूलर)-का भक्षण करनेपर तप्तकृच्छ्रसे शुद्धि होती है॥ १८-२०॥ | | वृथा कृसरसंयावं पायसापूपसंकुलम्।<br>भुक्त्वा चैवंविधं त्वन्नं त्रिरात्रेण विशुध्यति ॥ २१ ॥<br><br>पीत्वा क्षीराण्येपेयानि ब्रह्मचारी समाहितः।<br>गोमूत्रयावकाहारो मासेनैकेन शुध्यति ॥ २२ ॥<br><br>अनिर्दशाहं गोक्षीरं माहिषं चाजमेव च।<br>संधिन्याश्च विवत्सायाः पिबन् क्षीरमिदं चरेत् ॥ २३ ॥<br><br>एतेषां च विकाराणि पीत्वा मोहेन मानवः।<br>गोमूत्रयावकाहारः सप्तरात्रेण शुध्यति ॥ २४ ॥ | किसी शास्त्रीय उद्देश्यके बिना व्यर्थ ही या केवल अपने लिये कृसर (अन्न), संयाव (लपसी), खीर और मालपूआके समान पदार्थ भक्षण करनेपर तीन रात्रितक व्रत करनेसे शुद्धि होती है। पीनेके अयोग्य दूधका पान करनेपर सावधानीपूर्वक गोमूत्रमें पके यावकका आहार करनेसे एक मासमें ब्रह्मचारी शुद्ध होता है। ब्यानेके दस दिन हुए बिना अथवा गर्भिणी और बिना बच्चेवाली गौ, भैंस और बकरीका दूध पीनेपर यही व्रत करना चाहिये। इनके (दूधके) विकार अर्थात् घी-दही आदिका मोहवश भक्षण करनेपर मनुष्य सात रात्रितक गोमूत्रमें अधपके यवका अथवा यवके सत्तू आदिका भोजन करनेसे शुद्ध होता है॥ २१-२४॥ | | भुक्त्वा चैव नवश्राद्धे मृतके सूतके तथा।<br>चान्द्रायणेन शुद्ध्येत ब्राह्मणस्तु समाहितः ॥ २५ ॥<br><br>यस्याग्नौ हूयते नित्यं न यस्याग्रं न दीयते।<br>चान्द्रायणं चरेत् सम्यक् तस्यान्नप्राशने द्विजः ॥ २६ ॥<br><br>अभोज्यानां तु सर्वेषां भुक्त्वा चान्नमुपस्कृतम्।<br>अन्तावसायिनां चैव तप्तकृच्छ्रेण शुध्यति ॥ २७ ॥<br><br>चाण्डालान्नं द्विजो भुक्त्वा सम्यक् चान्द्रायणं चरेत्।<br>बुद्धिपूर्वं तु कृच्छाब्दं पुनः संस्कारमेव च ॥ २८ ॥ | (मृत्युके अनन्तर होनेवाले) नवश्राद्ध (मृत व्यक्तिके प्रथम दिनसे लेकर दशम दिनतक किये जानेवाले श्राद्ध), जननाशौच तथा मरणाशौचमें भोजन करनेपर ब्राह्मण समाहित होकर चान्द्रायणव्रत करनेसे शुद्ध होता है। जो (अधिकारी) न नित्य अग्निमें हवन करता है और न अग्रासन (भोजन करनेके पूर्व ब्राह्मण तथा अतिथिको भोजन कराता है, न गोग्रास ही निकालता है) देता है, उसका अन्न भक्षण करनेपर द्विजको चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। जो अभोज्य हैं उन सभीका तथा अन्त्यजोंका पक्वान्न ग्रहण करनेपर तप्तकृच्छ्रव्रतसे शुद्धि होती है। बिना जाने चाण्डालका अन्न भक्षण करके द्विजको भलीभाँति चान्द्रायणव्रत करना चाहिये और जान-बूझकर ऐसा करनेपर एक वर्षतक कृच्छ्रव्रतका पालन करके पुनः (द्विजत्व-प्राप्तिके लिये) संस्कार करना चाहिये॥ २५-२८॥ |

४२२* कूर्मपुराण *
असुरामद्यपानेन कुर्याच्चान्द्रायणव्रतम्।<br>अभोज्यान्नं तु भुक्त्वा च प्राजापत्येन शुध्यति॥ २९॥सुराभिन्न मद्यका पान करनेपर चान्द्रायणव्रत करना चाहिये और अभोज्यान्न-भक्षण करनेपर प्राजापत्यव्रतसे शुद्धि होती है। मल, मूत्र एवं वीर्यका भक्षण करनेपर भी यही (प्राजापत्य नामक) व्रत करना चाहिये। अन्य सभी न कहे गये पापोंमें यथाविधि एक दिनका उपवास करना चाहिये॥ २९-३०॥
विण्मूत्रप्राशनं कृत्वा रेतसश्चैतदाचरेत्।<br>अनादिष्टेषु चैकाहं सर्वत्र तु यथार्थतः॥ ३०॥<br>विड्वराखरोष्ट्राणां गोमायोः कपिकाकयोः।<br>प्राश्य मूत्रपुरीषाणि द्विजश्चान्द्रायणं चरेत्॥ ३१॥ग्रामसूकर, गदहा, ऊँट, शृगाल, बंदर तथा कौएके मल-मूत्रका भक्षण करनेपर द्विजको चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। अज्ञानसे मल-मूत्रका भक्षण करने और सुराका स्पर्श करनेपर तीनों वर्णवाले द्विजातियोंको पुनः संस्कार करना चाहिये। अज्ञानवश कच्चा मांसभक्षी पक्षियोंके मूत्र-पुरीषका भक्षण हो जानेपर द्विजोत्तमको महासांतपन नामक व्रत करना चाहिये। गृध्र,मेढक, कुरर पक्षी एवं विष्किर (नखसे बिखेरकर खानेवाले पक्षी)-का भक्षण करनेपर (अथवा इनके मूत्र-पुरीषादिका भक्षण करनेपर) कृच्छ्रव्रत करना चाहिये॥ ३१-३३॥
अज्ञानात् प्राश्य विण्मूत्रं सुरासंस्पृष्टमेव च।<br>पुनः संस्कारमर्हन्ति त्रयो वर्णा द्विजातयः॥ ३२॥
क्रव्यादं पक्षिणां चैव प्राश्य मूत्रपुरीषकम्।<br>महासांतपनं मोहात् तथा कुर्याद् द्विजोत्तमः।<br>भासमण्डूककुररे विष्किरे कृच्छ्रमाचरेत्॥ ३३॥<br>प्राजापत्येन शुध्येत ब्राह्मणोच्छिष्टभोजने।<br>क्षत्रिये तप्तकृच्छ्रं स्याद् वैश्ये चैवातिकृच्छ्रकम्।<br>शूद्रोच्छिष्टं द्विजो भुक्त्वा कुर्याच्चान्द्रायणव्रतम्॥ ३४॥ब्राह्मणका उच्छिष्ट भक्षण करनेपर प्राजापत्य-व्रतसे शुद्धि होती है। क्षत्रियोंका उच्छिष्ट भक्षण करनेपर तसकृच्छ्र नामक व्रत करना चाहिये, वैश्यका उच्छिष्ट ग्रहण करनेपर अतिकृच्छ्र और शूद्रका उच्छिष्ट ग्रहण करनेपर ब्राह्मणको चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। सुराके पात्रमें जल पीनेपर चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। कुत्तेका जूठा खानेपर द्विजकी शुद्धि तीन रात्रितक उपवास करनेसे होती है। कुत्तेका पीतशेष इच्छापूर्वक ग्रहण करनेवालेको तीन राततक गोमूत्रमें पके हुए यवान्नका आहारमात्र ग्रहण करना चाहिये॥ ३४-३५॥
सुराभाण्डोदरे वारि पीत्वा चान्द्रायणं चरेत्।<br>शुनोच्छिष्टं द्विजो भुक्त्वा त्रिरात्रेण विशुध्यति।<br>गोमूत्रयावकाहारः पीतशेषं च रागवान्॥ ३५॥
अपो मूत्रपुरीषाद्यैर्दूषिताः प्राशयेद् यदा।<br>तदा सांतपनं प्रोक्तं व्रतं पापविशोधनम्॥ ३६॥<br>चाण्डालकूपभाण्डेषु यदि ज्ञानात् पिबेज्जलम्।<br>चरेत् सांतपनं कृच्छ्रं ब्राह्मणः पापशोधनम्॥ ३७॥<br>चाण्डालेन तु संस्पृष्टं पीत्वा वारि द्विजोत्तमः।<br>त्रिरात्रेण विशुध्येत पञ्चगव्येन चैव हि॥ ३८॥<br>महापातकिसंस्पर्शं भुङ्क्तेऽस्नात्वा द्विजो यदि।<br>बुद्धिपूर्वं तु मूढात्मा तप्तकृच्छ्रं समाचरेत्॥ ३९॥<br>स्पृष्ट्वा महापातकिनं चाण्डालं वा रजस्वलाम्।<br>प्रमादाद् भोजनं कृत्वा त्रिरात्रेण विशुध्यति॥ ४०॥यदि मल तथा मूत्र आदिसे दूषित जलका पान कर ले तो उस पापकी शुद्धिके लिये सांतपन नामक व्रत बतलाया गया है। चाण्डालके कूपसे तथा उसके बरतनोंमें यदि ज्ञानपूर्वक ब्राह्मण जल पी ले तो उस पापकी शुद्धिके लिये कृच्छ्रसांतपन नामक व्रत करना चाहिये। चाण्डालके द्वारा स्पर्श हुआ जल पीनेपर द्विजोत्तम तीन रात्रितक पञ्चगव्य ग्रहण करनेसे शुद्ध होता है। महापातकीका स्पर्श होनेपर बिना स्नान किये यदि द्विज जान-बूझकर मोहवश भोजन करता है तो उसे तसकृच्छ्र करना चाहिये। प्रमादवश महापातकी, चाण्डाल या रजस्वलाका स्पर्शकर भोजन करनेपर तीन रात्रिपर्यन्त उपवाससे शुद्धि होती है॥ ३६-४०॥
  • अध्याय ३३ * | ४२३ ---|--- स्नानार्हो यदि भुञ्जीत अहोरात्रेण शुध्यति ।<br>बुद्धिपूर्वं तु कृच्छ्रेण भगवानाह पद्मजः ॥ ४१ ॥<br><br>शुष्कपर्युषितादीनि गवादिप्रतिदूषितम् ।<br>भुक्त्वोपवासं कुर्वीत कृच्छ्रपादमथापि वा ॥ ४२ ॥<br><br>संवत्सरान्ते कृच्छ्रं तु चरेद् विप्रः पुनः पुनः ।<br>अज्ञातभुक्तशुद्ध्यर्थं ज्ञातस्य तु विशेषतः ॥ ४३ ॥ | भगवान् ब्रह्माने कहा है कि स्नानके योग्य व्यक्ति यदि बिना स्नान किये भोजन करता है तो वह अहोरात्र उपवास करनेसे शुद्ध हो जाता है, किंतु ज्ञानपूर्वक भोजन करनेपर कृच्छ्रव्रत करनेसे शुद्धि होती है। शुष्क, बासी आदि तथा गौ आदिद्वारा दूषित (उच्छिष्ट) पदार्थोंका भक्षण करनेपर एक दिनका उपवास अथवा कृच्छ्रव्रतका चतुर्थांश व्रत करना चाहिये। अज्ञानमें अभोज्य पदार्थोंके भक्षणसे होनेवाले पापकी शुद्धिके लिये संवत्सरके अन्तमें ब्राह्मणको बार-बार कृच्छ्रव्रत करना चाहिये और जान-बूझकर ऐसा होनेपर इसे विशेषरूपसे करना चाहिये॥ ४१—४३ ॥ व्रात्यानां यजनं कृत्वा परेषामन्त्यकर्म च।<br>अभिचारमहीनं च त्रिभिः कृच्छ्रैर्विशुध्यति ॥ ४४ ॥<br><br>ब्राह्मणादिहतानां तु कृत्वा दाहादिकाः क्रियाः।<br>गोमूत्रयावकाहारः प्राजापत्येन शुध्यति ॥ ४५ ॥<br><br>तैलाभ्यक्तोऽथवा कुर्याद् यदि मूत्रपुरीषके।<br>अहोरात्रेण शुध्येत श्मश्रुकर्म च मैथुनम् ॥ ४६ ॥ | संस्कारहीन पुरुषोंका यज्ञ कराने और दूसरोंका* अन्त्येष्टिकर्म तथा अभिचार-कर्म करनेपर तीन कृच्छ्रव्रत करनेसे शुद्धि होती है। ब्राह्मण आदिके द्वारा मारे गये पुरुषोंका दाहादि कर्म करनेपर गोमूत्रमें पके यवान्नका आहार करने और प्राजापत्य-व्रत करनेसे शुद्धि होती है। तेल लगाकर और मल-मूत्रका त्याग करने, श्मश्रुकर्म करने (दाढ़ी आदि बनाने) तथा मैथुन करनेपर अहोरात्र उपवास करनेसे शुद्धि होती है॥ ४४—४६ ॥ एकाहेन विवाहाग्निं परिहार्य द्विजोत्तमः।<br>त्रिरात्रेण विशुध्येत त्रिरात्रात् षडहं पुनः ॥ ४७ ॥<br><br>दशाहं द्वादशाहं वा परिहार्य प्रमादतः।<br>कृच्छ्रं चान्द्रायणं कुर्यात् तत्पापस्यापनुत्तये ॥ ४८ ॥ | एक दिन विवाहाग्नि (गृह्याग्नि)-का त्याग करने अर्थात् उस अग्निमें हवन न करनेसे द्विजोत्तम तीन दिन (उपवास करने)-से शुद्ध होता है और तीन दिनतक नित्य हवन न करनेपर छः दिनोंके उपवाससे शुद्ध होता है। प्रमादवश दस दिन अथवा बारह दिनतक गृह्याग्निका त्याग करनेपर उस पापकी शुद्धिके लिये कृच्छ्रचान्द्रायणव्रत करना चाहिये॥ ४७-४८॥ पतिताद् द्रव्यमादाय तदुत्सर्गेण शुध्यति ।<br>चरेत् सांतपनं कृच्छ्रमित्याह भगवान् प्रभुः ॥ ४९ ॥<br><br>अनाशकनिवृत्तास्तु प्रव्रज्यावसितास्तथा।<br>चरेयुस्त्रीणि कृच्छ्राणि त्रीणि चान्द्रायणानि च ॥ ५० ॥ | भगवान् प्रभुने बताया है कि पतित व्यक्तिसे द्रव्य लेनेपर उस द्रव्यका त्याग कर देनेसे शुद्धि होती है, साथ ही कृच्छ्रसांतपनव्रत करना चाहिये। प्रायोपवेशन-व्रतसे भ्रष्ट तथा संन्यास-आश्रमसे च्युत व्यक्तिको तीन कृच्छ्र और तीन चान्द्रायणव्रत करना चाहिये॥ ४९-५०॥ पुनश्च जातकर्मादिसंस्कारैः संस्कृता द्विजाः।<br>शुद्ध्येयुस्तद् व्रतं सम्यक् चरेयुर्धर्मवर्धनाः ॥ ५१ ॥ | पुनः जातकर्मादि संस्कारोंद्वारा संस्कृत होनेपर धर्मकी वृद्धि चाहनेवाले द्विजोंको भलीभाँति व्रतका पालन करना चाहिये॥ ५१॥

* यद्यपि अधिकारीके अभावमें किसीका अन्त्यकर्म करना पुण्यप्रद होता है, पर यदि यही अन्त्यकर्म लोभवश अधिकारीके रहते हुए भी स्वयं किया जाय तो पापका कारण होता है, अतः इसके लिये प्रायश्चित्तका विधान है।

४२४ * कूर्मपुराण *


अनुपासितसंध्यस्तु तदहर्यापको वसेत्।<br>अनश्नन् संयतमना रात्रौ चेद् रात्रिमेव हि॥ ५२॥<br><br>अकृत्वा समिदाधानं शुचिः स्नात्वा समाहितः।<br>गायत्र्यष्टसहस्रस्य जप्यं कुर्याद् विशुद्धये॥ ५३॥<br><br>उपासीत न चेत् संध्यां गृहस्थोऽपि प्रमादतः।<br>स्नात्वा विशुध्यते सद्यः परिश्रान्तस्तु संयमात्॥ ५४॥<br><br>वेदोदितानि नित्यानि कर्माणि च विलोप्य तु।<br>स्नातकव्रतलोपं तु कृत्वा चोपवसेद् दिनम्॥ ५५॥(प्रातः) संध्या न करनेपर उस दिन वैसे ही बिना भोजन किये संयतमन होकर रहना चाहिये और सायं-संध्या न करनेपर रात्रिमें भोजन नहीं करना चाहिये। (गार्हपत्याग्निमें) समिधा न डालनेपर अर्थात् नित्य-हवन (नित्यकर्म—अग्निहोत्र) न करनेपर उस पापकी शुद्धिके लिये स्नान करके पवित्रतापूर्वक समाहित होकर आठ हजार गायत्रीका जप करना चाहिये। गृहस्थाश्रममें रहते हुए भी व्यक्ति यदि प्रमादसे संध्या नहीं करता है तो स्नान करके उपवास करनेसे वह शुद्ध हो जाता है और थकानके कारण संध्या न करनेवाला संयम (मन एकाग्रकर पश्चात्तापमात्र) करनेसे शुद्ध हो जाता है। वेदमें बताये गये नित्य-कर्मोंका लोप करने तथा स्नातकके व्रतका लोप करनेपर स्नातकको एक दिनका उपवास करना चाहिये॥ ५२—५५॥
संवत्सरं चरेत् कृच्छ्रमग्न्युत्सादी द्विजोत्तमः।<br>चान्द्रायणं चरेद् व्रात्यो गोप्रदानेन शुध्यति॥ ५६॥<br><br>नास्तिक्यं यदि कुर्वीत प्राजापत्यं चरेद् द्विजः।<br>देवद्रोहं गुरुद्रोहं तप्तकृच्छ्रेण शुध्यति॥ ५७॥<br><br>उष्ट्रयानं समारुह्य खरयानं च कामतः।<br>त्रिरात्रेण विशुध्येत् तु नग्नो वा प्रविशेज्जलम्॥ ५८॥अग्निका परित्याग करनेवाले द्विजोत्तमको एक वर्षतक कृच्छ्रव्रत करना चाहिये और संस्कारहीन व्यक्ति चान्द्रायणव्रत करने और गोदान करनेसे शुद्ध हो जाता है। नास्तिकता करनेवाले द्विजको प्राजापत्य-व्रतका पालन करना चाहिये। देवतासे तथा गुरुसे द्रोह करनेपर तप्तकृच्छ्रव्रत करनेसे शुद्धि होती है। इच्छापूर्वक ऊँट या गदहेकी सवारी करनेपर तीन रात्रिपर्यन्त उपवास करनेसे शुद्धि होती है। इसी प्रकार नग्न होकर जलमें प्रवेश करनेपर तीन राततक उपवास करना चाहिये॥ ५६—५८॥
षष्ठान्नकालतामासं संहिताजप एव च।<br>होमाश्च शाकला नित्यमपांक्तानां विशोधनम्॥ ५९॥<br><br>नीलं रक्तं वसित्वा च ब्राह्मणो वस्त्रमेव हि।<br>अहोरात्रोषितः स्नातः पञ्चगव्येन शुध्यति॥ ६०॥पंक्तिसे बहिष्कृत यदि ऐसे लोग हैं, जिनके लिये विशेष प्रायश्चित्तका उपदेश नहीं किया गया है, वे लोग एक मासतक नियमपूर्वक 'षष्ठान्नकालता' (तीन दिन भोजन न कर तीसरे दिन सायं केवल एक बार सात्त्विक (हविष्यान्न) भोजन करें, संहिताजप (वेदसंहिताके मन्त्रोंका पाठ) करें तथा शाकल होम (बौधायनस्मृति प्रश्न ४, अध्याय ३ के अनुसार) करें तो शुद्ध हो सकते हैं। नीला या लाल वस्त्र धारण करनेपर ब्राह्मण एक अहोरात्र उपवास करनेके अनन्तर स्नानकर पञ्चगव्यका पान करनेसे शुद्ध होता है॥ ५९-६०॥
वेदधर्मपुराणानां चण्डालस्य तु भाषणे।<br>चान्द्रायणेन शुद्धिः स्यान्न ह्यान्या तस्य निष्कृतिः॥ ६१॥चाण्डालको वेद, धर्मशास्त्रों तथा पुराणोंका उपदेश करनेपर चान्द्रायणसे शुद्धि होती है, इसके अतिरिक्त उसकी निष्कृति (निस्तार)-का कोई अन्य उपाय नहीं है॥ ६१॥
  • अध्याय ३३ * । ४२५
श्लोकअर्थ
उद्बन्धनादिनिहतं संस्पृश्य ब्राह्मणः क्वचित्।<br>चान्द्रायणेन शुद्धिः स्यात् प्राजापत्येन वा पुनः॥ ६२॥<br><br>उच्छिष्टो यद्यनाचान्तश्चाण्डालादीन् स्पृशेद् द्विजः।<br>प्रमादाद् वै जपेत् स्नात्वा गायत्र्यष्टसहस्रकम्॥ ६३॥<br><br>द्रुपदानां शतं वापि ब्रह्मचारी समाहितः।<br>त्रिरात्रोपोषितः सम्यक् पञ्चगव्येन शुध्यति॥ ६४॥<br><br>चण्डालपतितादींस्तु कामाद् यः संस्पृशेद् द्विजः।<br>उच्छिष्टस्तत्र कुर्वीत प्राजापत्यं विशुद्धये॥ ६५॥उद्वन्धन (फाँसी) आदिद्वारा मरे व्यक्तिका कदाचित् स्पर्श होनेपर ब्राह्मण चान्द्रायण अथवा प्राजापत्यव्रत करनेसे शुद्ध होता है। प्रमादवश यदि जूठे मुँह बिना आचमन किये द्विज चाण्डाल आदिका स्पर्श करता है तो उसे स्नानकर आठ हजार गायत्रीका जप करना चाहिये। ब्रह्मचारीको तो समाहित होकर तीन रात उपवास करके भलीभाँति सौ बार द्रुपदा मन्त्रका जप करना चाहिये और फिर पञ्चगव्यप्राशन करनेपर उसकी शुद्धि होती है। जो उच्छिष्टमुख द्विज इच्छापूर्वक चाण्डाल तथा पतित आदिका स्पर्श करता है, उसे शुद्धिके लिये प्राजापत्यव्रत करना चाहिये॥ ६२—६५॥
चाण्डालसूतकशावांस्तथा नारीं रजस्वलाम्।<br>स्पृष्ट्वा स्नायाद् विशुद्ध्यर्थं तत्स्पृष्टं पतितं तथा॥ ६६॥<br><br>चाण्डालसूतकशावैः संस्पृष्टं संस्पृशेद् यदि।<br>प्रमादात् तत आचम्य जपं कुर्यात् समाहितः॥ ६७॥<br><br>तत्स्पृष्टस्पर्शिनं स्पृष्ट्वा बुद्धिपूर्वं द्विजोत्तमः।<br>आचमेत् तद्विशुद्ध्यर्थं प्राह देवः पितामहः॥ ६८॥चाण्डाल, अशौचयुक्त व्यक्ति, शव, रजस्वला स्त्री, उनसे स्पृष्ट व्यक्ति तथा पतितका स्पर्श करनेपर शुद्धिके लिये स्नान करना चाहिये। प्रमादवश चाण्डाल, अशौचयुक्त व्यक्ति तथा शव—इनको स्पर्श किये व्यक्तिका स्पर्श होनेपर (स्नानोपरान्त) आचमन करके एकाग्र होकर (गायत्री-) जप करना चाहिये। द्विजोत्तम यदि जान-बूझकर चाण्डाल आदिद्वारा स्पर्श किये व्यक्तिका स्पर्श करे तो उसे उस पापकी शुद्धिके लिये (स्नान* करके) आचमन करना चाहिये—ऐसा पितामहदेवने कहा है॥ ६६—६८॥
भुञ्जानस्य तु विप्रस्य कदाचित् संस्रवेद् गुदम्।<br>कृत्वा शौचं ततः स्नायादुपोष्य जुहुयाद् घृतम्॥ ६९॥<br><br>चाण्डालान्त्यशवं स्पृष्ट्वा कृच्छ्रं कुर्याद् विशुद्धये।<br>स्पृष्टाभ्यक्तस्त्वसंस्पृश्यमहोरात्रेण शुध्यति॥ ७०॥भोजन करते समय ब्राह्मणके गुदामार्गसे कदाचित् मलस्राव हो जाय तो शौच करनेके अनन्तर स्नान करना चाहिये और उपवास करके घृतसे हवन करे। चाण्डाल एवं अन्त्यजके शवका स्पर्श करके शुद्धिके लिये कृच्छ्रव्रत करना चाहिये। उबटन आदि लगानेके बाद अस्पृश्य व्यक्तिका स्पर्श होनेपर एक अहोरात्र उपवास करनेसे शुद्धि होती है॥ ६९-७०॥
सुरां स्पृष्ट्वा द्विजः कुर्यात् प्राणायामत्रयं शुचिः।<br>पलाण्डुं लशुनं चैव घृतं प्राश्य ततः शुचिः॥ ७१॥<br><br>ब्राह्मणस्तु शुना दष्टस्त्र्यहं सायं पयः पिबेत्।<br>नाभेरूर्ध्वं तु दष्टस्य तदेव द्विगुणं भवेत्॥ ७२॥<br><br>स्यादेतत् त्रिगुणं बाह्वोर्मूर्ध्नि च स्याच्चतुर्गुणम्।<br>स्नात्वा जपेद् वा सावित्रीं श्वभिर्दष्टो द्विजोत्तमः॥ ७३॥सुराका स्पर्श करके द्विज तीन प्राणायाम करनेसे शुद्ध होता है। प्याज, लहसुनका स्पर्श होनेपर घृतका प्राशन करनेसे शुद्धि होती है। कुत्तेके काटनेपर ब्राह्मणको (कुत्तेके स्पर्शके प्रायश्चित्तके साथ) तीन दिन सायंकाल केवल दूध पीना चाहिये। नाभिके ऊपरी भागमें काटनेपर यही क्रिया (प्रायश्चित्त) दो बार करनी चाहिये। इसी प्रकार बाहुमें काटनेपर यही क्रिया तीन बार और मस्तकमें काटनेपर चार बार करनी चाहिये अथवा कुत्तेके काटनेपर द्विजोत्तमको स्नान करके गायत्रीका जप करना चाहिये॥ ७१—७३॥

* यथाविधि आचमनकी योग्यता स्नानके बिना नहीं होती है।

४२६ * कूर्मपुराण *


अनिर्वर्त्य महायज्ञान् यो भुंक्ते तु द्विजोत्तमः।<br>अनातुरः सति धने कृच्छ्रार्धेन स शुध्यति॥ ७४॥स्वस्थ रहते और धन होनेपर भी जो द्विजोत्तम प्रतिदिन विहित पाँच महायज्ञोंको बिना सम्पन्न किये भोजन करता है, वह अर्धकृच्छ्रव्रत करनेसे शुद्ध होता है। जो अग्निहोत्री ब्राह्मण पर्वोंमें उपस्थान नहीं करता और जो ऋतुकालमें भार्याके साथ सहवास नहीं करता वह भी अर्धकृच्छ्रव्रत करनेसे शुद्ध होता है॥ ७४-७५॥
आहिताग्निरुपस्थानं न कुर्याद् यस्तु पर्वणि।<br>ऋतौ न गच्छेद् भार्यां वा सोऽपि कृच्छ्रार्धमाचरेत्॥ ७५॥
विनाऽद्भिरप्सु वाप्यार्तः शारीरं संनिवेश्य च।<br>सचैलो जलमाप्लुत्य गामालभ्य विशुध्यति॥ ७६॥कोई आर्त (मल-मूत्रके वेगसे आर्त-त्रस्त) व्यक्ति यदि जलके अभावमें मल-मूत्रका त्याग अकस्मात् कर देता है या जलके मध्यमें रहता हुआ मल-मूत्रके वेगसे आर्त होनेके कारण जलके मध्य ही अकस्मात् मल-मूत्रका त्याग कर देता है तो मल-मूत्रका प्रक्षालनकर ग्राम या नगर आदिके बाहर नदी आदिमें शरीरपर धारित समस्त वस्त्रोंके साथ उसे स्नान करना चाहिये तथा गौका स्पर्श करना चाहिये, तभी शुद्धि होती है।
बुद्धिपूर्वं त्वभ्युदितो जपेदन्तर्जले द्विजः।<br>गायत्र्यष्टसहस्रं तु त्र्यहं चोपवसेद् व्रती॥ ७७॥जान-बूझकर (सूर्योदयकालतक शयन करनेवाले अथवा आलस्यवश सोये रहनेके कारण सूर्योदयकालीन अनुष्ठानको न करनेवाले) ब्राह्मणको सूर्योदयके समय जलमें प्रविष्ट होकर आठ हजार गायत्रीका जप तथा तीन दिनतक उपवास करना चाहिये॥ ७६-७७॥
अनुगम्येच्छया शूद्रं प्रेतीभूतं द्विजोत्तमः।<br>गायत्र्यष्टसहस्रं च जप्यं कुर्यान्नदीषु च॥ ७८॥इच्छापूर्वक मृत शूद्रके शवका अनुगमन करनेपर द्विजोत्तमको नदीके किनारे आठ हजार गायत्रीका जप करना चाहिये। ब्राह्मणके वध करनेकी झूठी शपथ करनेपर ब्राह्मणको यावकान्न (यवके सत्तू या उससे बने हुए किसी अन्य पदार्थ)-से चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। एक ही पंक्तिमें बैठे हुए ब्राह्मणोंको विषम दान करनेपर कृच्छ्रव्रत करनेसे शुद्धि होती है। चाण्डालकी छायाका स्पर्श होनेपर स्नान करके घृतका प्राशन करना चाहिये॥ ७८-८०॥
कृत्वा तु शपथं विप्रो विप्रस्य वधसंयुक्तम्।<br>मृषैव यावकान्नेन कुर्याच्चान्द्रायणं व्रतम्॥ ७९॥
पंक्त्यां विषमदानं तु कृत्वा कृच्छ्रेण शुध्यति।<br>छायां श्वपाकस्यारुह्य स्नात्वा सम्प्राशयेद् घृतम्॥ ८०॥
ईक्षेदादित्यमशुचिर्दृष्ट्वाग्निं चन्द्रमेव वा।<br>मानुषं चास्थि संस्पृश्य स्नानं कृत्वा विशुध्यति॥ ८१॥अशुद्धिकी स्थितिमें अग्नि अथवा चन्द्रमाका दर्शनकर सूर्यका दर्शन करना चाहिये। मनुष्यकी हड्डीका स्पर्श होनेपर स्नान करनेसे शुद्धि होती है। मिथ्या (असत् विषयका अथवा दम्भपूर्ण) अध्ययन करनेपर एक वर्षतक भिक्षाव्रत ग्रहण करना चाहिये। कृतघ्नको (ब्रह्मचर्य) व्रतका पालन करते हुए पाँच वर्षतक ब्राह्मणके घरमें निवास करना चाहिये। ब्राह्मणको 'हुंकार' तथा गुरुजनोंको 'त्वंकार' (तुम) कहनेपर स्नान करके दिनभर भोजन नहीं करना चाहिये और उन्हें प्रणामके द्वारा प्रसन्न करना चाहिये॥ ८१-८३॥
कृत्वा तु मिथ्याध्ययनं चरेद् भैक्षं तु वत्सरम्।<br>कृतघ्नो ब्राह्मणगृहे पञ्च संवत्सरं व्रती॥ ८२॥
हुंकारं ब्राह्मणस्योक्त्वा त्वंकारं च गरीयसः।<br>स्नात्वानश्नन्नहःशेषं प्रणिपत्य प्रसादयेत्॥ ८३॥
* अध्याय ३३ *४२७

ताडयित्वा तृणेनापि कण्ठं बद्ध्वापि वाससा।
विवादे वापि निर्जित्य प्रणिपत्य प्रसादयेत्॥ ८४॥

अवगूर्य चरेत् कृच्छ्रमति कृच्छ्रं निपातने।
कृच्छात्तिकृच्छ्रौ कुर्वीत विप्रस्योत्पाद्य शोणितम्॥ ८५॥

गुरोराक्रोशमनृतं कृत्वा कुर्याद् विशोधनम्।
एकरात्रं त्रिरात्रं वा तत्पापस्यापनुत्तये॥ ८६॥

देवर्षीणामभिमुखं ष्ठीवनाक्रोशने कृते।
उल्मुकेन दहेज्जिह्वां दातव्यं च हिरण्यकम्॥ ८७॥

देवोद्याने तु यः कुर्यान्मूत्रोच्चारं सकृद् द्विजः।
छिन्द्याच्छिश्नं तु शुद्ध्यर्थं चरेच्चान्द्रायणं तु वा॥ ८८॥

देवतायतने मूत्रं कृत्वा मोहाद् द्विजोत्तमः।
शिश्नस्योत्कर्तनं कृत्वा चान्द्रायणमथाचरेत्॥ ८९॥

देवतानामृषीणां च देवानां चैव कुत्सनम्।
कृत्वा सम्यक् प्रकुर्वीत प्राजापत्यं द्विजोत्तमः॥ ९०॥

तैस्तु सम्भाषणं कृत्वा स्नात्वा देवान् समर्चयेत्।
दृष्ट्वा वीक्षेत भास्वन्तं स्मृत्वा विश्वेश्वरं स्मरेत्॥ ९१॥

यः सर्वभूताधिपतिं विश्वेशानं विनिन्दति।
न तस्य निष्कृतिः शक्या कर्तुं वर्षशतैरपि॥ ९२॥

चान्द्रायणं चरेत् पूर्वं कृच्छ्रं चैवातिकृच्छ्रकम्।
प्रपन्नः शरणं देवं तस्मात् पापाद् विमुच्यते॥ ९३॥

सर्वस्वदानं विधिवत् सर्वपापविशोधनम्।
चान्द्रायणं च विधिना कृच्छ्रं चैवातिकृच्छ्रकम्॥ ९४॥

पुण्यक्षेत्राभिगमनं सर्वपापविनाशनम्।
देवताभ्यर्चनं नृणामशेषाघविनाशनम्॥ ९५॥

तृणद्वारा भी (उनकी) ताड़ना करनेपर, वस्त्रद्वारा कण्ठ बाँधनेपर, विवादमें पराजित करनेपर प्रणामके द्वारा उन्हें प्रसन्न करना चाहिये। ब्राह्मणको धमकानेपर कृच्छ्रव्रत और पटक देनेपर अतिकृच्छ्रव्रत करना चाहिये। विप्रका रक्त बहानेपर कृच्छ्र तथा अतिकृच्छ्र दोनों व्रत करना चाहिये॥ ८४-८५॥

गुरुको गाली या शाप देनेपर या उनसे झूठ बोलनेपर उस पापकी शुद्धिके लिये (पापके तारतम्यके अनुसार) एक रात या तीन रातका उपवास रखना चाहिये। देवताओं और ऋषियोंकी ओर थूकने तथा (उनके प्रति) आक्रोश (आक्षेप) प्रकट करनेपर उल्मुक (अंगारवाली लकड़ी)-से जीभका दाह करना चाहिये और स्वर्णका दान करना चाहिये। जो द्विज देवताओंके उद्यानमें एक बार भी मल-मूत्र विसर्जित करता है तो शुद्धिके लिये मूत्रेन्द्रियका छेदन कर देना चाहिये अथवा चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। जो द्विजोत्तम देवमन्दिरमें मोहवश मूत्रोत्सर्ग करता है, उसे मूत्रेन्द्रियका उच्छेद करके चान्द्रायणव्रत करना चाहिये। देवताओं, ऋषियों तथा देवों (देवतुल्य महापुरुषों-माता, पिता, गुरु आदि)-की निन्दा करनेपर द्विजोत्तमको भलीभाँति प्राजापत्य-व्रत करना चाहिये। इनके साथ सम्भाषण करनेपर स्नान करके देवताओंकी पूजा करनी चाहिये और उन्हें देखनेपर सूर्यका दर्शन करना चाहिये तथा विश्वेश्वरका स्मरण करना चाहिये॥ ८६-९१॥

जो सभी प्राणियोंके अधिपति विश्वेशानकी निन्दा करता है, उसके पापकी शुद्धि सौ वर्षोंमें भी सम्भव नहीं है, पर (पश्चात्तापपूर्वक) पहले चान्द्रायणव्रत करे, अनन्तर कृच्छ्र तथा अतिकृच्छ्रव्रतोंको श्रद्धापूर्वक करके देव (शंकर)-की शरणमें जाय। ऐसा करनेपर देव शंकरकी कृपासे ही पापसे मुक्ति हो जाती है। विधिपूर्वक अपना सर्वस्व दान करनेसे सभी पापोंकी शुद्धि हो जाती है। इसी प्रकार विधिपूर्वक चान्द्रायणव्रत करने, कृच्छ्र और अतिकृच्छ्रव्रतोंको करनेसे सभी पाप दूर हो जाते हैं। पुण्य क्षेत्रोंकी यात्रा सभी पापोंको दूर कर देती है। मनुष्योंके लिये देवताओंकी आराधना करना सम्पूर्ण पापोंके नाशका अचूक साधन है॥ ९२-९५॥

४२८* कूर्मपुराण *
अमावस्यां तिथिं प्राप्य यः समाराधयेच्छिवम्।<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा तु सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ९६ ॥<br><br>कृष्णाष्टम्यां महादेवं तथा कृष्णचतुर्दशीम्।<br>सम्पूज्य ब्राह्मणमुखे सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ९७ ॥<br><br>त्रयोदश्यां तथा रात्रौ सोपहारं त्रिलोचनम्।<br>दृष्ट्वेशं प्रथमे यामे मुच्यते सर्वपातकैः॥ ९८ ॥<br><br>उपोषितश्चतुर्दश्यां कृष्णपक्षे समाहितः।<br>यमाय धर्मराजाय मृत्यवे चान्तकाय च॥ ९९ ॥<br><br>वैवस्वताय कालाय सर्वभूतक्षयाय च।<br>प्रत्येकं तिलसंयुक्तान् दद्यात् सप्तोदकाञ्जलीन्।<br>स्नात्वा नद्यां तु पूर्वाह्णे मुच्यते सर्वपातकैः॥ १००॥<br><br>ब्रह्मचर्यमधःशय्यामुपवासं द्विजार्चनम्।<br>व्रतेष्वेतेषु कुर्वीत शान्तः संयतमानसः॥ १०१॥<br><br>अमावस्यायां ब्रह्माणं समुद्दिश्य पितामहम्।<br>ब्राह्मणांस्त्रीन् समभ्यर्च्य मुच्यते सर्वपातकैः॥ १०२॥<br><br>षष्ठ्यामुपोषितो देवं शुक्लपक्षे समाहितः।<br>सप्तम्यामर्चयेद् भानुं मुच्यते सर्वपातकैः॥ १०३॥<br><br>भरण्यां च चतुर्थ्यां च शनैश्चरदिने यमम्।<br>पूजयेत् सप्तजन्मोत्थैर्मुच्यते पातकैर्नरः॥ १०४॥<br><br>एकादश्यां निराहारः समभ्यर्च्य जनार्दनम्।<br>द्वादश्यां शुक्लपक्षस्य महापापैः प्रमुच्यते॥ १०५॥<br><br>तपो जपस्तीर्थसेवा देवब्राह्मणपूजनम्।<br>ग्रहणादिषु कालेषु महापातकशोधनम्॥ १०६॥<br><br>यः सर्वपापयुक्तोऽपि पुण्यतीर्थेषु मानवः।<br>नियमेन त्यजेत् प्राणान् स मुच्येत् सर्वपातकैः॥ १०७॥<br><br>ब्रह्मघ्नं वा कृतघ्नं वा महापातकदूषितम्।<br>भर्तारमुद्धरेन्नारी प्रविष्टा सह पावकम्॥ १०८॥<br><br>एतदेव परं स्त्रीणां प्रायश्चित्तं विदुर्बुधाः।<br>सर्वपापसमुद्भूतौ नात्र कार्या विचारणा॥ १०९॥अमावास्या तिथि आनेपर जो शिवकी भलीभाँति आराधना करता है और ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। कृष्णपक्षकी अष्टमी तथा कृष्णपक्षकी ही चतुर्दशीको महादेव शंकरका पूजन कर ब्राह्मणको भोजन करानेसे सभी पापोंसे मुक्ति हो जाती है। त्रयोदशीकी रात्रिके प्रथम याममें उपहारसहित त्रिलोचन ईश शंकरका दर्शन करनेसे मनुष्य सभी पातकोंसे मुक्त हो जाता है। कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको पूर्वाह्नमें समाहित होकर नदीमें स्नानकर उपवास करके यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत, काल तथा सर्वभूतविनाशक—इनमें प्रत्येकके निमित्त तिलमिश्रित सात जलाञ्जलि प्रदान करनेवाला सभी पातकोंसे मुक्त हो जाता है॥ ९६–१००॥<br><br>(प्रायश्चित्तके प्रसंगसे उपदिष्ट) इन सभी व्रतोंमें शान्त और संयतमन होकर ब्रह्मचर्य, भूमिशयन, उपवास तथा ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये। अमावास्याको पितामह ब्रह्माको उद्दिष्ट करके तीन ब्राह्मणोंकी पूजा करनेसे सभी पातकोंसे मुक्ति हो जाती है। शुक्लपक्षकी षष्ठीको समाहित होकर उपवास करके सप्तमीको सूर्यदेवकी पूजा करनी चाहिये, इससे सभी पापोंसे मुक्ति हो जाती है। शनिवारको भरणी नक्षत्र और चतुर्थी तिथि होनेपर (ऐसे योगमें) जो मनुष्य यमराजका पूजन करता है, वह सात जन्मोंमें किये गये पापोंसे मुक्त हो जाता है। शुक्लपक्षकी एकादशीको निराहार रहकर द्वादशीको जनार्दनकी पूजा करनेसे महापापोंसे मुक्ति मिल जाती है॥ १०१–१०५॥<br><br>सूर्य तथा चन्द्रग्रहण आदि समयोंमें जप, तप, तीर्थ-सेवा और देवता तथा ब्राह्मणोंका पूजन महापातकोंसे शुद्ध करनेवाला होता है। सभी पापोंसे युक्त होनेपर भी जो मनुष्य नियमपूर्वक पुण्य तीर्थोंमें प्राणोंका त्याग करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ १०६-१०७॥<br><br>मृत पतिके साथ अग्निमें प्रवेश करनेवाली नारी ब्रह्मघाती, कृतघ्न अथवा महापातकोंसे दूषित भी पतिका उद्धार कर देती है। विद्वानोंने स्त्रीके लिये सभी प्रकारके पापोंका यही (पातिव्रतधर्म-पालन ही) श्रेष्ठ प्रायश्चित्त बतलाया है। इसमें विचार नहीं करना चाहिये॥ १०८-१०९॥
* अध्याय ३३ *४२९
पतिव्रता तु या नारी भर्तृशुश्रूषणोत्सुका।<br>न तस्या विद्यते पापमिह लोके परत्र च॥ ११०॥जो नारी पतिव्रता है और पतिकी सेवा-शुश्रूषामें अनुरक्त है, उसके लिये न तो इस लोकमें कोई पाप है और न परलोकमें॥ ११०॥
पतिव्रता धर्मरता रुद्राण्येव न संशयः।<br>नास्याः पराभवं कर्तुं शक्नोतीह जनः क्वचित् ॥ १११ ॥(पातिव्रत) धर्मपरायण पतिव्रता (स्त्री) रुद्राणी ही होती है, इसमें संदेह नहीं। इस संसारमें कोई भी मनुष्य इसे कभी भी पराजित करनेमें समर्थ नहीं है। उदाहरणके
यथा रामस्य सुभगा सीता त्रैलोक्यविश्रुता।<br>पत्नी दाशरथेर्देवी विजिग्ये राक्षसेश्वरम् ॥ ११२ ॥लिये दशरथके पुत्र रामकी तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध सुन्दर पत्नी देवी सीताने राक्षसेश्वर (रावण)-को पराजित कर दिया था। कालसे प्रेरित राक्षसराज रावणने रामकी सुन्दर
रामस्य भार्यां विमलां रावणो राक्षसेश्वरः।<br>सीतां विशालनयनां चकमे कालचोदितः ॥ ११३ ॥तथा विशाल नेत्रोंवाली भार्या सीताको प्राप्त करनेकी इच्छा की। उसने मायासे तपस्वीका वेष धारणकर जनशून्य वनमें विचरण (निवास) करती हुई कामिनी
गृहीत्वा मायया वेषं चरन्तीं विजने वने।<br>समाहर्तुं मतिं चक्रे तापसः किल कामिनीम् ॥ ११४॥(सीता)-का अपहरण करनेका विचार किया। तब पतिव्रता भगवती सीताने रावणके दुष्ट भावको समझकर अपने पति दशरथ-पुत्र रामका स्मरण किया और पवित्र
विज्ञाय सा च तद्भावं स्मृत्वा दाशरथिं पतिम् ।<br>जगाम शरणं वह्निमावसथ्यं शुचिस्मिता ॥ ११५ ॥मुसकानवाली उन सीतादेवीने आवसथ्य अग्निकी शरण ग्रहण की॥ १११-११५॥
उपतस्थे महायोगं सर्वदोषविनाशनम्।<br>कृताञ्जली रामपत्नी साक्षात् पतिमिवाच्युतम् ॥ ११६॥रामकी पत्नी (सीतादेवी) हाथ जोड़कर साक्षात् पतिके समान सभी दोषोंको नष्ट करनेवाले महायोगरूप अच्युत (अग्नि)-की शरणमें गयीं (और उनकी स्तुति
नमस्यामि महायोगं कृतान्तं गहनं परम् ।<br>दाहकं सर्वभूतानामीशानं कालरूपिणम् ॥ ११७ ॥करने लगीं—) महायोगस्वरूप, परम गहन (रहस्यस्वरूप), कृतान्त, दहन करनेवाले, सभी प्राणियोंके नियामक कालरूपी अग्निको मैं नमस्कार करती हूँ। मैं सभी
नमस्ये पावकं देवं साक्षिणं विश्वतोमुखम्।<br>आत्मानं दीप्तवपुषं सर्वभूतहृदि स्थितम् ॥ ११८ ॥ओर मुखवाले, सभी प्राणियोंके हृदयमें स्थित, दीप्त शरीरवाले, आत्मरूप तथा साक्षीदेव पावक (अग्नि)-को नमस्कार करती हूँ। मैं ब्राह्मणोंके उपकारक, ब्रह्मरूपी,
प्रपद्ये शरणं वह्निं ब्रह्मण्यं ब्रह्मरूपिणम्।<br>भूतेशं कृत्तिवसनं शरण्यं परमं पदम् ॥ ११९॥कृत्तिवासा,* शरणागतवत्सल, परमपदरूप भूतेश वह्निकी शरण ग्रहण करती हूँ। मैं जगन्मूर्ति, सभी तेजोंके
ॐ प्रपद्ये जगन्मूर्ति प्रभवं सर्वतेजसाम्।<br>महायोगेश्वरं वह्निमादित्यं परमेष्ठिनम् ॥ १२० ॥उद्भव-स्थान, महायोगेश्वर, परमेष्ठी, आदित्य और ओंकाररूप वह्निदेवकी शरण ग्रहण करती हूँ ॥ ११६-१२० ॥
प्रपद्ये शरणं रुद्रं महाग्रासं त्रिशूलिनम्।<br>कालाग्निं योगिनामीशं भोगमोक्षफलप्रदम् ॥ १२१ ॥मैं महाग्रास, त्रिशूली, भोग एवं मोक्षरूप फलोंके प्रदाता, योगियोंके ईश और रुद्रस्वरूप कालाग्निकी शरण ग्रहण करती हूँ। मैं भूर्भुवः तथा स्वःस्वरूप, हिरण्मयगृहमें
प्रपद्ये त्वां विरूपाक्षं भूर्भुवःस्वःस्वरूपिणम्।<br>हिरण्मये गृहे गुप्तं महान्तममितौजसम् ॥ १२२ ॥सुगुप्त, विरूपाक्ष तथा अमित तेजस्वी आप महान्की शरण ग्रहण करती हूँ ॥ १२१-१२२॥

* 'कृत्ति' मृग आदिके चर्मको कहते हैं। अग्नि रुद्रके अंश हैं और रुद्र कृत्तिवासा हैं, इसलिये अग्निको भी कृत्तिवासा कहते हैं।

४३०* कूर्मपुराण *
वैश्वानरं प्रपद्येऽहं सर्वभूतेष्ववस्थितम्।<br>हव्यकव्यवहं देवं प्रपद्ये वह्निमीश्वरम्॥ १२३॥सभी प्राणियोंमें अवस्थित वैश्वानरकी मैं शरण ग्रहण करती हूँ। मैं हव्य तथा कव्यको वहन करनेवाले ईश्वर वह्निदेवकी शरणमें हूँ। मैं उस पर-तत्त्व, वरणीय, साक्षात् सविता और तेजोरूप परम ज्योति अग्निकी शरण ग्रहण करती हूँ। हव्यवाहन! आप मेरी रक्षा करें॥ १२३-१२४॥
प्रपद्ये तत्परं तत्त्वं वरेण्यं सवितुः स्वयम्।<br>भर्गमग्निपरं ज्योती रक्ष मां हव्यवाहन॥ १२४॥
इति वह्न्यष्टकं जप्त्वा रामपत्नी यशस्विनी।<br>ध्यायन्ती मनसा तस्थौ राममुन्मीलितेक्षणा॥ १२५॥इस वह्न्यष्टकका जप करके यशस्विनी उन्मीलित नेत्रोंवाली रामकी पत्नी सीता मनसे रामका ध्यान करती हुई स्थित हो गयीं॥ १२५॥
अथावसथ्याद् भगवान् हव्यवाहो महेश्वरः।<br>आविरासीत् सुदीप्तात्मा तेजसा प्रवहन्निव॥ १२६॥स्तुति करनेके अनन्तर उस आवसथ्य अग्निसे अत्यन्त उदीप्त स्वरूपवाले (दुष्ट भाववाले रावणपर क्रुद्ध होनेके कारण) तेजसे जलते हुएके समान भगवान् महेश्वर हव्यवाह प्रकट हो गये। रावणके वधकी इच्छासे मायामयी सीताको उत्पन्नकर वे पावक (अग्निदेव) धर्ममयी सीताको लेकर अन्तर्हित हो गये। धर्ममयी सीता-जैसी ही उस मायामयी सीताको देखकर राक्षसराज रावण उसे ही लेकर सागरके मध्यमें स्थित लंकाको चला गया। रावणका वध करके (भगवती) सीताको प्राप्तकर लक्ष्मणसहित रामका मन शंकायुक्त हो गया। जनसामान्यको विश्वास दिलानेके लिये वह मायासे निर्मित सीता उदीप्त अग्निमें प्रविष्ट हो गयीं और अग्निने उन्हें अपनेमें मिला लिया॥ १२६-१३०॥
सृष्ट्वा मायामयीं सीतां स रावणवधेप्सया।<br>सीतामादाय धर्मिष्ठां पावकोऽन्तरधीयत॥ १२७॥
तां दृष्ट्वा तादृशीं सीतां रावणो राक्षसेश्वरः।<br>समादाय ययौ लङ्कां सागरान्तरसंस्थिताम्॥ १२८॥
कृत्वाथ रावणवधं रामो लक्ष्मणसंयुतः।<br>समादायाभवत् सीतां शङ्काकुलितमानसः॥ १२९॥
सा प्रत्ययाय भूतानां सीता मायामयी पुनः।<br>विवेश पावकं दीप्तं ददाह ज्वलनोऽपि ताम्॥ १३०॥
दग्ध्वा मायामयीं सीतां भगवानुग्रदीधितिः।<br>रामायादर्शयत् सीतां पावकोऽभूत् सुरप्रियः॥ १३१॥मायामयी सीताको अपनेमें लीन कर लेनेके पश्चात् उग्र किरणोंवाले भगवान् पावक (अग्नि)-ने रामको (वास्तविक) सीताका दर्शन कराया। इससे 'पावक' देवताओंके प्रिय बन गये। सुन्दर मध्य-भागवाली उन जनककी पुत्रीने अपने दोनों हाथोंसे अपने स्वामी रामके दोनों चरणोंको पकड़कर भूमिपर प्रणाम किया॥ १३१-१३२॥
प्रगृह्य भर्तुश्चरणौ कराभ्यां सा सुमध्यमा।<br>चकार प्रणतिं भूमौ रामाय जनकात्मजा॥ १३२॥
दृष्ट्वा हृष्टमना रामो विस्मयाकुललोचनः।<br>ननाम वह्निं शिरसा तोषयामास राघवः॥ १३३॥(सीताको) देखकर आश्चर्यचकित नेत्रोंवाले रघुवंशी रामने प्रसन्नमन हो सिरसे प्रणामकर अग्निको संतुष्ट किया। भगवान् (राम)-ने वह्निसे कहा—मेरे समीपमें आयी यह दिव्यगुणोंवाली सीता किस प्रकार पहले आपद्वारा अपनेमें लीन की जाती हुई देखी गयी। लोकोंको अपनेमें पचा लेनेवाले तथा हव्यको वहन करनेवाले अग्निने उन दशरथपुत्र रामसे सभी लोगोंकी संनिधिमें ही वह सब बताया जो पूर्वमें घटित हुआ था॥ १३३-१३५॥
उवाच वह्निंभगवान् किमेषा वरवर्णिनी।<br>दग्धा भगवता पूर्वं दृष्टा मत्पार्श्वमागता॥ १३४॥
तमाह देवो लोकानां दाहको हव्यवाहनः।<br>यथावृत्तं दाशरथिं भूतानामेव संनिधौ॥ १३५॥