संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय ३६ * | ४४५ |
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| सर्वत्र हिमवान् पुण्यो गङ्गा पुण्या समन्ततः ।<br>नद्यः समुद्रगाः पुण्याः समुद्रश्च विशेषतः ॥ ४६ ॥ | हिमालय तथा गङ्गा सर्वत्र ही पवित्र हैं। समुद्रमें जानेवाली नदियाँ तथा विशेषरूपसे समुद्र पवित्र हैं ॥ ४६ ॥ |
| बदर्याश्रममासाद्य मुच्यते कलिकल्मषात् ।<br>तत्र नारायणो देवो नरेणास्ते सनातनः ॥ ४७ ॥ | बदर्याश्रममें पहुँचकर मनुष्य कलिके पापसे मुक्त हो जाता है। वहाँपर सनातन नारायणदेव नरके साथ विराजमान रहते हैं। वहाँ विधिपूर्वक किया गया दान तथा जप अक्षय हो जाता है। वह पवित्र तीर्थ महादेवको विशेषरूपसे प्रिय है। वहाँ समाहित मनसे श्राद्ध करके मनुष्य अपने सभी पितरोंको मुक्त कर देता है ॥ ४७-४८ ॥ |
| अक्षयं तत्र दानं स्यात् जप्यं वापि तथाविधम् ।<br>महादेवप्रियं तीर्थं पावनं तद् विशेषतः ।<br>तारयेच्च पितॄन् सर्वान् दत्त्वा श्राद्धं समाहितः ॥ ४८ ॥ | |
| देवदारुवनं पुण्यं सिद्धगन्धर्वसेवितम् ।<br>महादेवेन देवेन तत्र दत्तं महद् वरम् ॥ ४९ ॥ | सिद्ध तथा गन्धर्वोंसे सेवित पवित्र देवदास-वन नामक एक तीर्थ है। देव महादेवने वहाँ महान् वर प्रदान किया था। सभी मुनियोंको मोहित करनेके अनन्तर पुनः उनके द्वारा भलीभाँति पूजित होनेपर प्रसन्न होकर भगवान् शंकरने भक्तहृदय उन मुनियोंसे कहा—इस रमणीय तथा श्रेष्ठ आश्रममें आप लोग मेरी भक्तिसे संयुक्त होकर सदा निवास करें, इससे आप लोगोंको सिद्धि प्राप्त होगी ॥ ४९—५१ ॥ |
| मोहयित्वा मुनीन् सर्वान् पुनस्तैः सम्प्रपूजितः ।<br>प्रसन्नो भगवानीशो मुनीन्द्रान् प्राह भावितान् ॥ ५० ॥ | |
| इहाश्रमवरे रम्ये निवसिष्यथ सर्वदा ।<br>मद्भावनासमायुक्तास्ततः सिद्धिमवाप्स्यथ ॥ ५१ ॥ | |
| येऽत्र मामर्चयन्तीह लोके धर्मपरा जनाः ।<br>तेषां ददामि परमं गाणपत्यं हि शाश्वतम् ॥ ५२ ॥ | इस लोकमें धर्मपरायण जो लोग यहाँ मेरी पूजा करते हैं, उन्हें मैं श्रेष्ठ शाश्वत गाणपत्य-पद प्रदान करता हूँ। मैं यहाँ नारायणके साथ नित्य निवास करता हूँ। जो मनुष्य यहाँ प्राणोंका परित्याग करता है, वह पुनर्जन्म नहीं प्राप्त करता ॥ ५२-५३ ॥ |
| अत्र नित्यं वसिष्यामि सह नारायणेन च ।<br>प्राणानिह नरस्त्यक्त्वा न भूयो जन्म विन्दति ॥ ५३ ॥ | |
| संस्मरन्ति च ये तीर्थं देशान्तरगता जनाः ।<br>तेषां च सर्वपापानि नाशयामि द्विजोत्तमाः ॥ ५४ ॥ | हे द्विजोत्तमो ! दूसरे देशोंमें गये हुए जो लोग इस तीर्थका स्मरण करते हैं, उनके सभी पापोंको मैं नष्ट कर देता हूँ। यहाँ किया हुआ श्राद्ध, दान, तप, होम, पिण्डदान, ध्यान, जप तथा नियम सर्वदाके लिये अक्षय हो जाता है। इसलिये द्विजातियोंको महादेवद्वारा सेवित पुण्य देवदारु-वनका सभी प्रयत्नोंद्वारा दर्शन (सेवन) करना चाहिये। जहाँ ईश्वर महादेव अथवा पुरुषोत्तम विष्णु रहते हैं, वहाँ गङ्गा, सभी तीर्थ तथा सभी मन्दिरोंकी स्थिति होती है ॥ ५४–५७ ॥ |
| श्राद्धं दानं तपो होमः पिण्डनिर्वपणं तथा ।<br>ध्यानं जपborder नियमः सर्वमत्राक्षयं कृतम् ॥ ५५ ॥ | |
| तस्मात् सर्वप्रयत्नेन द्रष्टव्यं हि द्विजातिभिः ।<br>देवदारुवनं पुण्यं महादेवनिषेवितम् ॥ ५६ ॥ | |
| यत्रेश्वरो महादेवो विष्णुर्वा पुरुषोत्तमः ।<br>तत्र संनिहिता गङ्गा तीर्थान्यायतनborder च ॥ ५७ ॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें छत्तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३६ ॥