भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४४६* कूर्मपुराण *

सैंतीसवाँ अध्याय

देवदारु-वनमें स्थित मुनियोंका वृत्तान्त एवं शिवलिङ्गका पतन, मुनियोंको ब्रह्माका उपदेश, शिवको प्रसन्न करने-हेतु ऋषियोंद्वारा तपस्या तथा स्तुति, शिवद्वारा सांख्यका उपदेश

ऋषय ऊचुः<br>कथं दारुवनं प्राप्तो भगवान् गोवृषध्वजः।<br>मोहयामास विप्रेन्द्रान् सूत वक्तुमिहार्हसि॥ १ ॥**ऋषियोंने कहा—**सूतजी! इस समय आप यह बतलायें कि भगवान् गोवृषध्वजने दारुवनमें आकर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको क्यों मोहित किया?॥ १ ॥
सूत उवाच<br>पुरा दारुवने रम्ये देवसिद्धनिषेविते।<br>सपुत्रदारा मुनयस्तपश्चेरुः सहस्रशः॥ २ ॥**सूतजी बोले—**प्राचीन कालमें देवताओं तथा सिद्धोंसे सेवित रमणीय दारुवनमें हजारों मुनिजन अपने पुत्रों तथा अपनी स्त्रियोंके साथ तपस्या करते थे। विविध कर्मोंमें प्रवृत्त होते हुए तथा यथाविधि उन्हें सम्पन्न करते हुए वे महर्षिगण विविध यज्ञोंसे यजन तथा तप करते थे॥ २-३ ॥
प्रवृत्तं विविधं कर्म प्रकुर्वाणा यथाविधि।<br>यजन्ति विविधैर्यज्ञैस्तपन्ति च महर्षयः॥ ३ ॥
तेषां प्रवृत्तिविन्यस्तचेतसामथ शूलधृक्।<br>ख्यापयन् स महादोषं ययौ दारुवनं हरः॥ ४ ॥तदनन्तर त्रिशूल धारण करनेवाले वे हर प्रवृत्तिमार्गमें मन लगानेवाले उन ऋषियोंके महान् दोषका वर्णन करते हुए दारुवनमें गये। महेश्वर देव शंकर निवृत्तिविज्ञानकी स्थापना करनेके लिये विश्वके गुरु विष्णुको अपने पार्श्वमें लेकर वहाँ गये। महान् बाहुवाले, पुष्ट शरीरवाले तथा सुन्दर नेत्रवाले उन्नीस वर्षके लीलायुक्त पुरुषका वेश धारणकर श्रीशंकर वहाँ गये॥ ४-६॥
कृत्वा विश्वगुरुं विष्णुं पार्श्वे देवो महेश्वरः।<br>ययौ निवृत्तिविज्ञानस्थापनार्थं च शंकरः॥ ५ ॥
आस्थाय विपुलं वेशमूनविंशतिवत्सरः।<br>लीलालसो महाबाहुः पीनाङ्गश्चारुलोचनः॥ ६ ॥
चामीकरवपुः श्रीमान् पूर्णचन्द्रनिभाननः।<br>मत्तमातङ्गगमनो दिग्वासा जगदीश्वरः॥ ७ ॥जगदीश्वर (शंकर)-का शरीर स्वर्ण-वर्णके समान तथा श्रीसम्पन्न था। उनका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान, उनकी गति मतवाले हाथीके समान और दिशाएँ ही उनके वस्त्रका स्थान ले रखी थीं। सभी रत्नोंसे अलंकृत कमलोंकी माला धारण किये हुए भगवान् ईश मुसकराते हुए आ रहे थे॥ ७-८॥
कुशेशयमयीं मालां सर्वरत्नैरलंकृताम्।<br>दधानो भगवानीशः समागच्छति सस्मितः॥ ८ ॥
योऽनन्तः पुरुषो योनिर्लोकानामव्ययो हरिः।<br>स्त्रीवेषं विष्णुरास्थाय सोऽनुगच्छति शूलिनम्॥ ९ ॥जो सभी लोकोंके उत्पत्ति-स्थान, अनन्त अव्यय पुरुष हरि विष्णु हैं, वे स्त्री-वेष धारणकर शूली शंकरका अनुगमन कर रहे थे। उनका मुख पूर्णिमाके चन्द्रके तुल्य था। पयोधर पीन और उन्नत थे। पवित्र मुसकान थी और वे (विष्णु) अत्यन्त प्रसन्न थे। दोनों चरणोंसे नूपुरकी ध्वनि हो रही थी, सुन्दर पीताम्बर उन्होंने धारण कर रखा था। दिव्य श्यामल शरीर था। नेत्र अत्यन्त सुन्दर थे। हंसके समान उदार गति थी। भगवान् विष्णु विलासमय एवं अति मनोहारी रूप धारण कर रखे थे॥ ९-११॥
सम्पूर्णचन्द्रवदनं पीनोन्नतपयोधरम्।<br>शुचिस्मितं सुप्रसन्नं रणन्नूपुरकद्वयम्॥ १० ॥
... दिव्यं श्यामलं चारुलोचनम्।<br>... विलासि सुमनोहरम्॥ ११ ॥