भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • अध्याय ३७ * ४४७
एवं स भगवानीशो देवदारुवने हरः।<br>चचार हरिणा भिक्षां मायया मोहयन् जगत्॥ १२॥<br><br>दृष्ट्वा चरन्तं विश्वेशं तत्र तत्र पिनाकिनम्।<br>मायया मोहिता नार्यो देवदेवं समन्वयुः॥ १३॥<br><br>विस्रस्तवस्त्राभरणास्त्यक्त्वा लज्जां पतिव्रताः।<br>सहैव तेन कामार्ता विलासिन्यश्चरन्ति हि॥ १४॥<br><br>ऋषीणां पुत्रका ये स्युर्युवानो जितमानसाः।<br>अन्वगच्छन् हृषीकेशं सर्वे कामप्रपीडिताः॥ १५॥<br><br>गायन्ति नृत्यन्ति विलासवाह्या<br> नारीगणा मायिनमेकमीशम्।<br>दृष्ट्वा सपत्नीकमतीवकान्त-<br> मिच्छन्त्यथालिङ्गनमाचरन्ति ॥ १६॥<br><br>पदे निपेतुः स्मितमाचरन्ति<br> गायन्ति गीतानि मुनीशपुत्राः।<br>आलोक्य पद्मापतिमादिदेवं<br> भ्रूभङ्गमन्ये विचरन्ति तेन॥ १७॥<br><br>आसामथैषामपि वासुदेवो<br> मायी मुरारिर्मनसि प्रविष्टः।<br>करोति भोगान् मनसि प्रवृत्तिं<br> मायानुभूयन्त इतीव सम्यक्॥ १८॥<br><br>विभाति विश्वामरभूतभर्ता<br> स माधवः स्त्रीगणमध्यविष्टः।<br>अशेषशक्त्यासनसंनिविष्टो<br> यथैकशक्त्या सह देवदेवः॥ १९॥<br><br>करोति नृत्यं परमप्रभावं<br> तदा विरूढः पुनरेव भूयः।<br>ययौ समारुह्य हरिः स्वभावं<br> तदीशवृत्तामृतमादिदेवः ॥ २०॥<br><br>दृष्ट्वा नारीकुलं रुद्रं पुत्राणामपि केशवम्।<br>मोहयन्तं मुनिश्रेष्ठाः कोपं संदधिरे भृशम्॥ २१॥इस प्रकारके (स्त्री-वेषवाले) हरिके साथ वे भगवान् ईश हर अपनी मायासे संसारको मोहित करते हुए भिक्षाके लिये दारुवनमें विचरण करने लगे। पिनाकी विश्वेश्वरको स्थान-स्थानपर भ्रमण करते देखकर (उनकी) मायासे मोहित हो (देवदारु-वनकी) स्त्रियाँ देवाधिदेवका अनुगमन करने लगीं। अस्त-व्यस्त वस्त्र तथा आभूषणोंवाली ये सभी पतिव्रता स्त्रियाँ लज्जाका परित्यागकर विलासयुक्त और कामार्त होकर उन्हींके साथ भ्रमण करने लगीं। जिन्होंने अपने मनको वशमें कर रखा था, ऋषियोंके वे सभी युवा पुत्र भी कामपीड़ित होकर (स्त्रीरूपधारी) हृषीकेशके पीछे-पीछे चलने लगे॥ १२—१५॥<br><br>पत्नीके रूपमें श्रीविष्णुको साथमें लेकर चलनेवाले अतीव सुन्दर, मायामय, अद्वितीय ईश (श्रीशंकर)-को देखकर (महर्षियोंकी) विलासिनी स्त्रियाँ नाचने-गाने लगीं, उन्हें प्राप्त करनेकी अभिलाषा करने लगीं और उनका आलिंगन करने लगीं। लक्ष्मीके पति आदिदेव (विष्णु)-को (स्त्री-रूपमें) देखकर मुनीश्वरोंके पुत्र उनके पैरोंपर गिरने लगे, मुसकराने लगे और गीत गाने लगे। दूसरे मुनिपुत्र भ्रूविलास (कटाक्षपात) करते हुए उनके साथ विचरण करने लगे। उन (स्त्रियों) तथा उन (पुरुषों)-के मनमें प्रविष्ट होकर मायावी मुरारि वासुदेवने उनके मनमें भोगोंके प्रति प्रवृत्ति उत्पन्न की। इस प्रकार उन सभीने भलीभाँति मायाका अनुभव किया॥ १६—१८॥<br><br>स्त्रियोंके मध्य घिरे हुए समस्त देवों और प्राणियोंके स्वामी वे माधव तथा शंकर वैसे ही सुशोभित हुए जैसे समस्त शक्तियोंके आसनपर स्थित अद्वितीय शक्तिस्वरूपा पार्वतीके साथ देवाधिदेव शंकर सुशोभित होते हैं। उस समय महादेव (मुनियोंको मोहित करनेकी भावनापर) आरूढ़ होकर पुनः बार-बार अत्यन्त प्रभावकारी नृत्य करने लगे और आदिदेव हरि उन ईशके चरितामृत-रूप स्वभावके रहस्यको समझकर उनके पीछे-पीछे चलने लगे॥ १९-२०॥<br><br>स्त्री-समूहको मुग्ध कर रहे रुद्र और पुत्रोंको मोहित कर रहे (नारीरूप) विष्णुको देखकर उन श्रेष्ठ मुनियोंको अत्यन्त क्रोध हो आया॥ २१॥