संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ४४८ | * कूर्मपुराण * |
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| अतीव परुषं वाक्यं प्रोचुर्देवं कपर्दिनम्।<br>शेपुश्च शापैर्विविधैर्मायया तस्य मोहिताः॥ २२॥ | उन (शंकर)-की मायासे मोहित होकर मुनियोंने कपर्दीदेव (शंकर)-से अत्यन्त परुष (कठोर) वचन कहा और विविध शापोंसे उन्हें अभिशस्त किया। पर वे सभी परुष वचन एवं शाप व्यर्थ हो गये; क्योंकि उन मुनियोंकी तपस्याएँ (तपस्यासे उत्पन्न शक्तियाँ) भगवान् शंकरसे प्रत्याहत होकर वैसे ही प्रभावशून्य हो गयीं, जैसे आकाशमें सूर्यके प्रकाशसे प्रत्याहत ताराएँ प्रभावशून्य हो जाती हैं॥ २२-२३॥ |
| तपांसि तेषां सर्वेषां प्रत्याहन्यन्त शंकरे।<br>यथादित्यप्रकाशेन तारका नभसि स्थिताः॥ २३॥<br>ते भग्नतपसो विप्राः समेत्य वृषभध्वजम्।<br>को भवानिति देवेशं पृच्छन्ति स्म विमोहिताः॥ २४॥ | इस प्रकार अपनी तपस्याको निष्प्रभाव देखकर मोहित हुए वे मुनि वृषभध्वज देवेशके पास जाकर उनसे पूछने लगे—'आप कौन हैं?' तब उन भगवान् ईशने कहा—सुव्रतो! इस समय आप लोगोंके इस स्थानमें मैं पत्नीसहित तपस्या करनेके लिये आया हूँ॥ २४-२५॥ |
| सोऽब्रवीद् भगवान्नीशस्तपश्चर्तुमिहागतः।<br>इदानीं भार्यया देशे भवद्भिरिह सुव्रताः॥ २५॥<br>तस्य ते वाक्यमाकर्ण्य भृग्वाद्या मुनिपुंगवाः।<br>ऊचुर्गृहीत्वा वसनं त्यक्त्वा भार्या तपश्चर॥ २६॥ | उनके उस वाक्यको सुनकर उन भृगु आदि श्रेष्ठ मुनियोंने कहा—वस्त्र धारणकर, भार्याका परित्यागकर तपस्या करो॥ २६॥ |
| अथोवाच विहस्येशः पिनाकी नीललोहितः।<br>सम्प्रेक्ष्य जगतो योनिं पार्श्वस्थं च जनार्दनम्॥ २७॥<br><br>कथं भवद्भिरुदितं स्वभार्यापोषणोत्सुकैः।<br>त्यक्तव्या मम भार्येति धर्मज्ञैः शान्तमानसैः॥ २८॥ | तब नीललोहित पिनाकी ईश्वरने हँसकर पार्श्वभागमें स्थित संसारके मूल कारण जनार्दनकी ओर देखकर इस प्रकार कहा—धर्मको जाननेवाले तथा शान्त मनवाले और अपनी भार्याके पालन-पोषणमें तत्पर रहनेवाले आप लोगोंने मुझसे यह कैसे कहा कि अपनी भार्याका परित्याग कर दो॥ २७-२८॥ |
| <center>ऋषय ऊचुः</center>व्यभिचाररता नार्यः संत्याज्याः पतिनेरिताः।<br>अस्माभिरेषा सुभगा तादृशी त्यागमर्हति॥ २९॥ | ऋषियोंने कहा—(शास्त्रोंके अनुसार) पतिका कर्तव्य है कि व्यभिचारिणी पत्नीको (भरण-आच्छादनकी व्यवस्था भले ही कर दे, पर) पत्नीरूपमें उसे न स्वीकार करे। अतः आपको भी इस प्रकारकी इस सुन्दरीका त्याग करना चाहिये॥ २९॥ |
| <center>महादेव उवाच</center>न कदाचिदियं विप्रा मनसाप्यन्यमिच्छति।<br>नाहमेनामपि तथा विमुञ्चामि कदाचन॥ ३०॥ | महादेव बोले—विप्रो! यह कभी मनसे भी किसी दूसरेकी इच्छा नहीं करती और न मैं कभी इसका परित्याग करता हूँ॥ ३०॥ |
| <center>ऋषय ऊचुः</center>दृष्टा व्यभिचरन्तीह ह्यस्माभिः पुरुषाधम।<br>उक्तं ह्यसत्यं भवता गम्यतां क्षिप्रमेव हि॥ ३१॥ | ऋषियोंने कहा—पुरुषाधम! हमने इसे यहाँ व्यभिचार करते हुए देखा है। आपने असत्य कहा है। अतः शीघ्र ही यहाँसे चले जाइये॥ ३१॥ |
| एवमुक्ते महादेवः सत्यमेव मयेरितम्।<br>भवतां प्रतिभात्येषेत्युक्त्वासौ विचचार ह॥ ३२॥<br>सोऽगच्छद्धरिणा सार्धं मुनीन्द्रस्य महात्मनः।<br>वसिष्ठस्याश्रमं पुण्यं भिक्षार्थी परमेश्वरः॥ ३३॥<br>दृष्ट्वा समागतं देवं भिक्षमाणमरुन्धती।<br>वसिष्ठस्य प्रिया भार्या प्रत्युद्गम्य ननाम तम्॥ ३४॥ | ऋषियोंके ऐसा कहनेपर महादेवने कहा—मैंने सत्य ही कहा है। आपको यह (मेरे पार्श्वमें विद्यमान सुन्दरी स्त्री) ऐसी प्रतीत होती है। ऐसा कहकर महादेव विचरण करने लगे। भिक्षाकी इच्छासे वे परमेश्वर विष्णुके साथ मुनिश्रेष्ठ महात्मा वसिष्ठके पवित्र आश्रममें गये। भिक्षा माँगते हुए देवको आये देखकर वसिष्ठकी प्रिय पत्नी अरुन्धतीने समीपमें जाकर उन्हें प्रणाम किया॥ ३२-३४॥ |