संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| ४४८ | * कूर्मपुराण * |
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| अतीव परुषं वाक्यं प्रोचुर्देवं कपर्दिनम्।<br>शेपुश्च शापैर्विविधैर्मायया तस्य मोहिताः॥ २२॥ | उन (शंकर)-की मायासे मोहित होकर मुनियोंने कपर्दीदेव (शंकर)-से अत्यन्त परुष (कठोर) वचन कहा और विविध शापोंसे उन्हें अभिशस्त किया। पर वे सभी परुष वचन एवं शाप व्यर्थ हो गये; क्योंकि उन मुनियोंकी तपस्याएँ (तपस्यासे उत्पन्न शक्तियाँ) भगवान् शंकरसे प्रत्याहत होकर वैसे ही प्रभावशून्य हो गयीं, जैसे आकाशमें सूर्यके प्रकाशसे प्रत्याहत ताराएँ प्रभावशून्य हो जाती हैं॥ २२-२३॥ |
| तपांसि तेषां सर्वेषां प्रत्याहन्यन्त शंकरे।<br>यथादित्यप्रकाशेन तारका नभसि स्थिताः॥ २३॥<br>ते भग्नतपसो विप्राः समेत्य वृषभध्वजम्।<br>को भवानिति देवेशं पृच्छन्ति स्म विमोहिताः॥ २४॥ | इस प्रकार अपनी तपस्याको निष्प्रभाव देखकर मोहित हुए वे मुनि वृषभध्वज देवेशके पास जाकर उनसे पूछने लगे—'आप कौन हैं?' तब उन भगवान् ईशने कहा—सुव्रतो! इस समय आप लोगोंके इस स्थानमें मैं पत्नीसहित तपस्या करनेके लिये आया हूँ॥ २४-२५॥ |
| सोऽब्रवीद् भगवान्नीशस्तपश्चर्तुमिहागतः।<br>इदानीं भार्यया देशे भवद्भिरिह सुव्रताः॥ २५॥<br>तस्य ते वाक्यमाकर्ण्य भृग्वाद्या मुनिपुंगवाः।<br>ऊचुर्गृहीत्वा वसनं त्यक्त्वा भार्या तपश्चर॥ २६॥ | उनके उस वाक्यको सुनकर उन भृगु आदि श्रेष्ठ मुनियोंने कहा—वस्त्र धारणकर, भार्याका परित्यागकर तपस्या करो॥ २६॥ |
| अथोवाच विहस्येशः पिनाकी नीललोहितः।<br>सम्प्रेक्ष्य जगतो योनिं पार्श्वस्थं च जनार्दनम्॥ २७॥<br><br>कथं भवद्भिरुदितं स्वभार्यापोषणोत्सुकैः।<br>त्यक्तव्या मम भार्येति धर्मज्ञैः शान्तमानसैः॥ २८॥ | तब नीललोहित पिनाकी ईश्वरने हँसकर पार्श्वभागमें स्थित संसारके मूल कारण जनार्दनकी ओर देखकर इस प्रकार कहा—धर्मको जाननेवाले तथा शान्त मनवाले और अपनी भार्याके पालन-पोषणमें तत्पर रहनेवाले आप लोगोंने मुझसे यह कैसे कहा कि अपनी भार्याका परित्याग कर दो॥ २७-२८॥ |
| <center>ऋषय ऊचुः</center>व्यभिचाररता नार्यः संत्याज्याः पतिनेरिताः।<br>अस्माभिरेषा सुभगा तादृशी त्यागमर्हति॥ २९॥ | ऋषियोंने कहा—(शास्त्रोंके अनुसार) पतिका कर्तव्य है कि व्यभिचारिणी पत्नीको (भरण-आच्छादनकी व्यवस्था भले ही कर दे, पर) पत्नीरूपमें उसे न स्वीकार करे। अतः आपको भी इस प्रकारकी इस सुन्दरीका त्याग करना चाहिये॥ २९॥ |
| <center>महादेव उवाच</center>न कदाचिदियं विप्रा मनसाप्यन्यमिच्छति।<br>नाहमेनामपि तथा विमुञ्चामि कदाचन॥ ३०॥ | महादेव बोले—विप्रो! यह कभी मनसे भी किसी दूसरेकी इच्छा नहीं करती और न मैं कभी इसका परित्याग करता हूँ॥ ३०॥ |
| <center>ऋषय ऊचुः</center>दृष्टा व्यभिचरन्तीह ह्यस्माभिः पुरुषाधम।<br>उक्तं ह्यसत्यं भवता गम्यतां क्षिप्रमेव हि॥ ३१॥ | ऋषियोंने कहा—पुरुषाधम! हमने इसे यहाँ व्यभिचार करते हुए देखा है। आपने असत्य कहा है। अतः शीघ्र ही यहाँसे चले जाइये॥ ३१॥ |
| एवमुक्ते महादेवः सत्यमेव मयेरितम्।<br>भवतां प्रतिभात्येषेत्युक्त्वासौ विचचार ह॥ ३२॥<br>सोऽगच्छद्धरिणा सार्धं मुनीन्द्रस्य महात्मनः।<br>वसिष्ठस्याश्रमं पुण्यं भिक्षार्थी परमेश्वरः॥ ३३॥<br>दृष्ट्वा समागतं देवं भिक्षमाणमरुन्धती।<br>वसिष्ठस्य प्रिया भार्या प्रत्युद्गम्य ननाम तम्॥ ३४॥ | ऋषियोंके ऐसा कहनेपर महादेवने कहा—मैंने सत्य ही कहा है। आपको यह (मेरे पार्श्वमें विद्यमान सुन्दरी स्त्री) ऐसी प्रतीत होती है। ऐसा कहकर महादेव विचरण करने लगे। भिक्षाकी इच्छासे वे परमेश्वर विष्णुके साथ मुनिश्रेष्ठ महात्मा वसिष्ठके पवित्र आश्रममें गये। भिक्षा माँगते हुए देवको आये देखकर वसिष्ठकी प्रिय पत्नी अरुन्धतीने समीपमें जाकर उन्हें प्रणाम किया॥ ३२-३४॥ |
| * अध्याय ३७ * | ४४९ |
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| प्रक्षाल्य पादौ विमलं दत्त्वा चासनमुत्तमम्।<br>सम्प्रेक्ष्य शिथिलं गात्रमभिघातहतं द्विजैः।<br>संध्यामास भैषज्यैर्विषण्णा वदना सती ॥ ३५ ॥<br><br>चकार महतीं पूजां प्रार्थयामास भार्यया।<br>को भवान् कुत आयातः किमाचारो भवानिति।<br>उवाच तां महादेवः सिद्धानां प्रवरोऽस्म्यहम्॥ ३६॥<br><br>यदेतन्मण्डलं शुद्धं भाति ब्रह्ममयं सदा।<br>एषैव देवता मह्यं धारयामि सदैव तत्॥ ३७॥<br>इत्युक्त्वा प्रययौ श्रीमाननुगृह्य पतिव्रताम्।<br>ताडयाञ्चक्रिरे दण्डैर्लोष्टिभिर्मुष्टिभिर्द्विजाः ॥ ३८ ॥<br><br>दृष्ट्वा चरन्तं गिरिशं नग्नं विकृतलक्षणम्।<br>प्रोचुरेतद् भवाँल्लिङ्गमुत्पाटयतु दुर्मते ॥ ३९ ॥<br><br>तानब्रवीन्महायोगी करिष्यामीति शंकरः।<br>युष्माकं मामके लिङ्गे यदि द्वेषोऽभिजायते ॥ ४० ॥<br>इत्युक्त्वोत्पाटयामास भगवान् भगनेत्रहा।<br>नापश्यंस्तत्क्षणेनेशं केशवं लिङ्गमेव च ॥ ४१ ॥<br><br>तदोत्पाता बभूवुर्हि लोकानां भयशंसिनः।<br>न राजते सहस्रांशुश्चचाल पृथिवी पुनः।<br>निष्प्रभाश्च ग्रहाः सर्वे चुक्षुभे च महोदधिः ॥ ४२ ॥<br>अपश्यच्चानसूयात्रेः स्वप्नं भार्या पतिव्रता।<br>कथयामास विप्राणां भयादाकुलितेक्षणा ॥ ४३ ॥<br><br>तेजसा भासयन् कृत्स्नं नारायणसहायवान्।<br>भिक्षमाणः शिवो नूनं दृष्टोऽस्माकं गृहेष्विति ॥ ४४ ॥<br><br>तस्या वचनमाकर्ण्य शङ्कमाना महर्षयः।<br>सर्वे जग्मुर्महायोगं ब्रह्माणं विश्वसम्भवम् ॥ ४५ ॥<br><br>उपास्यमानममलैर्योगिभिर्ब्रह्मवित्तमैः।<br>चतुर्वेदैर्मूर्तिमद्भिः सावित्र्या सहितं प्रभुम्॥ ४६ ॥ | (परमेश्वरके) चरणोंको धोकर और शुद्ध उत्तम आसन प्रदान कर द्विजोंके आघातसे आहत उनके शिथिल शरीरको देखकर अत्यन्त खिन्न सती (अरुन्धती)-ने (उनके व्रणोंपर) औषधि लगायी और भार्यासहित (परमेश्वरकी) उन्होंने (अरुन्धतीने) महती पूजा की तथा पूछा—'आप कौन हैं, कहाँसे आये हैं, आपका आचार क्या है?' महादेवने उनसे कहा—'मैं सिद्धोंमें श्रेष्ठ (सिद्ध) हूँ।' जो यह ब्रह्ममय शुद्ध मण्डल सदा प्रकाशित होता है वही मेरे देवता (आस्पद) हैं। मैं सदा ही उनको धारण करता हूँ॥ ३५–३७॥<br><br>ऐसा कहकर तथा पतिव्रता (अरुन्धती)-पर कृपा करके श्रीमान् (महादेव) चल पड़े। द्विज उन्हें डंडों, ढेलों तथा मुक्कोंसे मारने लगे। नग्न तथा विकृत लक्षणवाले गिरिशको घूमते हुए देखकर मुनियोंने कहा—हे दुर्मते! तुम अपने इस लिङ्गको उखाड़ो। महायोगी शंकरने उनसे कहा—आप लोगोंको यदि मेरे लिङ्गके प्रति द्वेष उत्पन्न हो गया हो तो मैं वैसा ही करूँगा॥ ३८–४०॥<br><br>ऐसा कहकर भगके नेत्रोंको नष्ट करनेवाले भगवान्ने (अपने) लिङ्गको उखाड़ दिया। पर तत्काल ही सब कुछ अदृश्य हो गया और (मुनियोंने) न शंकरको देखा न केशवको और न लिङ्गको ही देखा और तभी पूरे लोकमें भय उत्पन्न करनेवाले उपद्रव होने लगे। सहस्रकिरण (सूर्य)-का तेज समाप्त हो गया, पृथ्वी काँपने लगी। सभी ग्रह प्रभावहीन हो गये और समुद्रमें क्षोभ उत्पन्न हो गया॥ ४१–४२॥<br><br>इधर अत्रिकी पत्नी पतिव्रता अनसूयाने स्वप्न देखा। उनके नेत्र भयसे व्याकुल हो गये। उन्होंने ब्राह्मणोंसे (स्वप्नकी बात बताते हुए) कहा—निश्चय ही हम लोगोंके घरमें अपने तेजसे सम्पूर्ण संसारको प्रकाशित कर रहे शिव (भगवान् शंकर) नारायणके साथ भिक्षा माँगते हुए दिखलायी पड़े थे। उनके वचन सुनकर सशंकित सभी महर्षि जगत्को उत्पन्न करनेवाले महायोगी ब्रह्माजीके पास गये॥ ४३–४५॥<br><br>वहाँ उन्होंने ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ विशुद्ध योगिजनोंद्वारा तथा मूर्तिमान् चारों वेदोंद्वारा उपासित होते हुए प्रभु (ब्रह्मा)-को सावित्रीके साथ देखा॥ ४६ ॥ |
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४५० * कूर्मपुराण *
| आसीनमासने रम्ये नानाश्चर्यसमन्विते।<br>प्रभासहस्रकलिले ज्ञानैश्वर्यादिसंयुते॥ ४७॥ | नाना प्रकारके आश्चर्योंसे समन्वित, हजारों प्रकारकी प्रभासे सुशोभित और ज्ञान तथा ऐश्वर्यसे युक्त रमणीय आसनपर विराजमान परम रमणीय अप्राकृत दिव्य शरीरके कारण शोभासम्पन्न, मुसकानयुक्त, उज्ज्वल नेत्रोंवाले, महाबाहु, छन्दोमय, अजन्मा, प्रसन्नवदन, शुभ एवं श्रेष्ठ चतुर्मुख वेदपुरुष (ब्रह्मा)-को देखकर वे (मुनिजन) भूमिपर मस्तक टेककर ईश्वरकी स्तुति करने लगे— ॥ ४७-४९॥ |
| विभ्राजमानं वपुषा सस्मितं शुभ्रलोचनम्।<br>चतुर्मुखं महाबाहुं छन्दोमयमजं परम्॥ ४८॥ | |
| विलोक्य वेदपुरुषं प्रसन्नवदनं शुभम्।<br>शिरोभिर्धरणीं गत्वा तोषयामासुरीश्वरम्॥ ४९॥ | |
| तान् प्रसन्नमना देवश्चतुर्मूर्तिश्चतुर्मुखः।<br>व्याजहार मुनिश्रेष्ठाः किमागमनकारणम्॥ ५०॥ | चतुर्मूर्ति चतुर्मुख देवने उनपर प्रसन्न होकर पूछा— ‘मुनिश्रेष्ठो! आपके आनेका क्या प्रयोजन है?’ तब सभी मुनियोंने मस्तकपर हाथ जोड़कर उन परमात्मा ब्रह्माको उस (भगवान् शंकरकी दिव्य लीलाके) सम्पूर्ण वृत्तान्तको बतलाया॥ ५०-५१॥ |
| तस्य ते वृत्तमखिलं ब्रह्मणः परमात्मनः।<br>ज्ञापयाञ्चक्रिरे सर्वे कृत्वा शिरसि चाञ्जलिम्॥ ५१॥ | |
| ऋषय ऊचुः | ऋषियोंने कहा— पवित्र दारुवनमें अत्यन्त सुन्दर कोई पुरुष सम्पूर्ण सुन्दर अङ्गोंवाली अपनी भार्याके साथ नग्न ही प्रविष्ट हुआ। उस ईश्वरने अपने शरीरसे (हमारी) स्त्रियोंके समूहको तथा सभी कन्याओंमें अति रमणीय उसकी प्रियाने (हमारे) पुत्रोंको दूषित (अपनी ओर आकृष्ट) किया। हम लोगोंने उस पुरुषको विविध शाप दिये, किंतु वे निष्फल हो गये, तब हम लोगोंने उसे बहुत मारा और उसके लिङ्गको गिरा दिया, पर तत्काल ही भार्याके साथ भगवान् और लिङ्ग अन्तर्हित हो गये। तभीसे प्राणियोंको भय प्रदान करनेवाले भीषण उत्पात होने लगे हैं॥ ५२-५५॥ |
| कश्चिद् दारुवनं पुण्यं पुरुषोऽतीवशोभनः।<br>भार्यया चारुसर्वाङ्ग्या प्रविष्टो नग्न एव हि॥ ५२॥ | |
| मोहयामास वपुषा नारीणां कुलमीश्वरः।<br>कन्यकानां प्रिया चास्य दूषयामास पुत्रकान्॥ ५३॥ | |
| अस्माभिर्विविधाः शापाः प्रदत्ताश्च पराहताः।<br>ताडितोऽस्माभिरत्यर्थं लिङ्गं तु विनिपातितम्॥ ५४॥ | |
| अन्तर्हितश्च भगवान् सभार्यो लिङ्गमेव च।<br>उत्पाताश्चाभवन् घोराः सर्वभूतभयंकराः॥ ५५॥ | |
| क एष पुरुषो देव भीताः स्म पुरुषोत्तम।<br>भवन्तमेव शरणं प्रपन्ना वयमच्युत॥ ५६॥ | पुरुषोत्तम! वह देव-पुरुष कौन है? हम लोग भयभीत हो गये हैं। अच्युत! हम सब आपकी शरणमें आये हैं। इस संसारमें जो कुछ भी चेष्टा होती है, उसे आप अवश्य जानते हैं, इसलिये विश्वेश! अनुग्रह कर आप हमारी रक्षा करें॥ ५६-५७॥ |
| त्वं हि वेत्सि जगत्यस्मिन् यत्किञ्चिदपि चेष्टितम्।<br>अनुग्रहेण विश्वेश तदस्माननुपालय॥ ५७॥ | |
| विज्ञापितो मुनिगणैर्विश्वात्मा कमलोद्भवः।<br>ध्यात्वा देवं त्रिशूलाङ्कं कृताञ्जलिरभाषत॥ ५८॥ | मुनिगणोंके द्वारा इस प्रकार निवेदन किये जानेपर कमलसे उत्पन्न विश्वात्मा (ब्रह्मा)-ने त्रिशूलका चिह्न धारण करनेवाले देव (शंकर)-का ध्यान करते हुए हाथ जोड़कर इस प्रकार कहा— ॥ ५८॥ |
| ब्रह्मोवाच | ब्रह्मा बोले— आह! कष्ट है कि आज आप लोगोंका सर्वस्व नष्ट हो गया। आपके बलको धिक्कार है, तपश्चर्याको धिक्कार है, आपका यह सब मिथ्या ही हो गया। पवित्र संस्कारों और निधियोंमें परम निधिको प्राप्तकर वृथाचारी आप लोगोंने मोहवश उनकी उपेक्षा कर दी॥ ५९-६०॥ |
| हा कष्टं भवतामद्य जातं सर्वार्थनाशनम्।<br>धिग्बलं धिक् तपश्चर्या मिथ्यैव भवतामिह॥ ५९॥ | |
| सम्प्राप्य पुण्यसंस्कारान्निधीनां परमं निधिम्।<br>उपेक्षितं वृथाचारैर्भवद्भिरिह मोहितैः॥ ६०॥ |
* अध्याय ३७ * । ४५१
| काङ्क्षन्ते योगिनो नित्यं यतन्तो यतयो निधिम्।<br>यमेव तं समासाद्य हा भवद्भिरुपेक्षितम्॥ ६१ ॥<br><br>यजन्ति यज्ञैर्विविधैर्यत्प्राप्त्यै वेदवादिनः।<br>महानिधिं समासाद्य हा भवद्भिरुपेक्षितम्॥ ६२॥<br><br>यं समासाद्य देवानामैश्वर्यमखिलं जगत्।<br>तमासाद्याक्षयनिधिं हा भवद्भिरुपेक्षितम्॥ ६३॥<br>यत्समापत्तिजनितं विश्वेशत्वमिदं मम।<br>तदेवोपेक्षितं दृष्ट्वा निधानं भाग्यवर्जितैः॥ ६४॥ | योगी लोग तथा यत्न करनेवाले यति लोग जिस निधिको प्राप्त करनेकी नित्य अभिलाषा करते हैं, उसीको प्राप्तकर आप लोगोंने उपेक्षा कर दी, यह बहुत ही कष्टकी बात है। वैदिक लोग जिसकी प्राप्तिके लिये अनेक प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं, बड़ा कष्ट है कि उन महानिधिको प्राप्तकर भी आप सभीने उनकी उपेक्षा कर दी। हाय! जिसे प्राप्तकर देवताओंके ऐश्वर्य-रूपमें समस्त लोक-लोकान्तर दृष्टिगोचर हो रहे हैं, उन अक्षयनिधिको प्राप्तकर आपने उनकी उपेक्षा कर दी॥ ६१-६३॥<br><br>जिनकी प्राप्ति होनेसे मुझे यह विश्वेश्वरत्व प्राप्त हुआ है, उन (समस्त ऐश्वर्यके) निधानका दर्शनकर भाग्यरहित आप लोगोंने (उनकी) उपेक्षा कर दी। |
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| यस्मिन् समाहितं दिव्यमैश्वर्यं यत् तदव्ययम्।<br>तमासाद्य निधिं ब्राह्मं हा भवद्भिर्वृथा कृतम्॥ ६५॥<br><br>एष देवो महादेवो विज्ञेयस्तु महेश्वरः।<br>न तस्य परमं किञ्चित् पदं समधिगम्यते॥ ६६॥ | जिनमें वह अविनाशी दिव्य ऐश्वर्य समाहित है, उन ब्रह्मरूप निधिको प्राप्तकर भी आप लोगोंने अपना सुअवसर खो दिया, यह बड़े कष्टकी बात है। इन्हीं देवको महादेव और महेश्वर समझना चाहिये। इनका परम पद (सर्वोत्कृष्ट ऐश्वर्य) किंचित् भी प्राप्त नहीं किया जा सकता अर्थात् जाना नहीं जा सकता॥ ६४-६६॥ |
| देवतानामृषीणां च पितॄणां चापि शाश्वतः।<br>सहस्रयुगपर्यन्तं प्रलये सर्वदेहिनाम्।<br>संहरत्येष भगवान् कालो भूत्वा महेश्वरः॥ ६७॥<br><br>एष चैव प्रजाः सर्वाः सृजत्येकः स्वतेजसा।<br>एष चक्री च वज्री च श्रीवत्सकृतलक्षणः॥ ६८॥<br><br>योगी कृतयुगे देवस्त्रेतायां यज्ञ उच्यते।<br>द्वापरे भगवान् कालो धर्मकेतुः कलौ युगे॥ ६९॥<br><br>रुद्रस्य मूर्तयस्तिस्रो याभिर्विश्वमिदं ततम्।<br>तमो ह्यग्नी रजो ब्रह्मा सत्त्वं विष्णुरिति प्रभुः॥ ७०॥ | हजारों युग-पर्यन्त रहनेवाले प्रलयकालमें ये ही सनातन भगवान् महेश्वर कालरूप होकर देवताओं, ऋषियों तथा पितरों और समस्त देहधारियोंका संहार (अपनेमें लय) करते हैं। ये ही अद्वितीय अपने तेजसे समस्त प्रजाओंकी सृष्टि करते हैं। चक्र, वज्र तथा श्रीवत्सके चिह्नको धारण करनेवाले ये ही हैं (क्योंकि इनमें तथा श्रीविष्णुमें सर्वथा अभेद है), ये ही देव कृतयुगमें योगी, त्रेतामें यज्ञरूप, द्वापरमें भगवान् काल तथा कलियुगमें धर्मकेतु कहलाते हैं। रुद्रकी तीन मूर्तियाँ हैं, इन्होंने ही इस विश्वको व्याप्त कर रखा है। तमोगुणके अधिष्ठाताको अग्नि, रजोगुणके अधिष्ठाताको ब्रह्मा तथा सत्त्वगुणके अधिष्ठाताको प्रभु विष्णु कहा गया है॥ ६७-७०॥ |
| मूर्तिरन्या स्मृता चास्य दिग्वासा वै शिवा ध्रुवा।<br>यत्र तिष्ठति तद् ब्रह्म योगेन तु समन्वितम्॥ ७१॥<br><br>या चास्य पार्श्वगा भार्या भवद्भीरभिवीक्षिता।<br>सा हि नारायणो देवः परमात्मा सनातनः॥ ७२॥<br><br>तस्मात् सर्वमिदं जातं तत्रैव च लयं व्रजेत्।<br>स एव मोहयेत् कृत्स्नं स एव परमा गतिः॥ ७३॥ | इनकी एक दूसरी मूर्ति है जो दिगम्बरा, शाश्वत तथा शिवात्मिका कहलाती है। उसीमें योगसे युक्त परम ब्रह्म प्रतिष्ठित रहते हैं। जिनको इनके पार्श्वभागमें स्थित भार्याके रूपमें आपने देखा है, वे ही सनातन परमात्मा नारायण देव हैं। उनसे ही यह सब उत्पन्न है और उनमें ही यह सब लीन भी हो जाता है। वे ही सबको मोहित करते हैं और वे ही परम गति हैं॥ ७१-७३॥ |
४५२ * कूर्मपुराण *
| सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।<br>एकशृङ्गो महानात्मा पुराणोऽष्टाक्षरो हरिः ॥ ७४ ॥<br><br>चतुर्वेदश्चतुर्मूर्तिस्त्रिमूर्तिस्त्रिगुणः परः।<br>एकमूर्तिरमेयात्मा नारायण इति श्रुतिः ॥ ७५ ॥<br>ऋतस्य गर्भो भगवानापो मायातनुः प्रभुः।<br>स्तूयते विविधैर्मन्त्रैर्ब्राह्मणैर्धर्ममोक्षिभिः ॥ ७६ ॥<br><br>संहृत्य सकलं विश्वं कल्पान्ते पुरुषोत्तमः।<br>शेते योगामृतं पीत्वा यत् तद् विष्णोः परं पदम् ॥ ७७ ॥<br><br>न जायते न म्रियते वर्धते न च विश्वसृक्।<br>मूलप्रकृतिरव्यक्ता गीयते वैदिकैरजः ॥ ७८ ॥<br>ततो निशायां वृत्तायां सिसृक्षुरखिलं जगत्।<br>अजस्य नाभौ तद् बीजं क्षिपत्येष महेश्वरः ॥ ७९ ॥<br><br>तं मां वित्त महात्मानं ब्रह्माणं विश्वतोमुखम्।<br>महान्तं पुरुषं विश्वमपां गर्भमनुत्तमम् ॥ ८० ॥<br><br>न तं विदथ जनकं मोहितास्तस्य मायया।<br>देवदेवं महादेवं भूतानामीश्वरं हरम् ॥ ८१ ॥<br>एष देवो महादेवो ह्यनादिर्भगवान् हरः।<br>विष्णुना सह संयुक्तः करोति विकरोति च ॥ ८२ ॥<br><br>न तस्य विद्यते कार्यं न तस्माद् विद्यते परम्।<br>स वेदान् प्रददौ पूर्वं योगमायातनुर्मम ॥ ८३ ॥ | महान् आत्मा पुराण (शाश्वत) पुरुष हरि एक शृंगधारी (अनन्त ब्रह्माण्डको एक शृंग-रूपमें धारण करनेवाले) अष्टाक्षर (अष्टमूर्तिरूप तथा अविनाशी तत्त्व) हजारों सिरवाले, हजारों आँखवाले एवं हजारों चरणवाले हैं। श्रुतिका कथन है कि नारायण चतुर्वेद, चतुर्मूर्ति, त्रिमूर्ति एवं त्रिगुण होते हुए भी एकमूर्ति तथा अमेयात्मा हैं ॥ ७४-७५ ॥<br><br>माया (-से विविध) शरीर धारण करनेवाले तथा (समस्त जगत्के जीवन-जलको ही अपने आयतनके रूपमें स्वीकार करनेवाले) जलस्वरूप प्रभु भगवान् कर्मफलके एकमात्र अधिष्ठाता हैं। धर्म तथा मोक्षकी इच्छा करनेवाले ब्राह्मण लोग विविध मन्त्रोंके द्वारा (उनकी) स्तुति करते हैं। कल्पान्तमें समस्त विश्वका संहार करनेके अनन्तर योगामृतका पानकर पुरुषोत्तम (भगवान् शंकर) जिस सर्वाधिष्ठान, स्वप्रकाशमें शयन (परम विश्रान्तिका अनुभव) करते हैं, वही विष्णु नामका परम पद है। विश्वकी सृष्टि करनेवाले ये न जन्म लेते हैं, न मरते हैं और न वृद्धिको प्राप्त होते हैं। वैदिक लोग इन्हीं अजन्मा (भगवान्)-को अव्यक्त मूलप्रकृति कहते हैं ॥ ७६-७८ ॥<br><br>ये महेश्वर (प्रलयरूपी) रात्रिके बीत जानेपर सम्पूर्ण जगत्की सृष्टिकी इच्छासे अजकी नाभिमें इस (सृष्टि)-के बीजको स्थापित करते हैं। उन (अज)-के रूपमें मुझे ही आप लोग जानें। मैं ही समस्त लोकोंका मूल होनेके कारण महात्मा, ब्रह्मा, सर्वतोमुख, महान् पुरुष, विश्वात्मा अप् (समस्त स्थूल जल)-का अधिष्ठाता सर्वोत्तम देव हूँ। अनन्त ब्रह्माण्डके बीजको मेरेमें स्थापित करनेवाले उन परमपिता देवाधिपति महादेव हरको आप लोग उनकी मायासे मोहित होनेके कारण नहीं जान सके ॥ ७९-८१ ॥<br><br>वे ही अनादि देव भगवान् महादेव हर विष्णुके साथ युक्त होकर सृष्टि और संहार करते रहते हैं। उनका कोई कार्य (कर्तव्य) नहीं है और उनसे श्रेष्ठ कोई नहीं है। योगमायामय शरीर धारण करनेवाले उन्होंने पूर्वकालमें मुझे वेद प्रदान किया ॥ ८२-८३ ॥ |
| * अध्याय ३७ * | ४५३ |
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| स मायी मायया सर्वं करोति विकरोति च।<br>तमेव मुक्तये ज्ञात्वा व्रजेत शरणं भवम्॥ ८४॥<br><br>इतीरिता भगवता मरीचिप्रमुखा विभुम्।<br>प्रणम्य देवं ब्रह्माणं पृच्छन्ति स्म सुदुःखिताः॥ ८५॥<br>मुनय ऊचुः<br>कथं पश्येम तं देवं पुनरेव पिनाकिनम्।<br>ब्रूहि विश्वामरेशान त्राता त्वं शरणैषिणाम्॥ ८६॥<br>पितामह उवाच<br>यद् दृष्टं भवता तस्य लिङ्गं भुवि निपातितम्।<br>तल्लिङ्गानुकृतीशस्य कृत्वा लिङ्गमनुत्तमम्॥ ८७॥<br>पूजयध्वं सपत्नीकाः सादरं पुत्रसंयुताः।<br>वैदिकैरेव नियमैर्विविधैर्ब्रह्मचारिणः॥ ८८॥<br>संस्थाप्य शांकरैर्मन्त्रैर्ऋग्यजुःसामसम्भवैः।<br>तपः परं समास्थाय गृणन्तः शतरुद्रियम्॥ ८९॥<br>समाहिताः पूजयध्वं सपुत्राः सह बन्धुभिः।<br>सर्वे प्राञ्जलयो भूत्वा शूलपाणिं प्रपद्यथ॥ ९०॥<br>ततो द्रक्ष्यथ देवेशं दुर्दर्शमकृतात्मभिः।<br>यं दृष्ट्वा सर्वमज्ञानमधर्मश्च प्रणश्यति॥ ९१॥<br>ततः प्रणम्य वरदं ब्रह्माणममितौजसम्।<br>जग्मुः संहृष्टमनसो देवदारुवनं पुनः॥ ९२॥<br><br>आराधयितुमारब्धा ब्रह्मणा कथितः यथा।<br>अजानन्तः परं देवं वीतरागा विमत्सराः॥ ९३॥<br><br>स्थण्डिलेषु विचित्रेषु पर्वतानां गुहासु च।<br>नदीनां च विविक्तेषु पुलिनेषु शुभेषु च॥ ९४॥<br><br>शैवालभोजनाः केचित् केचिदन्तर्जलेशयाः।<br>केचिदभ्रावकाशास्तु पादाङ्गुष्ठाग्रविष्ठिताः॥ ९५॥ | वे मायी (अपनी) मायाद्वारा सभीकी सृष्टि और संहार करते हैं। उन्हें ही मुक्तिका मूल समझकर उन भवकी ही शरणमें जाना चाहिये। भगवान् (ब्रह्मा)-के ऐसा कहनेपर मरीचि आदि प्रमुख ऋषियोंने विभु ब्रह्मदेवको प्रणामकर अत्यन्त दुःखित होकर उनसे पूछा—॥ ८४-८५॥<br>मुनिजन बोले—समस्त देवोंके स्वामी! उन पिनाकधारी देवका दर्शन हम पुनः किस प्रकार कर पायेंगे, आप हमें बतायें। आप शरण चाहनेवालोंकी रक्षा करनेवाले हैं॥ ८६॥<br>पितामहने कहा—पृथ्वीपर गिराये गये उनके (महेश्वरके) जिस लिङ्गको आप लोगोंने देखा था, उसी लिङ्गके समान श्रेष्ठ लिङ्ग बनाकर सपत्नीक तथा पुत्रोंसहित आदरपूर्वक विविध वैदिक मन्त्रोंसे ब्रह्मचर्यपूर्वक आप लोग उसकी पूजा करें। ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेदमें कहे गये शंकरके मन्त्रोंसे (लिङ्गकी) स्थापना कर परम तपका अवलम्बन कर, शतरुद्रियका जप करते हुए समाहित होकर बन्धुओं तथा पुत्रोंसहित आप सभी लोग हाथ जोड़कर शूलपाणिकी शरणमें जायें। तदनन्तर आप लोग अकृतात्माओंके लिये दुर्दर्श उन देवेश्वरका दर्शन करेंगे, जिनको देख लेनेपर सम्पूर्ण अज्ञान और अधर्म दूर हो जाता है॥ ८७—९१॥<br>तब अमित ओजस्वी वरदाता ब्रह्माको प्रणामकर प्रसन्नमनवाले वे सभी महर्षि पुनः देवदारु-वनकी ओर चले गये और परम देवको न जानते हुए भी उन महर्षियोंने राग एवं मात्सर्यसे रहित होकर ब्रह्माजीने जैसा बताया था, तदनुसार अनेकविध यज्ञीय वेदियों, पर्वतोंकी गुफाओं तथा जनशून्य नदियोंके सुन्दर किनारोंपर भगवान् शंकरकी आराधना प्रारम्भ कर दी॥ ९२–९४॥<br>कुछ लोग शैवालका भोजन करते हुए, कुछ जलके अंदर शयनकी मुद्रामें स्थित रहते हुए तथा कुछ लोग खुले आकाशके नीचे पैरके अँगूठेके अग्रभागपर स्थित रहकर श्रीशंकरकी आराधनामें दत्तचित्त हो गये॥ ९५॥ |
४५४ * कूर्मपुराण *
दन्तोलूखलिनस्त्वन्ये ह्मश्मकुट्टास्तथा परे।
शाकपर्णाशिनः केचित् सम्प्रक्षाला मरीचिपाः ॥ ९६ ॥
वृक्षमूलनिकेताश्च शिलाशय्यास्तथा परे।
कालं नयन्ति तपसा पूजयन्तो महेश्वरम् ॥ ९७ ॥
ततस्तेषां प्रसादार्थं प्रपन्नार्तिहरो हरः।
चकार भगवान् बुद्धिं प्रबोधाय वृषध्वजः ॥ ९८ ॥
देवः कृतयुगे ह्यस्मिन् शृङ्गे हिमवतः शुभे।
देवदारुवनं प्राप्तः प्रसन्नः परमेश्वरः ॥ ९९ ॥
भस्मपाण्डुरदिग्धाङ्गो नग्नो विकृतलक्षणः।
उल्मुकव्यग्रहस्तश्च रक्तपिङ्गललोचनः ॥ १०० ॥
क्वचिच्च हसते रौद्रं क्वचिद् गायति विस्मितः।
क्वचिन्नृत्यति शृङ्गारी क्वचिद् रौति मुहुर्मुहुः ॥ १०१ ॥
आश्रमेऽभ्यागतो भिक्षां याचते च पुनः पुनः।
मायां कृत्वात्मनो रूपं देवस्तद् वनमागतः ॥ १०२ ॥
कृत्वा गिरिसुतां गौरीं पार्श्वे देवः पिनाकधृक्।
सा च पूर्ववद् देवेशी देवदारुवनं गता ॥ १०३ ॥
दृष्ट्वा समागतं देवं देव्या सह कपर्दिनम्।
प्रणेमुः शिरसा भूमौ तोषयामासुरीश्वरम् ॥ १०४ ॥
वैदिकैर्विविधैर्मन्त्रैः सूक्तैर्माहेश्वरैः शुभैः।
अथर्वशिरसा चान्ये रुद्राद्यैर्ब्रह्मभिर्भवम् ॥ १०५ ॥
कुछ दूसरे दन्तोलूखली अर्थात् दाँतोंके ही द्वारा अनाजको तुष (भूसी) आदिसे रहितकर बिना पकाये खा लेते थे, कुछ दूसरे पत्थरपर ही अन्नको कूटकर खा लेते थे*। कुछ शाक तथा पत्तोंका ही भोजन करते थे, कुछ लोग एक समय भोजन करके अङ्गोंकी चिन्ता (शारीरिक सौष्ठव आदिकी चिन्ता) नहीं रखते थे, कुछ लोग स्नानपरायण एवं कुछ लोग सूर्य-किरणोंका ही पान करते थे। कुछ लोग वृक्षके नीचे रहते थे, दूसरे शिलारूपी शय्यापर ही सोते थे। इस प्रकार तपस्या (विविधाके) द्वारा महेश्वरकी पूजा करते हुए वे (मुनिजन) समय व्यतीत कर रहे थे॥ ९६-९७॥
(मुनियोंको इस प्रकार पश्चात्तापपूर्वक तपस्यामें निरत देखकर) उनकी व्याकुलता दूर करनेके लिये शरणागतोंके दुःखहर्ता भगवान् वृषध्वज हरने उन्हें प्रबोधित (मोहमुक्त) करनेका विचार किया। इसलिये प्रसन्न परमेश्वर वे देव (शंकर) सत्ययुगमें हिमालयके इस शुभ शिखरपर स्थित देवदारु-वनमें पुनः आये। उनके सारे अङ्ग भस्मसे उपलिप्त होनेके कारण श्वेत वर्णके थे, नग्न थे, विकृत लक्षणवाले थे, हाथमें उल्मुक (जलती लकड़ी) लेकर उसे घुमा रहे थे और उनके नेत्र लाल तथा पिंगलवर्णके थे॥ ९८–१००॥
कभी वे भयंकर रूपसे हँसते, कभी आश्चर्ययुक्त हो गान करने लगते, कभी शृंगारपूर्वक नृत्य करने लगते और कभी बार-बार रोने लगते। (इस स्थितिमें भगवान्) महादेव आश्रममें आकर बार-बार भिक्षा माँगने लगे। इस प्रकार अपना मायामय रूप बनाकर वे देव (शंकर) उस (देवदारु) वनमें विचरने लगे और उन पिनाकधारी देवने पर्वतपुत्री गौरीको अपने पार्श्वभागमें कर लिया था। वे देवेशी पूर्वके समान ही देवदारु-वनमें महादेवके साथ आयीं॥ १०१-१०३॥
देवीके साथ कपर्दी (शंकर) देवको आया देखकर उन्होंने (मुनियोंने) भूमिमें सिर रखकर ईश्वरको प्रणाम किया और स्तुति की। वे विविध वैदिक मन्त्रों, शुभ माहेश्वर सूक्तों, अथर्वशिरस् तथा अन्य रुद्रसम्बन्धी वेदमन्त्रोंसे शंकरकी स्तुति करने लगे— ॥ १०४-१०५ ॥
* भोज्य अन्नकी स्वादिष्टताके प्रति अनासक्त होनेसे अन्नके परिष्कारके साधन उलूखल तथा सिलको उपयोगमें नहीं लाते थे। (इनके उपयोगमें हिंसा भी होती है, इसलिये तपस्वी लोग विशेषरूपसे इनका वर्जन करते हैं।)
* अध्याय ३७ *
४५५
| नमो देवादिदेवाय महादेवाय ते नमः।<br>त्र्यम्बकाय नमस्तुभ्यं त्रिशूलवरधारिणे ॥ १०६ ॥ | देवोंके आदिदेवको नमस्कार है। महादेव ! आपको नमस्कार है। श्रेष्ठ त्रिशूल धारण करनेवाले त्र्यम्बक ! आपको नमस्कार है। दिगम्बर, (स्वेच्छासे) विकृत (रूप धारण करनेवाले) तथा पिनाकी आपको नमस्कार है। समस्त प्रणतजनोंके आश्रय तथा स्वयं निराश्रय (निरधिष्ठान देव)-को नमस्कार है। अन्त करनेवाले (यम)-का भी अन्त करनेवाले और सबका संहार करनेवाले आपको नमस्कार है। नृत्यपरायण और भैरवरूप आपको नमस्कार है। नर-नारी शरीरवाले (अर्धनारीश्वर) एवं योगियोंके गुरु आपको नमस्कार है। दान्त, शान्त, तापस (विरक्त) तथा हरको नमस्कार है। अत्यन्त भीषण, चर्माम्बरधारी रुद्रको नमस्कार है। लेलिहानको नमस्कार है, शितिकण्ठको नमस्कार है। अघोर तथा घोर रूपवाले वामदेवको नमस्कार है। धतूरेकी माला धारण करनेवाले और देवीके प्रियकर्ताको नमस्कार है। गङ्गाजलकी धाराको धारण करनेवाले परमेष्ठी शम्भुको नमस्कार है। योगाधिपतिको नमस्कार है तथा ब्रह्माधिपतिको नमस्कार है ॥ १०६-११२ ॥ |
| नमो दिग्वाससे तुभ्यं विकृताय पिनाकिने।<br>सर्वप्रणतदेहाय स्वयमप्रणतात्मने ॥ १०७ ॥ | |
| अन्तकान्तकृते तुभ्यं सर्वसंहरणाय च।<br>नमोऽस्तु नृत्यशीलाय नमो भैरवरूपिणे ॥ १०८ ॥ | |
| नरनारीशरीराय योगिनां गुरवे नमः।<br>नमो दान्ताय शान्ताय तापसाय हराय च ॥ १०९ ॥ | |
| विभीषणाय रुद्राय नमस्ते कृत्तिवाससे।<br>नमस्ते लेलिहानाय शितिकण्ठाय ते नमः ॥ ११० ॥ | |
| अघोरघोररूपाय वामदेवाय वै नमः।<br>नमः कनकमालाय देव्याः प्रियकराय च ॥ १११ ॥ | |
| गङ्गासलिलधाराय शम्भवे परमेष्ठिने।<br>नमो योगाधिपतये ब्रह्माधिपतये नमः ॥ ११२ ॥ | |
| प्राणाय च नमस्तुभ्यं नमो भस्माङ्गरागिणे।<br>नमस्ते घनवाहाय दंष्ट्रिणे वह्निरेतसे ॥ ११३ ॥ | भस्मका अङ्गराग लगानेवाले प्राणरूप आपको बार-बार नमस्कार है। घनवाह<sup>१</sup>! दंष्ट्री तथा वह्निरेतसको<sup>२</sup> नमस्कार है। ब्रह्माके सिरका हरण करनेवाले कालरूपको नमस्कार है। हम आपके न आगमनको जानते हैं और न गमनको ही जानते हैं। विश्वेश्वर ! महादेव ! आप जिस रूपमें हैं, उसी रूपमें आपको नमस्कार है। प्रमथनाथ तथा शुभ सम्पदा देनेवालेको नमस्कार है। हाथमें कपाल<sup>३</sup> धारण करनेवाले आपको तथा आप मीढुष्टम—शिवलिङ्ग-विग्रहको नमस्कार है। कनकलिङ्ग<sup>४</sup> और वारिलिङ्ग<sup>५</sup> आपको नमस्कार है। अग्नि तथा सूर्यस्वरूप लिङ्गवालेको नमस्कार है, ज्ञानलिङ्ग ! आपको नमस्कार है। सर्पोंकी मालावाले और कर्णिकारप्रिय<sup>६</sup> आपको नमस्कार है। किरीटी, कुण्डल धारण करनेवाले तथा कालके भी काल आपको नमस्कार है ॥ ११३-११६ ॥ |
| ब्रह्मणश्च शिरोहर्त्रे नमस्ते कालरूपिणे।<br>आगतिं ते न जानीमो गतिं नैव च नैव च।<br>विश्वेश्वर महादेव योऽसि सोऽसि नमोऽस्तु ते ॥ ११४ ॥ | |
| नमः प्रमथनाथाय दात्रे च शुभसम्पदाम्।<br>कपालपाणये तुभ्यं नमो मीढुष्टमाय ते।<br>नमः कनकलिङ्गाय वारिलिङ्गाय ते नमः ॥ ११५ ॥ | |
| नमो वह्न्यर्कलिङ्गाय ज्ञानलिङ्गाय ते नमः।<br>नमो भुजंगहाराय कर्णिकारप्रियाय च।<br>किरीटिने कुण्डलिने कालकालाय ते नमः ॥ ११६ ॥ |
१-मेघ शंकरके वाहन हैं, इसलिये वे 'घनवाहन' हैं।
२-भगवान् शंकरके वीर्यसे स्वर्णकी उत्पत्ति हुई है और स्वर्ण वह्निका ही एक रूप है, इसलिये भगवान् शंकरको 'वह्निरता' कहते हैं।
३-ब्रह्माके सिर-हरणकी कथा पिछले अध्यायमें आयी है।
४-वह्नि महादेवकी मूर्ति है और वह्निका ही रूप कनक (स्वर्ण) है, इसीलिये महादेवको 'कनकलिङ्ग' कहते हैं।
५-जल भी भगवान् महादेवकी मूर्ति है, इसलिये महादेवको वारि (जल)-की मूर्ति कहते हैं।
६-कर्णिकार पुष्पविशेषका नाम है।
| ४५६ | * कूर्मपुराण * |
|---|---|
| वामदेव महेशान देवदेव त्रिलोचन।<br>क्षम्यतां यत्कृतं मोहात् त्वमेव शरणं हि नः॥ ११७॥<br>चरितानि विचित्राणि गुह्यानि गहनानि च।<br>ब्रह्मादीनां च सर्वेषां दुर्विज्ञेयोऽसि शंकर॥ ११८॥<br>अज्ञानाद् यदि वा ज्ञानाद् यत्किंचित् कुरुते नरः।<br>तत्सर्वं भगवान्नेव कुरुते योगमायया॥ ११९॥<br>एवं स्तुत्वा महादेवं प्रहृष्टेनान्तरात्मना।<br>ऊचुः प्रणम्य गिरिशं पश्यामस्त्वां यथा पुरा॥ १२०॥<br>तेषां संस्तवमाकर्ण्य सोमः सोमविभूषणः।<br>स्वमेव परमं रूपं दर्शयामास शंकरः॥ १२१॥<br>तं ते दृष्ट्वा गिरिशं देव्या सह पिनाकिनम्।<br>यथा पूर्वं स्थिता विप्राः प्रणेमुर्हृष्टमानसाः॥ १२२॥<br>ततस्ते मुनयः सर्वे संस्तूय च महेश्वरम्।<br>भृग्वङ्गिरोवसिष्ठास्तु विश्वामित्रस्तथैव च॥ १२३॥<br>गौतमोऽत्रिः सुकेशश्च पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः।<br>मरीचिः कश्यपश्चापि संवर्तश्च महातपाः।<br>प्रणम्य देवदेवेशमिदं वचनमब्रुवन्॥ १२४॥<br>कथं त्वां देवदेवेश कर्मयोगेन वा प्रभो।<br>ज्ञानेन वाथ योगेन पूजयामः सदैव हि॥ १२५॥<br><br>केन वा देवमार्गेण सम्पूज्यो भगवानिह।<br>किं सेव्यमसेव्यं वा सर्वमेतद् ब्रवीहि नः॥ १२६॥<br>देवदेव उवाच<br>एतद् वः सम्प्रवक्ष्यामि गूढं गहनमुत्तमम्।<br>ब्रह्मणे कथितं पूर्वमादावेव महर्षयः॥ १२७॥<br>सांख्ययोगो द्विधा ज्ञेयः पुरुषाणां हि साधनम्।<br>योगेन सहितं सांख्यं पुरुषाणां विमुक्तिदम्॥ १२८॥<br><br>न केवल्रेन योगेन दृश्यते पुरुषः परः।<br>ज्ञानं तु केवलं सम्यगपवर्गफलप्रदम्॥ १२९॥<br><br>भवन्तः केवलं योगं समाश्रित्य विमुक्तये।<br>विहाय सांख्यं विमलमकुर्वन्त परिश्रमम्॥ १३०॥<br><br>एतस्मात् कारणात् विप्रा नृणां केवलधर्मिणाम्।<br>आगतोऽहमिमं देशं ज्ञापयन् मोहसम्भवम्॥ १३१॥ | वामदेव! त्रिलोचन! महेशान! देवाधिदेव! मोहवश हमने जो किया, उसे आप क्षमा करें। हम सभी आपकी शरणमें हैं। आपके चरित्र विचित्र, गहन तथा गुह्य हैं। शंकर! आप ब्रह्मा आदि सभीके लिये दुर्विज्ञेय हैं। मनुष्य ज्ञान अथवा अज्ञानसे जो कुछ भी करता है, वह सब आप भगवान् ही अपनी योगमायासे करते हैं। इस प्रकार महादेवकी स्तुतिकर प्रसन्न-मनसे (मुनियोंने) उनको प्रणाम किया और कहा—हम लोग आपको पूर्वरूपमें देखना चाहते हैं॥ ११७-१२०॥<br>उनकी (मुनियोंकी इस) स्तुतिको सुनकर चन्द्रभूषण सोम शंकरने अपने परम रूपका दर्शन (उन्हें) कराया। उन पिनाकी गिरिशको देवी (पार्वती)-के साथ पहले-जैसे (मङ्गलमय) रूपमें स्थित देखकर प्रसन्न-मनवाले ब्राह्मणोंने उन्हें प्रणाम किया। तदनन्तर भृगु, अंगिरा, वसिष्ठ तथा विश्वामित्र, गौतम, अत्रि, सुकेश, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, मरीचि, कश्यप तथा महातपस्वी संवर्त आदि सभी ऋषियोंने महेश्वरकी स्तुतिकर उन देवदेवेशको प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—॥ १२१-१२४॥<br>देवदेवेश! प्रभो! हम सब किस प्रकारसे आपकी सदा पूजा करें, कर्मयोग या ज्ञानयोगसे? किस देवमार्ग (प्रशस्त मार्ग)-के द्वारा भगवान्की पूजा करनी चाहिये, हम लोगोंके लिये क्या सेवनीय है, क्या असेवनीय है, यह सब आप हमें बतलायें॥ १२५-१२६॥<br>देवदेवने कहा—महर्षियो! मैं आप लोगोंको यह उत्तम और गम्भीर रहस्य बतलाता हूँ। पूर्वकालमें (मैंने) इसे ब्रह्माजीको बतलाया था॥ १२७॥<br>पुरुषोंके लिये साधनस्वरूप दो प्रकारका सांख्ययोग समझना चाहिये। योगसहित (कर्मयोगसहित अर्थात् अनासक्त-भावसे कर्मनिष्ठाके साथ) सांख्य (ज्ञाननिष्ठा) पुरुषोंको मुक्ति प्रदान करनेवाला है। केवल योगके द्वारा परम पुरुषका दर्शन नहीं होता। (शुद्ध) ज्ञान (ज्ञाननिष्ठा) भलीभाँति केवल मोक्षफलको देनेवाला है। आप लोग मुक्ति प्राप्त करनेके लिये विमल सांख्यका परित्याग करके केवल योगका ही अवलम्बनकर परिश्रम कर रहे थे। ब्राह्मणो! इसी कारणसे केवल धर्म करनेवाले (कर्ममात्रनिष्ठ-कर्मव्यसनी) मनुष्योंको मोह उत्पन्न होता है, यह बतानेके लिये मैं इस स्थानपर आया हूँ॥ १२८-१३१॥ |
- अध्याय ३७ * ४५७
तस्माद् भवद्भिर्विमलं ज्ञानं कैवल्यसाधनम् ।
ज्ञातव्यं हि प्रयत्नेन श्रोतव्यं दृश्यमेव च ॥ १३२ ॥
अतः आप लोगोंको मोक्षके साधनरूप विशुद्ध ज्ञानको प्रयत्नपूर्वक जानना, सुनना तथा उसका साक्षात्कार करना चाहिये ॥ १३२ ॥
एकः सर्वत्रगो ह्यात्मा केवलश्चितिमात्रकः ।
आनन्दो निर्मलो नित्यं स्यादेतत् सांख्यदर्शनम् ॥ १३३ ॥
एतदेव परं ज्ञानमेष मोक्षोऽत्र गीयते ।
एतत् कैवल्यममलं ब्रह्मभावश्च वर्णितः ॥ १३४ ॥
आश्रित्य चैतत् परमं तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।
पश्यन्ति मां महात्मानो यतयो विश्वमीश्वरम् ॥ १३५ ॥
आत्मा सर्वत्र व्याप्त, विशुद्ध, चिन्मात्र, आनन्द, निर्मल, नित्य तथा एक है। यही सांख्य (ज्ञाननिष्ठाका) दर्शन है। यही परम ज्ञान है, इसीको यहाँ मोक्ष कहा गया है। यही निर्मल मोक्ष है और यही शुद्ध ब्रह्मभाव बताया गया है। इस परम (ज्ञान)-का आश्रय ग्रहणकर उसमें ही निष्ठा रखते हुए और उसीके परायण रहते हुए महात्मा तथा यतिजन मुझ विश्वरूप ईश्वरका दर्शन करते हैं ॥ १३३-१३५ ॥
एतत् तत् परमं ज्ञानं केवलं सन्निरञ्जनम् ।
अहं हि वेद्यो भगवान् मम मूर्तिरियं शिवा ॥ १३६ ॥
बहूनि साधनानीह सिद्धये कथितानि तु ।
तेषामभ्यधिकं ज्ञानं मामकं द्विजपुंगवाः ॥ १३७ ॥
यही वह सत्, निरञ्जन तथा अद्वितीय परम ज्ञान है। मुझे ही भगवान् जानना चाहिये और यह शिवा मेरी ही मूर्ति है। श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! सिद्धिके लिये यहाँ (शास्त्रोंमें) बहुतसे साधन बताये गये हैं, किंतु उनमें मेरे विषयका ज्ञान सर्वश्रेष्ठ है ॥ १३६-१३७ ॥
ज्ञानयोगरताः शान्ता मामेव शरणं गताः ।
ये हि मां भस्मनिरता ध्यायन्ति सततं हृदि ॥ १३८ ॥
मद्भक्तिपरमा नित्यं यतयः क्षीणकल्मषाः ।
नाशयाम्यचिरात् तेषां घोरं संसारसागरम् ॥ १३९ ॥
भस्म धारण करनेवाले, (संसारकी निःसारताको हृदयसे समझनेवाले) ज्ञानयोगपरायण, शान्त और मेरे ही शरणमें आये हुए जो लोग हृदयमें निरन्तर मेरा ही ध्यान करते हैं और नित्य मेरी परम भक्तिमें तत्पर हैं, कल्मषोंसे रहित एवं पूर्ण संयत हैं, उन लोगोंके घोर संसाररूपी सागरको मैं शीघ्र ही नष्ट कर देता हूँ ॥ १३८-१३९ ॥
प्रशान्तः संयतमना भस्मोद्धूलितविग्रहः ।
ब्रह्मचर्यरतो नग्नो व्रतं पाशुपतं चरेत् ॥ १४० ॥
निर्मितं हि मया पूर्वं व्रतं पाशुपतं परम् ।
गुह्याद् गुह्यतमं सूक्ष्मं वेदसारं विमुक्तये ॥ १४१ ॥
भस्मसे धूसरित शरीरवाला होकर संयतमन तथा शान्त होकर, ब्रह्मचर्यव्रत-परायण होते हुए वस्त्रादि परिधानकी आसक्तिसे रहित होकर पाशुपत-व्रतका पालन करना चाहिये। मुक्तिप्राप्तिके लिये मैंने पूर्वकालमें गुह्यसे भी गुह्यतम, वेदके साररूप, सूक्ष्म एवं श्रेष्ठ पाशुपत-व्रतका उपदेश किया था ॥ १४०-१४१ ॥
यद वा कौपीनवसनः स्याद् वैकवसनो मुनिः ।
वेदाभ्यासरतो विद्वान् ध्यायेत् पशुपतिं शिवम् ॥ १४२ ॥
एष पाशुपतो योगः सेवनीयो मुमुक्षुभिः ।
भस्मच्छन्नैर्हि सततं निष्कामैरिति विश्रुतिः ॥ १४३ ॥
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।
बहवोऽनेन योगेन पूता मद्भावमागताः ॥ १४४ ॥
अथवा कौपीन वस्त्र या एक वस्त्र धारणकर विद्वान् मुनिको वेदाभ्यासमें रत रहते हुए पशुपति शिवका (सतत) ध्यान करना चाहिये। मोक्षकी अभिलाषावाले मुमुक्षुजनोंको सतत भस्मसे उपलिप्त रहकर निष्कामभावसे इस पाशुपतयोगका सेवन करना चाहिये। ऐसा श्रुतिका कथन है। राग, भय तथा क्रोधसे सर्वथा रहित, मुझे ही सर्वस्व समझनेवाले और मेरा ही आश्रय ग्रहण करनेवाले बहुतसे (भक्तजन) इस योगके द्वारा पवित्र होकर मेरे भावको प्राप्त हुए हैं ॥ १४२-१४४ ॥
४५८ * कूर्मपुराण *
| अन्यानि चैव शास्त्राणि लोकेऽस्मिन् मोहनानि तु।<br>वेदवादविरुद्धानि मयैव कथितानि तु॥ १४५॥<br><br>वामं पाशुपतं सोमं लाकुलं चैव भैरवम्।<br>असेव्यमेतत् कथितं वेदबाह्यं तथेतरम्॥ १४६॥<br><br>वेदमूर्तिरहं विप्रा नान्यशास्त्रार्थवेदिभिः।<br>ज्ञायते मत्स्वरूपं तु मुक्त्वा वेदं सनातनम्॥ १४७॥<br><br>स्थापयध्वमिदं मार्गं पूजयध्वं महेश्वरम्।<br>अचिरादैश्वरं ज्ञानमुत्पत्स्यति न संशयः॥ १४८॥<br><br>मयि भक्तिश्च विपुला भवतामस्तु सत्तमाः।<br>ध्यातमात्रो हि सांनिध्यं दास्यामि मुनिसत्तमाः॥ १४९॥<br><br>इत्युक्त्वा भगवान् सोमस्तत्रैवान्तरधीयत।<br>तेऽपि दारुवने तस्मिन् पूजयन्ति स्म शंकरम्।<br>ब्रह्मचर्यरताः शान्ता ज्ञानयोगपरायणाः॥ १५०॥ | इस संसारमें मोहित करनेवाले तथा वेदमतका विरोध करनेवाले अन्य भी शास्त्र हैं, वे मेरे द्वारा ही कहे गये हैं। वाम (मार्ग), पाशुपत, सोम, लाकुल तथा भैरव (मार्ग) तथा अन्य—ये असेव्य और वेदबाह्य कहे गये हैं॥ १४५-१४६॥<br><br>ब्राह्मणो! मैं वेदमूर्ति हूँ। सनातन वेदका परित्यागकर दूसरे शास्त्रको जाननेवाले लोग मेरे स्वरूपको नहीं जान सकते। (अतः आप लोग) इस मार्गकी स्थापना करें, महेश्वरकी पूजा करें (इससे) शीघ्र ही आप लोगोंको ईश्वर-सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त होगा, इसमें संशय नहीं है। श्रेष्ठ जनो! आप सभीकी मुझमें महान् भक्ति हो। श्रेष्ठ मुनियो! ध्यान करनेमात्रसे मैं आपको अपना सांनिध्य प्रदान करूँगा॥ १४७-१४९॥<br><br>इतना कहकर भगवान् सोम (शंकर) वहींपर अन्तर्धान हो गये। वे शान्त महर्षि भी ब्रह्मचर्यपरायण होकर, ज्ञानयोग-परायण रहते हुए उस दारुवनमें शंकरकी पूजा करने लगे। उन ब्रह्मवादी महात्मा मुनिगणोंने (स्वयं मोहरहित हो जानेके कारण) एकत्रित होकर अध्यात्मज्ञान-सम्बन्धी बहुतसे सिद्धान्तोंका विस्तार किया॥ १५०-१५१॥ |
| समेत्य ते महात्मानो मुनयो ब्रह्मवादिनः।<br>वितेनिरे बहून् वादानध्यात्मज्ञानसंश्रयान्॥ १५१॥<br><br>किमस्र्य जगतो मूलमात्मा चास्माकमेव हि।<br>कोऽपि स्यात् सर्वभावानां हेतुरीश्वर एव च॥ १५२॥<br><br>इत्येवं मन्यमानानां ध्यानमार्गावलम्बिनाम्।<br>आविरासीन्महादेवी देवी गिरिवरात्मजा॥ १५३॥<br><br>कोटिसूर्यप्रतीकाशा ज्वालामालासमावृता।<br>स्वभाभिर्विमलाभिस्तु पूरयन्ती नभस्तलम्॥ १५४॥ | इस जगत्का मूल (कारण) क्या है? (उत्तर—) हमारी आत्मा ही इस जगत्का मूल है। सभी भाव पदार्थोंका हेतु कौन है? (उत्तर—) ईश्वर ही सभी भावोंका जनक है। इस प्रकारकी दृढ़ धारणाके साथ ध्यानमार्गका अवलम्बन करनेवाले उन महर्षियोंके समक्ष श्रेष्ठ पर्वत (हिमालय)-की पुत्री महादेवी पार्वती प्रकट हुईं॥ १५२-१५३॥<br><br>करोड़ों सूर्यके समान, ज्वालामालाओं (तेजो-राशि)-से समावृत वे अपनी विमल प्रभासे आकाशमण्डलको आपूरित कर रही थीं। हजारों ज्वालाओं (तेजोमण्डल)-के मध्यमें प्रतिष्ठित, अतुलनीय, अद्वितीय, सम्पूर्ण जगत्के ईश (शंकर)-की पत्नी, उन गिरिजाका दर्शनकर मुनियोंने उन्हें प्रणाम किया। क्योंकि वे जानते हैं कि ये ही परमेश्वरी परमेश्वर महेश्वरकी मूलशक्ति (बीज) हैं॥ १५४-१५५॥ |
| तामन्वपश्यन् गिरिजाममेयां<br>ज्वालासहस्रान्तरसंनिविष्टाम् ।<br>प्रणेमुरेकामखिलेशपत्नीं<br>जानन्ति ते तत् परमस्य बीजम्॥ १५५॥ |
| * अध्याय ३७ * | ४५९ |
|---|---|
| अस्माकमेषा परमेशपत्नी<br>गतिस्तथात्मा गगनाभिधाना।<br>पश्यन्त्यथात्मानमिदं च कृत्स्नं<br>तस्यामथैते मुनयश्च विप्राः॥ १५६॥ | अनन्तर उन लोगोंने ऐसी भावना की—ये ही परमेश-पत्नी हम सबकी गति हैं, आत्मा हैं, इन्हें गगन (आकाश) नामसे कहा जाता है, (क्योंकि ये महादेवी वस्तुगत्या निराकार तथा परम व्यापक हैं, अतएव परम अवकाशस्वरूप सर्वाधिष्ठान होनेसे कथंचित् आकाशके द्वारा तुलनीय हैं और परब्रह्मका व्योम (आकाश) नाम है ही तथा इन महादेवी एवं परब्रह्ममें सर्वथा अभेद है।) समस्त मुनि एवं समस्त विप्र इन्हींमें अपनेको तथा समस्त प्रपञ्चको देखते हैं। (मुनियोंके इस पवित्र भावसे संतुष्ट होकर) परमेश्वरकी पत्नी (पार्वती)-ने उन्हें (विशेषरूपसे) देखा। इसी बीच (मुनियोंने) सभीके मूल कारण, नियामक, पुराण पुरुष, बृहत् एवं रुद्रात्मक कवि, देव शम्भु (महादेव)-का दर्शन किया। तदनन्तर देवी (पार्वती) तथा देव (शंकर)-को देखकर उन्होंने (मुनियोंने) प्रणाम किया, उत्तम आनन्द प्राप्त किया और उनमें भगवान् (परमेश)-की कृपासे जन्मके विनाशके हेतुरूप अर्थात् पुनर्जन्म न करानेवाले ईश्वर-सम्बन्धी ज्ञानका आविर्भाव हुआ॥ १५६-१५८॥ |
| निरीक्षितास्ते परमेशपत्न्या<br>तदन्तरे देवमशेषहेतुम्।<br>पश्यन्ति शम्भुं कविमीशितारं<br>रुद्रं बृहन्तं पुरुषं पुराणम्॥ १५७॥ | |
| आलोक्य देवीमथ देवमीशं<br>प्रणेमुरानन्दमवापुरग्र्यम् ।<br>ज्ञानं तदैशं भगवत्प्रसादा-<br>दाविर्बभौ जन्मविनाशहेतु ॥ १५८॥ | |
| इयं हि सा जगतो योनिरैका<br>सर्वात्मिका सर्वनियामिका च।<br>माहेश्वरीशक्तिरनादिसिद्धा<br>व्योमाभिधाना दिवि राजतीव॥ १५९॥ | (इस ज्ञानके आविर्भावके साथ ही मुनियोंने यह अनुभव किया) ये ही देवी जगत्की एकमात्र मूल कारण, सर्वात्मिका, सबका नियन्त्रण करनेवाली तथा अनादिसिद्ध व्योम नामवाली माहेश्वरी शक्ति हैं, जो द्युलोकमें शोभित होती हुई प्रतीत हो रही हैं। देवाधिदेव महान् परमेष्ठी, परसे भी पर, अद्वितीय रुद्र महेश्वर शिवने इसी परम शक्ति (महादेवी)-में अंशरूपसे विद्यमान मायाका आश्रय ग्रहणकर विश्वकी सृष्टि की॥ १५९-१६०॥ |
| अस्यां महत्परमेष्ठी परस्ता-<br>न्महेश्वरः शिव एकोऽथ रुद्रः।<br>चकार विश्वं परशक्तिनिष्ठां<br>मायामथारुह्य स देवदेवः॥ १६०॥ | |
| एको देवः सर्वभूतेषु गूढो<br>मायी रुद्रः सकलो निष्कलश्च।<br>स एव देवी न च तद्विभिन्न-<br>मेतज्ज्ञात्वा ह्यमृतत्वं व्रजन्ति॥ १६१॥ | ये देव ही सभी प्राणियोंमें गूढ़रूपसे प्रतिष्ठित हैं अर्थात् सर्वत्र सूक्ष्मरूपसे व्याप्त हैं। वे मायी (मायाके नियन्ता) रुद्र सकल (साकार) तथा निष्कल (निराकार) हैं। वे ही देवी (रूप) हैं, उनसे भिन्न (जगत्में और कुछ भी) नहीं है, ऐसा जानकर अमृतत्वकी प्राप्ति होती है। इधर भर्ग (वरेण्य तेजोरूप), देवाधिदेव, भगवान् परमेश मुनियोंके मोहको दूरकर तथा उन्हें परमज्ञानसे सम्पन्न कर महादेवीके साथ अन्तर्हित हो गये और एकमात्र अरण्यको ही अपना घर माननेवाले वे परम ज्ञानी मुनि लोग उन परम देव रुद्रकी आराधनामें दत्तचित्त हो गये॥ १६१-१६२॥ |
| अन्तर्हितोऽभूद् भगवानथेशो<br>देव्या भर्गः सह देवादिदेवः।<br>आराधयन्ति स्म तमेव देवं<br>वनौकसस्ते पुनरेव रुद्रम्॥ १६२॥ |
४६० * कूर्मपुराण *
| एतद् वः कथितं सर्वं देवदेवविचेष्टितम्।<br>देवदारुवने पूर्वं पुराणे यन्मया श्रुतम्॥ १६३॥<br><br>यः पठेच्छृणुयान्नित्यं मुच्यते सर्वपातकैः।<br>श्रावयेद् वा द्विजान् शान्तान् स याति परमां गतिम्॥ १६४॥ | इस तरह प्राचीन कालमें देवदारु-वनमें घटित देवाधिदेवका जो वृत्तान्त मैंने पुराणमें सुना था, वह आप लोगोंको बता दिया। जो नित्य इसका पाठ करेगा अथवा श्रवण करेगा, वह सभी पातकोंसे मुक्त हो जायगा अथवा जो शान्त द्विजोंको इसे सुनायेगा, वह परम गतिको प्राप्त होगा॥ १६३-१६४॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे सप्तत्रिंशोऽध्यायः॥ ३७॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें सैंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३७॥
अड़तीसवाँ अध्याय
तीर्थमाहात्म्य-प्रकरणमें मार्कण्डेय-युधिष्ठिर-संवादका प्रारम्भ, मार्कण्डेयजीद्वारा नर्मदा तथा अमरकण्टकतीर्थके माहात्म्यका प्रतिपादन
| सूत उवाच<br>एषा पुण्यतमा देवी देवगन्धर्वसेविता।<br>नर्मदा लोकविख्याता तीर्थानामुत्तमा नदी॥ १॥<br><br>तस्याः शृणुध्वं माहात्म्यं मार्कण्डेयेन भाषितम्।<br>युधिष्ठिराय तु शुभं सर्वपापप्रणाशनम्॥ २॥ | **सूतजीने कहा—**देवताओं तथा गन्धर्वोंद्वारा सेवित ये अत्यन्त पवित्र नर्मदादेवी संसारमें प्रसिद्ध हैं तथा नदीरूपमें सभी तीर्थोंमें उत्तम तीर्थ हैं। इनका वह शुभ माहात्म्य आप लोग सुनें, जो महर्षि मार्कण्डेयद्वारा युधिष्ठिरको बताया गया है तथा सभी पापोंका नाशक होनेके कारण शुभ है॥ १-२॥ |
| युधिष्ठिर उवाच<br>श्रुतास्तु विविधा धर्मास्त्वत्प्रसादान्महामुने।<br>माहात्म्यं च प्रयागस्य तीर्थानि विविधानि च॥ ३॥<br><br>नर्मदा सर्वतीर्थानां मुख्या हि भवतेरिता।<br>तस्यास्त्विदानीं माहात्म्यं वक्तुमर्हसि सत्तम॥ ४॥ | **युधिष्ठिर बोले—**महामुने! आपकी कृपासे मैंने विविध धर्मोंको सुना, साथ ही प्रयागका माहात्म्य और विविध तीर्थोंका भी (माहात्म्य) श्रवण किया। आपने बतलाया कि सभी तीर्थोंमें नर्मदा मुख्य हैं, अतः हे सत्तम! इस समय आप उन्हींका माहात्म्य मुझे बतलायें॥ ३-४॥ |
| मार्कण्डेय उवाच<br>नर्मदा सरितां श्रेष्ठा रुद्रदेहाद् विनिःसृता।<br>तारयेत् सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च॥ ५॥<br><br>नर्मदायास्तु माहात्म्यं पुराणे यन्मया श्रुतम्।<br>इदानीं तत् प्रवक्ष्यामि शृणुष्वैकमनाः शुभम्॥ ६॥<br><br>पुण्या कनखले गङ्गा कुरुक्षेत्रे सरस्वती।<br>ग्रामे वा यदि वारण्ये पुण्या सर्वत्र नर्मदा॥ ७॥<br><br>त्रिभिः सारस्वतं तोयं सप्ताहेन तु यामुनम्।<br>सद्यः पुनाति गाङ्गेयं दर्शनादेव नार्मदम्॥ ८॥ | **मार्कण्डेयने कहा—**रुद्रकी देहसे निकली हुई नर्मदा सभी नदियोंमें श्रेष्ठ हैं। (वे) सभी चर-अचर प्राणियोंको पार उतारनेवाली हैं। पुराणमें नर्मदाका जो माहात्म्य मैंने सुना है, उसे अब बतलाता हूँ, आप लोग एकाग्र होकर सुनें—॥ ५-६॥<br><br>गङ्गा कनखलमें तथा सरस्वती कुरुक्षेत्रमें पवित्र (कही गयी) हैं, किंतु ग्राम अथवा अरण्यमें सर्वत्र ही नर्मदाको पवित्र कहा गया है। सरस्वतीका जल तीन दिनोंतक, यमुनाका जल सात दिनोंतक तथा गङ्गाजल तत्काल स्नान-पानसे पवित्र करता है, किंतु नर्मदाका जल तो दर्शनमात्रसे ही पवित्र कर देता है॥ ७-८॥ |
| * अध्याय ३८ * | ४६१ |
|---|---|
| कलिङ्गदेशपश्चार्धे पर्वतेऽमरकण्टके।<br>पुण्या च त्रिषु लोकेषु रमणीया मनोरमा॥ ९ ॥<br>सदेवसुरगन्धर्वा ऋषयश्च तपोधनाः।<br>तपस्तप्त्वा तु राजेन्द्र सिद्धिं तु परमां गताः॥ १०॥<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् नियमस्थो जितेन्द्रियः।<br>उपोष्य रजनीमेकां कुलानां तारयेच्छतम्॥ ११॥ | कलिंग देशके पश्चार्धमें अमरकण्टक पर्वतपर तीनों लोकोंमें पवित्र, रमणीय, मनोरम नर्मदाका उद्गम स्थल है। राजेन्द्र! वहाँ देवताओंसहित असुरों, गन्धर्वों, ऋषियों तथा तपस्वियोंने तपस्या कर परम सिद्धि प्राप्त की है। राजन्! मनुष्य वहाँ (नर्मदामें) स्नान करके जितेन्द्रिय तथा नियम-परायण रहते हुए एक रात्रि उपवास करे तो अपने सौ पीढ़ियोंको तार देता है॥ ९-११॥ |
| योजनानां शतं साग्रं श्रूयते सरिदुत्तमा।<br>विस्तारेण तु राजेन्द्र योजनद्वयमायता ॥ १२ ॥<br>षष्टितीर्थसहस्राणि षष्टिकोट्यस्तथैव च।<br>पर्वतस्य समन्तात् तु तिष्ठन्त्यमरकण्टके ॥ १३॥<br>ब्रह्मचारी शुचिर्भूत्वा जितक्रोधो जितेन्द्रियः।<br>सर्वहिंसानिवृत्तस्तु सर्वभूतहिते रतः॥ १४॥<br>एवं सर्वसमाचारो यस्तु प्राणान् समुत्सृजेत्।<br>तस्य पुण्यफलं राजन् शृणुष्वावहितो नृप॥ १५॥ | राजेन्द्र! सुना जाता है कि वह श्रेष्ठ नदी सौ योजनसे कुछ अधिक लम्बी तथा दो योजन चौड़े विस्तारमें फैली है। अमरकण्टक पर्वतमें चारों ओर साठ करोड़ साठ हजार तीर्थ स्थित हैं। राजन्! जो ब्रह्मचर्यपरायण है, पवित्र है, क्रोध तथा इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त किया है, सभी प्रकारकी हिंसाओंसे सर्वथा निवृत्त है, सभी प्राणियोंके हितमें परायण है तथा ऐसे ही सभी पवित्र आचारोंसे सम्पन्न है, वह मनुष्य यहाँ प्राणोंका परित्यागकर जिस पुण्य फलको प्राप्त करता है, उसे आप सावधान होकर सुनें- ॥ १२-१५॥ |
| शतवर्षसहस्राणि स्वर्गे मोदति पाण्डव।<br>अप्सरोगणसंकीर्णो दिव्यस्त्रीपरिवारितः ॥ १६॥<br>दिव्यगन्धानुलिप्तश्च दिव्यपुष्पोपशोभितः।<br>क्रीडते देवलोके तु दैवतैः सह मोदते ॥ १७॥<br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो राजा भवति धार्मिकः।<br>गृहं तु लभतेऽसौ वै नानारत्नसमन्वितम् ॥ १८॥<br>स्तम्भैर्मणिमयैर्दिव्यैर्वज्रवैदूर्यभूषितम् ।<br>आलेख्यवाहनैः शुभ्रैर्दासीदाससमन्वितम् ॥ १९॥<br>राजराजेश्वरः श्रीमान् सर्वस्त्रीजनवल्लभः।<br>जीवेद् वर्षशतं साग्रं तत्र भोगसमन्वितः ॥ २०॥ | पाण्डव! वह पुरुष अप्सराओंके समूहोंसे व्याप्त अर्थात् सेवित तथा चारों ओर दिव्य स्त्रियोंसे आवृत रहकर स्वर्गमें सौ हजार वर्षोंतक आनन्द प्राप्त करता है। दिव्य गन्ध (चन्दन)-से अनुलिप्त होकर तथा दिव्य पुष्पोंसे सुशोभित होकर देवलोकमें क्रीडा करता है और देवताओंके साथ आनन्द प्राप्त करता है। स्वर्गमें सुख भोगने योग्य पुण्योंके निःशेष होनेपर वह धार्मिक राजा होता है और नाना प्रकारके रत्नोंसे समन्वित दिव्य मणिमय स्तम्भों, हीरे एवं वैदूर्यमणिसे विभूषित, उत्तम चित्रों तथा वाहनोंसे अलंकृत और दासी-दाससे समन्वित भवन प्राप्त करता है। वह राजराजेश्वर श्रीसम्पन्न, सभी स्त्रियोंका प्रियकर तथा भोगोंसे युक्त होकर वहाँ (पृथ्वीपर) सौ वर्षसे भी अधिक समयतक जीवित रहता है॥ १६-२०॥ |
| अग्निप्रवेशेऽथ जले अथवाऽनशने कृते।<br>अनिवर्तिका गतिस्तस्य पवनस्याम्बरे यथा ॥ २१ ॥ | (इस तीर्थमें) अग्नि अथवा जलमें प्रवेश करने अथवा अनशन-व्रत करनेसे वैसी ही पुनरागमनरहित गति होती है, जैसी कि आकाशमें पवनकी होती है (इसका आशय यह है कि शास्त्रविहित तपके रूपमें अग्निप्रवेश आदि तप इस तीर्थमें अक्षय पुण्य देनेवाले होते हैं) ॥ २१ ॥ |
४६२ * कूर्मपुराण *
| पश्चिमे पर्वततटे सर्वपापविनाशनः।<br>ह्रदो जलेश्वरो नाम त्रिषु लोकेषु विश्रुतः॥ २२॥<br><br>तत्र पिण्डप्रदानेन संध्योपासनकर्मणा।<br>दशवर्षाणि पितरस्तर्पिताः स्युर्न संशयः॥ २३॥<br>दक्षिणे नर्मदाकूले कपिलाख्या महानदी।<br>सरलार्जुनसंच्छन्ना नातिदूरे व्यवस्थिता॥ २४॥<br><br>सा तु पुण्या महाभागा त्रिषु लोकेषु विश्रुता।<br>तत्र कोटिशतं साग्रं तीर्थानां तु युधिष्ठिर॥ २५॥<br><br>तस्मिंस्तीर्थे तु ये वृक्षाः पतिताः कालपर्ययात्।<br>नर्मदातोयसंस्पृष्टास्ते यान्ति परमां गतिम्॥ २६॥<br><br>द्वितीया तु महाभागा विशल्यकरणी शुभा।<br>तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा विशल्यो भवति क्षणात्॥ २७॥<br><br>कपिला च विशल्या च श्रूयते राजसत्तम।<br>ईश्वरेण पुरा प्रोक्ता लोकानां हितकाम्यया॥ २८॥<br><br>अनाशकं तु यः कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थे नराधिप।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा रुद्रलोकं स गच्छति॥ २९॥<br><br>तत्र स्नात्वा नरो राजन्नश्वमेधफलं लभेत्।<br>ये वसन्त्युत्तरे कूले रुद्रलोके वसन्ति ते॥ ३०॥<br>सरस्वत्यां च गङ्गायां नर्मदायां युधिष्ठिर।<br>समं स्नानं च दानं च यथा मे शंकरोऽब्रवीत्॥ ३१॥<br><br>परित्यजति यः प्राणान् पर्वतेऽमरकण्टके।<br>वर्षकोटिशतं साग्रं रुद्रलोके महीयते॥ ३२॥<br><br>नर्मदायां जलं पुण्यं फेनोर्मिसमलंकृतम्।<br>पवित्रं शिरसावन्द्य सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ३३॥<br><br>नर्मदा सर्वतः पुण्या ब्रह्महत्यापहारिणी।<br>अहोरात्रोपवासेन मुच्यते ब्रह्महत्यया॥ ३४॥<br><br>जालेश्वरं तीर्थवरं सर्वपापविनाशनम्।<br>तत्र गत्वा नियमवान् सर्वकामाँल्लभेन्नरः॥ ३५॥<br><br>चन्द्रसूर्योपरागे तु गत्वा ह्यमरकण्टकम्।<br>अश्वमेधाद् दशगुणं पुण्यमाप्नोति मानवः॥ ३६॥ | (अमरकण्टक) पर्वतके पश्चिमी किनारेपर सभी पापोंका नाश करनेवाला और तीनों लोकोंमें विख्यात जलेश्वर नामका एक ह्रद (तालाब) है। वहाँ पिण्डदान करने तथा संध्योपासन कर्म करनेसे दस (हजार) वर्षतक पितर तृप्त रहते हैं, इसमें संदेह नहीं॥ २२-२३॥<br><br>नर्मदाके दक्षिण तटके समीपमें ही कपिला नामवाली महानदी स्थित है, जो साल तथा अर्जुनके वृक्षोंसे घिरी हुई है। वह महाभागा (नदी) पवित्र तथा तीनों लोकोंमें विख्यात है। युधिष्ठिर! वहाँ सौ करोड़से भी अधिक तीर्थ हैं। कालक्रमसे जो वृक्ष उस तीर्थमें गिरते हैं, वे नर्मदाके जलका स्पर्श प्राप्त हो जानेके कारण परम गतिको प्राप्त होते हैं। दूसरी महाभागा शुभ नदी विशल्यकरणी है, उस तीर्थमें स्नानकर मनुष्य तत्क्षण ही शल्यसे (सभी प्रकारके पापरूपी काँटोंसे) रहित हो जाता है। राजश्रेष्ठ! यह आप्त श्रुति है कि ईश्वरने इन कपिला तथा विशल्या नामकी दोनों नदियोंको प्राणिमात्रके कल्याण करनेका आदेश पहलेसे ही दे रखा है। नराधिपति!<br>उस तीर्थमें जो (शास्त्रीय विधिसे) अनशनव्रत करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर रुद्रलोकमें जाता है। राजन्! वहाँ स्नानकर मनुष्य अश्वमेधका फल प्राप्त करता है और जो लोग उत्तरी तटपर निवास करते हैं, वे रुद्रलोकमें निवास करते हैं॥ २४-३०॥<br><br>युधिष्ठिर! शंकरने मुझे जैसा बतलाया था, उसके अनुसार गङ्गा, सरस्वती एवं नर्मदामें किया गया स्नान और दान समान फलदायक होता है। जो अमरकण्टक पर्वतपर प्राणोंका परित्याग करता है, वह सौ करोड़ वर्षोंसे भी अधिक समयतक रुद्रलोकमें पूजित होता है। फेन और ऊर्मियों (तरङ्गों)-से अलंकृत नर्मदाके पवित्र जलको पवित्रतापूर्वक सिरसे वन्दित करनेपर अर्थात् सिरपर धारण करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। नर्मदा सभी प्रकारसे पवित्र और ब्रह्महत्याको दूर करनेवाली है। वहाँ एक अहोरात्र उपवास करनेसे ब्रह्महत्या (-के पाप)-से मुक्ति हो जाती है। जालेश्वर नामका श्रेष्ठ तीर्थ सभी पापोंको नष्ट करनेवाला है। वहाँ जाकर नियमसे रहनेवाला मनुष्य सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। चन्द्र तथा सूर्यग्रहणमें अमरकण्टककी यात्रा करनेसे मनुष्य अश्वमेध-यज्ञसे दस गुना अधिक पुण्य प्राप्त करता है॥ ३१-३६॥ |
- अध्याय ३९ * | ४६३
एष पुण्यो गिरिवरो देवगन्धर्वसेवितः।
नानाद्रुमलताकीर्णो नानापुष्पोपशोभितः ॥ ३७ ॥
तत्र संनिहितो राजन् देव्या सह महेश्वरः।
ब्रह्मा विष्णुस्तथा चेन्द्रो विद्याधरगणैः सह ॥ ३८ ॥
प्रदक्षिणं तु यः कुर्यात् पर्वतं ह्यमरकण्टकम्।
पौण्डरीकस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥ ३९ ॥
कावेरी नाम विपुला नदी कल्मषनाशिनी।
तत्र स्नात्वा महादेवमर्चयेद् वृषभध्वजम्।
संगमे नर्मदायास्तु रुद्रलोके महीयते ॥ ४० ॥
यह पुण्यप्रद श्रेष्ठ पर्वत (अमरकण्टक) देवताओं तथा गन्धर्वोंद्वारा सेवित, नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे परिपूर्ण एवं विविध प्रकारके पुष्पोंसे सुशोभित है। राजन्! यहाँ देवी (पार्वती)-के साथ महेश्वर और विद्याधरगणोंके साथ ब्रह्मा, विष्णु तथा इन्द्र भी स्थित रहते हैं। जो मानव अमरकण्टक पर्वतकी परिक्रमा करता है, वह पौण्डरीक यज्ञका फल प्राप्त करता है। ऐसे ही कावेरी नामकी एक प्रसिद्ध नदी है। यह विशाल है तथा कल्मषोंका नाश करनेवाली है। उसमें स्नानकर तथा नर्मदाके संगममें स्नान करके वृषभध्वज महादेवकी आराधना करनेसे रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है॥ ३७–४०॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे अष्टात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें अड़तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३८॥
उनतालीसवाँ अध्याय
तीर्थमाहात्म्य-वर्णनके प्रसंगमें नर्मदाके तटवर्ती तीर्थोंका विस्तारसे वर्णन
मार्कण्डेय उवाच
नर्मदा सरितां श्रेष्ठा सर्वपापविनाशिनी।
मुनिभिः कथिता पूर्वमीश्वरेण स्वयम्भुवा ॥ १ ॥
मुनिभिः संस्तुता ह्येषा नर्मदा प्रवरा नदी।
रुद्रगात्राद् विनिष्क्रान्ता लोकानां हितकाम्यया ॥ २ ॥
सर्वपापहरा नित्यं सर्वदेवनमस्कृता।
संस्तुता देवगन्धर्वैरप्सरोभिस्तथैव च ॥ ३ ॥
उत्तरे चैव तत्कूले तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।
नाम्ना भद्रेश्वरं पुण्यं सर्वपापहरं शुभम्।
तत्र स्नात्वा नरो राजन् दैवतैः सह मोदते ॥ ४ ॥
मार्कण्डेयने कहा— मुनियोंने तथा उनसे पूर्व स्वयम्भू ईश्वरने नर्मदाका वर्णन सभी पापोंका नाश करनेवाली सर्वश्रेष्ठ नदीके रूपमें किया है। मुनियोंद्वारा स्तुति करनेपर यह श्रेष्ठ नर्मदा नदी लोगोंके कल्याणकी कामनासे रुद्रके शरीरसे निकली है। यह नित्य सभी पापोंको हरनेवाली है, सभी देवोंद्वारा नमस्कृत है और देवताओं, गन्धर्वों तथा अप्सराओंके द्वारा स्तुत्य है॥ १–३॥
इस (नर्मदा) नदीके उत्तरी किनारेपर तीनों लोकोंमें विख्यात भद्रेश्वरनामका तीर्थ है, जो पवित्र, शुभ तथा सभी पापोंका हरण करनेवाला है। राजन्! वहाँ स्नान करके मनुष्य देवताओंके साथ आनन्दित होता है।
ततो गच्छेत राजेन्द्र तीर्थमाम्नातकेश्वरम्।
तत्र स्नात्वा नरो राजन् गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ५ ॥
राजेन्द्र! वहाँसे आम्रातकेश्वर तीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान करके मनुष्य हजार गौओंके दानका फल प्राप्त करता है॥ ४–५॥
ततोऽङ्गारेश्वरं गच्छेन्नियतो नियताशनः।
सर्वपापविशुद्धात्मा रुद्रलोके महीयते ॥ ६ ॥
तदनन्तर संयमपूर्वक नियत आहार करते हुए अङ्गारेश्वर तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। इससे (तीर्थ-विधि सम्पन्न करनेसे) सभी पापोंका शोधन होता है और रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है॥ ६॥
४६४ * कूर्मपुराण *
ततो गच्छेत राजेन्द्र केदारं नाम पुण्यदम् । तत्र स्नात्वोदकं कृत्वा सर्वान् कामानवाप्नुयात् ॥ ७ ॥
पिप्पलेशं ततो गच्छेत् सर्वपापविनाशनम्। तत्र स्नात्वा महाराज रुद्रलोके महीयते ॥ ८ ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र विमलेश्वरमुत्तमम्। तत्र प्राणान् परित्यज्य रुद्रलोकमवाप्नुयात् ॥ ९ ॥
ततः पुष्करिणीं गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत् । स्नातमात्रो नरस्तत्र इन्द्रस्यार्धासनं लभेत् ॥ १०॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र शूलभेदमिति श्रुतम् । तत्र स्नात्वार्चयेद् देवं गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ११॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र बलितीर्थमनुत्तमम्। तत्र स्नात्वा नरो राजन् सिंहासनपतिर्भवेत् ॥ १२ ॥
शक्रतीर्थं ततो गच्छेत् कूले चैव तु दक्षिणे । उपोष्य रजनीमेकां स्नानं कृत्वा यथाविधि ॥ १३ ॥
आराधयेन्महायोगं देवं नारायणं हरिम् । गोसहस्रफलं प्राप्य विष्णुलोकं स गच्छति ॥ १४ ॥ ऋषितीर्थं ततो गत्वा सर्वपापहरं नृणाम्। स्नातमात्रो नरस्तत्र शिवलोके महीयते ॥ १५ ॥
नारदस्य तु तत्रैव तीर्थं परमशोभनम् । स्नातमात्रो नरस्तत्र गोसहस्रफलं लभेत् ॥ १६ ॥
यत्र तप्तं तपः पूर्वं नारदेन सुरर्षिणा । प्रीतस्तस्य ददौ योगं देवदेवो महेश्वरः ॥ १७ ॥
ब्रह्मणा निर्मितं लिङ्गं ब्रह्मोश्वरमिति श्रुतम् । यत्र स्नात्वा नरो राजन् ब्रह्मलोके महीयते ॥ १८ ॥
ऋणतीर्थं ततो गच्छेत् स ऋणान्मुच्यते ध्रुवम् । महेश्वरं ततो गच्छेत् पर्याप्तं जन्मनः फलम् ॥ १९ ॥
राजेन्द्र ! इसके बाद पुण्य प्रदान करनेवाले केदार नामक तीर्थमें जाना चाहिये, वहाँ स्नान करके उदकदान (तर्पण आदि क्रिया) करनेसे सभी कामनाओंकी प्राप्ति होती है। तदनन्तर सभी पापोंका विनाश करनेवाले पिप्पलेश (तीर्थ) - में जाना चाहिये। महाराज! वहाँ स्नान करनेसे रुद्रलोकमें आदर प्राप्त होता है। राजेन्द्र ! तदनन्तर श्रेष्ठ विमलेश्वर (तीर्थ)-में जाना चाहिये। वहाँ प्राणोंका परित्याग करनेसे रुद्रलोक प्राप्त होता है। इसके बाद पुष्करिणीमें जाकर वहाँ स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य इन्द्रका आधा आसन प्राप्त करता है ॥ ७-१० ॥
राजेन्द्र ! ऐसी श्रुति है कि वहाँसे शूलभेद नामके तीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ स्नान करके देवाराधना करनी चाहिये। इससे हजार गौओंके दानका फल प्राप्त होता है। राजेन्द्र! तदनन्तर परम उत्तम बलितीर्थमें जाना चाहिये। राजन् ! वहाँ स्नान करके मनुष्य सिंहासनाधिपति अर्थात् राजा होता है। इसके उपरान्त (बलितीर्थके) दक्षिणी किनारेपर स्थित शक्रतीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ एक रात्रि उपवास करके यथाविधि स्नान करना चाहिये तथा महायोगस्वरूप नारायण हरिकी आराधना करनी चाहिये। इनसे हजार गौओंके दानका फल प्राप्तकर मनुष्य विष्णुलोकमें जाता है ॥ ११-१४॥
तदनन्तर मनुष्योंके समस्त पापोंको हरनेवाले ऋषितीर्थमें जाकर वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य शिवलोकमें पूजित होता है। वहींपर नारदजीका परम शोभन तीर्थ है। वहाँ स्नानमात्र करके मनुष्य हजार गोदानका फल प्राप्त करता है। पूर्वकालमें इसी तीर्थमें देवर्षि नारदने तपस्या की थी और इसी तपस्याके फलस्वरूप देवाधिदेव महेश्वरने प्रसन्न होकर उन्हें योग प्रदान किया था। राजन् ! ब्रह्माके द्वारा स्थापित लिङ्ग ब्रह्मोश्वर नामसे प्रसिद्ध है। इस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ १५-१८ ॥
तदनन्तर ऋणतीर्थमें जाना चाहिये, वहाँ जानेवाला निश्चित ही ऋणसे मुक्त हो जाता है। इसके बाद महेश्वर-तीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ जाकर तीर्थसेवन करनेसे जन्मका अन्तिम फल (महेश्वरका दर्शन) प्राप्त होता है ॥ १९ ॥
- अध्याय ३९ * | ४६५ ---|---
भीमेश्वरं ततो गच्छेत् सर्वव्याधिविनाशनम्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र सर्वदुःखैः प्रमुच्यते ॥ २० ॥ | तदुपरांत सभी व्याधियोंका विनाश करनेवाले भीमेश्वर-तीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य सभी दुःखोंसे मुक्त हो जाता है॥२०॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र पिङ्गलेश्वरमुत्तमम्।<br>अहोरात्रोपवासेन त्रिरात्रफलमाप्नुयात् ॥ २१ ॥<br><br>तस्मिंस्तीर्थे तु राजेन्द्र कपिलां यः प्रयच्छति।<br>यावन्ति तस्या रोमाणि तत्प्रसूतिकुलेषु च।<br>तावद् वर्षसहस्राणि रुद्रलोके महीयते ॥ २२ ॥<br><br>यस्तु प्राणपरित्यागं कुर्यात् तत्र नराधिप।<br>अक्षयं मोदते कालं यावच्चन्द्रदिवाकरौ ॥ २३ ॥<br><br>नर्मदातटमाश्रित्य तिष्ठन्ते ये तु मानवाः।<br>ते मृताः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ॥ २४ ॥ | राजेन्द्र! तदनन्तर उत्तम पिङ्गलेश्वर (तीर्थमें) जाना चाहिये। वहाँ अहोरात्रका उपवास करनेसे त्रिरात्र (उपवास)-का फल प्राप्त होता है। राजेन्द्र! उस तीर्थमें जो कपिला (गौ)-का दान करता है, वह उस कपिलाके तथा उसके कुलमें उत्पन्न संतानोंके शरीरोंपर जितने रोम होते हैं, उतने ही हजार वर्षपर्यन्त रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। नराधिप! वहाँ जो प्राणोंका त्याग करता है, वह जबतक सूर्य-चन्द्रमा हैं, तबतक अक्षय आनन्द प्राप्त करता है। जो मनुष्य नर्मदाके तटका आश्रयकर (वहाँ) रहते हैं, वे मरनेपर पुण्यवान् संतोंके समान स्वर्ग प्राप्त करते हैं॥ २१—२४॥ ततो दीप्तेश्वरं गच्छेद व्यासतीर्थं तपोवनम्।<br>निवर्तिता पुरा तत्र व्यासभीता महानदी।<br>हुंकारिता तु व्यासेन दक्षिणेन ततो गता ॥ २५ ॥<br><br>प्रदक्षिणं तु यः कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थे युधिष्ठिर।<br>प्रीतस्तस्य भवेद् व्यासो वाञ्छितं लभते फलम् ॥ २६ ॥ | तदनन्तर व्यासतीर्थ नामक तपोवनमें स्थित दीप्तेश्वर (तीर्थमें) जाना चाहिये। प्राचीन कालमें वहाँ व्यासजीसे भयभीत होकर महानदी (नर्मदा) वापस हो गयी थी और व्यासके द्वारा हुंकार किये जानेपर (अर्थात् रोष प्रकट करनेपर) वहाँसे दक्षिणकी ओर चली गयी। युधिष्ठिर! उस तीर्थमें जो प्रदक्षिणा करता है, प्रसन्न होकर व्यासजी उसे अभिलषित फल प्रदान करते हैं॥ २५-२६॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र इक्षुनद्यास्तु संगमम्।<br>त्रैलोक्यविश्रुतं पुण्यं तत्र संनिहितः शिवः।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् गाणपत्यमवाप्नुयात् ॥ २७ ॥<br><br>स्कन्दतीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपापप्रणाशनम्<br>आजन्मनः कृतं पापं स्नातस्तीव्रं व्यपोहति ॥ २८ ॥<br><br>तत्र देवाः सगन्धर्वा भवात्मजमनुत्तमम्।<br>उपासते महात्मानं स्कन्दं शक्तिधरं प्रभुम् ॥ २९ ॥<br><br>ततो गच्छेदाङ्गिरसं स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>गोसहस्रफलं प्राप्य रुद्रलोकं स गच्छति ॥ ३० ॥ | राजेन्द्र! तदनन्तर तीनों लोकोंमें विख्यात तथा पवित्र इक्षुनदीके संगमपर जाना चाहिये। वहाँ शिव प्रतिष्ठित हैं। राजन्! वहाँ मनुष्य स्नानकर (शिवका) गाणपत्य-पद प्राप्त करता है। इसके बाद सभी पापोंका विनाश करनेवाले स्कन्दतीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ स्नान करनेसे जन्मभरका किया हुआ पाप शीघ्र ही दूर हो जाता है। वहाँ शंकरजीके पुत्र, श्रेष्ठ महात्मा, शक्तिसम्पन्न प्रभु स्कन्दकी गन्धर्वोंसहित देवता उपासना करते हैं। तदनन्तर आङ्गिरस तीर्थमें जाकर स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नान करनेवाला व्यक्ति हजार गोदानका फल प्राप्त कर रुद्रलोकमें जाता है॥ २७-३०॥ अङ्गिरा यत्र देवेशं ब्रह्मपुत्रो वृषध्वजम्।<br>तपसाराध्य विश्वेशं लब्धवान् योगमुत्तमम् ॥ ३१ ॥<br><br>कुशतीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपापप्रणाशनम्।<br>स्नानं तत्र प्रकुर्वीत अश्वमेधफलं लभेत् ॥ ३२ ॥ | वहाँ ब्रह्माजीके पुत्र (महर्षि) अङ्गिराने तपस्याके द्वारा देवेश वृषध्वज विश्वेश्वरकी आराधना कर उत्तम योग प्राप्त किया था। तदनन्तर समस्त पापोंको नष्ट करनेवाले कुशतीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ स्नान करनेसे व्यक्ति अश्वमेधका फल प्राप्त करता है॥ ३१-३२॥
| ४६६ | * कूर्मपुराण * |
|---|---|
| कोटितीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपापप्रणाशनम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राज्यं लभते नात्र संशयः ॥ ३३ ॥ | इसके पश्चात् सभी पापोंको नष्ट करनेवाले कोटितीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ स्नानकर मनुष्य राज्य प्राप्त कर लेता है, इसमें कोई संदेह नहीं ॥ ३३ ॥ |
| चन्द्रभागां ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र सोमलोके महीयते ॥ ३४ ॥ | तदुपरान्त चन्द्रभागामें स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्रसे ही मनुष्य सोमलोकमें आदर प्राप्त करता |
| नर्मदादक्षिणे कूले संगमेश्वरमुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् सर्वयज्ञफलं लभेत् ॥ ३५ ॥ | है। राजन्! नर्मदाके दक्षिणी किनारेपर उत्तम संगमेश्वर (तीर्थ) है। वहाँ स्नान करके मनुष्य सभी यज्ञोंका |
| नर्मदायोत्तरे कूले तीर्थं परमशोभनम्।<br>आदित्यायतनं रम्यमीश्वरेण तु भाषितम् ॥ ३६ ॥ | फल प्राप्त कर लेता है। नर्मदाके उत्तरी किनारेपर अत्यन्त सुन्दर तीर्थ है। वहाँ आदित्यका रमणीय मन्दिर |
| तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र दत्त्वा दानं तु शक्तितः।<br>तस्य तीर्थप्रभावेण लभते चाक्षयं फलम् ॥ ३७॥ | है। यह स्वयं ईश्वरने बताया है। राजेन्द्र! वहाँ स्नानकर यथाशक्ति दान देनेपर उस तीर्थके प्रभावसे अक्षय फल |
| दरिद्रा व्याधिता ये तु ये च दुष्कृतकारिणः।<br>मुच्यन्ते सर्वपापेभ्यः सूर्यलोकं प्रयान्ति च ॥ ३८ ॥ | प्राप्त होता है तथा जो लोग दरिद्र, व्याधियुक्त और दुष्कर्म करनेवाले हैं, वे सभी पापोंसे मुक्त होकर सूर्यलोकको जाते हैं ॥ ३४-३८ ॥ |
| मार्गेश्वरं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र स्वर्गलोकमवाप्नुयात् ॥ ३९ ॥ | तदनन्तर मार्गेश्वर (तीर्थ) जाकर वहाँ स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य स्वर्गलोक प्राप्त करता है। इसके पश्चात् पश्चिमकी ओर स्थित श्रेष्ठ |
| ततः पश्चिमतो गच्छेन्मरुदालयमुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र शुचिर्भूत्वा प्रयत्नतः ॥ ४० ॥ | मरुदालयमें (वायुके स्थानमें) जाना चाहिये। राजेन्द्र! वहाँ स्नान करके प्रयत्नपूर्वक पवित्र होकर अपनी |
| काञ्चनं तु द्विजो दद्याद् यथाविभवविस्तरम्।<br>पुष्पकेण विमानेन वायुलोकं स गच्छति ॥ ४१ ॥ | सम्पत्तिके विस्तारके अनुसार द्विजको स्वर्ण प्रदान करना चाहिये। ऐसा करनेवाला मनुष्य पुष्पक-विमानके द्वारा वायुलोक जाता है ॥ ३९-४१ ॥ |
| ततो गच्छेत राजेन्द्र अहल्यातीर्थमुत्तमम्।<br>स्नानमात्रादप्सरोभिर्मोदते कालमक्षयम् ॥ ४२ ॥ | राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ अहल्यातीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ स्नानमात्रसे मनुष्य अक्षय (अनन्त) कालतक |
| चैत्रमासे तु सम्प्राप्ते शुक्लपक्षे त्रयोदशी।<br>कामदेवदिने तस्मिन्नहल्यां यस्तु पूजयेत् ॥ ४३ ॥ | अप्सराओंके साथ आनन्द करता है। चैत्र शुक्ल पक्षकी त्रयोदशी कामदेवका दिन है। उस दिन इस अहल्यातीर्थमें |
| यत्र तत्र नरोत्पन्नो वरस्तत्र प्रियो भवेत्।<br>स्त्रीवल्लभो भवेच्छ्रीमान् कामदेव इवापरः ॥ ४४ ॥ | जो मनुष्य अहल्याकी पूजा करता है, वह जहाँ-कहीं भी उत्पन्न होता है, श्रेष्ठ तथा प्रिय होता है और विशेषरूपसे दूसरे कामदेवके समान हो जानेसे श्री- |
| अयोध्यां तु समासाद्य तीर्थं शक्रस्य विश्रुतम्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ४५ ॥ | शोभासम्पन्न तथा स्त्रीवल्लभ होता है। इन्द्रके प्रसिद्ध तीर्थ अयोध्यामें आकर स्नानमात्र करनेवाला मनुष्य हजार गोदानका फल प्राप्त करता है ॥ ४२-४५ ॥ |
| सोमतीर्थं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ४६ ॥ | तदनन्तर सोमतीर्थमें जाकर वहाँ स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे |
| सोमग्रहे तु राजेन्द्र पापक्षयकरं भवेत्।<br>त्रैलोक्यविश्रुतं राजन् सोमतीर्थं महाफलम् ॥ ४७ ॥ | मुक्त हो जाता है। राजन्! तीनों लोकोंमें विख्यात सोमतीर्थ महान् फल देनेवाला है ॥ ४६-४७ ॥ |
| * अध्याय ३९ * | ४६७ |
|---|---|
| यस्तु चान्द्रायणं कुर्यात् तत्र तीर्थे समाहितः ।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा सोमलोकं स गच्छति ॥ ४८ ॥<br><br>अग्निप्रवेशं यः कुर्यात् सोमतीर्थे नराधिप ।<br>जले चानशनं वापि नासौ मर्त्योऽभिजायते ॥ ४९ ॥<br><br>स्तम्भतीर्थं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत् ।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र सोमलोके महीयते ॥ ५० ॥<br>ततो गच्छेत राजेन्द्र विष्णुतीर्थमनुत्तमम् ।<br>योधनीपुरमाख्यातं विष्णोः स्थानमनुत्तमम् ॥ ५१ ॥<br><br>असुरा योधितस्तत्र वासुदेवेन कोटिशः ।<br>तत्र तीर्थं समुत्पन्नं विष्णुश्रीको भवेदिह ।<br>अहोरात्रोपवासेन ब्रह्महत्यां व्यपोहति ॥ ५२ ॥<br><br>नर्मदादक्षिणे कूले तीर्थं परमशोभनम् ।<br>कामतीर्थमिति ख्यातं यत्र कामोऽर्चयद् भवम् ॥ ५३ ॥<br><br>तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा उपवासपरायणः ।<br>कुसुमायुधरूपेण रुद्रलोके महीयते ॥ ५४ ॥<br>ततो गच्छेत राजेन्द्र ब्रह्मतीर्थमनुत्तमम् ।<br>उमाहकमिति ख्यातं तत्र संतर्पयेत् पितॄन् ॥ ५५ ॥<br><br>पौर्णमास्याममावास्यां श्राद्धं कुर्याद् यथाविधि ।<br>गजरूपा शिला तत्र तोयमध्ये व्यवस्थिता ॥ ५६ ॥<br><br>तस्मिंस्तु दापयेत् पिण्डान् वैशाख्यां तु विशेषतः ।<br>स्नात्वा समाहितमना दम्भमात्सर्यवर्जितः ।<br>तृप्यन्ति पितरस्तस्य यावत् तिष्ठति मेदिनी ॥ ५७ ॥<br>सिद्धेश्वरं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत् ।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र गाणपत्यपदं लभेत् ॥ ५८ ॥<br><br>ततो गच्छेत राजेन्द्र लिङ्गो यत्र जनार्दनः ।<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र विष्णुलोके महीयते ॥ ५९ ॥<br><br>यत्र नारायणो देवो मुनीनां भावितात्मनाम् ।<br>स्वात्मानं दर्शयामास लिङ्गं तत् परमं पदम् ॥ ६० ॥ | राजेन्द्र! वहाँ चन्द्रग्रहण (-का स्नान) पापोंका क्षय करनेवाला होता है। उस तीर्थमें जो एकाग्र-मनसे चान्द्रायणव्रत करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो विशुद्ध आत्मावाला होकर सोमलोकको जाता है। नराधिप ! जो सोमतीर्थमें अग्निप्रवेश, जलप्रवेश अथवा अनशन करता है, वह मनुष्य पुनः उत्पन्न नहीं होता। तदनन्तर स्तम्भतीर्थमें जाकर वहाँ स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य सोमलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है अर्थात् पूजित होता है ॥ ४८-५० ॥<br><br>राजेन्द्र ! तदनन्तर परम उत्तम विष्णुतीर्थमें जाना चाहिये, वहाँ योधनीपुर नामक विष्णुका श्रेष्ठ स्थान है। वहाँ वासुदेवने करोड़ों असुरोंसे युद्ध किया था। अतः वह स्थान (वासुदेवकी पवित्र संनिधिके कारण) तीर्थ (पुण्यमय) हो गया है। जो मनुष्य उस तीर्थका सेवन करता है, वह विष्णके समान श्रीसम्पन्न हो जाता है। वहाँ एक अहोरात्र उपवास करनेसे ब्रह्महत्या दूर हो जाती है। नर्मदाके दक्षिणी किनारेपर कामतीर्थ नामसे प्रसिद्ध एक अत्यन्त सुन्दर तीर्थ है। वहाँपर कामदेवने शंकरकी आराधना की थी। उस तीर्थमें स्नानकर उपवासपरायण रहनेवाला मनुष्य कामदेवके समान रूपवाला होकर रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ ५१-५४ ॥<br><br>राजेन्द्र ! तदनन्तर उत्तम ब्रह्मतीर्थमें जाना चाहिये। वह तीर्थ 'उमाहक' इस नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ पितरोंका तर्पण करना चाहिये। पूर्णिमा तथा अमावास्याको विधिपूर्वक श्राद्ध करना चाहिये। वहाँ जलके भीतर हाथीके आकारकी शिला स्थित है। उस शिलापर विशेष रूपसे वैशाख पूर्णिमाको स्नानके अनन्तर दम्भ तथा मात्सर्यसे रहित होकर एकाग्रमनसे पिण्डदान करना चाहिये। इससे पिण्डदाताके पितर जबतक पृथ्वी रहती है, तबतक तृप्त रहते हैं ॥ ५५-५७ ॥<br><br>इसके बाद सिद्धेश्वर (तीर्थमें) जाकर वहाँ स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य गाणपत्य-पद प्राप्त करता है। राजेन्द्र! तदनन्तर जहाँ जनार्दन लिङ्गरूपमें प्रतिष्ठित हैं, वहाँ जाना चाहिये। राजेन्द्र ! वहाँ स्नान करनेसे विष्णुलोकमें आदर प्राप्त होता है। यही एकमात्र वह स्थान है, जहाँ नारायणदेवने भक्तिपूर्ण मुनियोंको लिङ्गरूपमें अपना दर्शन कराया था। यह लिङ्ग विष्णुरूप होनेसे परमपद है ॥ ५८-६० ॥ |