संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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४५२ * कूर्मपुराण *
| सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।<br>एकशृङ्गो महानात्मा पुराणोऽष्टाक्षरो हरिः ॥ ७४ ॥<br><br>चतुर्वेदश्चतुर्मूर्तिस्त्रिमूर्तिस्त्रिगुणः परः।<br>एकमूर्तिरमेयात्मा नारायण इति श्रुतिः ॥ ७५ ॥<br>ऋतस्य गर्भो भगवानापो मायातनुः प्रभुः।<br>स्तूयते विविधैर्मन्त्रैर्ब्राह्मणैर्धर्ममोक्षिभिः ॥ ७६ ॥<br><br>संहृत्य सकलं विश्वं कल्पान्ते पुरुषोत्तमः।<br>शेते योगामृतं पीत्वा यत् तद् विष्णोः परं पदम् ॥ ७७ ॥<br><br>न जायते न म्रियते वर्धते न च विश्वसृक्।<br>मूलप्रकृतिरव्यक्ता गीयते वैदिकैरजः ॥ ७८ ॥<br>ततो निशायां वृत्तायां सिसृक्षुरखिलं जगत्।<br>अजस्य नाभौ तद् बीजं क्षिपत्येष महेश्वरः ॥ ७९ ॥<br><br>तं मां वित्त महात्मानं ब्रह्माणं विश्वतोमुखम्।<br>महान्तं पुरुषं विश्वमपां गर्भमनुत्तमम् ॥ ८० ॥<br><br>न तं विदथ जनकं मोहितास्तस्य मायया।<br>देवदेवं महादेवं भूतानामीश्वरं हरम् ॥ ८१ ॥<br>एष देवो महादेवो ह्यनादिर्भगवान् हरः।<br>विष्णुना सह संयुक्तः करोति विकरोति च ॥ ८२ ॥<br><br>न तस्य विद्यते कार्यं न तस्माद् विद्यते परम्।<br>स वेदान् प्रददौ पूर्वं योगमायातनुर्मम ॥ ८३ ॥ | महान् आत्मा पुराण (शाश्वत) पुरुष हरि एक शृंगधारी (अनन्त ब्रह्माण्डको एक शृंग-रूपमें धारण करनेवाले) अष्टाक्षर (अष्टमूर्तिरूप तथा अविनाशी तत्त्व) हजारों सिरवाले, हजारों आँखवाले एवं हजारों चरणवाले हैं। श्रुतिका कथन है कि नारायण चतुर्वेद, चतुर्मूर्ति, त्रिमूर्ति एवं त्रिगुण होते हुए भी एकमूर्ति तथा अमेयात्मा हैं ॥ ७४-७५ ॥<br><br>माया (-से विविध) शरीर धारण करनेवाले तथा (समस्त जगत्के जीवन-जलको ही अपने आयतनके रूपमें स्वीकार करनेवाले) जलस्वरूप प्रभु भगवान् कर्मफलके एकमात्र अधिष्ठाता हैं। धर्म तथा मोक्षकी इच्छा करनेवाले ब्राह्मण लोग विविध मन्त्रोंके द्वारा (उनकी) स्तुति करते हैं। कल्पान्तमें समस्त विश्वका संहार करनेके अनन्तर योगामृतका पानकर पुरुषोत्तम (भगवान् शंकर) जिस सर्वाधिष्ठान, स्वप्रकाशमें शयन (परम विश्रान्तिका अनुभव) करते हैं, वही विष्णु नामका परम पद है। विश्वकी सृष्टि करनेवाले ये न जन्म लेते हैं, न मरते हैं और न वृद्धिको प्राप्त होते हैं। वैदिक लोग इन्हीं अजन्मा (भगवान्)-को अव्यक्त मूलप्रकृति कहते हैं ॥ ७६-७८ ॥<br><br>ये महेश्वर (प्रलयरूपी) रात्रिके बीत जानेपर सम्पूर्ण जगत्की सृष्टिकी इच्छासे अजकी नाभिमें इस (सृष्टि)-के बीजको स्थापित करते हैं। उन (अज)-के रूपमें मुझे ही आप लोग जानें। मैं ही समस्त लोकोंका मूल होनेके कारण महात्मा, ब्रह्मा, सर्वतोमुख, महान् पुरुष, विश्वात्मा अप् (समस्त स्थूल जल)-का अधिष्ठाता सर्वोत्तम देव हूँ। अनन्त ब्रह्माण्डके बीजको मेरेमें स्थापित करनेवाले उन परमपिता देवाधिपति महादेव हरको आप लोग उनकी मायासे मोहित होनेके कारण नहीं जान सके ॥ ७९-८१ ॥<br><br>वे ही अनादि देव भगवान् महादेव हर विष्णुके साथ युक्त होकर सृष्टि और संहार करते रहते हैं। उनका कोई कार्य (कर्तव्य) नहीं है और उनसे श्रेष्ठ कोई नहीं है। योगमायामय शरीर धारण करनेवाले उन्होंने पूर्वकालमें मुझे वेद प्रदान किया ॥ ८२-८३ ॥ |