भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 461, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 461

* अध्याय ३७ * । ४५१


काङ्क्षन्ते योगिनो नित्यं यतन्तो यतयो निधिम्।<br>यमेव तं समासाद्य हा भवद्भिरुपेक्षितम्॥ ६१ ॥<br><br>यजन्ति यज्ञैर्विविधैर्यत्प्राप्त्यै वेदवादिनः।<br>महानिधिं समासाद्य हा भवद्भिरुपेक्षितम्॥ ६२॥<br><br>यं समासाद्य देवानामैश्वर्यमखिलं जगत्।<br>तमासाद्याक्षयनिधिं हा भवद्भिरुपेक्षितम्॥ ६३॥<br>यत्समापत्तिजनितं विश्वेशत्वमिदं मम।<br>तदेवोपेक्षितं दृष्ट्वा निधानं भाग्यवर्जितैः॥ ६४॥योगी लोग तथा यत्न करनेवाले यति लोग जिस निधिको प्राप्त करनेकी नित्य अभिलाषा करते हैं, उसीको प्राप्तकर आप लोगोंने उपेक्षा कर दी, यह बहुत ही कष्टकी बात है। वैदिक लोग जिसकी प्राप्तिके लिये अनेक प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं, बड़ा कष्ट है कि उन महानिधिको प्राप्तकर भी आप सभीने उनकी उपेक्षा कर दी। हाय! जिसे प्राप्तकर देवताओंके ऐश्वर्य-रूपमें समस्त लोक-लोकान्तर दृष्टिगोचर हो रहे हैं, उन अक्षयनिधिको प्राप्तकर आपने उनकी उपेक्षा कर दी॥ ६१-६३॥<br><br>जिनकी प्राप्ति होनेसे मुझे यह विश्वेश्वरत्व प्राप्त हुआ है, उन (समस्त ऐश्वर्यके) निधानका दर्शनकर भाग्यरहित आप लोगोंने (उनकी) उपेक्षा कर दी।
यस्मिन् समाहितं दिव्यमैश्वर्यं यत् तदव्ययम्।<br>तमासाद्य निधिं ब्राह्मं हा भवद्भिर्वृथा कृतम्॥ ६५॥<br><br>एष देवो महादेवो विज्ञेयस्तु महेश्वरः।<br>न तस्य परमं किञ्चित् पदं समधिगम्यते॥ ६६॥जिनमें वह अविनाशी दिव्य ऐश्वर्य समाहित है, उन ब्रह्मरूप निधिको प्राप्तकर भी आप लोगोंने अपना सुअवसर खो दिया, यह बड़े कष्टकी बात है। इन्हीं देवको महादेव और महेश्वर समझना चाहिये। इनका परम पद (सर्वोत्कृष्ट ऐश्वर्य) किंचित् भी प्राप्त नहीं किया जा सकता अर्थात् जाना नहीं जा सकता॥ ६४-६६॥
देवतानामृषीणां च पितॄणां चापि शाश्वतः।<br>सहस्रयुगपर्यन्तं प्रलये सर्वदेहिनाम्।<br>संहरत्येष भगवान् कालो भूत्वा महेश्वरः॥ ६७॥<br><br>एष चैव प्रजाः सर्वाः सृजत्येकः स्वतेजसा।<br>एष चक्री च वज्री च श्रीवत्सकृतलक्षणः॥ ६८॥<br><br>योगी कृतयुगे देवस्त्रेतायां यज्ञ उच्यते।<br>द्वापरे भगवान् कालो धर्मकेतुः कलौ युगे॥ ६९॥<br><br>रुद्रस्य मूर्तयस्तिस्रो याभिर्विश्वमिदं ततम्।<br>तमो ह्यग्नी रजो ब्रह्मा सत्त्वं विष्णुरिति प्रभुः॥ ७०॥हजारों युग-पर्यन्त रहनेवाले प्रलयकालमें ये ही सनातन भगवान् महेश्वर कालरूप होकर देवताओं, ऋषियों तथा पितरों और समस्त देहधारियोंका संहार (अपनेमें लय) करते हैं। ये ही अद्वितीय अपने तेजसे समस्त प्रजाओंकी सृष्टि करते हैं। चक्र, वज्र तथा श्रीवत्सके चिह्नको धारण करनेवाले ये ही हैं (क्योंकि इनमें तथा श्रीविष्णुमें सर्वथा अभेद है), ये ही देव कृतयुगमें योगी, त्रेतामें यज्ञरूप, द्वापरमें भगवान् काल तथा कलियुगमें धर्मकेतु कहलाते हैं। रुद्रकी तीन मूर्तियाँ हैं, इन्होंने ही इस विश्वको व्याप्त कर रखा है। तमोगुणके अधिष्ठाताको अग्नि, रजोगुणके अधिष्ठाताको ब्रह्मा तथा सत्त्वगुणके अधिष्ठाताको प्रभु विष्णु कहा गया है॥ ६७-७०॥
मूर्तिरन्या स्मृता चास्य दिग्वासा वै शिवा ध्रुवा।<br>यत्र तिष्ठति तद् ब्रह्म योगेन तु समन्वितम्॥ ७१॥<br><br>या चास्य पार्श्वगा भार्या भवद्भीरभिवीक्षिता।<br>सा हि नारायणो देवः परमात्मा सनातनः॥ ७२॥<br><br>तस्मात् सर्वमिदं जातं तत्रैव च लयं व्रजेत्।<br>स एव मोहयेत् कृत्स्नं स एव परमा गतिः॥ ७३॥इनकी एक दूसरी मूर्ति है जो दिगम्बरा, शाश्वत तथा शिवात्मिका कहलाती है। उसीमें योगसे युक्त परम ब्रह्म प्रतिष्ठित रहते हैं। जिनको इनके पार्श्वभागमें स्थित भार्याके रूपमें आपने देखा है, वे ही सनातन परमात्मा नारायण देव हैं। उनसे ही यह सब उत्पन्न है और उनमें ही यह सब लीन भी हो जाता है। वे ही सबको मोहित करते हैं और वे ही परम गति हैं॥ ७१-७३॥