संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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४५० * कूर्मपुराण *
| आसीनमासने रम्ये नानाश्चर्यसमन्विते।<br>प्रभासहस्रकलिले ज्ञानैश्वर्यादिसंयुते॥ ४७॥ | नाना प्रकारके आश्चर्योंसे समन्वित, हजारों प्रकारकी प्रभासे सुशोभित और ज्ञान तथा ऐश्वर्यसे युक्त रमणीय आसनपर विराजमान परम रमणीय अप्राकृत दिव्य शरीरके कारण शोभासम्पन्न, मुसकानयुक्त, उज्ज्वल नेत्रोंवाले, महाबाहु, छन्दोमय, अजन्मा, प्रसन्नवदन, शुभ एवं श्रेष्ठ चतुर्मुख वेदपुरुष (ब्रह्मा)-को देखकर वे (मुनिजन) भूमिपर मस्तक टेककर ईश्वरकी स्तुति करने लगे— ॥ ४७-४९॥ |
| विभ्राजमानं वपुषा सस्मितं शुभ्रलोचनम्।<br>चतुर्मुखं महाबाहुं छन्दोमयमजं परम्॥ ४८॥ | |
| विलोक्य वेदपुरुषं प्रसन्नवदनं शुभम्।<br>शिरोभिर्धरणीं गत्वा तोषयामासुरीश्वरम्॥ ४९॥ | |
| तान् प्रसन्नमना देवश्चतुर्मूर्तिश्चतुर्मुखः।<br>व्याजहार मुनिश्रेष्ठाः किमागमनकारणम्॥ ५०॥ | चतुर्मूर्ति चतुर्मुख देवने उनपर प्रसन्न होकर पूछा— ‘मुनिश्रेष्ठो! आपके आनेका क्या प्रयोजन है?’ तब सभी मुनियोंने मस्तकपर हाथ जोड़कर उन परमात्मा ब्रह्माको उस (भगवान् शंकरकी दिव्य लीलाके) सम्पूर्ण वृत्तान्तको बतलाया॥ ५०-५१॥ |
| तस्य ते वृत्तमखिलं ब्रह्मणः परमात्मनः।<br>ज्ञापयाञ्चक्रिरे सर्वे कृत्वा शिरसि चाञ्जलिम्॥ ५१॥ | |
| ऋषय ऊचुः | ऋषियोंने कहा— पवित्र दारुवनमें अत्यन्त सुन्दर कोई पुरुष सम्पूर्ण सुन्दर अङ्गोंवाली अपनी भार्याके साथ नग्न ही प्रविष्ट हुआ। उस ईश्वरने अपने शरीरसे (हमारी) स्त्रियोंके समूहको तथा सभी कन्याओंमें अति रमणीय उसकी प्रियाने (हमारे) पुत्रोंको दूषित (अपनी ओर आकृष्ट) किया। हम लोगोंने उस पुरुषको विविध शाप दिये, किंतु वे निष्फल हो गये, तब हम लोगोंने उसे बहुत मारा और उसके लिङ्गको गिरा दिया, पर तत्काल ही भार्याके साथ भगवान् और लिङ्ग अन्तर्हित हो गये। तभीसे प्राणियोंको भय प्रदान करनेवाले भीषण उत्पात होने लगे हैं॥ ५२-५५॥ |
| कश्चिद् दारुवनं पुण्यं पुरुषोऽतीवशोभनः।<br>भार्यया चारुसर्वाङ्ग्या प्रविष्टो नग्न एव हि॥ ५२॥ | |
| मोहयामास वपुषा नारीणां कुलमीश्वरः।<br>कन्यकानां प्रिया चास्य दूषयामास पुत्रकान्॥ ५३॥ | |
| अस्माभिर्विविधाः शापाः प्रदत्ताश्च पराहताः।<br>ताडितोऽस्माभिरत्यर्थं लिङ्गं तु विनिपातितम्॥ ५४॥ | |
| अन्तर्हितश्च भगवान् सभार्यो लिङ्गमेव च।<br>उत्पाताश्चाभवन् घोराः सर्वभूतभयंकराः॥ ५५॥ | |
| क एष पुरुषो देव भीताः स्म पुरुषोत्तम।<br>भवन्तमेव शरणं प्रपन्ना वयमच्युत॥ ५६॥ | पुरुषोत्तम! वह देव-पुरुष कौन है? हम लोग भयभीत हो गये हैं। अच्युत! हम सब आपकी शरणमें आये हैं। इस संसारमें जो कुछ भी चेष्टा होती है, उसे आप अवश्य जानते हैं, इसलिये विश्वेश! अनुग्रह कर आप हमारी रक्षा करें॥ ५६-५७॥ |
| त्वं हि वेत्सि जगत्यस्मिन् यत्किञ्चिदपि चेष्टितम्।<br>अनुग्रहेण विश्वेश तदस्माननुपालय॥ ५७॥ | |
| विज्ञापितो मुनिगणैर्विश्वात्मा कमलोद्भवः।<br>ध्यात्वा देवं त्रिशूलाङ्कं कृताञ्जलिरभाषत॥ ५८॥ | मुनिगणोंके द्वारा इस प्रकार निवेदन किये जानेपर कमलसे उत्पन्न विश्वात्मा (ब्रह्मा)-ने त्रिशूलका चिह्न धारण करनेवाले देव (शंकर)-का ध्यान करते हुए हाथ जोड़कर इस प्रकार कहा— ॥ ५८॥ |
| ब्रह्मोवाच | ब्रह्मा बोले— आह! कष्ट है कि आज आप लोगोंका सर्वस्व नष्ट हो गया। आपके बलको धिक्कार है, तपश्चर्याको धिक्कार है, आपका यह सब मिथ्या ही हो गया। पवित्र संस्कारों और निधियोंमें परम निधिको प्राप्तकर वृथाचारी आप लोगोंने मोहवश उनकी उपेक्षा कर दी॥ ५९-६०॥ |
| हा कष्टं भवतामद्य जातं सर्वार्थनाशनम्।<br>धिग्बलं धिक् तपश्चर्या मिथ्यैव भवतामिह॥ ५९॥ | |
| सम्प्राप्य पुण्यसंस्कारान्निधीनां परमं निधिम्।<br>उपेक्षितं वृथाचारैर्भवद्भिरिह मोहितैः॥ ६०॥ |