भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 459, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 459
* अध्याय ३७ *४४९
प्रक्षाल्य पादौ विमलं दत्त्वा चासनमुत्तमम्।<br>सम्प्रेक्ष्य शिथिलं गात्रमभिघातहतं द्विजैः।<br>संध्यामास भैषज्यैर्विषण्णा वदना सती ॥ ३५ ॥<br><br>चकार महतीं पूजां प्रार्थयामास भार्यया।<br>को भवान् कुत आयातः किमाचारो भवानिति।<br>उवाच तां महादेवः सिद्धानां प्रवरोऽस्म्यहम्॥ ३६॥<br><br>यदेतन्मण्डलं शुद्धं भाति ब्रह्ममयं सदा।<br>एषैव देवता मह्यं धारयामि सदैव तत्॥ ३७॥<br>इत्युक्त्वा प्रययौ श्रीमाननुगृह्य पतिव्रताम्।<br>ताडयाञ्चक्रिरे दण्डैर्लोष्टिभिर्मुष्टिभिर्द्विजाः ॥ ३८ ॥<br><br>दृष्ट्वा चरन्तं गिरिशं नग्नं विकृतलक्षणम्।<br>प्रोचुरेतद् भवाँल्लिङ्गमुत्पाटयतु दुर्मते ॥ ३९ ॥<br><br>तानब्रवीन्महायोगी करिष्यामीति शंकरः।<br>युष्माकं मामके लिङ्गे यदि द्वेषोऽभिजायते ॥ ४० ॥<br>इत्युक्त्वोत्पाटयामास भगवान् भगनेत्रहा।<br>नापश्यंस्तत्क्षणेनेशं केशवं लिङ्गमेव च ॥ ४१ ॥<br><br>तदोत्पाता बभूवुर्हि लोकानां भयशंसिनः।<br>न राजते सहस्रांशुश्चचाल पृथिवी पुनः।<br>निष्प्रभाश्च ग्रहाः सर्वे चुक्षुभे च महोदधिः ॥ ४२ ॥<br>अपश्यच्चानसूयात्रेः स्वप्नं भार्या पतिव्रता।<br>कथयामास विप्राणां भयादाकुलितेक्षणा ॥ ४३ ॥<br><br>तेजसा भासयन् कृत्स्नं नारायणसहायवान्।<br>भिक्षमाणः शिवो नूनं दृष्टोऽस्माकं गृहेष्विति ॥ ४४ ॥<br><br>तस्या वचनमाकर्ण्य शङ्कमाना महर्षयः।<br>सर्वे जग्मुर्महायोगं ब्रह्माणं विश्वसम्भवम् ॥ ४५ ॥<br><br>उपास्यमानममलैर्योगिभिर्ब्रह्मवित्तमैः।<br>चतुर्वेदैर्मूर्तिमद्भिः सावित्र्या सहितं प्रभुम्॥ ४६ ॥(परमेश्वरके) चरणोंको धोकर और शुद्ध उत्तम आसन प्रदान कर द्विजोंके आघातसे आहत उनके शिथिल शरीरको देखकर अत्यन्त खिन्न सती (अरुन्धती)-ने (उनके व्रणोंपर) औषधि लगायी और भार्यासहित (परमेश्वरकी) उन्होंने (अरुन्धतीने) महती पूजा की तथा पूछा—'आप कौन हैं, कहाँसे आये हैं, आपका आचार क्या है?' महादेवने उनसे कहा—'मैं सिद्धोंमें श्रेष्ठ (सिद्ध) हूँ।' जो यह ब्रह्ममय शुद्ध मण्डल सदा प्रकाशित होता है वही मेरे देवता (आस्पद) हैं। मैं सदा ही उनको धारण करता हूँ॥ ३५–३७॥<br><br>ऐसा कहकर तथा पतिव्रता (अरुन्धती)-पर कृपा करके श्रीमान् (महादेव) चल पड़े। द्विज उन्हें डंडों, ढेलों तथा मुक्कोंसे मारने लगे। नग्न तथा विकृत लक्षणवाले गिरिशको घूमते हुए देखकर मुनियोंने कहा—हे दुर्मते! तुम अपने इस लिङ्गको उखाड़ो। महायोगी शंकरने उनसे कहा—आप लोगोंको यदि मेरे लिङ्गके प्रति द्वेष उत्पन्न हो गया हो तो मैं वैसा ही करूँगा॥ ३८–४०॥<br><br>ऐसा कहकर भगके नेत्रोंको नष्ट करनेवाले भगवान्ने (अपने) लिङ्गको उखाड़ दिया। पर तत्काल ही सब कुछ अदृश्य हो गया और (मुनियोंने) न शंकरको देखा न केशवको और न लिङ्गको ही देखा और तभी पूरे लोकमें भय उत्पन्न करनेवाले उपद्रव होने लगे। सहस्रकिरण (सूर्य)-का तेज समाप्त हो गया, पृथ्वी काँपने लगी। सभी ग्रह प्रभावहीन हो गये और समुद्रमें क्षोभ उत्पन्न हो गया॥ ४१–४२॥<br><br>इधर अत्रिकी पत्नी पतिव्रता अनसूयाने स्वप्न देखा। उनके नेत्र भयसे व्याकुल हो गये। उन्होंने ब्राह्मणोंसे (स्वप्नकी बात बताते हुए) कहा—निश्चय ही हम लोगोंके घरमें अपने तेजसे सम्पूर्ण संसारको प्रकाशित कर रहे शिव (भगवान् शंकर) नारायणके साथ भिक्षा माँगते हुए दिखलायी पड़े थे। उनके वचन सुनकर सशंकित सभी महर्षि जगत्को उत्पन्न करनेवाले महायोगी ब्रह्माजीके पास गये॥ ४३–४५॥<br><br>वहाँ उन्होंने ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ विशुद्ध योगिजनोंद्वारा तथा मूर्तिमान् चारों वेदोंद्वारा उपासित होते हुए प्रभु (ब्रह्मा)-को सावित्रीके साथ देखा॥ ४६ ॥

1131 Kurma Puran_Section_16__Front

संक्षिप्त कूर्मपुराण · पृष्ठ 459, कुल 506 में से · BharatKosha