भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

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* अध्याय ३७ *४५३
स मायी मायया सर्वं करोति विकरोति च।<br>तमेव मुक्तये ज्ञात्वा व्रजेत शरणं भवम्॥ ८४॥<br><br>इतीरिता भगवता मरीचिप्रमुखा विभुम्।<br>प्रणम्य देवं ब्रह्माणं पृच्छन्ति स्म सुदुःखिताः॥ ८५॥<br>मुनय ऊचुः<br>कथं पश्येम तं देवं पुनरेव पिनाकिनम्।<br>ब्रूहि विश्वामरेशान त्राता त्वं शरणैषिणाम्॥ ८६॥<br>पितामह उवाच<br>यद् दृष्टं भवता तस्य लिङ्गं भुवि निपातितम्।<br>तल्लिङ्गानुकृतीशस्य कृत्वा लिङ्गमनुत्तमम्॥ ८७॥<br>पूजयध्वं सपत्नीकाः सादरं पुत्रसंयुताः।<br>वैदिकैरेव नियमैर्विविधैर्ब्रह्मचारिणः॥ ८८॥<br>संस्थाप्य शांकरैर्मन्त्रैर्ऋग्यजुःसामसम्भवैः।<br>तपः परं समास्थाय गृणन्तः शतरुद्रियम्॥ ८९॥<br>समाहिताः पूजयध्वं सपुत्राः सह बन्धुभिः।<br>सर्वे प्राञ्जलयो भूत्वा शूलपाणिं प्रपद्यथ॥ ९०॥<br>ततो द्रक्ष्यथ देवेशं दुर्दर्शमकृतात्मभिः।<br>यं दृष्ट्वा सर्वमज्ञानमधर्मश्च प्रणश्यति॥ ९१॥<br>ततः प्रणम्य वरदं ब्रह्माणममितौजसम्।<br>जग्मुः संहृष्टमनसो देवदारुवनं पुनः॥ ९२॥<br><br>आराधयितुमारब्धा ब्रह्मणा कथितः यथा।<br>अजानन्तः परं देवं वीतरागा विमत्सराः॥ ९३॥<br><br>स्थण्डिलेषु विचित्रेषु पर्वतानां गुहासु च।<br>नदीनां च विविक्तेषु पुलिनेषु शुभेषु च॥ ९४॥<br><br>शैवालभोजनाः केचित् केचिदन्तर्जलेशयाः।<br>केचिदभ्रावकाशास्तु पादाङ्गुष्ठाग्रविष्ठिताः॥ ९५॥वे मायी (अपनी) मायाद्वारा सभीकी सृष्टि और संहार करते हैं। उन्हें ही मुक्तिका मूल समझकर उन भवकी ही शरणमें जाना चाहिये। भगवान् (ब्रह्मा)-के ऐसा कहनेपर मरीचि आदि प्रमुख ऋषियोंने विभु ब्रह्मदेवको प्रणामकर अत्यन्त दुःखित होकर उनसे पूछा—॥ ८४-८५॥<br>मुनिजन बोले—समस्त देवोंके स्वामी! उन पिनाकधारी देवका दर्शन हम पुनः किस प्रकार कर पायेंगे, आप हमें बतायें। आप शरण चाहनेवालोंकी रक्षा करनेवाले हैं॥ ८६॥<br>पितामहने कहा—पृथ्वीपर गिराये गये उनके (महेश्वरके) जिस लिङ्गको आप लोगोंने देखा था, उसी लिङ्गके समान श्रेष्ठ लिङ्ग बनाकर सपत्नीक तथा पुत्रोंसहित आदरपूर्वक विविध वैदिक मन्त्रोंसे ब्रह्मचर्यपूर्वक आप लोग उसकी पूजा करें। ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेदमें कहे गये शंकरके मन्त्रोंसे (लिङ्गकी) स्थापना कर परम तपका अवलम्बन कर, शतरुद्रियका जप करते हुए समाहित होकर बन्धुओं तथा पुत्रोंसहित आप सभी लोग हाथ जोड़कर शूलपाणिकी शरणमें जायें। तदनन्तर आप लोग अकृतात्माओंके लिये दुर्दर्श उन देवेश्वरका दर्शन करेंगे, जिनको देख लेनेपर सम्पूर्ण अज्ञान और अधर्म दूर हो जाता है॥ ८७—९१॥<br>तब अमित ओजस्वी वरदाता ब्रह्माको प्रणामकर प्रसन्नमनवाले वे सभी महर्षि पुनः देवदारु-वनकी ओर चले गये और परम देवको न जानते हुए भी उन महर्षियोंने राग एवं मात्सर्यसे रहित होकर ब्रह्माजीने जैसा बताया था, तदनुसार अनेकविध यज्ञीय वेदियों, पर्वतोंकी गुफाओं तथा जनशून्य नदियोंके सुन्दर किनारोंपर भगवान् शंकरकी आराधना प्रारम्भ कर दी॥ ९२–९४॥<br>कुछ लोग शैवालका भोजन करते हुए, कुछ जलके अंदर शयनकी मुद्रामें स्थित रहते हुए तथा कुछ लोग खुले आकाशके नीचे पैरके अँगूठेके अग्रभागपर स्थित रहकर श्रीशंकरकी आराधनामें दत्तचित्त हो गये॥ ९५॥
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