संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५४ * कूर्मपुराण *
दन्तोलूखलिनस्त्वन्ये ह्मश्मकुट्टास्तथा परे।
शाकपर्णाशिनः केचित् सम्प्रक्षाला मरीचिपाः ॥ ९६ ॥
वृक्षमूलनिकेताश्च शिलाशय्यास्तथा परे।
कालं नयन्ति तपसा पूजयन्तो महेश्वरम् ॥ ९७ ॥
ततस्तेषां प्रसादार्थं प्रपन्नार्तिहरो हरः।
चकार भगवान् बुद्धिं प्रबोधाय वृषध्वजः ॥ ९८ ॥
देवः कृतयुगे ह्यस्मिन् शृङ्गे हिमवतः शुभे।
देवदारुवनं प्राप्तः प्रसन्नः परमेश्वरः ॥ ९९ ॥
भस्मपाण्डुरदिग्धाङ्गो नग्नो विकृतलक्षणः।
उल्मुकव्यग्रहस्तश्च रक्तपिङ्गललोचनः ॥ १०० ॥
क्वचिच्च हसते रौद्रं क्वचिद् गायति विस्मितः।
क्वचिन्नृत्यति शृङ्गारी क्वचिद् रौति मुहुर्मुहुः ॥ १०१ ॥
आश्रमेऽभ्यागतो भिक्षां याचते च पुनः पुनः।
मायां कृत्वात्मनो रूपं देवस्तद् वनमागतः ॥ १०२ ॥
कृत्वा गिरिसुतां गौरीं पार्श्वे देवः पिनाकधृक्।
सा च पूर्ववद् देवेशी देवदारुवनं गता ॥ १०३ ॥
दृष्ट्वा समागतं देवं देव्या सह कपर्दिनम्।
प्रणेमुः शिरसा भूमौ तोषयामासुरीश्वरम् ॥ १०४ ॥
वैदिकैर्विविधैर्मन्त्रैः सूक्तैर्माहेश्वरैः शुभैः।
अथर्वशिरसा चान्ये रुद्राद्यैर्ब्रह्मभिर्भवम् ॥ १०५ ॥
कुछ दूसरे दन्तोलूखली अर्थात् दाँतोंके ही द्वारा अनाजको तुष (भूसी) आदिसे रहितकर बिना पकाये खा लेते थे, कुछ दूसरे पत्थरपर ही अन्नको कूटकर खा लेते थे*। कुछ शाक तथा पत्तोंका ही भोजन करते थे, कुछ लोग एक समय भोजन करके अङ्गोंकी चिन्ता (शारीरिक सौष्ठव आदिकी चिन्ता) नहीं रखते थे, कुछ लोग स्नानपरायण एवं कुछ लोग सूर्य-किरणोंका ही पान करते थे। कुछ लोग वृक्षके नीचे रहते थे, दूसरे शिलारूपी शय्यापर ही सोते थे। इस प्रकार तपस्या (विविधाके) द्वारा महेश्वरकी पूजा करते हुए वे (मुनिजन) समय व्यतीत कर रहे थे॥ ९६-९७॥
(मुनियोंको इस प्रकार पश्चात्तापपूर्वक तपस्यामें निरत देखकर) उनकी व्याकुलता दूर करनेके लिये शरणागतोंके दुःखहर्ता भगवान् वृषध्वज हरने उन्हें प्रबोधित (मोहमुक्त) करनेका विचार किया। इसलिये प्रसन्न परमेश्वर वे देव (शंकर) सत्ययुगमें हिमालयके इस शुभ शिखरपर स्थित देवदारु-वनमें पुनः आये। उनके सारे अङ्ग भस्मसे उपलिप्त होनेके कारण श्वेत वर्णके थे, नग्न थे, विकृत लक्षणवाले थे, हाथमें उल्मुक (जलती लकड़ी) लेकर उसे घुमा रहे थे और उनके नेत्र लाल तथा पिंगलवर्णके थे॥ ९८–१००॥
कभी वे भयंकर रूपसे हँसते, कभी आश्चर्ययुक्त हो गान करने लगते, कभी शृंगारपूर्वक नृत्य करने लगते और कभी बार-बार रोने लगते। (इस स्थितिमें भगवान्) महादेव आश्रममें आकर बार-बार भिक्षा माँगने लगे। इस प्रकार अपना मायामय रूप बनाकर वे देव (शंकर) उस (देवदारु) वनमें विचरने लगे और उन पिनाकधारी देवने पर्वतपुत्री गौरीको अपने पार्श्वभागमें कर लिया था। वे देवेशी पूर्वके समान ही देवदारु-वनमें महादेवके साथ आयीं॥ १०१-१०३॥
देवीके साथ कपर्दी (शंकर) देवको आया देखकर उन्होंने (मुनियोंने) भूमिमें सिर रखकर ईश्वरको प्रणाम किया और स्तुति की। वे विविध वैदिक मन्त्रों, शुभ माहेश्वर सूक्तों, अथर्वशिरस् तथा अन्य रुद्रसम्बन्धी वेदमन्त्रोंसे शंकरकी स्तुति करने लगे— ॥ १०४-१०५ ॥
* भोज्य अन्नकी स्वादिष्टताके प्रति अनासक्त होनेसे अन्नके परिष्कारके साधन उलूखल तथा सिलको उपयोगमें नहीं लाते थे। (इनके उपयोगमें हिंसा भी होती है, इसलिये तपस्वी लोग विशेषरूपसे इनका वर्जन करते हैं।)