संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* अध्याय ३७ *
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| नमो देवादिदेवाय महादेवाय ते नमः।<br>त्र्यम्बकाय नमस्तुभ्यं त्रिशूलवरधारिणे ॥ १०६ ॥ | देवोंके आदिदेवको नमस्कार है। महादेव ! आपको नमस्कार है। श्रेष्ठ त्रिशूल धारण करनेवाले त्र्यम्बक ! आपको नमस्कार है। दिगम्बर, (स्वेच्छासे) विकृत (रूप धारण करनेवाले) तथा पिनाकी आपको नमस्कार है। समस्त प्रणतजनोंके आश्रय तथा स्वयं निराश्रय (निरधिष्ठान देव)-को नमस्कार है। अन्त करनेवाले (यम)-का भी अन्त करनेवाले और सबका संहार करनेवाले आपको नमस्कार है। नृत्यपरायण और भैरवरूप आपको नमस्कार है। नर-नारी शरीरवाले (अर्धनारीश्वर) एवं योगियोंके गुरु आपको नमस्कार है। दान्त, शान्त, तापस (विरक्त) तथा हरको नमस्कार है। अत्यन्त भीषण, चर्माम्बरधारी रुद्रको नमस्कार है। लेलिहानको नमस्कार है, शितिकण्ठको नमस्कार है। अघोर तथा घोर रूपवाले वामदेवको नमस्कार है। धतूरेकी माला धारण करनेवाले और देवीके प्रियकर्ताको नमस्कार है। गङ्गाजलकी धाराको धारण करनेवाले परमेष्ठी शम्भुको नमस्कार है। योगाधिपतिको नमस्कार है तथा ब्रह्माधिपतिको नमस्कार है ॥ १०६-११२ ॥ |
| नमो दिग्वाससे तुभ्यं विकृताय पिनाकिने।<br>सर्वप्रणतदेहाय स्वयमप्रणतात्मने ॥ १०७ ॥ | |
| अन्तकान्तकृते तुभ्यं सर्वसंहरणाय च।<br>नमोऽस्तु नृत्यशीलाय नमो भैरवरूपिणे ॥ १०८ ॥ | |
| नरनारीशरीराय योगिनां गुरवे नमः।<br>नमो दान्ताय शान्ताय तापसाय हराय च ॥ १०९ ॥ | |
| विभीषणाय रुद्राय नमस्ते कृत्तिवाससे।<br>नमस्ते लेलिहानाय शितिकण्ठाय ते नमः ॥ ११० ॥ | |
| अघोरघोररूपाय वामदेवाय वै नमः।<br>नमः कनकमालाय देव्याः प्रियकराय च ॥ १११ ॥ | |
| गङ्गासलिलधाराय शम्भवे परमेष्ठिने।<br>नमो योगाधिपतये ब्रह्माधिपतये नमः ॥ ११२ ॥ | |
| प्राणाय च नमस्तुभ्यं नमो भस्माङ्गरागिणे।<br>नमस्ते घनवाहाय दंष्ट्रिणे वह्निरेतसे ॥ ११३ ॥ | भस्मका अङ्गराग लगानेवाले प्राणरूप आपको बार-बार नमस्कार है। घनवाह<sup>१</sup>! दंष्ट्री तथा वह्निरेतसको<sup>२</sup> नमस्कार है। ब्रह्माके सिरका हरण करनेवाले कालरूपको नमस्कार है। हम आपके न आगमनको जानते हैं और न गमनको ही जानते हैं। विश्वेश्वर ! महादेव ! आप जिस रूपमें हैं, उसी रूपमें आपको नमस्कार है। प्रमथनाथ तथा शुभ सम्पदा देनेवालेको नमस्कार है। हाथमें कपाल<sup>३</sup> धारण करनेवाले आपको तथा आप मीढुष्टम—शिवलिङ्ग-विग्रहको नमस्कार है। कनकलिङ्ग<sup>४</sup> और वारिलिङ्ग<sup>५</sup> आपको नमस्कार है। अग्नि तथा सूर्यस्वरूप लिङ्गवालेको नमस्कार है, ज्ञानलिङ्ग ! आपको नमस्कार है। सर्पोंकी मालावाले और कर्णिकारप्रिय<sup>६</sup> आपको नमस्कार है। किरीटी, कुण्डल धारण करनेवाले तथा कालके भी काल आपको नमस्कार है ॥ ११३-११६ ॥ |
| ब्रह्मणश्च शिरोहर्त्रे नमस्ते कालरूपिणे।<br>आगतिं ते न जानीमो गतिं नैव च नैव च।<br>विश्वेश्वर महादेव योऽसि सोऽसि नमोऽस्तु ते ॥ ११४ ॥ | |
| नमः प्रमथनाथाय दात्रे च शुभसम्पदाम्।<br>कपालपाणये तुभ्यं नमो मीढुष्टमाय ते।<br>नमः कनकलिङ्गाय वारिलिङ्गाय ते नमः ॥ ११५ ॥ | |
| नमो वह्न्यर्कलिङ्गाय ज्ञानलिङ्गाय ते नमः।<br>नमो भुजंगहाराय कर्णिकारप्रियाय च।<br>किरीटिने कुण्डलिने कालकालाय ते नमः ॥ ११६ ॥ |
१-मेघ शंकरके वाहन हैं, इसलिये वे 'घनवाहन' हैं।
२-भगवान् शंकरके वीर्यसे स्वर्णकी उत्पत्ति हुई है और स्वर्ण वह्निका ही एक रूप है, इसलिये भगवान् शंकरको 'वह्निरता' कहते हैं।
३-ब्रह्माके सिर-हरणकी कथा पिछले अध्यायमें आयी है।
४-वह्नि महादेवकी मूर्ति है और वह्निका ही रूप कनक (स्वर्ण) है, इसीलिये महादेवको 'कनकलिङ्ग' कहते हैं।
५-जल भी भगवान् महादेवकी मूर्ति है, इसलिये महादेवको वारि (जल)-की मूर्ति कहते हैं।
६-कर्णिकार पुष्पविशेषका नाम है।