संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ४५६ | * कूर्मपुराण * |
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| वामदेव महेशान देवदेव त्रिलोचन।<br>क्षम्यतां यत्कृतं मोहात् त्वमेव शरणं हि नः॥ ११७॥<br>चरितानि विचित्राणि गुह्यानि गहनानि च।<br>ब्रह्मादीनां च सर्वेषां दुर्विज्ञेयोऽसि शंकर॥ ११८॥<br>अज्ञानाद् यदि वा ज्ञानाद् यत्किंचित् कुरुते नरः।<br>तत्सर्वं भगवान्नेव कुरुते योगमायया॥ ११९॥<br>एवं स्तुत्वा महादेवं प्रहृष्टेनान्तरात्मना।<br>ऊचुः प्रणम्य गिरिशं पश्यामस्त्वां यथा पुरा॥ १२०॥<br>तेषां संस्तवमाकर्ण्य सोमः सोमविभूषणः।<br>स्वमेव परमं रूपं दर्शयामास शंकरः॥ १२१॥<br>तं ते दृष्ट्वा गिरिशं देव्या सह पिनाकिनम्।<br>यथा पूर्वं स्थिता विप्राः प्रणेमुर्हृष्टमानसाः॥ १२२॥<br>ततस्ते मुनयः सर्वे संस्तूय च महेश्वरम्।<br>भृग्वङ्गिरोवसिष्ठास्तु विश्वामित्रस्तथैव च॥ १२३॥<br>गौतमोऽत्रिः सुकेशश्च पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः।<br>मरीचिः कश्यपश्चापि संवर्तश्च महातपाः।<br>प्रणम्य देवदेवेशमिदं वचनमब्रुवन्॥ १२४॥<br>कथं त्वां देवदेवेश कर्मयोगेन वा प्रभो।<br>ज्ञानेन वाथ योगेन पूजयामः सदैव हि॥ १२५॥<br><br>केन वा देवमार्गेण सम्पूज्यो भगवानिह।<br>किं सेव्यमसेव्यं वा सर्वमेतद् ब्रवीहि नः॥ १२६॥<br>देवदेव उवाच<br>एतद् वः सम्प्रवक्ष्यामि गूढं गहनमुत्तमम्।<br>ब्रह्मणे कथितं पूर्वमादावेव महर्षयः॥ १२७॥<br>सांख्ययोगो द्विधा ज्ञेयः पुरुषाणां हि साधनम्।<br>योगेन सहितं सांख्यं पुरुषाणां विमुक्तिदम्॥ १२८॥<br><br>न केवल्रेन योगेन दृश्यते पुरुषः परः।<br>ज्ञानं तु केवलं सम्यगपवर्गफलप्रदम्॥ १२९॥<br><br>भवन्तः केवलं योगं समाश्रित्य विमुक्तये।<br>विहाय सांख्यं विमलमकुर्वन्त परिश्रमम्॥ १३०॥<br><br>एतस्मात् कारणात् विप्रा नृणां केवलधर्मिणाम्।<br>आगतोऽहमिमं देशं ज्ञापयन् मोहसम्भवम्॥ १३१॥ | वामदेव! त्रिलोचन! महेशान! देवाधिदेव! मोहवश हमने जो किया, उसे आप क्षमा करें। हम सभी आपकी शरणमें हैं। आपके चरित्र विचित्र, गहन तथा गुह्य हैं। शंकर! आप ब्रह्मा आदि सभीके लिये दुर्विज्ञेय हैं। मनुष्य ज्ञान अथवा अज्ञानसे जो कुछ भी करता है, वह सब आप भगवान् ही अपनी योगमायासे करते हैं। इस प्रकार महादेवकी स्तुतिकर प्रसन्न-मनसे (मुनियोंने) उनको प्रणाम किया और कहा—हम लोग आपको पूर्वरूपमें देखना चाहते हैं॥ ११७-१२०॥<br>उनकी (मुनियोंकी इस) स्तुतिको सुनकर चन्द्रभूषण सोम शंकरने अपने परम रूपका दर्शन (उन्हें) कराया। उन पिनाकी गिरिशको देवी (पार्वती)-के साथ पहले-जैसे (मङ्गलमय) रूपमें स्थित देखकर प्रसन्न-मनवाले ब्राह्मणोंने उन्हें प्रणाम किया। तदनन्तर भृगु, अंगिरा, वसिष्ठ तथा विश्वामित्र, गौतम, अत्रि, सुकेश, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, मरीचि, कश्यप तथा महातपस्वी संवर्त आदि सभी ऋषियोंने महेश्वरकी स्तुतिकर उन देवदेवेशको प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—॥ १२१-१२४॥<br>देवदेवेश! प्रभो! हम सब किस प्रकारसे आपकी सदा पूजा करें, कर्मयोग या ज्ञानयोगसे? किस देवमार्ग (प्रशस्त मार्ग)-के द्वारा भगवान्की पूजा करनी चाहिये, हम लोगोंके लिये क्या सेवनीय है, क्या असेवनीय है, यह सब आप हमें बतलायें॥ १२५-१२६॥<br>देवदेवने कहा—महर्षियो! मैं आप लोगोंको यह उत्तम और गम्भीर रहस्य बतलाता हूँ। पूर्वकालमें (मैंने) इसे ब्रह्माजीको बतलाया था॥ १२७॥<br>पुरुषोंके लिये साधनस्वरूप दो प्रकारका सांख्ययोग समझना चाहिये। योगसहित (कर्मयोगसहित अर्थात् अनासक्त-भावसे कर्मनिष्ठाके साथ) सांख्य (ज्ञाननिष्ठा) पुरुषोंको मुक्ति प्रदान करनेवाला है। केवल योगके द्वारा परम पुरुषका दर्शन नहीं होता। (शुद्ध) ज्ञान (ज्ञाननिष्ठा) भलीभाँति केवल मोक्षफलको देनेवाला है। आप लोग मुक्ति प्राप्त करनेके लिये विमल सांख्यका परित्याग करके केवल योगका ही अवलम्बनकर परिश्रम कर रहे थे। ब्राह्मणो! इसी कारणसे केवल धर्म करनेवाले (कर्ममात्रनिष्ठ-कर्मव्यसनी) मनुष्योंको मोह उत्पन्न होता है, यह बतानेके लिये मैं इस स्थानपर आया हूँ॥ १२८-१३१॥ |