संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ३७ * ४५७
तस्माद् भवद्भिर्विमलं ज्ञानं कैवल्यसाधनम् ।
ज्ञातव्यं हि प्रयत्नेन श्रोतव्यं दृश्यमेव च ॥ १३२ ॥
अतः आप लोगोंको मोक्षके साधनरूप विशुद्ध ज्ञानको प्रयत्नपूर्वक जानना, सुनना तथा उसका साक्षात्कार करना चाहिये ॥ १३२ ॥
एकः सर्वत्रगो ह्यात्मा केवलश्चितिमात्रकः ।
आनन्दो निर्मलो नित्यं स्यादेतत् सांख्यदर्शनम् ॥ १३३ ॥
एतदेव परं ज्ञानमेष मोक्षोऽत्र गीयते ।
एतत् कैवल्यममलं ब्रह्मभावश्च वर्णितः ॥ १३४ ॥
आश्रित्य चैतत् परमं तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।
पश्यन्ति मां महात्मानो यतयो विश्वमीश्वरम् ॥ १३५ ॥
आत्मा सर्वत्र व्याप्त, विशुद्ध, चिन्मात्र, आनन्द, निर्मल, नित्य तथा एक है। यही सांख्य (ज्ञाननिष्ठाका) दर्शन है। यही परम ज्ञान है, इसीको यहाँ मोक्ष कहा गया है। यही निर्मल मोक्ष है और यही शुद्ध ब्रह्मभाव बताया गया है। इस परम (ज्ञान)-का आश्रय ग्रहणकर उसमें ही निष्ठा रखते हुए और उसीके परायण रहते हुए महात्मा तथा यतिजन मुझ विश्वरूप ईश्वरका दर्शन करते हैं ॥ १३३-१३५ ॥
एतत् तत् परमं ज्ञानं केवलं सन्निरञ्जनम् ।
अहं हि वेद्यो भगवान् मम मूर्तिरियं शिवा ॥ १३६ ॥
बहूनि साधनानीह सिद्धये कथितानि तु ।
तेषामभ्यधिकं ज्ञानं मामकं द्विजपुंगवाः ॥ १३७ ॥
यही वह सत्, निरञ्जन तथा अद्वितीय परम ज्ञान है। मुझे ही भगवान् जानना चाहिये और यह शिवा मेरी ही मूर्ति है। श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! सिद्धिके लिये यहाँ (शास्त्रोंमें) बहुतसे साधन बताये गये हैं, किंतु उनमें मेरे विषयका ज्ञान सर्वश्रेष्ठ है ॥ १३६-१३७ ॥
ज्ञानयोगरताः शान्ता मामेव शरणं गताः ।
ये हि मां भस्मनिरता ध्यायन्ति सततं हृदि ॥ १३८ ॥
मद्भक्तिपरमा नित्यं यतयः क्षीणकल्मषाः ।
नाशयाम्यचिरात् तेषां घोरं संसारसागरम् ॥ १३९ ॥
भस्म धारण करनेवाले, (संसारकी निःसारताको हृदयसे समझनेवाले) ज्ञानयोगपरायण, शान्त और मेरे ही शरणमें आये हुए जो लोग हृदयमें निरन्तर मेरा ही ध्यान करते हैं और नित्य मेरी परम भक्तिमें तत्पर हैं, कल्मषोंसे रहित एवं पूर्ण संयत हैं, उन लोगोंके घोर संसाररूपी सागरको मैं शीघ्र ही नष्ट कर देता हूँ ॥ १३८-१३९ ॥
प्रशान्तः संयतमना भस्मोद्धूलितविग्रहः ।
ब्रह्मचर्यरतो नग्नो व्रतं पाशुपतं चरेत् ॥ १४० ॥
निर्मितं हि मया पूर्वं व्रतं पाशुपतं परम् ।
गुह्याद् गुह्यतमं सूक्ष्मं वेदसारं विमुक्तये ॥ १४१ ॥
भस्मसे धूसरित शरीरवाला होकर संयतमन तथा शान्त होकर, ब्रह्मचर्यव्रत-परायण होते हुए वस्त्रादि परिधानकी आसक्तिसे रहित होकर पाशुपत-व्रतका पालन करना चाहिये। मुक्तिप्राप्तिके लिये मैंने पूर्वकालमें गुह्यसे भी गुह्यतम, वेदके साररूप, सूक्ष्म एवं श्रेष्ठ पाशुपत-व्रतका उपदेश किया था ॥ १४०-१४१ ॥
यद वा कौपीनवसनः स्याद् वैकवसनो मुनिः ।
वेदाभ्यासरतो विद्वान् ध्यायेत् पशुपतिं शिवम् ॥ १४२ ॥
एष पाशुपतो योगः सेवनीयो मुमुक्षुभिः ।
भस्मच्छन्नैर्हि सततं निष्कामैरिति विश्रुतिः ॥ १४३ ॥
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।
बहवोऽनेन योगेन पूता मद्भावमागताः ॥ १४४ ॥
अथवा कौपीन वस्त्र या एक वस्त्र धारणकर विद्वान् मुनिको वेदाभ्यासमें रत रहते हुए पशुपति शिवका (सतत) ध्यान करना चाहिये। मोक्षकी अभिलाषावाले मुमुक्षुजनोंको सतत भस्मसे उपलिप्त रहकर निष्कामभावसे इस पाशुपतयोगका सेवन करना चाहिये। ऐसा श्रुतिका कथन है। राग, भय तथा क्रोधसे सर्वथा रहित, मुझे ही सर्वस्व समझनेवाले और मेरा ही आश्रय ग्रहण करनेवाले बहुतसे (भक्तजन) इस योगके द्वारा पवित्र होकर मेरे भावको प्राप्त हुए हैं ॥ १४२-१४४ ॥