संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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४५८ * कूर्मपुराण *
| अन्यानि चैव शास्त्राणि लोकेऽस्मिन् मोहनानि तु।<br>वेदवादविरुद्धानि मयैव कथितानि तु॥ १४५॥<br><br>वामं पाशुपतं सोमं लाकुलं चैव भैरवम्।<br>असेव्यमेतत् कथितं वेदबाह्यं तथेतरम्॥ १४६॥<br><br>वेदमूर्तिरहं विप्रा नान्यशास्त्रार्थवेदिभिः।<br>ज्ञायते मत्स्वरूपं तु मुक्त्वा वेदं सनातनम्॥ १४७॥<br><br>स्थापयध्वमिदं मार्गं पूजयध्वं महेश्वरम्।<br>अचिरादैश्वरं ज्ञानमुत्पत्स्यति न संशयः॥ १४८॥<br><br>मयि भक्तिश्च विपुला भवतामस्तु सत्तमाः।<br>ध्यातमात्रो हि सांनिध्यं दास्यामि मुनिसत्तमाः॥ १४९॥<br><br>इत्युक्त्वा भगवान् सोमस्तत्रैवान्तरधीयत।<br>तेऽपि दारुवने तस्मिन् पूजयन्ति स्म शंकरम्।<br>ब्रह्मचर्यरताः शान्ता ज्ञानयोगपरायणाः॥ १५०॥ | इस संसारमें मोहित करनेवाले तथा वेदमतका विरोध करनेवाले अन्य भी शास्त्र हैं, वे मेरे द्वारा ही कहे गये हैं। वाम (मार्ग), पाशुपत, सोम, लाकुल तथा भैरव (मार्ग) तथा अन्य—ये असेव्य और वेदबाह्य कहे गये हैं॥ १४५-१४६॥<br><br>ब्राह्मणो! मैं वेदमूर्ति हूँ। सनातन वेदका परित्यागकर दूसरे शास्त्रको जाननेवाले लोग मेरे स्वरूपको नहीं जान सकते। (अतः आप लोग) इस मार्गकी स्थापना करें, महेश्वरकी पूजा करें (इससे) शीघ्र ही आप लोगोंको ईश्वर-सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त होगा, इसमें संशय नहीं है। श्रेष्ठ जनो! आप सभीकी मुझमें महान् भक्ति हो। श्रेष्ठ मुनियो! ध्यान करनेमात्रसे मैं आपको अपना सांनिध्य प्रदान करूँगा॥ १४७-१४९॥<br><br>इतना कहकर भगवान् सोम (शंकर) वहींपर अन्तर्धान हो गये। वे शान्त महर्षि भी ब्रह्मचर्यपरायण होकर, ज्ञानयोग-परायण रहते हुए उस दारुवनमें शंकरकी पूजा करने लगे। उन ब्रह्मवादी महात्मा मुनिगणोंने (स्वयं मोहरहित हो जानेके कारण) एकत्रित होकर अध्यात्मज्ञान-सम्बन्धी बहुतसे सिद्धान्तोंका विस्तार किया॥ १५०-१५१॥ |
| समेत्य ते महात्मानो मुनयो ब्रह्मवादिनः।<br>वितेनिरे बहून् वादानध्यात्मज्ञानसंश्रयान्॥ १५१॥<br><br>किमस्र्य जगतो मूलमात्मा चास्माकमेव हि।<br>कोऽपि स्यात् सर्वभावानां हेतुरीश्वर एव च॥ १५२॥<br><br>इत्येवं मन्यमानानां ध्यानमार्गावलम्बिनाम्।<br>आविरासीन्महादेवी देवी गिरिवरात्मजा॥ १५३॥<br><br>कोटिसूर्यप्रतीकाशा ज्वालामालासमावृता।<br>स्वभाभिर्विमलाभिस्तु पूरयन्ती नभस्तलम्॥ १५४॥ | इस जगत्का मूल (कारण) क्या है? (उत्तर—) हमारी आत्मा ही इस जगत्का मूल है। सभी भाव पदार्थोंका हेतु कौन है? (उत्तर—) ईश्वर ही सभी भावोंका जनक है। इस प्रकारकी दृढ़ धारणाके साथ ध्यानमार्गका अवलम्बन करनेवाले उन महर्षियोंके समक्ष श्रेष्ठ पर्वत (हिमालय)-की पुत्री महादेवी पार्वती प्रकट हुईं॥ १५२-१५३॥<br><br>करोड़ों सूर्यके समान, ज्वालामालाओं (तेजो-राशि)-से समावृत वे अपनी विमल प्रभासे आकाशमण्डलको आपूरित कर रही थीं। हजारों ज्वालाओं (तेजोमण्डल)-के मध्यमें प्रतिष्ठित, अतुलनीय, अद्वितीय, सम्पूर्ण जगत्के ईश (शंकर)-की पत्नी, उन गिरिजाका दर्शनकर मुनियोंने उन्हें प्रणाम किया। क्योंकि वे जानते हैं कि ये ही परमेश्वरी परमेश्वर महेश्वरकी मूलशक्ति (बीज) हैं॥ १५४-१५५॥ |
| तामन्वपश्यन् गिरिजाममेयां<br>ज्वालासहस्रान्तरसंनिविष्टाम् ।<br>प्रणेमुरेकामखिलेशपत्नीं<br>जानन्ति ते तत् परमस्य बीजम्॥ १५५॥ |