संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय ३७ * | ४५९ |
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| अस्माकमेषा परमेशपत्नी<br>गतिस्तथात्मा गगनाभिधाना।<br>पश्यन्त्यथात्मानमिदं च कृत्स्नं<br>तस्यामथैते मुनयश्च विप्राः॥ १५६॥ | अनन्तर उन लोगोंने ऐसी भावना की—ये ही परमेश-पत्नी हम सबकी गति हैं, आत्मा हैं, इन्हें गगन (आकाश) नामसे कहा जाता है, (क्योंकि ये महादेवी वस्तुगत्या निराकार तथा परम व्यापक हैं, अतएव परम अवकाशस्वरूप सर्वाधिष्ठान होनेसे कथंचित् आकाशके द्वारा तुलनीय हैं और परब्रह्मका व्योम (आकाश) नाम है ही तथा इन महादेवी एवं परब्रह्ममें सर्वथा अभेद है।) समस्त मुनि एवं समस्त विप्र इन्हींमें अपनेको तथा समस्त प्रपञ्चको देखते हैं। (मुनियोंके इस पवित्र भावसे संतुष्ट होकर) परमेश्वरकी पत्नी (पार्वती)-ने उन्हें (विशेषरूपसे) देखा। इसी बीच (मुनियोंने) सभीके मूल कारण, नियामक, पुराण पुरुष, बृहत् एवं रुद्रात्मक कवि, देव शम्भु (महादेव)-का दर्शन किया। तदनन्तर देवी (पार्वती) तथा देव (शंकर)-को देखकर उन्होंने (मुनियोंने) प्रणाम किया, उत्तम आनन्द प्राप्त किया और उनमें भगवान् (परमेश)-की कृपासे जन्मके विनाशके हेतुरूप अर्थात् पुनर्जन्म न करानेवाले ईश्वर-सम्बन्धी ज्ञानका आविर्भाव हुआ॥ १५६-१५८॥ |
| निरीक्षितास्ते परमेशपत्न्या<br>तदन्तरे देवमशेषहेतुम्।<br>पश्यन्ति शम्भुं कविमीशितारं<br>रुद्रं बृहन्तं पुरुषं पुराणम्॥ १५७॥ | |
| आलोक्य देवीमथ देवमीशं<br>प्रणेमुरानन्दमवापुरग्र्यम् ।<br>ज्ञानं तदैशं भगवत्प्रसादा-<br>दाविर्बभौ जन्मविनाशहेतु ॥ १५८॥ | |
| इयं हि सा जगतो योनिरैका<br>सर्वात्मिका सर्वनियामिका च।<br>माहेश्वरीशक्तिरनादिसिद्धा<br>व्योमाभिधाना दिवि राजतीव॥ १५९॥ | (इस ज्ञानके आविर्भावके साथ ही मुनियोंने यह अनुभव किया) ये ही देवी जगत्की एकमात्र मूल कारण, सर्वात्मिका, सबका नियन्त्रण करनेवाली तथा अनादिसिद्ध व्योम नामवाली माहेश्वरी शक्ति हैं, जो द्युलोकमें शोभित होती हुई प्रतीत हो रही हैं। देवाधिदेव महान् परमेष्ठी, परसे भी पर, अद्वितीय रुद्र महेश्वर शिवने इसी परम शक्ति (महादेवी)-में अंशरूपसे विद्यमान मायाका आश्रय ग्रहणकर विश्वकी सृष्टि की॥ १५९-१६०॥ |
| अस्यां महत्परमेष्ठी परस्ता-<br>न्महेश्वरः शिव एकोऽथ रुद्रः।<br>चकार विश्वं परशक्तिनिष्ठां<br>मायामथारुह्य स देवदेवः॥ १६०॥ | |
| एको देवः सर्वभूतेषु गूढो<br>मायी रुद्रः सकलो निष्कलश्च।<br>स एव देवी न च तद्विभिन्न-<br>मेतज्ज्ञात्वा ह्यमृतत्वं व्रजन्ति॥ १६१॥ | ये देव ही सभी प्राणियोंमें गूढ़रूपसे प्रतिष्ठित हैं अर्थात् सर्वत्र सूक्ष्मरूपसे व्याप्त हैं। वे मायी (मायाके नियन्ता) रुद्र सकल (साकार) तथा निष्कल (निराकार) हैं। वे ही देवी (रूप) हैं, उनसे भिन्न (जगत्में और कुछ भी) नहीं है, ऐसा जानकर अमृतत्वकी प्राप्ति होती है। इधर भर्ग (वरेण्य तेजोरूप), देवाधिदेव, भगवान् परमेश मुनियोंके मोहको दूरकर तथा उन्हें परमज्ञानसे सम्पन्न कर महादेवीके साथ अन्तर्हित हो गये और एकमात्र अरण्यको ही अपना घर माननेवाले वे परम ज्ञानी मुनि लोग उन परम देव रुद्रकी आराधनामें दत्तचित्त हो गये॥ १६१-१६२॥ |
| अन्तर्हितोऽभूद् भगवानथेशो<br>देव्या भर्गः सह देवादिदेवः।<br>आराधयन्ति स्म तमेव देवं<br>वनौकसस्ते पुनरेव रुद्रम्॥ १६२॥ |