संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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४६० * कूर्मपुराण *
| एतद् वः कथितं सर्वं देवदेवविचेष्टितम्।<br>देवदारुवने पूर्वं पुराणे यन्मया श्रुतम्॥ १६३॥<br><br>यः पठेच्छृणुयान्नित्यं मुच्यते सर्वपातकैः।<br>श्रावयेद् वा द्विजान् शान्तान् स याति परमां गतिम्॥ १६४॥ | इस तरह प्राचीन कालमें देवदारु-वनमें घटित देवाधिदेवका जो वृत्तान्त मैंने पुराणमें सुना था, वह आप लोगोंको बता दिया। जो नित्य इसका पाठ करेगा अथवा श्रवण करेगा, वह सभी पातकोंसे मुक्त हो जायगा अथवा जो शान्त द्विजोंको इसे सुनायेगा, वह परम गतिको प्राप्त होगा॥ १६३-१६४॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे सप्तत्रिंशोऽध्यायः॥ ३७॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें सैंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३७॥
अड़तीसवाँ अध्याय
तीर्थमाहात्म्य-प्रकरणमें मार्कण्डेय-युधिष्ठिर-संवादका प्रारम्भ, मार्कण्डेयजीद्वारा नर्मदा तथा अमरकण्टकतीर्थके माहात्म्यका प्रतिपादन
| सूत उवाच<br>एषा पुण्यतमा देवी देवगन्धर्वसेविता।<br>नर्मदा लोकविख्याता तीर्थानामुत्तमा नदी॥ १॥<br><br>तस्याः शृणुध्वं माहात्म्यं मार्कण्डेयेन भाषितम्।<br>युधिष्ठिराय तु शुभं सर्वपापप्रणाशनम्॥ २॥ | **सूतजीने कहा—**देवताओं तथा गन्धर्वोंद्वारा सेवित ये अत्यन्त पवित्र नर्मदादेवी संसारमें प्रसिद्ध हैं तथा नदीरूपमें सभी तीर्थोंमें उत्तम तीर्थ हैं। इनका वह शुभ माहात्म्य आप लोग सुनें, जो महर्षि मार्कण्डेयद्वारा युधिष्ठिरको बताया गया है तथा सभी पापोंका नाशक होनेके कारण शुभ है॥ १-२॥ |
| युधिष्ठिर उवाच<br>श्रुतास्तु विविधा धर्मास्त्वत्प्रसादान्महामुने।<br>माहात्म्यं च प्रयागस्य तीर्थानि विविधानि च॥ ३॥<br><br>नर्मदा सर्वतीर्थानां मुख्या हि भवतेरिता।<br>तस्यास्त्विदानीं माहात्म्यं वक्तुमर्हसि सत्तम॥ ४॥ | **युधिष्ठिर बोले—**महामुने! आपकी कृपासे मैंने विविध धर्मोंको सुना, साथ ही प्रयागका माहात्म्य और विविध तीर्थोंका भी (माहात्म्य) श्रवण किया। आपने बतलाया कि सभी तीर्थोंमें नर्मदा मुख्य हैं, अतः हे सत्तम! इस समय आप उन्हींका माहात्म्य मुझे बतलायें॥ ३-४॥ |
| मार्कण्डेय उवाच<br>नर्मदा सरितां श्रेष्ठा रुद्रदेहाद् विनिःसृता।<br>तारयेत् सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च॥ ५॥<br><br>नर्मदायास्तु माहात्म्यं पुराणे यन्मया श्रुतम्।<br>इदानीं तत् प्रवक्ष्यामि शृणुष्वैकमनाः शुभम्॥ ६॥<br><br>पुण्या कनखले गङ्गा कुरुक्षेत्रे सरस्वती।<br>ग्रामे वा यदि वारण्ये पुण्या सर्वत्र नर्मदा॥ ७॥<br><br>त्रिभिः सारस्वतं तोयं सप्ताहेन तु यामुनम्।<br>सद्यः पुनाति गाङ्गेयं दर्शनादेव नार्मदम्॥ ८॥ | **मार्कण्डेयने कहा—**रुद्रकी देहसे निकली हुई नर्मदा सभी नदियोंमें श्रेष्ठ हैं। (वे) सभी चर-अचर प्राणियोंको पार उतारनेवाली हैं। पुराणमें नर्मदाका जो माहात्म्य मैंने सुना है, उसे अब बतलाता हूँ, आप लोग एकाग्र होकर सुनें—॥ ५-६॥<br><br>गङ्गा कनखलमें तथा सरस्वती कुरुक्षेत्रमें पवित्र (कही गयी) हैं, किंतु ग्राम अथवा अरण्यमें सर्वत्र ही नर्मदाको पवित्र कहा गया है। सरस्वतीका जल तीन दिनोंतक, यमुनाका जल सात दिनोंतक तथा गङ्गाजल तत्काल स्नान-पानसे पवित्र करता है, किंतु नर्मदाका जल तो दर्शनमात्रसे ही पवित्र कर देता है॥ ७-८॥ |