भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 471, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 471
* अध्याय ३८ *४६१
कलिङ्गदेशपश्चार्धे पर्वतेऽमरकण्टके।<br>पुण्या च त्रिषु लोकेषु रमणीया मनोरमा॥ ९ ॥<br>सदेवसुरगन्धर्वा ऋषयश्च तपोधनाः।<br>तपस्तप्त्वा तु राजेन्द्र सिद्धिं तु परमां गताः॥ १०॥<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् नियमस्थो जितेन्द्रियः।<br>उपोष्‍य रजनीमेकां कुलानां तारयेच्छतम्॥ ११॥कलिंग देशके पश्चार्धमें अमरकण्टक पर्वतपर तीनों लोकोंमें पवित्र, रमणीय, मनोरम नर्मदाका उद्गम स्थल है। राजेन्द्र! वहाँ देवताओंसहित असुरों, गन्धर्वों, ऋषियों तथा तपस्वियोंने तपस्या कर परम सिद्धि प्राप्त की है। राजन्! मनुष्य वहाँ (नर्मदामें) स्नान करके जितेन्द्रिय तथा नियम-परायण रहते हुए एक रात्रि उपवास करे तो अपने सौ पीढ़ियोंको तार देता है॥ ९-११॥
योजनानां शतं साग्रं श्रूयते सरिदुत्तमा।<br>विस्तारेण तु राजेन्द्र योजनद्वयमायता ॥ १२ ॥<br>षष्टितीर्थसहस्राणि षष्टिकोट्यस्तथैव च।<br>पर्वतस्य समन्तात् तु तिष्ठन्त्यमरकण्टके ॥ १३॥<br>ब्रह्मचारी शुचिर्भूत्वा जितक्रोधो जितेन्द्रियः।<br>सर्वहिंसानिवृत्तस्तु सर्वभूतहिते रतः॥ १४॥<br>एवं सर्वसमाचारो यस्तु प्राणान् समुत्सृजेत्।<br>तस्य पुण्यफलं राजन् शृणुष्वावहितो नृप॥ १५॥राजेन्द्र! सुना जाता है कि वह श्रेष्ठ नदी सौ योजनसे कुछ अधिक लम्बी तथा दो योजन चौड़े विस्तारमें फैली है। अमरकण्टक पर्वतमें चारों ओर साठ करोड़ साठ हजार तीर्थ स्थित हैं। राजन्! जो ब्रह्मचर्यपरायण है, पवित्र है, क्रोध तथा इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त किया है, सभी प्रकारकी हिंसाओंसे सर्वथा निवृत्त है, सभी प्राणियोंके हितमें परायण है तथा ऐसे ही सभी पवित्र आचारोंसे सम्पन्न है, वह मनुष्य यहाँ प्राणोंका परित्यागकर जिस पुण्य फलको प्राप्त करता है, उसे आप सावधान होकर सुनें- ॥ १२-१५॥
शतवर्षसहस्राणि स्वर्गे मोदति पाण्डव।<br>अप्सरोगणसंकीर्णो दिव्यस्त्रीपरिवारितः ॥ १६॥<br>दिव्यगन्धानुलिप्तश्च दिव्यपुष्पोपशोभितः।<br>क्रीडते देवलोके तु दैवतैः सह मोदते ॥ १७॥<br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो राजा भवति धार्मिकः।<br>गृहं तु लभतेऽसौ वै नानारत्नसमन्वितम् ॥ १८॥<br>स्तम्भैर्मणिमयैर्दिव्यैर्वज्रवैदूर्यभूषितम् ।<br>आलेख्यवाहनैः शुभ्रैर्दासीदाससमन्वितम् ॥ १९॥<br>राजराजेश्वरः श्रीमान् सर्वस्त्रीजनवल्लभः।<br>जीवेद् वर्षशतं साग्रं तत्र भोगसमन्वितः ॥ २०॥पाण्डव! वह पुरुष अप्सराओंके समूहोंसे व्याप्त अर्थात् सेवित तथा चारों ओर दिव्य स्त्रियोंसे आवृत रहकर स्वर्गमें सौ हजार वर्षोंतक आनन्द प्राप्त करता है। दिव्य गन्ध (चन्दन)-से अनुलिप्त होकर तथा दिव्य पुष्पोंसे सुशोभित होकर देवलोकमें क्रीडा करता है और देवताओंके साथ आनन्द प्राप्त करता है। स्वर्गमें सुख भोगने योग्य पुण्योंके निःशेष होनेपर वह धार्मिक राजा होता है और नाना प्रकारके रत्नोंसे समन्वित दिव्य मणिमय स्तम्भों, हीरे एवं वैदूर्यमणिसे विभूषित, उत्तम चित्रों तथा वाहनोंसे अलंकृत और दासी-दाससे समन्वित भवन प्राप्त करता है। वह राजराजेश्वर श्रीसम्पन्न, सभी स्त्रियोंका प्रियकर तथा भोगोंसे युक्त होकर वहाँ (पृथ्वीपर) सौ वर्षसे भी अधिक समयतक जीवित रहता है॥ १६-२०॥
अग्निप्रवेशेऽथ जले अथवाऽनशने कृते।<br>अनिवर्तिका गतिस्तस्य पवनस्याम्बरे यथा ॥ २१ ॥(इस तीर्थमें) अग्नि अथवा जलमें प्रवेश करने अथवा अनशन-व्रत करनेसे वैसी ही पुनरागमनरहित गति होती है, जैसी कि आकाशमें पवनकी होती है (इसका आशय यह है कि शास्त्रविहित तपके रूपमें अग्निप्रवेश आदि तप इस तीर्थमें अक्षय पुण्य देनेवाले होते हैं) ॥ २१ ॥