भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४६२ * कूर्मपुराण *


| पश्चिमे पर्वततटे सर्वपापविनाशनः।<br>ह्रदो जलेश्वरो नाम त्रिषु लोकेषु विश्रुतः॥ २२॥<br><br>तत्र पिण्डप्रदानेन संध्योपासनकर्मणा।<br>दशवर्षाणि पितरस्तर्पिताः स्युर्न संशयः॥ २३॥<br>दक्षिणे नर्मदाकूले कपिलाख्या महानदी।<br>सरलार्जुनसंच्छन्ना नातिदूरे व्यवस्थिता॥ २४॥<br><br>सा तु पुण्या महाभागा त्रिषु लोकेषु विश्रुता।<br>तत्र कोटिशतं साग्रं तीर्थानां तु युधिष्ठिर॥ २५॥<br><br>तस्मिंस्तीर्थे तु ये वृक्षाः पतिताः कालपर्ययात्।<br>नर्मदातोयसंस्पृष्टास्ते यान्ति परमां गतिम्॥ २६॥<br><br>द्वितीया तु महाभागा विशल्यकरणी शुभा।<br>तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा विशल्यो भवति क्षणात्॥ २७॥<br><br>कपिला च विशल्या च श्रूयते राजसत्तम।<br>ईश्वरेण पुरा प्रोक्ता लोकानां हितकाम्यया॥ २८॥<br><br>अनाशकं तु यः कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थे नराधिप।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा रुद्रलोकं स गच्छति॥ २९॥<br><br>तत्र स्नात्वा नरो राजन्नश्वमेधफलं लभेत्।<br>ये वसन्त्युत्तरे कूले रुद्रलोके वसन्ति ते॥ ३०॥<br>सरस्वत्यां च गङ्गायां नर्मदायां युधिष्ठिर।<br>समं स्नानं च दानं च यथा मे शंकरोऽब्रवीत्॥ ३१॥<br><br>परित्यजति यः प्राणान् पर्वतेऽमरकण्टके।<br>वर्षकोटिशतं साग्रं रुद्रलोके महीयते॥ ३२॥<br><br>नर्मदायां जलं पुण्यं फेनोर्मिसमलंकृतम्।<br>पवित्रं शिरसावन्द्य सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ३३॥<br><br>नर्मदा सर्वतः पुण्या ब्रह्महत्यापहारिणी।<br>अहोरात्रोपवासेन मुच्यते ब्रह्महत्यया॥ ३४॥<br><br>जालेश्वरं तीर्थवरं सर्वपापविनाशनम्।<br>तत्र गत्वा नियमवान् सर्वकामाँल्लभेन्नरः॥ ३५॥<br><br>चन्द्रसूर्योपरागे तु गत्वा ह्यमरकण्टकम्।<br>अश्वमेधाद् दशगुणं पुण्यमाप्नोति मानवः॥ ३६॥ | (अमरकण्टक) पर्वतके पश्चिमी किनारेपर सभी पापोंका नाश करनेवाला और तीनों लोकोंमें विख्यात जलेश्वर नामका एक ह्रद (तालाब) है। वहाँ पिण्डदान करने तथा संध्योपासन कर्म करनेसे दस (हजार) वर्षतक पितर तृप्त रहते हैं, इसमें संदेह नहीं॥ २२-२३॥<br><br>नर्मदाके दक्षिण तटके समीपमें ही कपिला नामवाली महानदी स्थित है, जो साल तथा अर्जुनके वृक्षोंसे घिरी हुई है। वह महाभागा (नदी) पवित्र तथा तीनों लोकोंमें विख्यात है। युधिष्ठिर! वहाँ सौ करोड़से भी अधिक तीर्थ हैं। कालक्रमसे जो वृक्ष उस तीर्थमें गिरते हैं, वे नर्मदाके जलका स्पर्श प्राप्त हो जानेके कारण परम गतिको प्राप्त होते हैं। दूसरी महाभागा शुभ नदी विशल्यकरणी है, उस तीर्थमें स्नानकर मनुष्य तत्क्षण ही शल्यसे (सभी प्रकारके पापरूपी काँटोंसे) रहित हो जाता है। राजश्रेष्ठ! यह आप्त श्रुति है कि ईश्वरने इन कपिला तथा विशल्या नामकी दोनों नदियोंको प्राणिमात्रके कल्याण करनेका आदेश पहलेसे ही दे रखा है। नराधिपति!<br>उस तीर्थमें जो (शास्त्रीय विधिसे) अनशनव्रत करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर रुद्रलोकमें जाता है। राजन्! वहाँ स्नानकर मनुष्य अश्वमेधका फल प्राप्त करता है और जो लोग उत्तरी तटपर निवास करते हैं, वे रुद्रलोकमें निवास करते हैं॥ २४-३०॥<br><br>युधिष्ठिर! शंकरने मुझे जैसा बतलाया था, उसके अनुसार गङ्गा, सरस्वती एवं नर्मदामें किया गया स्नान और दान समान फलदायक होता है। जो अमरकण्टक पर्वतपर प्राणोंका परित्याग करता है, वह सौ करोड़ वर्षोंसे भी अधिक समयतक रुद्रलोकमें पूजित होता है। फेन और ऊर्मियों (तरङ्गों)-से अलंकृत नर्मदाके पवित्र जलको पवित्रतापूर्वक सिरसे वन्दित करनेपर अर्थात् सिरपर धारण करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। नर्मदा सभी प्रकारसे पवित्र और ब्रह्महत्याको दूर करनेवाली है। वहाँ एक अहोरात्र उपवास करनेसे ब्रह्महत्या (-के पाप)-से मुक्ति हो जाती है। जालेश्वर नामका श्रेष्ठ तीर्थ सभी पापोंको नष्ट करनेवाला है। वहाँ जाकर नियमसे रहनेवाला मनुष्य सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। चन्द्र तथा सूर्यग्रहणमें अमरकण्टककी यात्रा करनेसे मनुष्य अश्वमेध-यज्ञसे दस गुना अधिक पुण्य प्राप्त करता है॥ ३१-३६॥ |