भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • अध्याय ३९ * | ४६३

एष पुण्यो गिरिवरो देवगन्धर्वसेवितः।
नानाद्रुमलताकीर्णो नानापुष्पोपशोभितः ॥ ३७ ॥

तत्र संनिहितो राजन् देव्या सह महेश्वरः।
ब्रह्मा विष्णुस्तथा चेन्द्रो विद्याधरगणैः सह ॥ ३८ ॥

प्रदक्षिणं तु यः कुर्यात् पर्वतं ह्यमरकण्टकम्।
पौण्डरीकस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥ ३९ ॥

कावेरी नाम विपुला नदी कल्मषनाशिनी।
तत्र स्नात्वा महादेवमर्चयेद् वृषभध्वजम्।
संगमे नर्मदायास्तु रुद्रलोके महीयते ॥ ४० ॥

यह पुण्यप्रद श्रेष्ठ पर्वत (अमरकण्टक) देवताओं तथा गन्धर्वोंद्वारा सेवित, नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे परिपूर्ण एवं विविध प्रकारके पुष्पोंसे सुशोभित है। राजन्! यहाँ देवी (पार्वती)-के साथ महेश्वर और विद्याधरगणोंके साथ ब्रह्मा, विष्णु तथा इन्द्र भी स्थित रहते हैं। जो मानव अमरकण्टक पर्वतकी परिक्रमा करता है, वह पौण्डरीक यज्ञका फल प्राप्त करता है। ऐसे ही कावेरी नामकी एक प्रसिद्ध नदी है। यह विशाल है तथा कल्मषोंका नाश करनेवाली है। उसमें स्नानकर तथा नर्मदाके संगममें स्नान करके वृषभध्वज महादेवकी आराधना करनेसे रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है॥ ३७–४०॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे अष्टात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें अड़तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३८॥


उनतालीसवाँ अध्याय

तीर्थमाहात्म्य-वर्णनके प्रसंगमें नर्मदाके तटवर्ती तीर्थोंका विस्तारसे वर्णन

मार्कण्डेय उवाच
नर्मदा सरितां श्रेष्ठा सर्वपापविनाशिनी।
मुनिभिः कथिता पूर्वमीश्वरेण स्वयम्भुवा ॥ १ ॥
मुनिभिः संस्तुता ह्येषा नर्मदा प्रवरा नदी।
रुद्रगात्राद् विनिष्क्रान्ता लोकानां हितकाम्यया ॥ २ ॥
सर्वपापहरा नित्यं सर्वदेवनमस्कृता।
संस्तुता देवगन्धर्वैरप्सरोभिस्तथैव च ॥ ३ ॥
उत्तरे चैव तत्कूले तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।
नाम्ना भद्रेश्वरं पुण्यं सर्वपापहरं शुभम्।
तत्र स्नात्वा नरो राजन् दैवतैः सह मोदते ॥ ४ ॥

मार्कण्डेयने कहा— मुनियोंने तथा उनसे पूर्व स्वयम्भू ईश्वरने नर्मदाका वर्णन सभी पापोंका नाश करनेवाली सर्वश्रेष्ठ नदीके रूपमें किया है। मुनियोंद्वारा स्तुति करनेपर यह श्रेष्ठ नर्मदा नदी लोगोंके कल्याणकी कामनासे रुद्रके शरीरसे निकली है। यह नित्य सभी पापोंको हरनेवाली है, सभी देवोंद्वारा नमस्कृत है और देवताओं, गन्धर्वों तथा अप्सराओंके द्वारा स्तुत्य है॥ १–३॥
इस (नर्मदा) नदीके उत्तरी किनारेपर तीनों लोकोंमें विख्यात भद्रेश्वरनामका तीर्थ है, जो पवित्र, शुभ तथा सभी पापोंका हरण करनेवाला है। राजन्! वहाँ स्नान करके मनुष्य देवताओंके साथ आनन्दित होता है।

ततो गच्छेत राजेन्द्र तीर्थमाम्नातकेश्वरम्।
तत्र स्नात्वा नरो राजन् गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ५ ॥

राजेन्द्र! वहाँसे आम्रातकेश्वर तीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान करके मनुष्य हजार गौओंके दानका फल प्राप्त करता है॥ ४–५॥

ततोऽङ्गारेश्वरं गच्छेन्नियतो नियताशनः।
सर्वपापविशुद्धात्मा रुद्रलोके महीयते ॥ ६ ॥

तदनन्तर संयमपूर्वक नियत आहार करते हुए अङ्गारेश्वर तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। इससे (तीर्थ-विधि सम्पन्न करनेसे) सभी पापोंका शोधन होता है और रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है॥ ६॥