संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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ततो गच्छेत राजेन्द्र केदारं नाम पुण्यदम् । तत्र स्नात्वोदकं कृत्वा सर्वान् कामानवाप्नुयात् ॥ ७ ॥
पिप्पलेशं ततो गच्छेत् सर्वपापविनाशनम्। तत्र स्नात्वा महाराज रुद्रलोके महीयते ॥ ८ ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र विमलेश्वरमुत्तमम्। तत्र प्राणान् परित्यज्य रुद्रलोकमवाप्नुयात् ॥ ९ ॥
ततः पुष्करिणीं गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत् । स्नातमात्रो नरस्तत्र इन्द्रस्यार्धासनं लभेत् ॥ १०॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र शूलभेदमिति श्रुतम् । तत्र स्नात्वार्चयेद् देवं गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ११॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र बलितीर्थमनुत्तमम्। तत्र स्नात्वा नरो राजन् सिंहासनपतिर्भवेत् ॥ १२ ॥
शक्रतीर्थं ततो गच्छेत् कूले चैव तु दक्षिणे । उपोष्य रजनीमेकां स्नानं कृत्वा यथाविधि ॥ १३ ॥
आराधयेन्महायोगं देवं नारायणं हरिम् । गोसहस्रफलं प्राप्य विष्णुलोकं स गच्छति ॥ १४ ॥ ऋषितीर्थं ततो गत्वा सर्वपापहरं नृणाम्। स्नातमात्रो नरस्तत्र शिवलोके महीयते ॥ १५ ॥
नारदस्य तु तत्रैव तीर्थं परमशोभनम् । स्नातमात्रो नरस्तत्र गोसहस्रफलं लभेत् ॥ १६ ॥
यत्र तप्तं तपः पूर्वं नारदेन सुरर्षिणा । प्रीतस्तस्य ददौ योगं देवदेवो महेश्वरः ॥ १७ ॥
ब्रह्मणा निर्मितं लिङ्गं ब्रह्मोश्वरमिति श्रुतम् । यत्र स्नात्वा नरो राजन् ब्रह्मलोके महीयते ॥ १८ ॥
ऋणतीर्थं ततो गच्छेत् स ऋणान्मुच्यते ध्रुवम् । महेश्वरं ततो गच्छेत् पर्याप्तं जन्मनः फलम् ॥ १९ ॥
राजेन्द्र ! इसके बाद पुण्य प्रदान करनेवाले केदार नामक तीर्थमें जाना चाहिये, वहाँ स्नान करके उदकदान (तर्पण आदि क्रिया) करनेसे सभी कामनाओंकी प्राप्ति होती है। तदनन्तर सभी पापोंका विनाश करनेवाले पिप्पलेश (तीर्थ) - में जाना चाहिये। महाराज! वहाँ स्नान करनेसे रुद्रलोकमें आदर प्राप्त होता है। राजेन्द्र ! तदनन्तर श्रेष्ठ विमलेश्वर (तीर्थ)-में जाना चाहिये। वहाँ प्राणोंका परित्याग करनेसे रुद्रलोक प्राप्त होता है। इसके बाद पुष्करिणीमें जाकर वहाँ स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य इन्द्रका आधा आसन प्राप्त करता है ॥ ७-१० ॥
राजेन्द्र ! ऐसी श्रुति है कि वहाँसे शूलभेद नामके तीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ स्नान करके देवाराधना करनी चाहिये। इससे हजार गौओंके दानका फल प्राप्त होता है। राजेन्द्र! तदनन्तर परम उत्तम बलितीर्थमें जाना चाहिये। राजन् ! वहाँ स्नान करके मनुष्य सिंहासनाधिपति अर्थात् राजा होता है। इसके उपरान्त (बलितीर्थके) दक्षिणी किनारेपर स्थित शक्रतीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ एक रात्रि उपवास करके यथाविधि स्नान करना चाहिये तथा महायोगस्वरूप नारायण हरिकी आराधना करनी चाहिये। इनसे हजार गौओंके दानका फल प्राप्तकर मनुष्य विष्णुलोकमें जाता है ॥ ११-१४॥
तदनन्तर मनुष्योंके समस्त पापोंको हरनेवाले ऋषितीर्थमें जाकर वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य शिवलोकमें पूजित होता है। वहींपर नारदजीका परम शोभन तीर्थ है। वहाँ स्नानमात्र करके मनुष्य हजार गोदानका फल प्राप्त करता है। पूर्वकालमें इसी तीर्थमें देवर्षि नारदने तपस्या की थी और इसी तपस्याके फलस्वरूप देवाधिदेव महेश्वरने प्रसन्न होकर उन्हें योग प्रदान किया था। राजन् ! ब्रह्माके द्वारा स्थापित लिङ्ग ब्रह्मोश्वर नामसे प्रसिद्ध है। इस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ १५-१८ ॥
तदनन्तर ऋणतीर्थमें जाना चाहिये, वहाँ जानेवाला निश्चित ही ऋणसे मुक्त हो जाता है। इसके बाद महेश्वर-तीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ जाकर तीर्थसेवन करनेसे जन्मका अन्तिम फल (महेश्वरका दर्शन) प्राप्त होता है ॥ १९ ॥