भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 475
  • अध्याय ३९ * | ४६५ ---|---

भीमेश्वरं ततो गच्छेत् सर्वव्याधिविनाशनम्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र सर्वदुःखैः प्रमुच्यते ॥ २० ॥ | तदुपरांत सभी व्याधियोंका विनाश करनेवाले भीमेश्वर-तीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य सभी दुःखोंसे मुक्त हो जाता है॥२०॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र पिङ्गलेश्वरमुत्तमम्।<br>अहोरात्रोपवासेन त्रिरात्रफलमाप्नुयात् ॥ २१ ॥<br><br>तस्मिंस्तीर्थे तु राजेन्द्र कपिलां यः प्रयच्छति।<br>यावन्ति तस्या रोमाणि तत्प्रसूतिकुलेषु च।<br>तावद् वर्षसहस्राणि रुद्रलोके महीयते ॥ २२ ॥<br><br>यस्तु प्राणपरित्यागं कुर्यात् तत्र नराधिप।<br>अक्षयं मोदते कालं यावच्चन्द्रदिवाकरौ ॥ २३ ॥<br><br>नर्मदातटमाश्रित्य तिष्ठन्ते ये तु मानवाः।<br>ते मृताः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ॥ २४ ॥ | राजेन्द्र! तदनन्तर उत्तम पिङ्गलेश्वर (तीर्थमें) जाना चाहिये। वहाँ अहोरात्रका उपवास करनेसे त्रिरात्र (उपवास)-का फल प्राप्त होता है। राजेन्द्र! उस तीर्थमें जो कपिला (गौ)-का दान करता है, वह उस कपिलाके तथा उसके कुलमें उत्पन्न संतानोंके शरीरोंपर जितने रोम होते हैं, उतने ही हजार वर्षपर्यन्त रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। नराधिप! वहाँ जो प्राणोंका त्याग करता है, वह जबतक सूर्य-चन्द्रमा हैं, तबतक अक्षय आनन्द प्राप्त करता है। जो मनुष्य नर्मदाके तटका आश्रयकर (वहाँ) रहते हैं, वे मरनेपर पुण्यवान् संतोंके समान स्वर्ग प्राप्त करते हैं॥ २१—२४॥ ततो दीप्तेश्वरं गच्छेद व्यासतीर्थं तपोवनम्।<br>निवर्तिता पुरा तत्र व्यासभीता महानदी।<br>हुंकारिता तु व्यासेन दक्षिणेन ततो गता ॥ २५ ॥<br><br>प्रदक्षिणं तु यः कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थे युधिष्ठिर।<br>प्रीतस्तस्य भवेद् व्यासो वाञ्छितं लभते फलम् ॥ २६ ॥ | तदनन्तर व्यासतीर्थ नामक तपोवनमें स्थित दीप्तेश्वर (तीर्थमें) जाना चाहिये। प्राचीन कालमें वहाँ व्यासजीसे भयभीत होकर महानदी (नर्मदा) वापस हो गयी थी और व्यासके द्वारा हुंकार किये जानेपर (अर्थात् रोष प्रकट करनेपर) वहाँसे दक्षिणकी ओर चली गयी। युधिष्ठिर! उस तीर्थमें जो प्रदक्षिणा करता है, प्रसन्न होकर व्यासजी उसे अभिलषित फल प्रदान करते हैं॥ २५-२६॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र इक्षुनद्यास्तु संगमम्।<br>त्रैलोक्यविश्रुतं पुण्यं तत्र संनिहितः शिवः।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् गाणपत्यमवाप्नुयात् ॥ २७ ॥<br><br>स्कन्दतीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपापप्रणाशनम्<br>आजन्मनः कृतं पापं स्नातस्तीव्रं व्यपोहति ॥ २८ ॥<br><br>तत्र देवाः सगन्धर्वा भवात्मजमनुत्तमम्।<br>उपासते महात्मानं स्कन्दं शक्तिधरं प्रभुम् ॥ २९ ॥<br><br>ततो गच्छेदाङ्गिरसं स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>गोसहस्रफलं प्राप्य रुद्रलोकं स गच्छति ॥ ३० ॥ | राजेन्द्र! तदनन्तर तीनों लोकोंमें विख्यात तथा पवित्र इक्षुनदीके संगमपर जाना चाहिये। वहाँ शिव प्रतिष्ठित हैं। राजन्! वहाँ मनुष्य स्नानकर (शिवका) गाणपत्य-पद प्राप्त करता है। इसके बाद सभी पापोंका विनाश करनेवाले स्कन्दतीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ स्नान करनेसे जन्मभरका किया हुआ पाप शीघ्र ही दूर हो जाता है। वहाँ शंकरजीके पुत्र, श्रेष्ठ महात्मा, शक्तिसम्पन्न प्रभु स्कन्दकी गन्धर्वोंसहित देवता उपासना करते हैं। तदनन्तर आङ्गिरस तीर्थमें जाकर स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नान करनेवाला व्यक्ति हजार गोदानका फल प्राप्त कर रुद्रलोकमें जाता है॥ २७-३०॥ अङ्गिरा यत्र देवेशं ब्रह्मपुत्रो वृषध्वजम्।<br>तपसाराध्य विश्वेशं लब्धवान् योगमुत्तमम् ॥ ३१ ॥<br><br>कुशतीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपापप्रणाशनम्।<br>स्नानं तत्र प्रकुर्वीत अश्वमेधफलं लभेत् ॥ ३२ ॥ | वहाँ ब्रह्माजीके पुत्र (महर्षि) अङ्गिराने तपस्याके द्वारा देवेश वृषध्वज विश्वेश्वरकी आराधना कर उत्तम योग प्राप्त किया था। तदनन्तर समस्त पापोंको नष्ट करनेवाले कुशतीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ स्नान करनेसे व्यक्ति अश्वमेधका फल प्राप्त करता है॥ ३१-३२॥