भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४६६* कूर्मपुराण *
कोटितीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपापप्रणाशनम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राज्यं लभते नात्र संशयः ॥ ३३ ॥इसके पश्चात् सभी पापोंको नष्ट करनेवाले कोटितीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ स्नानकर मनुष्य राज्य प्राप्त कर लेता है, इसमें कोई संदेह नहीं ॥ ३३ ॥
चन्द्रभागां ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र सोमलोके महीयते ॥ ३४ ॥तदुपरान्त चन्द्रभागामें स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्रसे ही मनुष्य सोमलोकमें आदर प्राप्त करता
नर्मदादक्षिणे कूले संगमेश्वरमुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् सर्वयज्ञफलं लभेत् ॥ ३५ ॥है। राजन्! नर्मदाके दक्षिणी किनारेपर उत्तम संगमेश्वर (तीर्थ) है। वहाँ स्नान करके मनुष्य सभी यज्ञोंका
नर्मदायोत्तरे कूले तीर्थं परमशोभनम्।<br>आदित्यायतनं रम्यमीश्वरेण तु भाषितम् ॥ ३६ ॥फल प्राप्त कर लेता है। नर्मदाके उत्तरी किनारेपर अत्यन्त सुन्दर तीर्थ है। वहाँ आदित्यका रमणीय मन्दिर
तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र दत्त्वा दानं तु शक्तितः।<br>तस्य तीर्थप्रभावेण लभते चाक्षयं फलम् ॥ ३७॥है। यह स्वयं ईश्वरने बताया है। राजेन्द्र! वहाँ स्नानकर यथाशक्ति दान देनेपर उस तीर्थके प्रभावसे अक्षय फल
दरिद्रा व्याधिता ये तु ये च दुष्कृतकारिणः।<br>मुच्यन्ते सर्वपापेभ्यः सूर्यलोकं प्रयान्ति च ॥ ३८ ॥प्राप्त होता है तथा जो लोग दरिद्र, व्याधियुक्त और दुष्कर्म करनेवाले हैं, वे सभी पापोंसे मुक्त होकर सूर्यलोकको जाते हैं ॥ ३४-३८ ॥
मार्गेश्वरं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र स्वर्गलोकमवाप्नुयात् ॥ ३९ ॥तदनन्तर मार्गेश्वर (तीर्थ) जाकर वहाँ स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य स्वर्गलोक प्राप्त करता है। इसके पश्चात् पश्चिमकी ओर स्थित श्रेष्ठ
ततः पश्चिमतो गच्छेन्मरुदालयमुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र शुचिर्भूत्वा प्रयत्नतः ॥ ४० ॥मरुदालयमें (वायुके स्थानमें) जाना चाहिये। राजेन्द्र! वहाँ स्नान करके प्रयत्नपूर्वक पवित्र होकर अपनी
काञ्चनं तु द्विजो दद्याद् यथाविभवविस्तरम्।<br>पुष्पकेण विमानेन वायुलोकं स गच्छति ॥ ४१ ॥सम्पत्तिके विस्तारके अनुसार द्विजको स्वर्ण प्रदान करना चाहिये। ऐसा करनेवाला मनुष्य पुष्पक-विमानके द्वारा वायुलोक जाता है ॥ ३९-४१ ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र अहल्यातीर्थमुत्तमम्।<br>स्नानमात्रादप्सरोभिर्मोदते कालमक्षयम् ॥ ४२ ॥राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ अहल्यातीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ स्नानमात्रसे मनुष्य अक्षय (अनन्त) कालतक
चैत्रमासे तु सम्प्राप्ते शुक्लपक्षे त्रयोदशी।<br>कामदेवदिने तस्मिन्नहल्यां यस्तु पूजयेत् ॥ ४३ ॥अप्सराओंके साथ आनन्द करता है। चैत्र शुक्ल पक्षकी त्रयोदशी कामदेवका दिन है। उस दिन इस अहल्यातीर्थमें
यत्र तत्र नरोत्पन्नो वरस्तत्र प्रियो भवेत्।<br>स्त्रीवल्लभो भवेच्छ्रीमान् कामदेव इवापरः ॥ ४४ ॥जो मनुष्य अहल्याकी पूजा करता है, वह जहाँ-कहीं भी उत्पन्न होता है, श्रेष्ठ तथा प्रिय होता है और विशेषरूपसे दूसरे कामदेवके समान हो जानेसे श्री-
अयोध्यां तु समासाद्य तीर्थं शक्रस्य विश्रुतम्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ४५ ॥शोभासम्पन्न तथा स्त्रीवल्लभ होता है। इन्द्रके प्रसिद्ध तीर्थ अयोध्यामें आकर स्नानमात्र करनेवाला मनुष्य हजार गोदानका फल प्राप्त करता है ॥ ४२-४५ ॥
सोमतीर्थं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ४६ ॥तदनन्तर सोमतीर्थमें जाकर वहाँ स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे
सोमग्रहे तु राजेन्द्र पापक्षयकरं भवेत्।<br>त्रैलोक्यविश्रुतं राजन् सोमतीर्थं महाफलम् ॥ ४७ ॥मुक्त हो जाता है। राजन्! तीनों लोकोंमें विख्यात सोमतीर्थ महान् फल देनेवाला है ॥ ४६-४७ ॥