भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय ३९ *४६७
यस्तु चान्द्रायणं कुर्यात् तत्र तीर्थे समाहितः ।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा सोमलोकं स गच्छति ॥ ४८ ॥<br><br>अग्निप्रवेशं यः कुर्यात् सोमतीर्थे नराधिप ।<br>जले चानशनं वापि नासौ मर्त्योऽभिजायते ॥ ४९ ॥<br><br>स्तम्भतीर्थं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत् ।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र सोमलोके महीयते ॥ ५० ॥<br>ततो गच्छेत राजेन्द्र विष्णुतीर्थमनुत्तमम् ।<br>योधनीपुरमाख्यातं विष्णोः स्थानमनुत्तमम् ॥ ५१ ॥<br><br>असुरा योधितस्तत्र वासुदेवेन कोटिशः ।<br>तत्र तीर्थं समुत्पन्नं विष्णुश्रीको भवेदिह ।<br>अहोरात्रोपवासेन ब्रह्महत्यां व्यपोहति ॥ ५२ ॥<br><br>नर्मदादक्षिणे कूले तीर्थं परमशोभनम् ।<br>कामतीर्थमिति ख्यातं यत्र कामोऽर्चयद् भवम् ॥ ५३ ॥<br><br>तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा उपवासपरायणः ।<br>कुसुमायुधरूपेण रुद्रलोके महीयते ॥ ५४ ॥<br>ततो गच्छेत राजेन्द्र ब्रह्मतीर्थमनुत्तमम् ।<br>उमाहकमिति ख्यातं तत्र संतर्पयेत् पितॄन् ॥ ५५ ॥<br><br>पौर्णमास्याममावास्यां श्राद्धं कुर्याद् यथाविधि ।<br>गजरूपा शिला तत्र तोयमध्ये व्यवस्थिता ॥ ५६ ॥<br><br>तस्मिंस्तु दापयेत् पिण्डान् वैशाख्यां तु विशेषतः ।<br>स्नात्वा समाहितमना दम्भमात्सर्यवर्जितः ।<br>तृप्यन्ति पितरस्तस्य यावत् तिष्ठति मेदिनी ॥ ५७ ॥<br>सिद्धेश्वरं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत् ।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र गाणपत्यपदं लभेत् ॥ ५८ ॥<br><br>ततो गच्छेत राजेन्द्र लिङ्गो यत्र जनार्दनः ।<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र विष्णुलोके महीयते ॥ ५९ ॥<br><br>यत्र नारायणो देवो मुनीनां भावितात्मनाम् ।<br>स्वात्मानं दर्शयामास लिङ्गं तत् परमं पदम् ॥ ६० ॥राजेन्द्र! वहाँ चन्द्रग्रहण (-का स्नान) पापोंका क्षय करनेवाला होता है। उस तीर्थमें जो एकाग्र-मनसे चान्द्रायणव्रत करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो विशुद्ध आत्मावाला होकर सोमलोकको जाता है। नराधिप ! जो सोमतीर्थमें अग्निप्रवेश, जलप्रवेश अथवा अनशन करता है, वह मनुष्य पुनः उत्पन्न नहीं होता। तदनन्तर स्तम्भतीर्थमें जाकर वहाँ स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य सोमलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है अर्थात् पूजित होता है ॥ ४८-५० ॥<br><br>राजेन्द्र ! तदनन्तर परम उत्तम विष्णुतीर्थमें जाना चाहिये, वहाँ योधनीपुर नामक विष्णुका श्रेष्ठ स्थान है। वहाँ वासुदेवने करोड़ों असुरोंसे युद्ध किया था। अतः वह स्थान (वासुदेवकी पवित्र संनिधिके कारण) तीर्थ (पुण्यमय) हो गया है। जो मनुष्य उस तीर्थका सेवन करता है, वह विष्णके समान श्रीसम्पन्न हो जाता है। वहाँ एक अहोरात्र उपवास करनेसे ब्रह्महत्या दूर हो जाती है। नर्मदाके दक्षिणी किनारेपर कामतीर्थ नामसे प्रसिद्ध एक अत्यन्त सुन्दर तीर्थ है। वहाँपर कामदेवने शंकरकी आराधना की थी। उस तीर्थमें स्नानकर उपवासपरायण रहनेवाला मनुष्य कामदेवके समान रूपवाला होकर रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ ५१-५४ ॥<br><br>राजेन्द्र ! तदनन्तर उत्तम ब्रह्मतीर्थमें जाना चाहिये। वह तीर्थ 'उमाहक' इस नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ पितरोंका तर्पण करना चाहिये। पूर्णिमा तथा अमावास्याको विधिपूर्वक श्राद्ध करना चाहिये। वहाँ जलके भीतर हाथीके आकारकी शिला स्थित है। उस शिलापर विशेष रूपसे वैशाख पूर्णिमाको स्नानके अनन्तर दम्भ तथा मात्सर्यसे रहित होकर एकाग्रमनसे पिण्डदान करना चाहिये। इससे पिण्डदाताके पितर जबतक पृथ्वी रहती है, तबतक तृप्त रहते हैं ॥ ५५-५७ ॥<br><br>इसके बाद सिद्धेश्वर (तीर्थमें) जाकर वहाँ स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य गाणपत्य-पद प्राप्त करता है। राजेन्द्र! तदनन्तर जहाँ जनार्दन लिङ्गरूपमें प्रतिष्ठित हैं, वहाँ जाना चाहिये। राजेन्द्र ! वहाँ स्नान करनेसे विष्णुलोकमें आदर प्राप्त होता है। यही एकमात्र वह स्थान है, जहाँ नारायणदेवने भक्तिपूर्ण मुनियोंको लिङ्गरूपमें अपना दर्शन कराया था। यह लिङ्ग विष्णुरूप होनेसे परमपद है ॥ ५८-६० ॥