संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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४६८ * कूर्मपुराण *
| अङ्कोलं तु ततो गच्छेत् सर्वपापविनाशनम्।<br>स्नानं दानं च तत्रैव ब्राह्मणानां च भोजनम्।<br>पिण्डप्रदानं च कृतं प्रेत्यानन्तफलप्रदम् ॥ ६१ ॥<br><br>त्रैयम्बकेन तोयेन यश्चरुं श्रपयेत् ततः।<br>अङ्कोलमूले दद्याच्च पिण्डांश्चैव यथाविधि।<br>तारिताः पितरस्तेन तृप्यन्त्याचन्द्रतारकम् ॥ ६२ ॥<br><br>ततो गच्छेत राजेन्द्र तापसेश्वरमुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र प्राप्नुयात् तपसः फलम् ॥ ६३ ॥<br>शुक्लतीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपापविनाशनम्।<br>नास्ति तेन समं तीर्थं नर्मदायां युधिष्ठिर ॥ ६४ ॥<br><br>दर्शनात् स्पर्शनात् तस्य स्नानदानतपोजपात्।<br>होमाच्चैवोपवासाच्च शुक्लतीर्थे महत् फलम् ॥ ६५ ॥<br><br>योजनं तत् स्मृतं क्षेत्रं देवगन्धर्वसेवितम्।<br>शुक्लतीर्थमिति ख्यातं सर्वपापविनाशनम् ॥ ६६ ॥<br><br>पादपाग्रेण दृष्टेन ब्रह्महत्यां व्यपोहति।<br>देव्या सह सदा भर्गस्तत्र तिष्ठति शंकरः ॥ ६७ ॥<br><br>कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां वैशाखे मासि सुव्रत।<br>कैलासाच्चाभिनिष्क्रम्य तत्र संनिहितो हरः ॥ ६८ ॥<br><br>देवदानवगन्धर्वाः सिद्धविद्याधरास्तथा।<br>गणाश्चाप्सरसां नागास्तत्र तिष्ठन्ति पुंगव ॥ ६९ ॥<br>रजकेन यथा वस्त्रं शुक्लं भवति वारिणा।<br>आजन्मनि कृतं पापं शुक्लतीर्थे व्यपोहति।<br>स्नानं दानं तपः श्राद्धमनन्तं तत्र दृश्यते ॥ ७० ॥<br><br>शुक्लतीर्थात् परं तीर्थं न भूतं न भविष्यति।<br>पूर्वे वयसि कर्माणि कृत्वा पापानि मानवः।<br>अहोरात्रोपवासेन शुक्लतीर्थे व्यपोहति ॥ ७१ ॥<br><br>कार्तिकस्य तु मासस्य कृष्णपक्षे चतुर्दशी।<br>घृतेन स्नापयेद् देवमुपोष्य परमेश्वरम्।<br>एकविंशत्कुलोपेतो न च्यवेदेश्वरात् पदात् ॥ ७२ ॥<br><br>तपसा ब्रह्मचर्येण यज्ञदानेन वा पुनः।<br>न तां गतिमवाप्नोति शुक्लतीर्थे तु यां लभेत् ॥ ७३ ॥ | तदनन्तर सभी पापोंको नष्ट करनेवाले अंकोल तीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ किया गया स्नान, दान, ब्राह्मण-भोजन तथा पिण्डदान परलोकमें अनन्त फल प्रदान करनेवाला होता है। जो त्रैयम्बक (त्र्यम्बक) मन्त्रके द्वारा जलसे चरु पकाकर उससे अंकोल (वृक्ष)-के मूलमें यथाविधि पिण्डदान करता है, उसके द्वारा तारे गये पितर जबतक चन्द्रमा तथा तारे रहते हैं, तबतक तृप्त रहते हैं। राजेन्द्र ! तदनन्तर उत्तम तापसेश्वर (तीर्थमें) जाना चाहिये। राजेन्द्र ! वहाँ स्नानमात्र करनेसे व्यक्ति तपस्याका फल प्राप्त करता है ॥ ६१-६३ ॥<br><br>इसके पश्चात् सभी पापोंका नाश करनेवाले शुक्लतीर्थमें जाना चाहिये। युधिष्ठिर ! नर्मदामें उसके समान कोई तीर्थ नहीं है। उस शुक्लतीर्थके दर्शन करने, स्पर्श करने तथा वहाँ स्नान, दान, तप, जप, होम और उपवास करनेसे महान् फल प्राप्त होता है। देवताओं तथा गन्धर्वोंसे सेवित वह एक योजनका क्षेत्र शुक्लतीर्थ इस नामसे विख्यात है। वह समस्त पापोंको नष्ट करनेवाला है। (इस तीर्थमें स्थित) वृक्षके अग्रभागको भी देखनेसे ब्रह्महत्या दूर हो जाती है, वहाँ देवी (पार्वती)-के साथ भर्ग (तेजोमय) शंकर सदैव निवास करते हैं। सुव्रत ! वैशाख मासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको वहाँ कैलाससे आकर हर (शंकर) स्थित होते हैं। श्रेष्ठ! वहाँ देवता, दानव, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर, अप्सराओंके समूह तथा नाग रहते हैं ॥ ६४-६९ ॥<br><br>जिस प्रकार रजक (धोबी)-के द्वारा जलसे (धोनेसे) वस्त्र स्वच्छ (मलरहित) हो जाता है, उसी प्रकार शुक्लतीर्थमें स्नानसे जन्मभरका किया हुआ पाप दूर हो जाता है, वहाँ किया गया स्नान, दान, तप तथा श्राद्ध अनन्त फलदायक हो जाता है। शुक्लतीर्थ-सा परम तीर्थ न कोई हुआ न होगा। मनुष्य पूरी अवस्थाभरमें किये गये पापोंको शुक्लतीर्थमें एक अहोरात्रके उपवाससे दूर कर देता है। कार्तिक मासमें कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको उपवासकर परमेश्वर देवको घृतसे स्नान कराना चाहिये। इससे मनुष्य अपनी इक्कीस पीढ़ियोंके साथ ईश्वरके लोकमें निवास करता है। कभी भी वहाँसे च्युत नहीं होता। शुक्लतीर्थमें जो गति प्राप्त होती है, वह तपस्या, ब्रह्मचर्य, यज्ञ अथवा दानसे प्राप्त नहीं होती ॥ ७०-७३ ॥ |