संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय ३९ * | ४६१ |
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| शुक्लतीर्थं महातीर्थमृषिसिद्धनिषेवितम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् पुनर्जन्म न विन्दति ॥ ७४ ॥<br><br>अयने वा चतुर्दश्यां संक्रान्तौ विषुवे तथा।<br>स्नात्वा तु सोपवासः सन् विजितात्मा समाहितः ॥ ७५ ॥<br><br>दानं दद्याद् यथाशक्ति प्रीयेतां हरिशंकरौ।<br>एतत् तीर्थप्रभावेण सर्वं भवति चाक्षयम् ॥ ७६ ॥<br><br>अनाथं दुर्गतं विप्रं नाथवन्तमथापि वा।<br>उद्वाहयति यस्तीर्थे तस्य पुण्यफलं शृणु ॥ ७७ ॥<br><br>यावत् तद्रोमसंख्या तु तत्प्रसूतिकुलेषु च।<br>तावद् वर्षसहस्राणि रुद्रलोके महीयते ॥ ७८ ॥ | ऋषियों तथा सिद्धोंसे सेवित शुक्लतीर्थ महान् तीर्थ है। राजन्! वहाँ स्नान करके मनुष्य पुनर्जन्म नहीं प्राप्त करता। वहाँ अयन, चतुर्दशी, संक्रान्ति तथा विषुव (योग)-में स्नानोपरान्त उपवास करते हुए विजितात्मा पुरुषको समाहित होकर यथाशक्ति दान देना चाहिये। इससे विष्णु तथा शिव प्रसन्न होते हैं। इस तीर्थके प्रभावसे सब कुछ अक्षय होता है। अनाथ, दुर्गतिको प्राप्त अथवा सनाथ ब्राह्मणका भी इस तीर्थमें विवाह करानेसे जो पुण्य-फल प्राप्त होता है, उसे सुनो—उसके (विवाह सम्पन्न करानेवालेके) शरीरमें तथा उसके कुलकी संतानोंके शरीरमें जितने रोम होते हैं, उतने हजार वर्षोंतक वह रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ ७४-७८॥ |
| ततो गच्छेत राजेन्द्र यमतीर्थमनुत्तमम्।<br>कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां माघमासे युधिष्ठिर ।<br>स्नानं कृत्वा नक्तभोजी न पश्येद् योनिसङ्कटम् ॥ ७९ ॥<br><br>ततो गच्छेत राजेन्द्र एरण्डीतीर्थमुत्तमम्।<br>संगमे तु नरः स्नायादुपवासपरायणः।<br>ब्राह्मणं भोजयेदेकं कोटिर्भवति भोजिताः ॥ ८० ॥<br><br>एरण्डीसंगमे स्नात्वा भक्तिभावात् तु रञ्जितः।<br>मृत्तिकां शिरसि स्थाप्य अवगाह्य च तज्जलम्।<br>नर्मदोदकसम्मिश्रं मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ॥ ८१ ॥ | राजेन्द्र! तदनन्तर परम उत्तम यमतीर्थमें जाना चाहिये। युधिष्ठिर! माघमासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको इस यमतीर्थमें स्नान करके रात्रिमें भोजन करनेवालेको गर्भके संकटका सामना नहीं करना पड़ता। राजेन्द्र! तदुपरान्त श्रेष्ठ एरण्डी-तीर्थमें जाना चाहिये। व्यक्ति वहाँ संगममें स्नानकर उपवासपरायण रहते हुए एक ब्राह्मणको भोजन कराये, इससे करोड़ों (ब्राह्मणों)-को भोजन करानेका फल मिलता है। एरण्डी-संगममें स्नान करके भक्तिभावसे परिपूर्ण होकर मस्तकमें वहाँकी मिट्टी लगानेसे तथा नर्मदाके जलसे मिश्रित उस (एरण्डी-संगम)-के जलमें स्नान करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ७९-८१॥ |
| ततो गच्छेत राजेन्द्र तीर्थं कार्णाटिकेश्वरम्।<br>गङ्गावतरते तत्र दिने पुण्ये न संशयः ॥ ८२ ॥<br><br>तत्र स्नात्वा च पीत्वा च दत्त्वा चैव यथाविधि।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते ॥ ८३ ॥<br><br>नन्दितीर्थं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>प्रीयते तस्य नन्दीशः सोमलोके महीयते ॥ ८४ ॥ | राजेन्द्र! इसके पश्चात् कार्णाटिकेश्वर-तीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ पुण्य (पर्व)-दिनमें निश्चित रूपसे गङ्गा अवतरित होती हैं। वहाँ स्नानकर, (जल) पीकर और विधिपूर्वक दान देनेसे व्यक्ति सभी पापोंसे मुक्त होकर ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। तदनन्तर नन्दितीर्थमें जाकर स्नान करना चाहिये। ऐसा करनेसे उसपर नन्दीश्वर प्रसन्न होते हैं और वह सोमलोकमें आदर प्राप्त करता है॥ ८२-८४॥ |
| ततो गच्छेत राजेन्द्र तीर्थं त्वनरकं शुभम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् नरकं नैव पश्यति ॥ ८५ ॥<br><br>तस्मिंस्तीर्थे तु राजेन्द्र स्वान्यस्थीनि विनिक्षिपेत्।<br>रूपवान् जायते लोके धनभोगसमन्वितः ॥ ८६ ॥ | राजेन्द्र! तदुपरान्त शुभ अनरक नामक तीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान करके मनुष्य नरकका दर्शन नहीं करता। राजेन्द्र! उस तीर्थमें अपनी अस्थियोंके विसर्जनकी प्रेरणा अपने परिजनोंको देनी चाहिये। (वहाँ जिसकी अस्थि विसर्जित होती है) वह जन्मान्तरमें दिव्य रूप एवं विविध ऐश्वर्यसे सम्पन्न होता है॥ ८५-८६॥ |