संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| * अध्याय ३९ * | ४६१ |
|---|---|
| शुक्लतीर्थं महातीर्थमृषिसिद्धनिषेवितम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् पुनर्जन्म न विन्दति ॥ ७४ ॥<br><br>अयने वा चतुर्दश्यां संक्रान्तौ विषुवे तथा।<br>स्नात्वा तु सोपवासः सन् विजितात्मा समाहितः ॥ ७५ ॥<br><br>दानं दद्याद् यथाशक्ति प्रीयेतां हरिशंकरौ।<br>एतत् तीर्थप्रभावेण सर्वं भवति चाक्षयम् ॥ ७६ ॥<br><br>अनाथं दुर्गतं विप्रं नाथवन्तमथापि वा।<br>उद्वाहयति यस्तीर्थे तस्य पुण्यफलं शृणु ॥ ७७ ॥<br><br>यावत् तद्रोमसंख्या तु तत्प्रसूतिकुलेषु च।<br>तावद् वर्षसहस्राणि रुद्रलोके महीयते ॥ ७८ ॥ | ऋषियों तथा सिद्धोंसे सेवित शुक्लतीर्थ महान् तीर्थ है। राजन्! वहाँ स्नान करके मनुष्य पुनर्जन्म नहीं प्राप्त करता। वहाँ अयन, चतुर्दशी, संक्रान्ति तथा विषुव (योग)-में स्नानोपरान्त उपवास करते हुए विजितात्मा पुरुषको समाहित होकर यथाशक्ति दान देना चाहिये। इससे विष्णु तथा शिव प्रसन्न होते हैं। इस तीर्थके प्रभावसे सब कुछ अक्षय होता है। अनाथ, दुर्गतिको प्राप्त अथवा सनाथ ब्राह्मणका भी इस तीर्थमें विवाह करानेसे जो पुण्य-फल प्राप्त होता है, उसे सुनो—उसके (विवाह सम्पन्न करानेवालेके) शरीरमें तथा उसके कुलकी संतानोंके शरीरमें जितने रोम होते हैं, उतने हजार वर्षोंतक वह रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ ७४-७८॥ |
| ततो गच्छेत राजेन्द्र यमतीर्थमनुत्तमम्।<br>कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां माघमासे युधिष्ठिर ।<br>स्नानं कृत्वा नक्तभोजी न पश्येद् योनिसङ्कटम् ॥ ७९ ॥<br><br>ततो गच्छेत राजेन्द्र एरण्डीतीर्थमुत्तमम्।<br>संगमे तु नरः स्नायादुपवासपरायणः।<br>ब्राह्मणं भोजयेदेकं कोटिर्भवति भोजिताः ॥ ८० ॥<br><br>एरण्डीसंगमे स्नात्वा भक्तिभावात् तु रञ्जितः।<br>मृत्तिकां शिरसि स्थाप्य अवगाह्य च तज्जलम्।<br>नर्मदोदकसम्मिश्रं मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ॥ ८१ ॥ | राजेन्द्र! तदनन्तर परम उत्तम यमतीर्थमें जाना चाहिये। युधिष्ठिर! माघमासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको इस यमतीर्थमें स्नान करके रात्रिमें भोजन करनेवालेको गर्भके संकटका सामना नहीं करना पड़ता। राजेन्द्र! तदुपरान्त श्रेष्ठ एरण्डी-तीर्थमें जाना चाहिये। व्यक्ति वहाँ संगममें स्नानकर उपवासपरायण रहते हुए एक ब्राह्मणको भोजन कराये, इससे करोड़ों (ब्राह्मणों)-को भोजन करानेका फल मिलता है। एरण्डी-संगममें स्नान करके भक्तिभावसे परिपूर्ण होकर मस्तकमें वहाँकी मिट्टी लगानेसे तथा नर्मदाके जलसे मिश्रित उस (एरण्डी-संगम)-के जलमें स्नान करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ७९-८१॥ |
| ततो गच्छेत राजेन्द्र तीर्थं कार्णाटिकेश्वरम्।<br>गङ्गावतरते तत्र दिने पुण्ये न संशयः ॥ ८२ ॥<br><br>तत्र स्नात्वा च पीत्वा च दत्त्वा चैव यथाविधि।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते ॥ ८३ ॥<br><br>नन्दितीर्थं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>प्रीयते तस्य नन्दीशः सोमलोके महीयते ॥ ८४ ॥ | राजेन्द्र! इसके पश्चात् कार्णाटिकेश्वर-तीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ पुण्य (पर्व)-दिनमें निश्चित रूपसे गङ्गा अवतरित होती हैं। वहाँ स्नानकर, (जल) पीकर और विधिपूर्वक दान देनेसे व्यक्ति सभी पापोंसे मुक्त होकर ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। तदनन्तर नन्दितीर्थमें जाकर स्नान करना चाहिये। ऐसा करनेसे उसपर नन्दीश्वर प्रसन्न होते हैं और वह सोमलोकमें आदर प्राप्त करता है॥ ८२-८४॥ |
| ततो गच्छेत राजेन्द्र तीर्थं त्वनरकं शुभम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् नरकं नैव पश्यति ॥ ८५ ॥<br><br>तस्मिंस्तीर्थे तु राजेन्द्र स्वान्यस्थीनि विनिक्षिपेत्।<br>रूपवान् जायते लोके धनभोगसमन्वितः ॥ ८६ ॥ | राजेन्द्र! तदुपरान्त शुभ अनरक नामक तीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान करके मनुष्य नरकका दर्शन नहीं करता। राजेन्द्र! उस तीर्थमें अपनी अस्थियोंके विसर्जनकी प्रेरणा अपने परिजनोंको देनी चाहिये। (वहाँ जिसकी अस्थि विसर्जित होती है) वह जन्मान्तरमें दिव्य रूप एवं विविध ऐश्वर्यसे सम्पन्न होता है॥ ८५-८६॥ |
४७० * कूर्मपुराण *
| ततो गच्छेत राजेन्द्र कपिलातीर्थमुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ८७॥<br><br>ज्येष्ठमासे तु सम्प्राप्ते चतुर्दश्यां विशेषतः।<br>तत्रोपोष्य नरो भक्त्या दद्याद् दीपं घृतेन तु ॥ ८८॥<br><br>घृतेन स्नापयेद् रुद्रं सघृतं श्रीफलं दहेत्।<br>घण्टाभरणसंयुक्तां कपिलां वै प्रदापयेत् ॥ ८९॥<br><br>सर्वाभरणसंयुक्तः सर्वदेवनमस्कृतः।<br>शिवतुल्यबलो भूत्वा शिववत् क्रीडते चिरम् ॥ ९०॥ | राजेन्द्र ! तदनन्तर उत्तम कपिलातीर्थमें जाना चाहिये। राजन् ! वहाँ स्नानकर व्यक्ति हजार गोदानका फल प्राप्त करता है। ज्येष्ठ मासके आनेपर विशेषरूपसे चतुर्दशी तिथिको वहाँ उपवास कर मनुष्यको भक्तिपूर्वक घृतका दीप-दान करना चाहिये। घृतसे ही रुद्रका अभिषेक करना चाहिये, घृतयुक्त श्रीफलका हवन करना चाहिये और घंटा तथा आभरणोंसे सम्पन्न कपिला गौका दान करना चाहिये। इससे मनुष्य सभी अलंकारोंसे युक्त, सभी देवताओंके लिये वन्दनीय और शिवके समान तुल्य बलवाला होकर चिरकालतक शिवके समान क्रीडा करता है॥ ८७-९०॥ |
| अङ्गारकदिने प्राप्ते चतुर्थ्यां तु विशेषतः।<br>स्नापयित्वा शिवं दद्याद् ब्राह्मणेभ्यस्तु भोजनम् ॥ ९१॥<br><br>सर्वभोगसमायुक्तो विमानैः सार्वकामिकैः।<br>गत्वा शक्रस्य भवनं शक्रेण सह मोदते ॥ ९२॥<br><br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो धनवान् भोगवान् भवेत्।<br>अङ्गारकनवम्यां तु अमावास्यां तथैव च।<br>स्नापयेत् तत्र यत्नेन रूपवान् सुभगो भवेत् ॥ ९३॥ | विशेषरूपसे मंगलके दिन चतुर्थी पड़नेपर (इस कपिलातीर्थमें) शिवका अभिषेककर ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। ऐसा करनेवाला मनुष्य सभी भोगोंसे समन्वित होकर अपनी इच्छाके अनुसार सर्वत्र अप्रतिहतगति एवं सभी प्रकारकी सुविधाओंसे परिपूर्ण विमानोंके द्वारा इन्द्रके भवनमें जाकर इन्द्रके साथ आनन्दित होता है। स्वर्गसे च्युत होनेपर इस लोकमें भी धनवान् और भोगवान् होता है। अङ्गारक-नवमी (मंगलवारयुक्त नवमी) तथा अमावास्याको भी वहाँ (कपिलातीर्थमें) प्रयत्नपूर्वक अभिषेक करनेसे व्यक्ति रूपवान् तथा सौभाग्यशाली होता है॥ ९१-९३॥ |
| ततो गच्छेत राजेन्द्र गणेश्वरमनुत्तमम्।<br>श्रावणे मासि सम्प्राप्ते कृष्णपक्षे चतुर्दशी ॥ ९४॥<br><br>स्नातमात्रो नरस्तत्र रुद्रलोके महीयते।<br>पितॄणां तर्पणं कृत्वा मुच्यतेऽसावृणत्रयात् ॥ ९५॥ | राजेन्द्र ! तदनन्तर उत्तम गणेश्वर (तीर्थ)-में जाना चाहिये। श्रावण मास आनेपर कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है और पितरोंका तर्पण करनेसे तीनों ऋणोंसे मुक्त हो जाता है॥ ९४-९५॥ |
| गङ्गेश्वरसमीपे तु गङ्गावदनमुत्तमम्।<br>अकामो वा सकामो वा तत्र स्नात्वा तु मानवः।<br>आजन्मजनितैः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः ॥ ९६॥ | गणेश्वर (तीर्थ)-के समीप श्रेष्ठ गङ्गावदन नामक तीर्थ है। वहाँ मनुष्य कामनापूर्वक अथवा निष्कामभावसे स्नान करके जन्मभरके किये गये पापोंसे मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है॥ ९६॥ |
| तस्य वै पश्चिमे देशे समीपे नातिदूरतः।<br>दशाश्वमेधिकं तीर्थं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ ९७॥<br><br>उपोष्य रजनीमेकां मासि भाद्रपदे शुभे।<br>अमावस्यां नरः स्नात्वा पूजयेद् वृषभध्वजम् ॥ ९८॥ | उस (गङ्गावदन)-के पश्चिमी भागमें बहुत दूर नहीं अपितु समीपमें ही तीनों लोकोंमें विख्यात दशाश्वमेधिक नामक तीर्थ है। वहाँ शुभ भाद्रपद मासकी अमावास्याको एक रात्रिका उपवासकर स्नानपूर्वक वृषभध्वजका पूजन करना चाहिये॥ ९७-९८॥ |
- अध्याय ४० * | ४७१ ---|---
काञ्चनेन विमानेन किङ्किणीजालमालिना ।
गत्वा रुद्रपुरं रम्यं रुद्रेण सह मोदते ॥ ९९ ॥
सर्वत्र सर्वदिवसे स्नानं तत्र समाचरेत् ।
पितॄणां तर्पणं कुर्यादश्वमेधफलं लभेत् ॥ १०० ॥ | ऐसा करनेसे किंकिणीके समूहसे अलंकृत सोनेके विमानसे रमणीय रुद्रपुरमें पहुँचने तथा वहाँ रुद्रके साथ आनन्दानुभव करनेका सुअवसर प्राप्त होता है। उस (दशाश्वमेधिक) तीर्थमें सर्वत्र सभी दिनोंमें स्नान करना चाहिये और पितरोंका तर्पण करना चाहिये, इससे अश्वमेधका फल प्राप्त होता है ॥ ९९-१०० ॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें उनतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३९ ॥
चालीसवाँ अध्याय
तीर्थमाहात्म्य-प्रकरणमें नर्मदा तथा उसके समीपवर्ती तीर्थोंकी महिमा, मार्कण्डेय तथा युधिष्ठिरके संवादकी समाप्ति
मार्कण्डेय उवाच
ततो गच्छेत राजेन्द्र भृगुतीर्थमनुत्तमम् ।
तत्र देवो भृगुः पूर्वं रुद्रमाराधयत् पुरा ॥ १ ॥
दर्शनात् तस्य देवस्य सद्यः पापात् प्रमुच्यते ।
एतत् क्षेत्रं सुविपुलं सर्वपापप्रणाशनम् ॥ २ ॥
तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः ।
उपानहोस्तथा युग्मं देयमन्नं सकाञ्चनम् ।
भोजनं च यथाशक्ति तदस्याक्षयमुच्यते ॥ ३ ॥
क्षरन्ति सर्वदानानि यज्ञदानं तपः क्रिया ।
अक्षयं तत् तपस्तप्तं भृगुतीर्थे युधिष्ठिर ॥ ४ ॥
तस्यैव तपसोग्रेण तुष्टेन त्रिपुरारिणा ।
सांनिध्यं तत्र कथितं भृगुतीर्थे युधिष्ठिर ॥ ५ ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र गौतमेश्वरमुत्तमम् ।
यत्राराध्य त्रिशूलाङ्कं गौतमः सिद्धिमाप्नुयात् ॥ ६ ॥
तत्र स्नात्वा नरो राजन् उपवासपरायणः ।
काञ्चनेन विमानेन ब्रह्मलोके महीयते ॥ ७ ॥
वृषोत्सर्गं ततो गच्छेच्छाश्वतं पदमाप्नुयात् ।
न जानन्ति नरा मूढा विष्णोर्मायाविमोहिताः ॥ ८ ॥
मार्कण्डेयजीने कहा— राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ भृगुतीर्थमें जाना चाहिये। प्राचीन कालमें यहाँ महर्षि भृगुदेवने भगवान् रुद्रकी आराधना की थी। उन देवके दर्शन करनेसे तत्काल पापसे मुक्ति हो जाती है। यह क्षेत्र बहुत बड़ा तथा सभी पापोंको नष्ट करनेवाला है। यहाँ स्नान कर व्यक्ति स्वर्ग जाते हैं और यहाँ मृत्युको प्राप्त होनेवालोंका पुनर्जन्म नहीं होता। यहाँ जूतेका जोड़ा तथा सोनेके साथ अन्नका दान करना चाहिये। यथाशक्ति भोजन भी कराना चाहिये। यह सब अक्षय (फलवाला) कहा गया है। युधिष्ठिर! सभी दान, यज्ञ, तप तथा कर्म नष्ट हो जाते हैं (किंतु) भृगुतीर्थमें किया हुआ तप अक्षय होता है। युधिष्ठिर! उन्हीं (महर्षि भृगु)-की उग्र तपस्यासे प्रसन्न होकर त्रिपुरारि भगवान् शंकर भृगुतीर्थमें सदैव संनिहित रहते हैं, यह शास्त्रोंमें कहा गया है ॥ १–५ ॥
राजेन्द्र! तदनन्तर उत्तम गौतमेश्वर (तीर्थ)-में जाना चाहिये। जहाँ त्रिशूलका चिह्न धारण करनेवाले त्रिशूली (भगवान् शंकर)-की आराधनाकर (महर्षि) गौतमने सिद्धि प्राप्त की थी। राजन्! वहाँ (गौतमेश्वर-तीर्थमें) स्नानकर उपवासरत व्यक्ति सोनेके विमानद्वारा ब्रह्मलोक जाता है तथा वहाँ आदर प्राप्त करता है। तदुपरान्त वृषोत्सर्ग-तीर्थकी यात्रा कर शाश्वत पद प्राप्त करना चाहिये। विष्णुकी मायासे मोहित मूढ़ व्यक्ति इस तीर्थको नहीं जानते ॥ ६–८ ॥
४७२ * कूर्मपुराण *
| धौतपापं ततो गच्छेद् धौतं यत्र वृषेण तु।<br>नर्मदायां स्थितं राजन् सर्वपातकनाशनम्।<br>तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा ब्रह्महत्यां व्यपोहति ॥ ९ ॥<br><br>तत्र तीर्थे तु राजेन्द्र प्राणत्यागं करोति यः।<br>चतुर्भुजस्त्रिनेत्रश्च हरतुल्यबलो भवेत् ॥ १० ॥<br><br>वसेत् कल्पायुतं साग्रं शिवतुल्यपराक्रमः।<br>कालेन महता जातः पृथिव्यामेकराड् भवेत् ॥ ११ ॥ | इसके पश्चात् धौतपाप नामक तीर्थमें जाना चाहिये, जहाँ स्वयं वृष (अर्थात् भगवान् धर्म)-ने अपना (पाप) धोया था। राजन्! सभी पातकोंका नाश करनेवाला वह तीर्थ नर्मदामें स्थित है। उस तीर्थमें स्नानकर मनुष्य ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है। राजेन्द्र! उस तीर्थमें जो प्राणोंका त्याग करता है, वह चार भुजावाला, तीन नेत्रोंवाला और शंकरके समान बलवाला होता है। शिवके समान पराक्रमी होकर वह दस हजार कल्पोंसे भी अधिक समयतक शिवलोकमें निवास करता है और बहुत समयके बाद वह पृथ्वीपर एकच्छत्र सम्राट् बनकर उत्पन्न होता है॥ ९-११॥ |
| ततो गच्छेत राजेन्द्र हंसतीर्थमनुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् ब्रह्मलोके महीयते ॥ १२ ॥<br><br>ततो गच्छेत राजेन्द्र सिद्धो यत्र जनार्दनः।<br>वराहतीर्थमाख्यातं विष्णुलोकगतिप्रदम् ॥ १३ ॥<br><br>ततो गच्छेत राजेन्द्र चन्द्रतीर्थमनुत्तमम्।<br>पौर्णमास्यां विशेषेण स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र चन्द्रलोके महीयते ॥ १४ ॥<br><br>ततो गच्छेत राजेन्द्र कन्यातीर्थमनुत्तमम्।<br>शुक्लपक्षे तृतीयायां स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र पृथिव्यामेकराड् भवेत् ॥ १५ ॥<br><br>देवतीर्थं ततो गच्छेत् सर्वदेवनमस्कृतम्।<br>तत्र स्नात्वा च राजेन्द्र देवैः सह मोदते ॥ १६ ॥ | राजेन्द्र! उसके बाद श्रेष्ठ हंस-तीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। राजेन्द्र! वहाँसे विष्णुलोककी गति प्रदान करनेवाले वराहतीर्थ नामसे प्रसिद्ध तीर्थमें जाना चाहिये, जहाँ जनार्दनने सिद्धि प्राप्त की थी। राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ चन्द्रतीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ विशेषरूपसे पौर्णमासीको स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करनेवाला व्यक्ति चन्द्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। राजेन्द्र! इसके पश्चात् अत्युत्तम कन्यातीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ शुक्लपक्षकी तृतीया तिथिको स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करनेसे व्यक्ति पृथ्वीमें एकमात्र सम्राट् होता है। तदनन्तर सभी देवताओंसे वन्दित देवतीर्थमें जाना चाहिये। राजेन्द्र! वहाँ स्नान करनेसे देवताओंके साथ आनन्द (-के अनुभवका अवसर) प्राप्त होता है॥ १२-१६॥ |
| ततो गच्छेत राजेन्द्र शिखितीर्थमनुत्तमम्।<br>यत् तत्र दीयते दानं सर्वं कोटिगुणं भवेत् ॥ १७ ॥<br><br>ततो गच्छेत राजेन्द्र तीर्थं पैतामहं शुभम्।<br>यत् तत्र क्रियते श्राद्धं सर्वं तदक्षयं भवेत् ॥ १८ ॥<br><br>सावित्रीतीर्थमासाद्य यस्तु प्राणान् परित्यजेत्।<br>विधूय सर्वपापानि ब्रह्मलोके महीयते ॥ १९ ॥<br><br>मनोहरं तु तत्रैव तीर्थं परमशोभनम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् देवैः सह मोदते ॥ २० ॥<br><br>ततो गच्छेत राजेन्द्र मानसं तीर्थमुत्तमम्।<br>स्नात्वा तत्र नरो राजन् रुद्रलोके महीयते ॥ २१ ॥ | राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ शिखितीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ जो कुछ दान दिया जाता है, वह सब करोड़ गुना फलवाला हो जाता है। राजेन्द्र! शुभ पैतामह तीर्थमें भी जाना चाहिये। वहाँ जो श्राद्ध किया जाता है, वह अक्षय (फलवाला) हो जाता है। सावित्रीतीर्थमें पहुँचकर जो प्राणोंका परित्याग करता है, वह सभी पापोंको धोकर ब्रह्मलोकमें महिमा प्राप्त करता है। वहीं मनोहर नामक परम सुन्दर तीर्थ है। राजन्! वहाँ स्नानकर मनुष्य देवताओंके साथ आनन्द प्राप्त करता है। राजेन्द्र! तदनन्तर उत्तम मानस तीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान करके मनुष्य रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ १७-२१॥ |
| * अध्याय ४० * | ४७३ |
|---|---|
| स्वर्गबिन्दुं ततो गच्छेत् तीर्थं देवनमस्कृतम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् दुर्गतिं नैव गच्छति॥ २२॥<br><br>अप्सरेशं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>क्रीडते नाकलोकस्थो ह्यप्सरोभिः स मोदते॥ २३॥<br>ततो गच्छेत राजेन्द्र भारभूतिमनुत्तमम्।<br>उपोषितोऽर्चयेदीशं रुद्रलोके महीयते।<br>अस्मिंस्तीर्थे मृतो राजन् गाणपत्यमवाप्नुयात्॥ २४॥<br><br>कार्तिके मासि देवेशमर्चयेत् पार्वतीपतिम्।<br>अश्वमेधात् दशगुणं प्रवदन्ति मनीषिणः॥ २५॥<br><br>वृषभं यः प्रयच्छेत तत्र कुन्देन्दुसप्रभम्।<br>वृषयुक्तेन यानेन रुद्रलोकं स गच्छति॥ २६॥<br><br>एतत् तीर्थं समासाद्य यस्तु प्राणान् परित्यजेत्।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा रुद्रलोकं स गच्छति॥ २७॥<br><br>जलप्रवेशं यः कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थे नराधिप।<br>हंसयुक्तेन यानेन स्वर्गलोकं स गच्छति॥ २८॥<br>एरण्ड्या नर्मदायास्तु संगमं लोकविश्रुतम्।<br>तत्र तीर्थं महापुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्॥ २९॥<br><br>उपवासपरो भूत्वा नित्यं व्रतपरायणः।<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र मुच्यते ब्रह्महत्यया॥ ३०॥<br><br>ततो गच्छेत राजेन्द्र नर्मदोदधिसंगमम्।<br>जमदग्निरिति ख्यातः सिद्धो यत्र जनार्दनः॥ ३१॥<br><br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् नर्मदोदधिसंगमे।<br>त्रिगुणं चाश्वमेधस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥ ३२॥<br>ततो गच्छेत राजेन्द्र पिङ्गलेश्वरमुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् रुद्रलोके महीयते॥ ३३॥<br><br>तत्रोपवासं यः कृत्वा पश्येत विमलेश्वरम्।<br>सप्तजन्मकृतं पापं हित्वा याति शिवालयम्॥ ३४॥ | तदुपरान्त देवताओंसे नमस्कृत स्वर्गबिन्दु नामक तीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्यकी दुर्गति नहीं होती। इसके बाद अप्सरेश-तीर्थमें जाकर वहाँ स्नान करना चाहिये। इससे वह स्वर्गलोकमें निवास करते हुए क्रीड़ा करता है और अप्सराओंके साथ आनन्दित होता है॥ २२-२३॥<br><br>राजेन्द्र! तदनन्तर उत्तम भारभूति नामक तीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ उपवास करते हुए ईश्वरकी आराधना करनेसे रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। राजन्! इस तीर्थमें मरनेवाला (शिवलोकमें) गाणपत्य-पद प्राप्त करता है। (यहाँ) कार्तिक मासमें पार्वतीपति देवताओंके ईश शंकरकी पूजा करनी चाहिये। इसका फल मनीषी लोग अश्वमेधके फलसे भी दस गुना अधिक बताते हैं। जो वहाँ कुन्दपुष्प तथा इन्दु (चन्द्रमा)-के समान (श्वेत) वर्णवाले वृषभका दान करता है, वह वृषयुक्त विमानसे रुद्रलोकमें जाता है। इस तीर्थमें पहुँचकर जो प्राणोंका परित्याग करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो विशुद्ध आत्मावाला होकर रुद्रलोकमें जाता है। नराधिप! इस तीर्थमें जो जलमें प्रवेश (-कर प्राणत्याग) करता है, वह हंसयुक्त विमानसे स्वर्गलोक जाता है॥ २४-२८॥<br><br>एरण्डी तथा नर्मदाका संगम विख्यात है। वहाँ सभी पापोंको नष्ट करनेवाला महान् पुण्यप्रद तीर्थ है। राजेन्द्र! वहाँ स्नानकर उपवास करनेवाला तथा नित्य व्रतपरायण रहनेवाला व्यक्ति ब्रह्महत्या (-के पाप)-से मुक्त हो जाता है। राजेन्द्र! तदनन्तर नर्मदा और सागरके संगम-स्थलमें जाना चाहिये। जहाँ जमदग्नि नामसे विख्यात जनार्दनको सिद्धि प्राप्त हुई थी। राजन्! वहाँ नर्मदा तथा सागरके संगममें स्नान करनेसे मनुष्य अश्वमेधके फलका तिगुना फल प्राप्त करता है॥ २९-३२॥<br><br>राजेन्द्र! तदुपरान्त उत्तम पिङ्गलेश्वर तीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान करके मनुष्य रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। वहाँ उपवास करके जो विमलेश्वरका दर्शन करता है, वह सात जन्मोंमें किये पापोंसे मुक्त होकर शिवलोकमें जाता है॥ ३३-३४॥ |
४७४ * कूर्मपुराण *
ततो गच्छेत राजेन्द्र आलिकातीर्थमुत्तमम्।
उपोष्य रजनीमेकां नियतो नियताशनः।
अस्य तीर्थस्य माहात्म्यान्मुच्यते ब्रह्महत्यया॥ ३५॥
राजेन्द्र! वहाँसे उत्तम आलिका-तीर्थमें जाना चाहिये। इस तीर्थका माहात्म्य यह है कि यहाँ एक रात्रि उपवास करके संयत रहते हुए नियमपूर्वक सात्त्विक आहार करनेसे ब्रह्महत्या (-के पाप)-से मुक्ति मिल जाती है॥ ३५॥
एतानि तव संक्षेपात् प्राधान्यात् कथितानि तु।
न शक्या विस्तराद् वक्तुं संख्या तीर्थेषु पाण्डव॥ ३६॥
पाण्डव! संक्षेपमें मैंने प्रधान-प्रधान तीर्थोंको बतलाया। विस्तारपूर्वक तीर्थोंकी संख्याका वर्णन नहीं किया जा सकता॥ ३६॥
एषा पवित्रा विमला नदी त्रैलोक्यविश्रुता।
नर्मदा सरितां श्रेष्ठा महादेवस्य वल्लभा॥ ३७॥
मनसा संस्मरेद्यस्तु नर्मदां वै युधिष्ठिर।
चान्द्रायणशतं साग्रं लभते नात्र संशयः॥ ३८॥
अश्रद्दधानाः पुरुषा नास्तिक्यं घोरमाश्रिताः।
पतन्ति नरके घोरे इत्याह परमेश्वरः॥ ३९॥
नर्मदां सेवते नित्यं स्वयं देवो महेश्वरः।
तेन पुण्या नदी ज्ञेया ब्रह्महत्यापहारिणी॥ ४०॥
यह पवित्र तथा स्वच्छ जलवाली नर्मदा नदी तीनों लोकोंमें विख्यात है। नर्मदा सभी नदियोंमें श्रेष्ठ है और महादेवको अत्यन्त प्रिय है। युधिष्ठिर! जो मनसे भी नर्मदाका स्मरण करता है, वह सौ चान्द्रायण व्रतोंसे भी अधिक फल प्राप्त करता है, इसमें संशय नहीं है। परमेश्वरका यह कहना है कि श्रद्धासे रहित तथा घोर नास्तिकताका आश्रय लेनेवाले पुरुष भीषण नरकमें गिरते हैं (इसलिये ऐसे पुरुषोंको नरकसे बचनेके लिये नर्मदाका दर्शन-सेवन करना चाहिये)। इसी कारण स्वयं देव महेश्वर हम लोगोंको प्रेरणा देनेके लिये नित्य नर्मदाका सेवन करते हैं, अतः इस पवित्र नदीको ब्रह्महत्या-जैसे पापोंको दूर करनेवाली समझना चाहिये (तथा पूर्ण निष्ठाके साथ इसका दर्शन, सेवन अवश्य करना चाहिये)॥ ३७-४०॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे चत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४०॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिभागमें चालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४०॥
एकतालीसवाँ अध्याय
तीर्थमाहात्म्य-प्रकरणमें नैमिषारण्य तथा जयेश्वर-तीर्थकी महिमा, जयेश्वर-तीर्थमें महर्षि शिलादके पुत्र नन्दीकी तपस्या तथा उनके गणाधिपति होनेका आख्यान
सूत उवाच
इदं त्रैलोक्यविख्यातं तीर्थं नैमिशमुत्तमम्।
महादेवप्रियकरं महापातकनाशनम्॥ १॥
महादेवं दिदृक्षूणामृषीणां परमेष्ठिनाम्।
ब्रह्मणा निर्मितं स्थानं तपस्तप्तुं द्विजोत्तमाः॥ २॥
मरीचयोऽत्रयो विप्रा वसिष्ठाः क्रतवस्तथा।
भृगवोऽङ्गिरसः पूर्वा ब्रह्माणं कमलोद्भवम्॥ ३॥
समेत्य सर्ववरदं चतुर्मूर्तिं चतुर्मुखम्।
पृच्छन्ति प्रणिपत्यैनं विश्वकर्माणमच्युतम्॥ ४॥
सूतजीने कहा— तीनों लोकोंमें विख्यात यह उत्तम नैमिष-तीर्थ महादेवको प्रिय लगनेवाला तथा महापातकोंको नष्ट करनेवाला है। द्विजोत्तमो! ब्रह्माने इस नैमिष-तीर्थकी सृष्टि उन परमेष्ठी (ब्रह्मनिष्ठ) ऋषियोंके लिये की है जो महादेवका दर्शन करनेकी इच्छासे तपस्या करना चाहते हैं॥ १-२॥
ब्राह्मणो! प्राचीन कालमें मरीचि, अत्रि, वसिष्ठ, क्रतु, भृगु तथा अंगिराके वंशमें उत्पन्न ऋषियोंने सभी प्रकारका वर देनेवाले, कमलसे उत्पन्न चतुर्मूर्ति, चतुर्मुख, अच्युत, विश्वकर्मा ब्रह्माके पास जाकर प्रणामकर उनसे पूछा—॥ ३-४॥
| * अध्याय ४१ * | ४७५ |
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| षट्कुलीया ऊचुः<br>भगवन् देवमीशानं भर्गमेकं कपर्दिनम्।<br>केनोपायेन पश्यामो ब्रूहि देवनमस्कृतम्॥ ५ ॥<br><br>ब्रह्मोवाच<br>सत्रं सहस्त्रमासध्वं वाङ्मनोदोषवर्जिताः।<br>देशं च वः प्रवक्ष्यामि यस्मिन् देशे चरिष्यथ॥ ६ ॥<br><br>उक्त्वा मनोमयं चक्रं स सृष्ट्वा तानुवाच ह।<br>क्षिप्तमेतन्मया चक्रमनुव्रजत मा चिरम्।<br>यत्रास्य नेमिः शीर्येत स देशः पुरुषर्षभाः॥ ७ ॥<br>ततो मुमोच तच्चक्रं ते च तत्समनुव्रजन्।<br>तस्य वै व्रजतः क्षिप्रं यत्र नेमिरशीर्यत।<br>नैमिशं तत्स्मृतं नाम्ना पुण्यं सर्वत्र पूजितम्॥ ८ ॥<br><br>सिद्धचारणसंकीर्णं यक्षगन्धर्वसेवितम्।<br>स्थानं भगवतः शम्भोरेतन्नैमिषमुत्तमम्॥ ९ ॥<br><br>अत्र देवाः सगन्धर्वाः सयक्षोरगराक्षसाः।<br>तपस्तप्त्वा पुरा देवा लेभिरे प्रवरान् वरान्॥ १० ॥<br><br>इमं देशं समाश्रित्य षट्कुलीयाः समाहिताः।<br>सत्रेणाराध्य देवेशं दृष्टवन्तो महेश्वरम्॥ ११॥<br><br>अत्र दानं तपस्तप्तं स्नानं जप्यादिकं च यत्।<br>एकैकं पावयेत् पापं सप्तजन्मकृतं द्विजाः॥ १२॥<br><br>अत्र पूर्वं स भगवानृषीणां सत्रमासताम्।<br>प्रोवाच वायुर्ब्रह्माण्डं पुराणं ब्रह्मभाषितम्॥ १३॥<br><br>अत्र देवो महादेवो रुद्राण्या किल विश्वकृत्।<br>रमतेऽद्यापि भगवान् प्रमथैः परिवारितः॥ १४॥<br><br>अत्र प्राणान् परित्यज्य नियमेन द्विजातयः।<br>ब्रह्मलोकं गमिष्यन्ति यत्र गत्वा न जायते॥ १५॥ | **षट्कुलोत्पन्न ऋषियोंने कहा—**भगवन्! यह बतलायें कि हम किस उपायसे देवताओंद्वारा नमस्कृत, अद्वितीय तेजस्वी कपर्दी ईशानदेवका दर्शन करें॥ ५॥<br><br>**ब्रह्माजी बोले—**आप लोग वाणी तथा मनके दोषोंसे रहित होकर हजार यज्ञविशेष-सत्र सम्पन्न करें। मैं वह देश आप लोगोंको बतलाता हूँ, जहाँ आप यज्ञ करेंगे। ऐसा कहकर उन (ब्रह्मा)-ने एक मनोमय चक्रका निर्माण करके उन (ऋषियों)-से कहा—मेरे द्वारा छोड़े गये इस चक्रका आप लोग अनुगमन करें, विलम्ब न करें। श्रेष्ठ पुरुषो! जहाँ इस (चक्र)-की नेमि शीर्ण होगी (गिरकर टूटेगी) वही स्थान तपस्या एवं यज्ञ करनेका शुभ स्थान होगा॥ ६-७॥<br><br>तब उन्होंने (ब्रह्माने) उस (मनोमय) चक्रको छोड़ा और वे ऋषि उस चक्रके पीछे-पीछे चलने लगे। शीघ्रतापूर्वक जा रहे उस चक्रकी नेमि जहाँ (शीर्ण हुई) गिरी, वह स्थान नैमिश नामसे प्रसिद्ध हुआ और पवित्र तथा सर्वत्र पूजित हुआ। सिद्धों तथा चारणोंसे परिपूर्ण, यक्षों-गन्धर्वोंसे सेवित यह उत्तम नैमिश नामक स्थान भगवान् शम्भुका स्थान है। प्राचीन कालमें यहाँपर तपस्या करके देवताओं, गन्धर्वों, यक्षों, नागों और राक्षसोंने श्रेष्ठ वरोंको प्राप्त किया था॥ ८-१०॥<br><br>(मरीचि, अत्रि, वसिष्ठ, क्रतु, भृगु तथा अंगिरा—इन) छः कुलोंके ऋषियोंने इस देशमें रहते हुए एकाग्रतापूर्वक यज्ञानुष्ठानद्वारा देवेशकी आराधना कर महेश्वरका दर्शन किया था। द्विजो! यहाँ किया गया दान, तप, स्नान तथा जप आदि कोई भी शुभ कर्म अकेला ही सात जन्मोंमें किये पापको नष्ट कर उसे पवित्र बना देता है। प्राचीन कालमें इसी तीर्थमें भगवान् वायुने यज्ञ करनेवाले ऋषियोंको ब्रह्माजीद्वारा कहे गये ब्रह्माण्डपुराणको सुनाया था। आज भी यहाँ विश्वकी सृष्टि करनेवाले भगवान् महादेव प्रमथगणोंसे घिरे रहकर रुद्राणीके साथ रमण करते हैं। (अपनी अन्तिम अवस्थामें) नियमपूर्वक यहाँ निवासकर प्राणोंका परित्याग करनेवाले द्विजाति लोग उस ब्रह्मलोकमें जाते हैं, जहाँ जाकर पुनः जन्म नहीं लेना पड़ता॥ ११-१५॥ |
| ४७६ | * कूर्मपुराण * |
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| अन्यच्च तीर्थप्रवरं जाप्येश्वरमितिश्रुतम्।<br>जजाप रुद्रमनिशं यत्र नन्दी महागणः ॥ १६ ॥<br><br>प्रीतस्तस्य महादेवो देव्या सह पिनाकधृक् ।<br>ददावात्मसमानत्वं मृत्युवञ्चनमेव च ॥ १७ ॥<br>अभूदृषिः स धर्मात्मा शिलादो नाम धर्मवित्।<br>आराधयन्महादेवं पुत्रार्थं वृषभध्वजम् ॥ १८ ॥<br><br>तस्य वर्षसहस्रान्ते तप्यमानस्य विश्वकृत्।<br>शर्वः सोमो गणवृतो वरदोऽस्मीत्यभाषत ॥ १९ ॥<br><br>स वव्रे वरमीशानं वरेण्यं गिरिजापतिम्।<br>अयोनिजं मृत्युहीनं देहि पुत्रं त्वया समम् ॥ २० ॥<br><br>तथास्त्वित्याह भगवान् देव्या सह महेश्वरः ।<br>पश्यतस्तस्य विप्रर्षेरन्तर्धानं गतो हरः ॥ २१ ॥<br>ततो यियक्षुः स्वां भूमिं शिलादो धर्मवित्तमः ।<br>चकर्ष लाङ्गलेनोर्वीं भित्त्वादृश्यत शोभनः ॥ २२ ॥<br><br>संवर्तकानलप्रख्यः कुमारः प्रहसन्निव ।<br>रूपलावण्यसम्पन्नस्तेजसा भासयन् दिशः ॥ २३ ॥<br><br>कुमारतुल्योऽप्रतिमो मेघगम्भीरया गिरा।<br>शिलादं तात तातेति प्राह नन्दी पुनः पुनः ॥ २४ ॥<br><br>तं दृष्ट्वः नन्दनं जातं शिलादः परिषस्वजे।<br>मुनिभ्यो दर्शयामास ये तदाश्रमवासिनः ॥ २५ ॥<br>जातकर्मादिकाः सर्वाः क्रियास्तस्य चकार ह।<br>उपनीय यथाशास्त्रं वेदमध्यापयत् सुतम् ॥ २६ ॥<br><br>अधीतवेदो भगवान् नन्दी मतिमनुत्तमाम्।<br>चक्रे महेश्वरं द्रष्टुं जेष्ये मृत्युमिति प्रभुम् ॥ २७ ॥<br><br>स गत्वा सरितं पुण्यामेकाग्रश्रद्धयान्वितः ।<br>जजाप रुद्रमनिशं महेशासक्तमानसः ॥ २८ ॥<br><br>तस्य कोट्यां तु पूर्णायां शंकरो भक्तवत्सलः ।<br>आगत्य साम्बः सगणो वरदोऽस्मीत्युवाच ह ॥ २९ ॥ | एक दूसरा तीर्थोंमें श्रेष्ठ तीर्थ है, जो जाप्येश्वर नामसे प्रसिद्ध है। जहाँ महान् गण नन्दीने निरन्तर रुद्रका जप किया था और पिनाक धारण करनेवाले रुद्र-महादेव देवीके साथ उनपर प्रसन्न हुए और उन्होंने उन्हें (नन्दीको) अपनी समानता तथा मृत्युसे बचनेका वर प्रदान किया था॥ १६-१७॥<br><br>(इन नन्दीके प्रादुर्भावकी कथा इस प्रकार है—) शिलाद नामके एक धर्मज्ञ धर्मात्मा ऋषि हुए, उन्होंने पुत्रप्राप्तिके लिये वृषभध्वज महादेवकी आराधना की। तप करते हुए उन्होंने जब हजार वर्षका समय व्यतीत कर दिया, तब गणोंसे आवृत विश्वकर्ता सोम शर्वने 'मैं वर दूँगा' इस प्रकार कहा। उन्होंने (शिलाद ऋषिने) वरेण्य गिरिजापति ईशानसे वर माँगा कि मुझे आप मृत्युसे रहित अपने ही समान अयोनिज पुत्र प्रदान करें। देवीके साथ भगवान् महेश्वरने—'ऐसा ही हो' कहा और उन विप्रर्षिके देखते-देखते वे अन्तर्धान हो गये॥ १८-२१॥<br><br>तदनन्तर धर्मज्ञ शिलादने अपनी भूमिमें यज्ञ करनेकी इच्छासे हलद्वारा पृथ्वीको जोता। पृथ्वीका भेदन करनेपर उन्होंने संवर्तक नामक अग्निके समान, रूप तथा लावण्यसे सम्पन्न और अपने तेजसे दिशाओंको प्रकाशित करते हुए, हँसते हुए एक सुन्दर कुमारको देखा। कुमार (कार्तिकेय)-के समान उन अतुलनीय नन्दी (नामक कुमार)-ने मेघ-सदृश गम्भीर वाणीमें शिलादको बार-बार 'तात' 'तात' इस प्रकारसे कहा। आविर्भूत हुए उस पुत्रको देखकर शिलादने उसका आलिंगन किया और उस आश्रममें रहनेवाले जो मुनि थे, उन्हें भी उसे दिखाया॥ २२-२५॥<br><br>अनन्तर उन्होंने (शिलाद ऋषिने) उन नन्दीके जातकर्म आदि सभी संस्कार किये और शास्त्रविधिसे उपनयन-संस्कार कर वेद पढ़ाया। वेदका अध्ययन कर भगवान् नन्दीने यह श्रेष्ठ विचार किया कि प्रभु महेश्वरका दर्शन कर मैं मृत्युको जीतूँगा। उन्होंने पवित्र नदीके तटपर जाकर एकाग्र तथा श्रद्धायुक्त होकर महेश्वरमें अपने मनको आसक्तकर निरन्तर रुद्रका जप करना प्रारम्भ कर दिया। उनके द्वारा एक करोड़ जपकी संख्या पूर्ण होनेपर भक्तवत्सल शंकरने अपने गणों तथा पार्वतीके साथ वहाँ आकर 'मैं वर दूँगा' इस प्रकार कहा॥ २६-२९॥ |
* अध्याय ४१ *
| स वव्रे पुनरेवाहं जपेयं कोटिमीश्वरम्।<br>तावदायुर्र्महादेव देहीति वरमीश्वर ॥ ३० ॥ | नन्दीने वर माँगते हुए कहा—ईश्वर! मैं पुनः ईश्वरका एक करोड़ जप करना चाहता हूँ, अतः महादेव! आप मुझे उतनी ही लम्बी आयु प्रदान करें। 'ऐसा ही हो' यह कहकर वे देव अन्तर्धान हो गये। भगवान् नन्दीने पुनः उनमें मन लगाते हुए एक करोड़ जप किया। |
| एवमस्त्विति सम्प्रोच्य देवोऽप्यन्तरधीयत।<br>जजाप कोटिं भगवान् भूयस्तद्गतमानसः ॥ ३१ ॥ | दो करोड़ जप पूरा होनेपर पुनः भूतगणोंसे आवृत वृषध्वज (शंकर)-ने आकर 'मैं वर प्रदान करूँगा' ऐसा कहा। (तब नन्दीने कहा—) प्रभु शंकर! मैं पुनः तीसरी बार एक करोड़ जप करना चाहता हूँ। 'ऐसा ही हो' कहकर विश्वात्मा देव पुनः अन्तर्धान हो गये। |
| द्वितीयायां च कोट्यां वै सम्पूर्णायां वृषध्वजः।<br>आगत्य वरदोऽस्मीति प्राह भूतगणैर्वृतः ॥ ३२ ॥ | तीन करोड़ जप पूरा होनेपर भूतगणोंसे आवृत, अत्यन्त प्रसन्न-मन, देव (शंकर)-ने वहाँ आकर कहा—'मैं वर प्रदान करूँगा।' (इसपर नन्दीने कहा—) मैं पुनः आपके तेजसे सम्पन्न होकर करोड़की संख्यामें जप करना चाहता हूँ। ऐसा कहे जानेपर भगवान्ने कहा—अब तुम्हें आगे जप नहीं करना है॥ ३०-३५॥ |
| तृतीयां जप्तुमिच्छामि कोटिं भूयोऽपि शंकर।<br>तथास्त्वित्याह विश्वात्मा देवोऽप्यन्तरधीयत ॥ ३३ ॥ | तुम जरासे (वृद्धावस्थासे) मुक्त और अमर होकर सदा मेरे समीपमें स्थित रहोगे। तुम देवी (पार्वती)-के पुत्र, महागणपति (मेरे गणके अधिपति) एवं महेश्वर होओगे! तुम योगीश्वर, योगनेता, गणोंके ईश्वरोंके भी ईश्वर, सभी लोकोंके अधिपति, श्रीमान् सर्वज्ञ और मेरे बलसे सम्पन्न रहोगे। मेरा दिव्य ज्ञान तुम्हें हस्तामलकवत् प्राप्त रहेगा। तुम महाप्रलयपर्यन्त (गणेश्वर एवं नन्दीके रूपमें) स्थित रहोगे और उसके बाद मेरे पदको प्राप्त करोगे॥ ३६-३८॥ |
| कोटित्रयेऽथ सम्पूर्णे देवः प्रीतमना भृशम्।<br>आगत्य वरदोऽस्मीति प्राह भूतगणैर्वृतः ॥ ३४ ॥ | ऐसा कहकर महादेव शंकरने गणोंको बुलाकर उन नन्दीश्वरको गणोंके अधिपति के पदपर अत्यन्त उपयुक्त अभिषेक-विधिसे नियुक्त कर दिया। पिनाक धारण करनेवाले शंकरने स्वयं ही मरुद्गणोंकी शुभ कन्या जो 'सुयशा' इस नामसे विख्यात थी, उसके साथ इनका विवाह कर दिया॥ ३९-४०॥ |
| जपेयं कोटिमन्यां वै भूयोऽपि तव तेजसा।<br>इत्युक्ते भगवानाह न जप्तव्यं त्वया पुनः ॥ ३५ ॥<br>अमरो जरया त्यक्तो मम पार्श्वगतः सदा।<br>महागणपतिर्देव्याः पुत्रो भव महेश्वरः ॥ ३६ ॥ | यह जप्येश्वर नामक स्थान देवाधिदेव शूली शंकरका स्थान है। यहाँ जहाँ कहीं भी शरीर त्याग करनेवाला रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ ४१॥ |
| योगीश्वरो योगनेता गणानामीश्वरेश्वरः।<br>सर्वलोकाधिपः श्रीमान् सर्वज्ञो मद्बलान्वितः ॥ ३७ ॥ | |
| ज्ञानं तन्मामकं दिव्यं हस्तामलकवत् तव।<br>आभूतसम्प्लवस्थायी ततो यास्यसि मत्पदम् ॥ ३८ ॥ | |
| एतदुक्त्वा महादेवो गणानाहूय शंकरः।<br>अभिषेकेण युक्तेन नन्दीश्वरमयोजयत् ॥ ३९ ॥ | |
| उद्वाहयामास च तं स्वयमेव पिनाकधृक्।<br>मरुतां च शुभां कन्यां सुयशेति च विश्रुताम् ॥ ४० ॥ | |
| एतज्जप्येश्वरं स्थानं देवदेवस्य शूलिनः।<br>यत्र तत्र मृतो मर्त्यो रुद्रलोके महीयते ॥ ४१ ॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें एकतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४१॥
| ४७८ | * कूर्मपुराण * |
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बयालीसवाँ अध्याय
विविध शैव-तीर्थोंके माहात्म्यका निरूपण, तीर्थोंके अधिकारी तथा तीर्थ-माहात्म्यका उपसंहार
| सूत उवाच | सूतजीने कहा— ज्येष्ठेश्वरके समीपमें ही पञ्चनद नामका एक दूसरा श्रेष्ठ तीर्थ है, जो पवित्र तथा सभी पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ तीन रात्रिपर्यन्त उपवासकर महेश्वरकी पूजा करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा विशुद्ध आत्मावाला होकर रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। अमित तेजस्वी शंकरका एक दूसरा श्रेष्ठ तीर्थ है जो महाभैरव नामसे कहा गया है, वह महापातकोंका नाश करनेवाला है। वितस्ता नामक श्रेष्ठ नदी तीर्थोंमें परम तीर्थ है, वह सभी पापोंको हरनेवाली, पवित्र और साक्षात् पार्वतीरूप ही है॥ १-४॥ | | अन्यच्च तीर्थप्रवरं ज्येष्ठेश्वरसमीपतः।<br>नाम्ना पञ्चनदं पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्॥ १ ॥ | | | त्रिरात्रोपोषितस्तत्र पूजयित्वा महेश्वरम्।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा रुद्रलोके महीयते॥ २ ॥ | | | अन्यच्च तीर्थप्रवरं शंकरस्यामितौजसः।<br>महाभैरवमित्युक्तं महापातकनाशनम्॥ ३ ॥ | | | तीर्थानां च परं तीर्थं वितस्ता परमा नदी।<br>सर्वपापहरा पुण्या स्वयमेव गिरीन्द्रजा॥ ४ ॥ | | | तीर्थं पञ्चतपं नाम शम्भोरमिततेजसः।<br>यत्र देवादिदेवेन चक्रार्थं पूजितो भवः॥ ५ ॥ | अमित तेजस्वी शम्भुका पञ्चतप नामका एक तीर्थ है, जहाँ देवोंके आदिदेव (विष्णु)-ने चक्र-प्राप्तिके लिये शंकरकी पूजा की थी। वहाँ (पञ्चनद तीर्थमें) किया गया पिण्डदान आदि कर्म परलोकमें अनन्त फल प्रदान करनेवाला होता है। वहाँ संकल्पपूर्वक नियमसे निवास करते हुए यथासमय प्राण-त्याग करनेवाला ब्रह्मलोकमें महिमा प्राप्त करता है॥ ५-६॥ | | पिण्डदानादिकं तत्र प्रेत्यानन्तफलप्रदम्।<br>मृतस्तत्रापि नियमाद् ब्रह्मलोके महीयते॥ ६ ॥ | | | कायावरोहणं नाम महादेवालयं शुभम्।<br>यत्र माहेश्वरा धर्मा मुनिभिः सम्प्रवर्तिताः॥ ७ ॥ | कायावरोहण नामक महादेवका एक शुभ स्थान (तीर्थ) है, जहाँ मुनियोंने माहेश्वर धर्मोंका प्रवर्तन किया था। वहाँ किया गया श्राद्ध, दान, तप, होम तथा उपवास अक्षय (फल प्रदान करनेवाला) होता है। वहाँ जो प्राण परित्याग करता है, वह रुद्रलोकमें जाता है। एक दूसरा श्रेष्ठ तीर्थ है, जो कन्यातीर्थ इस नामसे विख्यात है। वहाँ जाकर प्राणोंका परित्याग करनेसे शाश्वत लोकोंकी प्राप्ति होती है। जमदग्निके पुत्र अक्लिष्टकर्मा परशुरामका भी एक शुभ तीर्थ है। उस तीर्थ-श्रेष्ठमें स्नान करनेसे हजार गोदानका फल प्राप्त होता है। महाकाल इस नामसे विख्यात तीर्थ तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। वहाँ जाकर प्राणोंका परित्याग करनेसे गाणपत्य-पद प्राप्त होता है। श्रेष्ठ नकुलीश्वर तीर्थ गुह्यस्थानोंमें भी अत्यन्त गुह्य है। वहाँ श्रीमान् भगवान् नकुलीश्वर विराजमान रहते हैं॥ ७-१२॥ | | श्राद्धं दानं तपो होम उपवासस्तथाक्षयः।<br>परित्यजति यः प्राणान् रुद्रलोकं स गच्छति॥ ८ ॥ | | | अन्यच्च तीर्थप्रवरं कन्यातीर्थमिति श्रुतम्।<br>तत्र गत्वा त्यजेत् प्राणाँल्लोकान् प्राप्नोति शाश्वतान्॥ ९ ॥ | | | जामदग्न्यस्य तु शुभं रामस्याक्लिष्टकर्मणः।<br>तत्र स्नात्वा तीर्थवरे गोसहस्रफलं लभेत्॥ १० ॥ | | | महाकालमिति ख्यातं तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।<br>गत्वा प्राणान् परित्यज्य गाणपत्यमवाप्नुयात्॥ ११ ॥ | | | गुह्याद् गुह्यतमं तीर्थं नकुलीश्वरमुत्तमम्।<br>तत्र संनिहितः श्रीमान् भगवान् नकुलीश्वरः॥ १२ ॥ | |
- अध्याय ४२ * ४७९
| हिमवच्छिखरे रम्ये गङ्गाद्वारे सुशोभने।<br>देव्या सह महादेवो नित्यं शिष्यैश्च संवृतः ॥ १३॥<br><br>तत्र स्नात्वा महादेवं पूजयित्वा वृषध्वजम्।<br>सर्वपापैर्विमुच्येत मृतस्तज्ज्ञानमाप्नुयात् ॥ १४॥<br>अन्यच्च देवदेवस्य स्थानं पुण्यतमं शुभम्।<br>भीमेश्वरमिति ख्यातं गत्वा मुञ्चति पातकम्॥ १५॥<br><br>तथान्यच्चण्डवेगायाः सम्भेदः पापनाशनः।<br>तत्र स्नात्वा च पीत्वा च मुच्यते ब्रह्महत्यया ॥ १६॥<br>सर्वेषामपि चैतेषां तीर्थानां परमा पुरी।<br>नाम्ना वाराणसी दिव्या कोटिकोट्ययुताधिका ॥ १७॥<br><br>तस्याः पुरस्तान्माहात्म्यं भाषितं वो मया त्विह।<br>नान्यत्र लभ्यते मुक्तिर्योगिनाप्येकजन्मना ॥ १८॥<br>एते प्राधान्यतः प्रोक्ता देशाः पापहरा नृणाम्।<br>गत्वा संक्षालयेत् पापं जन्मान्तरशतैः कृतम् ॥ १९॥<br><br>यः स्वधर्मान् परित्यज्य तीर्थसेवां करोति हि।<br>न तस्य फलते तीर्थमिह लोके परत्र च ॥ २०॥<br>प्रायश्चित्ती च विधुरस्तथा पापचरो गृही।<br>प्रकुर्यात् तीर्थसंसेवां ये चान्ये तादृशा जनाः ॥ २१॥<br><br>सहाग्निर्वा सपत्नीको गच्छेत् तीर्थानि यत्नतः।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो यथोक्तां गतिमाप्नुयात् ॥ २२॥<br><br>ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य कुर्याद् वा तीर्थसेवनम्।<br>विधाय वृत्तिं पुत्राणां भार्या तेषु निधाय च ॥ २३॥ | हिमालयके रमणीय शिखरपर स्थित अत्यन्त सुन्दर गङ्गाद्वारमें शिष्योंसे घिरे हुए महादेव देवीके साथ नित्य निवास करते हैं। वहाँ स्नानकर वृषध्वज महादेवकी पूजा करनेसे सभी पापोंसे मुक्ति हो जाती है और मृत्युके बाद परम ज्ञान प्राप्त होता है॥ १३-१४॥<br><br>देवाधिदेव (शंकर)-का एक दूसरा शुभ तथा पवित्रतम स्थान है जो भीमेश्वर इस नामसे विख्यात है। वहाँ जानेसे व्यक्ति पापसे मुक्त हो जाता है। इसी प्रकार चण्डवेगा नदीका उद्गम-स्थान भी पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ स्नान करने तथा जलका पान करनेसे मनुष्य ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है॥ १५-१६॥<br><br>इन सभी तीर्थोंमें भी श्रेष्ठ तथा दिव्य वाराणसी नामकी पुरी हजारों कोटिगुना अधिक फलप्रदा है। पूर्वमें मैंने आप लोगोंसे उसके माहात्म्यका वर्णन किया था। योगीको भी (वाराणसीके अतिरिक्त) अन्यत्र एक जन्ममें मुक्ति नहीं मिलती॥ १७-१८॥<br><br>मनुष्योंके पापोंको हरनेवाले ये प्रधान-प्रधान देश (तीर्थ) बतलाये गये हैं। यहाँ जाकर सैकड़ों जन्मोंमें किये पापोंका प्रक्षालन करना चाहिये। जो अपने धर्मोंका परित्यागकर तीर्थोंका सेवन करता है, उसके लिये तीर्थ न इस लोकमें फलदायी होते हैं न परलोकमें॥ १९-२०॥<br><br>प्रायश्चित्ती, पत्नीसे रहित विधुर पुरुष तथा जिनके द्वारा पाप हो गया है ऐसे गृहस्थ एवं इसी प्रकारके जो अन्य लोग हैं, उन्हें (पश्चात्तापपूर्वक यथाशास्त्र) तीर्थोंका सेवन करना चाहिये। प्रयत्नपूर्वक अग्नि* अथवा पत्नीके साथ तीर्थोंमें जाना चाहिये। ऐसा करनेसे मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त होकर यथोक्त गति (उत्तम गति) प्राप्त करता है। अथवा तीनों ऋणोंसे मुक्त होनेके बाद पुत्रोंके लिये जीविका-सम्बन्धी वृत्तिकी व्यवस्थाकर और अपनी पत्नीको उन्हें सौंपकर तीर्थका सेवन करना चाहिये॥ २१-२३॥ |
* अग्निहोत्री वानप्रस्थ-आश्रम स्वीकारकर अपनी अग्नि तथा धर्मपत्नीके साथ तीर्थमें निवास करता है।
४८० | * कूर्मपुराण *
| प्रायश्चित्तप्रसङ्गेन तीर्थमाहात्म्यमीरितम्।<br>यः पठेच्छृणुयाद् वापि मुच्यते सर्वपातकैः ॥ २४॥ | प्रायश्चित्तके प्रसंगवश तीर्थोंके माहात्म्यका वर्णन किया गया। इसे पढ़नेवाला अथवा सुननेवाला भी सभी पातकोंसे मुक्त हो जाता है॥ २४॥ |
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इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें बयालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ४२ ॥
तैंतालीसवाँ अध्याय
चतुर्विध प्रलयका प्रतिपादन, नैमित्तिक प्रलयका विशेष वर्णन, विष्णुद्वारा अपने माहात्म्यका निरूपण
| सूत उवाच | सूतजीने कहा— |
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| एतदाकर्ण्य विज्ञानं नारायणमुखेरितम्।<br>कूर्मरूपधरं देवं पप्रच्छुर्मुनयः प्रभुम् ॥ १॥ | नारायणके मुखसे कहे गये इस विशिष्ट ज्ञानको सुनकर मुनियोंने कूर्मरूप धारण करनेवाले प्रभु देवसे पूछा—॥ १॥ |
| मुनय ऊचुः | मुनियोंने कहा— |
| कथिता भवता धर्मा मोक्षज्ञानं सविस्तरम्।<br>लोकानां सर्गविस्तारं वंशमन्वन्तराणि च ॥ २॥ | (सूतजी!) आपने विस्तारपूर्वक धर्म, मोक्ष, ज्ञान, लोकोंकी सृष्टिके विस्तार, वंश और मन्वन्तरोंको हमें बतलाया। माधव! भूतभव्येश! जैसा आपने पूर्वमें (पुराण-लक्षणके प्रसंगसे प्रतिसर्गके विषयमें) बतलाया है, तदनुसार अब हमें प्राणियोंके प्रतिसर्गके विषयमें बतलायें ॥ २-३॥ |
| प्रतिसर्गमिदानीं नो वक्तुमर्हसि माधव।<br>भूतानां भूतभव्येश यथा पूर्वं त्वयोदितम् ॥ ३॥ | |
| सूत उवाच | सूतजीने कहा— |
| श्रुत्वा तेषां तदा वाक्यं भगवान् कूर्मरूपधृक्।<br>व्याजहार महायोगी भूतानां प्रतिसंचरम् ॥ ४॥ | तब उनके उस वचनको सुनकर कूर्मरूपधारी महायोगी भगवान्ने भूतोंके प्रतिसंचर अर्थात् प्रलयका वर्णन किया ॥ ४॥ |
| कूर्म उवाच | कूर्म बोले— |
| नित्यो नैमित्तिकश्चैव प्राकृतात्यन्तिकौ तथा।<br>चतुर्धायं पुराणेऽस्मिन् प्रोच्यते प्रतिसंचरः ॥ ५॥ | इस पुराणमें नित्य, नैमित्तिक, प्राकृत तथा आत्यन्तिक—इस प्रकारसे चार प्रकारका प्रतिसंचर (प्रलय) कहा गया है। लोकमें यहाँ जो प्राणियोंका नित्य क्षय दिखलायी देता है, उसे मुनियोंने नित्य-प्रलयके नामसे कहा है। कल्पान्तमें ब्रह्मा (की निद्रा)-के निमित्तसे होनेवाले तीनों लोकोंके प्रतिसर्ग—प्रलयको विद्वानोंने (नैमित्तिक प्रलय) कहा है। महत्तत्त्वसे लेकर विशेषपर्यन्त समस्त तत्त्वोंका जो क्षय हो जाता है, उसे कालचिन्तकोंने प्राकृत प्रतिसर्ग कहा है और ज्ञानद्वारा परमात्मामें होनेवाले योगियोंके आत्यन्तिक प्रलयको* कालचिन्तक द्विज आत्यन्तिक प्रतिसर्ग (प्रलय) कहते हैं ॥ ५-९॥ |
| योऽयं संदृश्यते नित्यं लोके भूतक्षयस्त्विह।<br>नित्यः संकीर्त्यते नाम्ना मुनिभिः प्रतिसंचरः ॥ ६॥ | |
| ब्राह्मो नैमित्तिको नाम कल्पान्ते यो भविष्यति।<br>त्रैलोक्यस्यास्य कथितः प्रतिसर्गो मनीषिभिः ॥ ७॥ | |
| महदाद्यं विशेषान्तं यदा संयाति संक्षयम्।<br>प्राकृतः प्रतिसर्गोऽयं प्रोच्यते कालचिन्तकैः ॥ ८॥ | |
| ज्ञानादात्यन्तिकः प्रोक्तो योगिनः परमात्मनि।<br>प्रलयः प्रतिसर्गोऽयं कालचिन्तापरैर्द्विजैः ॥ ९॥ |
* यहाँ 'प्रलय' का तात्पर्य परमात्मतत्त्वके साथ एकरूपतामें है।
- अध्याय ४३ * / ४८१
| आत्यन्तिकश्च कथितः प्रलयोऽत्र ससाधनः ।<br>नैमित्तिकमिदानीं वः कथयिष्ये समासतः ॥ १० ॥ | यहाँ साधनसहित आत्यन्तिक प्रलय अर्थात् मोक्षका वर्णन किया गया है। अब मैं संक्षेपमें आप लोगोंको नैमित्तिक प्रलयके विषयमें बतलाऊँगा ॥ १० ॥ |
| चतुर्युगसहस्रान्ते सम्प्राप्ते प्रतिसंचरे।<br>स्वात्मसंस्थाः प्रजाः कर्तुं प्रतिपेदे प्रजापतिः ॥ ११ ॥ | एक हजार चतुर्युग (सत्य-त्रेता-द्वापर तथा कलियुग)-के अन्तमें प्रलयकाल उपस्थित होनेपर प्रजापति समस्त प्रजाको आत्मस्थ करनेकी इच्छा करते हैं। इसके बाद सौ वर्षोंतक तीव्र अनावृष्टि होती है, वह भूतों एवं सभी प्राणियोंका विनाश करनेवाली तथा अत्यन्त भयंकर होती है। तदनन्तर भूमिपर जो अल्पसार अर्थात् निर्बल प्राणी होते हैं, सबसे पहले उनका लय होता है और वे भूमिमें मिल जाते हैं। तब सात रश्मियोंवाले रथपर आरूढ़ होकर सूर्य उदित होते हैं। उनकी किरणें असह्य हो जाती हैं, वे अपनी किरणोंद्वारा जल पीने लगते हैं। उनकी वे सातों रश्मियाँ महासमुद्रमें स्थित जलको पीती हैं। उस आहारसे उद्दीप्त होकर वे (सात) रश्मियाँ पुनः सात सूर्य बन जाती हैं। तदनन्तर सूर्यरूप वे सातों रश्मियाँ चारों दिशाओं तथा सम्पूर्ण इस चतुर्लोकको अग्निके समान दग्ध करने लगती हैं ॥ ११–१६ ॥ |
| ततो भवत्यनावृष्टिस्तीव्रा सा शतवार्षिकी।<br>भूतक्षयकरी घोरा सर्वभूतक्षयंकारी ॥ १२ ॥ | |
| ततो यान्यल्पसाराणि सत्त्वानि पृथिवीतले।<br>तानि चाग्रे प्रलीयन्ते भूमित्वमुपयान्ति च ॥ १३ ॥ | |
| सप्तरश्मिरथो भूत्वा समुत्तिष्ठन् दिवाकरः।<br>असह्यरश्मिर्भवति पिबन्नम्भो गभस्तिभिः ॥ १४ ॥ | |
| तस्य ते रश्मयः सप्त पिबन्त्यम्बु महार्णवे।<br>तेनाहारेण ता दीप्ताः सूर्याः सप्त भवन्त्युत ॥ १५ ॥ | |
| ततस्ते रश्मयः सप्त सूर्या भूत्वा चतुर्दिशम्।<br>चतुर्लोकमिदं सर्वं दहन्ति शिखिनस्तथा ॥ १६ ॥ | |
| व्याप्नुवन्तश्च ते विप्रास्तूर्ध्वं चाधश्च रश्मिभिः।<br>दीप्यन्ते भास्कराः सप्त युगान्ताग्निप्रतापिनः ॥ १७ ॥ | ब्राह्मणो ! प्रलयकालीन अग्निके तेजसे युक्त वे सातों सूर्य अपनी-अपनी रश्मियोंके द्वारा ऊर्ध्व तथा अधोभागको व्याप्तकर अतिशय उद्दीप्त हो जाते हैं। जलसे प्रदीप्त अनेक सहस्र रश्मियोंवाले वे सूर्य आकाशको आवृत्तकर स्थित रहते हैं और पृथिवीको जलाने लगते हैं। तदनन्तर उनके तेजसे जलती हुई पृथ्वी पर्वतों, नदियों, समुद्रों तथा द्वीपोंके साथ स्नेह (द्रवभाव)-से रहित हो जाती है अर्थात् अत्यन्त सूख जाती है। सतत प्रदीप्त रहनेवाली वे रश्मियाँ ऊपर-नीचे तथा आड़े-तिरछे सभी ओर व्याप्त हो जाती हैं ॥ १७–२० ॥ |
| ते सूर्या वारिणा दीप्ता बहुसाहस्ररश्मयः।<br>खं समावृत्य तिष्ठन्ति निर्दहन्तो वसुंधराम् ॥ १८ ॥ | |
| ततस्तेषां प्रतापेन दह्यमाना वसुंधरा।<br>साद्रिनद्यर्णवद्वीपा निस्नेहा समपद्यत ॥ १९ ॥ | |
| दीप्ताभिः संतताभिश्च रश्मिभिर्वै समन्ततः।<br>अधश्चोर्ध्वं च लग्नाभिस्तिर्यक् चैव समावृतम् ॥ २० ॥ | |
| सूर्याग्निना प्रमृष्टानां संसृष्टानां परस्परम्।<br>एकत्वमुपयातानामेकज्वालं भवत्युत ॥ २१ ॥ | सूर्यरूप अग्निके द्वारा प्रकृष्टरूपसे शोधित और परस्पर संसृष्ट संसारके समस्त पदार्थ एक ज्वालाके रूपमें एकाकार हो जाते हैं। सभी लोकोंको नष्ट करनेवाली वह सूर्यरूप अग्नि एक मण्डलके रूपमें होकर अपने तेजसे इस सम्पूर्ण चतुर्लोकको दग्ध करने लगती है ॥ २१-२२ ॥ |
| सर्वलोकप्रणाशश्च सोऽग्निर्भूत्वा सुकुण्डली।<br>चतुर्लोकमिदं सर्वं निर्दहत्यात्मतेजसा ॥ २२ ॥ |
| ४८२ | * कूर्मपुराण * |
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| ततः प्रलीने सर्वस्मिञ्जङ्गमे स्थावरे तथा।<br>निर्वृक्षा निस्तृणा भूमिः कूर्मपृष्ठा प्रकाशते॥ २३॥ | तब सम्पूर्ण स्थावर एवं जंगम पदार्थोंके लीन हो जानेपर वृक्षों तथा तृणोंसे रहित भूमि कछुएके पीठके समान दिखलायी देती है। (किरणोंसे) व्याप्त समस्त जगत् अम्बरीष (भड़-भूजेकी कड़ाही)-के सदृश वर्णवाला दिखलायी देता है। उन ज्वालाओंके द्वारा सभी कुछ पूर्णरूपसे प्रज्वलित होने लगता है॥ २३-२४॥ |
| अम्बरीषमिवाभाति सर्वमापूरितं जगत्।<br>सर्वमेव तदर्चिर्भिः पूर्णं जाज्वल्यते पुनः॥ २४॥<br>पाताले यानि सत्त्वानि महोदधिगतानि च।<br>ततस्तानि प्रलीयन्ते भूमित्वमुपयान्ति च॥ २५॥<br><br>द्वीपांश्च पर्वतांश्चैव वर्षाण्यथ महोदधीन्।<br>तान् सर्वान् भस्मसात् कृत्वा सप्तात्मा पावकः प्रभुः॥ २६॥<br><br>समुद्रेभ्यो नदीभ्यश्च पातालेभ्यश्च सर्वशः।<br>पिबन्नपः समिद्धोऽग्निः पृथिवीमाश्रितो ज्वलन्॥ २७॥ | तदनन्तर पातालमें तथा महासमुद्रोंमें जो प्राणी रहते हैं, उनका लय होता है और वे सभी भूमिके रूपमें परिवर्तित हो जाते हैं। सात (सूर्यों)-के रूपमें प्रदीप्त हो रहे प्रभु पावक (अग्निदेव) उन सभी द्वीपों, पर्वतों, वर्षों तथा महासमुद्रोंको भस्मसात् कर देते हैं। समुद्रों, नदियों तथा पातालोंके सम्पूर्ण जलका शोषण करती हुई प्रदीप्त अग्नि (सूर्यकी ज्वाला) पृथ्वीपर प्रज्वलित होने लगती है अर्थात् पृथ्वीको जलाने लगती है॥ २५-२७॥ |
| ततः संवर्तकः शैलानतिक्रम्य महांस्तथा।<br>लोकान् दहति दीप्तात्मा रुद्रतेजोविजृम्भितः॥ २८॥<br><br>स दग्ध्वा पृथिवीं देवो रसातलमशोषयत्।<br>अधस्तात् पृथिवीं दग्ध्वा दिवमूर्ध्वं दहिष्यति॥ २९॥<br><br>योजनानां शतानीह सहस्राण्ययुतानि च।<br>उत्तिष्ठन्ति शिखास्तस्य वह्नेः संवर्तकस्य तु॥ ३०॥ | तदनन्तर महान् संवर्तक नामक अग्नि पर्वतोंका अतिक्रमण करते हुए रुद्रके तेजसे पुष्ट होनेके कारण दीप्त आत्मावाला होकर लोकोंको जलाने लगती है। (सम्पूर्ण) पृथ्वीको दग्धकर वे अग्निदेव रसातलको शोषित करते हैं। पृथ्वीके नीचेके भागको जलाकर ऊपरके द्युलोकको जलाने लगते हैं। उस संवर्तक अग्निकी शिखाएँ सैकड़ों, हजारों तथा दस हजार योजन ऊपरतक उठने लगती हैं॥ २८-३०॥ |
| गन्धर्वांश्च पिशाचांश्च सयक्षोरगराक्षसान्।<br>तदा दहत्यसौ दीप्तः कालरुद्रप्रचोदितः॥ ३१॥<br><br>भूर्लोकं च भुवर्लोकं स्वर्लोकं च तथा महः।<br>दहेदशेषं कालाग्निः कालो विश्वतनुः स्वयम्॥ ३२॥<br><br>व्याप्तेष्वेतेषु लोकेषु तिर्यगूर्ध्वमथाग्निना।<br>तत् तेजः समनुप्राप्य कृत्स्नं जगदिदं शनैः।<br>अयोगुडनिभं सर्वं तदा चैकं प्रकाशते॥ ३३॥ | तब कालरुद्रद्वारा प्रेरित होकर यह उद्दीप्त अग्नि गन्धर्वों, पिशाचों, यक्षों, नागों तथा राक्षसोंको जलाती है। कालाग्निस্বরূপ विश्वात्मा स्वयं काल भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक तथा महर्लोकको सम्पूर्णरूपसे जला देता है। इन लोकोंमें तिरछे तथा ऊँचे सब जगह अग्निके द्वारा व्याप्त कर दिये जानेपर यह सम्पूर्ण जगत् उस तेजसे धीरे-धीरे पूरित होकर (जलते हुए) एक अयःपिण्ड (लोहपिण्ड)-के समान प्रकाशित होने लगता है॥ ३१-३३॥ |
| ततो गजकुलोन्नादास्तडिद्भिः समलंकृताः।<br>उत्तिष्ठन्ति तदा व्योम्नि घोराः संवर्तका घनाः॥ ३४॥ | तदनन्तर हाथियोंके समूहके समान नाद करनेवाले विद्युत्से अलंकृत संवर्तक नामक भयंकर मेघ आकाशमें प्रकट होते हैं॥ ३४॥ |
- अध्याय ४३ * | ४८३ ---|---
| केचिन्नीलोत्पलश्यामाः केचित् कुमुदसंनिभाः ।<br>धूम्रवर्णास्तथा केचित् केचित् पीताः पयोधराः ॥ ३५ ॥<br><br>केचिद् रासभवर्णास्तु लाक्षारसनिभास्तथा ।<br>शङ्खकुन्दनिभाश्चान्ये जात्यञ्जननिभाः परे ॥ ३६ ॥<br><br>मनःशिलाभास्त्वन्ये च कपोतसदृशाः परे ।<br>इन्द्रगोपनिभाः केचिद्धरितालनिभास्तथा ।<br>इन्द्रचापनिभाः केचिदुत्तिष्ठन्ति घना दिवि ॥ ३७ ॥<br>केचित् पर्वतसंकाशाः केचिद् गजकुलोपमाः ।<br>कूटाङ्गारनिभाश्चान्ये केचिन्मीनकुलोद्वहाः ।<br>बहुरूपा घोररूपा घोरस्वरनिनादिनः ॥ ३८ ॥<br><br>तदा जलधराः सर्वे पूरयन्ति नभःस्थलम् ।<br>ततस्ते जलदा घोरा राविणो भास्करात्मजाः ।<br>सप्तधा संवृतात्मानस्तमग्निं शमयन्त्युत ॥ ३९ ॥<br>ततस्ते जलदा वर्षं मुञ्चन्तीह महौघवत् ।<br>सुघोरमशिवं सर्वं नाशयन्ति च पावकम् ॥ ४० ॥<br><br>प्रवृष्टे च तदात्यर्थमम्भसा पूर्यते जगत् ।<br>अद्भिस्तेजोऽभिभूतत्वात् तदग्निः प्रविशत्यपः ॥ ४१ ॥<br>नष्टे चाग्नौ वर्षशतैः पयोदाः क्षयसम्भवाः ।<br>प्लावयन्तोऽथ भुवनं महाजलपरिस्त्रवैः ॥ ४२ ॥<br><br>धाराभिः पूरयन्तीदं चोद्यमानाः स्वयम्भुवा ।<br>अत्यन्तसलिलौघैश्च वेला इव महोदधिः ॥ ४३ ॥<br>साद्रिद्वीपा तथा पृथ्वी जलैः संच्छाद्यते शनैः ।<br>आदित्यरश्मिभिः पीतं जलमभ्रेषु तिष्ठति ।<br>पुनः पतति तद् भूमौ पूर्यन्ते तेन चार्णवाः ॥ ४४ ॥<br><br>ततः समुद्राः स्वां वेलामतिक्रान्तास्तु कृत्स्नशः ।<br>पर्वताश्च विलीयन्ते मही चाप्सु निमज्जति ॥ ४५ ॥ | उन मेघोंमेंसे कुछ नीलकमलके समान श्यामवर्णके, कुछ कुमुदके समान श्वेत वर्णके, कुछ धूम्रवर्णके, कुछ पीतवर्णके, कुछ रासभ (धूसर) वर्णके, कुछ लाक्षारसके समान, कुछ दूसरे शंख तथा कुन्द (पुष्प)-के समान रंगवाले, कुछ जाती पुष्प (चमेली)-के तथा अञ्जन (काजल)-के समान, कुछ मनःशिला (मैनसिल)-के समान रंगवाले और कुछ दूसरे कपोतके समान वर्णवाले, कुछ इन्द्रगोप (बीरबहूटी कीट)-के समान, कुछ हरतालके समान और कुछ इन्द्रधनुषके समान वर्णवाले मेघ आकाशमें प्रकट होते हैं ॥ ३५-३७ ॥<br><br>कुछ मेघ पर्वतके तुल्य, कुछ हाथियोंके समूहके समान, कुछ कूटाङ्गारके समान और कुछ मछलियोंके समूहके आकारके होते हैं। वे मेघ अनेक रूप धारण करनेवाले, भयंकर आकारवाले तथा घोर गर्जना-जैसी ध्वनि करनेवाले होते हैं। उस समय वे सभी बादल आकाशको व्याप्त कर लेते हैं, तदनन्तर भास्करसे उत्पन्न गर्जना करनेवाले वे सात प्रकारके भयंकर बादल एकत्रित होकर उस अग्निको शान्त करते हैं ॥ ३८-३९ ॥<br><br>तदुपरान्त वे मेघ महान् बाढ़के समान जलकी वर्षा करते हैं और अत्यन्त भयंकर, अकल्याणकारी उस सम्पूर्ण अग्निको नष्ट कर देते हैं। अतिशय वृष्टि होनेके कारण जगत् जलसे परिपूर्ण हो जाता है। जलके द्वारा तेज (अग्नि)-के अभिभूत होनेके कारण उस समय वह अग्नि जलमें प्रविष्ट हो जाता है ॥ ४०-४१ ॥<br><br>इस तरह अग्निके शान्त हो जानेपर स्वयम्भू-ब्रह्माके द्वारा प्रेरित मेघ अत्यधिक जलके प्रवाहोंसे समस्त भुवनको आप्लावित करते हुए वैसे ही अपनी जलधाराओंसे इस भुवनको परिपूर्ण कर देते हैं, जैसे समुद्र अत्यधिक जलोंके प्रवाहोंसे अपने तटोंको आप्लावित कर देता है। ये मेघ इतने जलसे भरपूर हैं कि इनका क्षय दिव्य सैकड़ों वर्षोंमें कदाचित् सम्भव है ॥ ४२-४३ ॥<br><br>धीरे-धीरे पर्वतों तथा द्वीपोंवाली पृथ्वी जलसे ढक जाती है और सूर्यकी रश्मियोंद्वारा गृहीत वह जल बादलोंमें स्थित रहता है। पुनः वह जल पृथ्वीपर गिरता है और उससे समुद्र इतने आपूरित हो जाते हैं कि सर्वत्र अपने तटोंका अतिक्रमण कर वे जलमय हो जाते हैं, पर्वत जलमें विलीन हो जाते हैं और पृथ्वी भी जलमें डूब जाती है ॥ ४४-४५ ॥ |
४८४ * कूर्मपुराण *
| तस्मिन्नेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे।<br>योगनिद्रां समास्थाय शेते देवः प्रजापतिः॥ ४६॥ | उस भयंकर एकार्णव (महासमुद्र)-में स्थावर-जंगम सभीके लीन हो जानेपर योगनिद्राका आश्रय ग्रहणकर देव प्रजापति शयन करते हैं॥ ४६॥ |
| चतुर्युगसहस्रान्तं कल्पमाहुर्महर्षयः।<br>वाराहो वर्तते कल्पो यस्य विस्तार ईरितः॥ ४७॥ | महर्षियोंने एक हजार चतुर्युगीका एक कल्प कहा है। अभी जिसका विस्तार बतलाया गया है, वह वाराह कल्प इस समय चल रहा है। ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवात्मक असंख्य कल्प हैं। पुराणोंमें काल-चिन्तक मुनियोंने उनका वर्णन किया है। सात्त्विक (सत्त्वप्रधान) कल्पोंमें हरिका अधिक माहात्म्य होता है। तामस (तमःप्रधान) कल्पोंमें शंकरका और राजस (रजः-प्रधान) कल्पोंमें प्रजापति ब्रह्माका अधिक माहात्म्य होता है। इस समय प्रवर्तमान वाराह कल्प सात्त्विक कल्प है। अन्य भी सात्त्विक कल्प हैं, उनमें मुझे कूर्मभगवान्का आश्रय ग्रहण करना चाहिये॥ ४७–५०॥ |
| असंख्यातास्तथा कल्पा ब्रह्मविष्णुशिवात्मकाः।<br>कथिता हि पुराणेषु मुनिभिः कालचिन्तकैः॥ ४८॥ | |
| सात्त्विकेष्वथ कल्पेषु माहात्म्यमधिकं हरेः।<br>तामसेषु हरस्योक्तं राजसेषु प्रजापतेः॥ ४९॥ | |
| योऽयं प्रवर्तते कल्पो वाराहः सात्त्विको मतः।<br>अन्ये च सात्त्विकाः कल्पा मम तेषु परिग्रहः॥ ५०॥ | |
| ध्यानं तपस्तथा ज्ञानं लब्ध्वा तेष्वेव योगिनः।<br>आराध्य गिरिशं मां च यान्ति तत् परमं पदम्॥ ५१॥ | उन कल्पोंमें योगीजन ध्यान, तप तथा ज्ञान प्राप्तकर उनके द्वारा शंकरकी तथा मेरी आराधना करके परमपदको प्राप्त करते हैं। जगत्के एकार्णव हो जानेपर मायाका अधिष्ठाता मैं सत्त्वका आश्रय ग्रहणकर मायामय योगनिद्रामें स्थित हो जाता हूँ। उस समय जनलोकमें विद्यमान महात्मा, महर्षिगण तपस्या तथा योगरूपी नेत्रोंके द्वारा निद्रालीन कालस्वरूप मेरा दर्शन करते हैं॥ ५१–५३॥ |
| सोऽहं सत्त्वं समास्थाय मायी मायामयीं स्वयम्।<br>एकार्णवे जगत्यस्मिन् योगनिद्रां व्रजामि तु॥ ५२॥ | |
| मां पश्यन्ति महात्मानः सुप्तं कालं महर्षयः।<br>जनलोके वर्तमानास्तपसा योगचक्षुषा॥ ५३॥ | |
| अहं पुराणपुरुषो भूर्भुवः प्रभवो विभुः।<br>सहस्रचरणः श्रीमान् सहस्रांशुः सहस्रदृक्॥ ५४॥ | मैं पुराणपुरुष, भूर्भुवः, प्रभव तथा विभु हूँ, मैं हजारों चरणोंवाला, श्रीसम्पन्न, हजारों किरणोंवाला तथा हजारों नेत्रोंवाला हूँ। मैं ही मन्त्र, अग्नि, ब्राह्मण, गौ, कुश एवं समिधा हूँ और प्रोक्षणी, स्रुव (यज्ञीय पात्र) सोम तथा घृत भी मैं ही हूँ। मैं ही संवर्तक (अग्नि), महान् आत्मा, पवित्र तथा परम यश हूँ। वेद-वेद्य (जिसे जाना जाता है), प्रभु, गोप्ता (रक्षक), गोपति (इन्द्रियों एवं वाणीके स्वामी) और ब्रह्माका मुख (आविर्भावस्थल) भी मैं ही हूँ। मैं अनन्त, तारक, योगी, गति, गतिशीलोंमें श्रेष्ठ, हंस, प्राण, कपिल, विश्वमूर्ति, सनातन, क्षेत्रज्ञ, प्रकृति, काल, जगद्बीज और अमृतरूप हूँ। मैं ही माता, पिता तथा महादेव हूँ, मुझसे अतिरिक्त कुछ भी नहीं है॥ ५४–५८॥ |
| मन्त्रोऽग्निर्ब्राह्मणा गावः कुशाश्च समिधो ह्यहम्।<br>प्रोक्षणी च स्रुवश्चैव सोमो घृतमथास्यहम्॥ ५५॥ | |
| संवर्तको महानात्मा पवित्रं परमं यशः।<br>वेदो वेद्यं प्रभुर्गोप्ता गोपतिर्ब्रह्मणो मुखम्॥ ५६॥ | |
| अनन्तस्तारको योगी गतिर्गतिमतां वरः।<br>हंसः प्राणोऽथ कपिलो विश्वमूर्तिः सनातनः॥ ५७॥ | |
| क्षेत्रज्ञः प्रकृतिः कालो जगद्बीजमथामृतम्।<br>माता पिता महादेवो मत्तो ह्यान्यन्न विद्यते॥ ५८॥ |
- अध्याय ४४ * ४८५
आदित्यवर्णो भुवनस्य गोप्ता नारायणः पुरुषो योगमूर्तिः। मां पश्यन्ति यतयो योगनिष्ठा ज्ञात्वात्मानममृतत्वं व्रजन्ति॥ ५९॥
मैं आदित्यके समान वर्णवाला, भुवनोंका रक्षक, नारायण पुरुष तथा योगमूर्ति हूँ। योगपरायण यतिजन मेरा दर्शन करते हैं और अपनी आत्माका ज्ञान प्राप्तकर अमृतत्व (मोक्ष)-को प्राप्त करते हैं॥ ५९॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४३॥ इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें तैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४३॥
चौवालीसवाँ अध्याय
प्राकृत प्रलयका वर्णन, शिवके विविध रूपों और विविध शक्तियोंका वर्णन, शिवकी आराधनाकी विधि, मुनियोंद्वारा कूर्मरूपधारी विष्णुकी स्तुति, कूर्मपुराणकी विषयानुक्रमणिकाका वर्णन, कूर्मपुराणकी फलश्रुति तथा इस पुराणकी वक्तृ-श्रोतृपरम्पराका प्रतिपादन, महर्षि व्यास तथा नारायणकी वन्दनाके साथ पुराणकी पूर्णताका कथन
कूर्म उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रतिसर्गमनुत्तमम्। प्राकृतं हि समासेन शृणुध्वं गदतो मम॥ १॥
गते परार्द्धद्वितये कालो लोकप्रकालनः। कालाग्निर्भस्मसात् कर्तुं करोति निखिलं मतिम्॥ २॥
स्वात्मन्यात्मानमावेश्य भूत्वा देवो महेश्वरः। दहेदशेषं ब्रह्माण्डं सदेवासुरमानुषम्॥ ३॥
तमाविश्य महादेवो भगवान्नीललोहितः। करोति लोकसंहारं भीषणं रूपमाश्रितः॥ ४॥
प्रविश्य मण्डलं सौरं कृत्वासौ बहुधा पुनः। निर्दहत्यखिलं लोकं सप्तसप्तिस्वरूपधृक्॥ ५॥
स दग्ध्वा सकलं सत्त्वमस्त्रं ब्रह्मशिरो महत्। देवतानां शरीरेषु क्षिपत्यखिलदाहकम्॥ ६॥
दग्धेष्वशेषदेवेषु देवी गिरिवरात्मजा। एका सा साक्षिणी शम्भोस्तिष्ठते वैदिकी श्रुतिः॥ ७॥
**(भगवान्) कूर्मने कहा—**इसके अनन्तर अब मैं उत्तम प्राकृत प्रलयका संक्षेपमें वर्णन करूँगा। उसे आप सब श्रवण करें॥ १॥
द्वितीय* परार्ध (अर्थात् ब्रह्माजीकी परमायु—दिव्य १०० वर्षका समय)-के बीत जानेपर समस्त लोकोंका लय करनेवाला कालरूप कालाग्नि सम्पूर्ण जगत्को भस्मसात् करनेका निश्चय करता है। महेश्वर देव अपनी आत्मामें आत्मा (जीवात्मा)-को आविष्टकर देवताओं, असुरों तथा मनुष्योंसे युक्त सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको दग्ध करते हैं। भगवान् नीललोहित महादेव भीषण रूप धारणकर उस अग्निमें प्रविष्ट होकर अर्थात् महाकालरूप होकर लोकका संहार करते हैं। सौर-मण्डलमें प्रविष्ट होकर उसे पुनः अनेक रूपवाला बनाकर सात-सात किरणोंवाले सूर्यरूपधारी वे महेश्वर सम्पूर्ण लोकोंको दग्ध करते हैं॥ २—५॥
समस्त सत्त्व (पदार्थों)-को दग्ध करके वे महेश्वर देवताओंके शरीरपर सभीको जलानेमें समर्थ ब्रह्मशिर नामक महान् अस्त्रको छोड़ते हैं। सम्पूर्ण देवताओंके दग्ध हो जानेपर श्रेष्ठ पर्वत (हिमवान्)-की पुत्री देवी पार्वती अकेली ही साक्षीके रूपमें उन (शिव)-के पास स्थित रहती हैं—ऐसी वैदिकी श्रुति है॥ ६-७॥
* ब्रह्माकी आयु दिव्य सौ वर्षकी है। इस कालको 'पर' कहते हैं। इसका आधा भाग 'परार्ध' होता है। (कूर्म० पूर्वविभाग अ० ५) शब्दकल्पद्रुममें उद्धृत।
| ४८६ | * कूर्मपुराण * |
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| शिरःकपालैर्देवानां कृतस्रग्वरभूषणः।<br>आदित्यचन्द्रादिगणैः पूरयन् व्योममण्डलम्॥ ८ ॥<br>सहस्रनयनो देवः सहस्राकृतिरीश्वरः।<br>सहस्रहस्तचरणः सहस्रार्चिर्महाभुजः॥ ९ ॥<br>दंष्ट्राकरालवदनः प्रदीप्तानललोचनः।<br>त्रिशूली कृत्तिवसनो योगमैश्वरमास्थितः॥ १०॥<br>पीत्वा तत्परमानन्दं प्रभूतममृतं स्वयम्।<br>करोति ताण्डवं देवीमालोक्य परमेश्वरः॥ ११ ॥<br>पीत्वा नृत्तामृतं देवी भर्तुः परममङ्गला।<br>योगमास्थाय देवस्य देहमायाति शूलिनः॥ १२॥<br><br>संत्यक्त्वा ताण्डवरसं स्वेच्छयैव पिनाकधृक्।<br>ज्योतिः स्वभावं भगवान् दग्ध्वा ब्रह्माण्डमण्डलम्॥ १३॥<br><br>संस्थितेष्वथ देवेषु ब्रह्मविष्णुपिनाकिषु।<br>गुणैरशेषैः पृथिवी विलयं याति वारिषु॥ १४॥<br><br>सवारितत्त्वं सगुणं ग्रसते हव्यवाहनः।<br>तेजस्तु गुणसंयुक्तं वायौ संयाति संक्षयम्॥ १५॥<br>आकाशे सगुणो वायुः प्रलयं याति विश्वभृत्।<br>भूतादौ च तथाकाशं लीयते गुणसंयुक्तम्॥ १६ ॥<br><br>इन्द्रियाणि च सर्वाणि तैजसे यान्ति संक्षयम्।<br>वैकारिके देवगणाः प्रलयं यान्ति सत्तमाः॥ १७॥<br><br>वैकारिकस्तैजसश्च भूतादिश्चेति सत्तमाः।<br>त्रिविधोऽयमहंकारो महति प्रलयं व्रजेत्॥ १८॥<br>महान्त्मेभिः सहितं ब्रह्माणमतितेजसम्।<br>अव्यक्तं जगतो योनिः संहरेदेकमव्ययम्॥ १९॥<br><br>एवं संहृत्य भूतानि तत्त्वानि च महेश्वरः।<br>वियोजयति चान्योन्यं प्रधानं पुरुषं परम्॥ २०॥ | देवताओंके मस्तकके कपालसे निर्मित मालाको आभूषणरूपमें धारण करनेवाले, हजारों नेत्रवाले, हजारों आकृतिवाले, हजारों हाथ-पैरवाले, हजारों किरणोंवाले, भीषण दंष्ट्रा (दाढ़)-के कारण भयंकर मुखोंवाले, प्रदीप्त अग्निके समान नेत्रोंवाले, त्रिशूली चर्माम्बरधारी वे देव महेश्वर अनन्त सूर्य एवं चन्द्रके समूहोंसे समस्त आकाशमण्डलको व्याप्तकर ऐश्वर्ययोगमें स्थित हो जाते हैं और भगवती पार्वतीको देखते हुए परमानन्दमय अमृतका पानकर स्वयं ताण्डव नृत्य करते हैं॥ ८-११॥<br><br>पतिके नृत्यरूपी अमृतका पानकर परम कल्याणरूपिणी देवी (पार्वती) योगका आश्रय लेते हुए त्रिशूली शिवके शरीरमें प्रविष्ट हो जाती हैं। ब्रह्माण्डमण्डलको दग्ध करनेके अनन्तर पिनाक धारण करनेवाले भगवान् (शिव) अपनी इच्छासे ही ताण्डव (-के आनन्द)-रसका परित्यागकर ज्योतिःस्वरूप अपने भावमें स्थित हो जाते हैं। ब्रह्मा, विष्णु तथा पिनाकी शिवके इस प्रकार स्थित हो जानेपर अपने सम्पूर्ण गुणोंके साथ पृथ्वी जलमें विलीन हो जाती है। अपने गुणोंसहित उस जल-तत्त्वको हव्यवाहन अग्नि ग्रहण कर लेता है और अपने गुणोंसहित वह तेज (अग्नि) वायुमें विलीन हो जाता है॥ १२-१५॥<br><br>विश्वका भरण-पोषण करनेवाला वायु अपने गुणोंके साथ आकाश (तत्त्व)-में लीन हो जाता है और अपने गुणसहित वह आकाश भूतादि अर्थात् तामस अहंकारमें लीन हो जाता है। सत्तमो! सभी इन्द्रियाँ तैजस अर्थात् राजस अहंकारमें विलीन हो जाती हैं और (इन्द्रियोंके अधिष्ठाता) देवगण वैकारिक अर्थात् सात्त्विक अहंकारमें प्रलीन हो जाते हैं। श्रेष्ठो! वैकारिक, तैजस तथा भूतादि (तामस) नामक तीन प्रकारका अहंकार महत्तत्त्वमें लीन हो जाता है॥ १६-१८॥<br><br>यह महत्तत्त्व पृथ्वीसे अहंकारपर्यन्त समस्त तत्त्वोंका मूल होनेके कारण एक प्रकारसे अमित तेजस्वी ब्रह्मा ही हैं। अतः ब्रह्मारूप तथा अपनेमें पृथ्वी आदि समस्त तत्त्वोंको समाविष्ट कर लेनेवाले इस अद्वितीय महत्तत्त्वका संहार वह प्रकृति कर देती है, जो अव्यक्त है एवं समस्त जगत्का मूल कारण है। इस प्रकार (पञ्च) भूतों तथा तत्त्वोंका संहारकर महेश्वर प्रधान-प्रकृति और पुरुषको परस्पर वियुक्त कर देते हैं॥ १९-२०॥ |
- अध्याय ४४ * | ४८७ ---|---
प्रधानपुंसोरजयोरेष संहार ईरितः।
महेश्वरेच्छाजनितो न स्वयं विद्यते लयः॥ २१॥
गुणसाम्यं तदव्यक्तं प्रकृतिः परिगीयते।
प्रधानं जगतो योनिर्मायातत्त्वमचेतनम्॥ २२॥
कूटस्थश्चिन्मयो ह्यात्मा केवलः पञ्चविंशकः।
गीयते मुनिभिः साक्षी महानेकः पितामहः ॥ २३॥
एवं संहारकरणी शक्तिर्माहेश्वरी ध्रुवा।
प्रधानाद्यं विशेषान्तं दहेद् रुद्र इति श्रुतिः॥ २४॥
योगिनामथ सर्वेषां ज्ञानविन्यस्तचेतसाम्।
आत्यन्तिकं चैव लयं विदधातीह शंकरः॥ २५॥
इत्येष भगवान् रुद्रः संहारं कुरुते वशी।
स्थापिका मोहनी शक्तिर्नारायण इति श्रुतिः॥ २६॥
हिरण्यगर्भो भगवान् जगत् सदसदात्मकम्।
सृजेदशेषं प्रकृतेस्तन्मयः पञ्चविंशकः॥ २७॥
सर्वज्ञाः सर्वगाः शान्ताः स्वात्मन्येव व्यवस्थिताः।
शक्तयो ब्रह्मविष्ण्वीशा भुक्तिमुक्तिफलप्रदाः ॥ २८॥
सर्वेश्वराः सर्ववन्द्याः शाश्वतानन्तभोगिनः।
एकमेवाक्षरं तत्त्वं पुंप्रधानेश्वरात्मकम् ॥ २९॥
अन्याश्च शक्तयो दिव्याः सन्ति तत्र सहस्रशः।
इज्यन्ते विविधैर्यज्ञैः शक्रादित्यादयोऽमराः ॥ ३०॥
एकैकस्य सहस्राणि देहानां वै शतानि च।
कथ्यन्ते चैव माहात्म्याच्छक्तिरेकैव निर्गुणा ॥ ३१॥ | इस (प्रकृति-पुरुष वियोगको) ही अनादि प्रकृति और पुरुषका संहार कहा जाता है (क्योंकि सांख्यशास्त्रके अनुसार इन दोनोंके नित्य होनेसे इनका लय कहीं नहीं हो सकता)। यह (वियोगरूप) लय भी महेश्वरकी इच्छासे ही होनेवाला है, स्वयं नहीं हो सकता। गुणोंकी साम्यावस्था ही प्रकृति है और अव्यक्त है। जगत्का मूल कारण प्रधान है। वह अचेतन है, इसे मायाके रूपमें समझना चाहिये॥ २१-२२॥
कूटस्थ, अद्वितीय पचीसवाँ तत्त्वरूप आत्मा चिन्मय-चेतन होता है। मुनिगण इसे साक्षी, महान् तथा पितामह कहते हैं। इतनेसे यह स्पष्ट है कि महेश्वरकी शाश्वत शक्ति ही संहार करती है। श्रुतिका भी यही कथन है कि रुद्र प्रधान अर्थात् प्रकृतिसे विशेष अर्थात् स्थूल-भूतपर्यन्त सभी तत्त्वोंको दग्ध करते हैं। ज्ञानपरायण सभी योगियोंका आत्यन्तिक प्रलय भी शंकर ही करते हैं॥ २३-२५॥
इस प्रकार सबको अपने वशमें रखनेवाले ये भगवान् रुद्र ही संहार करते हैं। श्रुतिके अनुसार (जगत्की) स्थापना करनेवाली (रुद्रकी) मोहनी शक्तिको ही नारायण कहते हैं। पचीसवें तत्त्व अर्थात् पुरुषस्वरूप भगवान् हिरण्यगर्भ प्रकृतिसे तन्मय (संयुक्त) होकर सम्पूर्ण सत्-असदात्मक जगत्की सृष्टि करते हैं॥ २६-२७॥
अपनी आत्मामें ही व्यवस्थित रहनेवाली (अर्थात् स्वयंमें ही अधिष्ठित वस्तुतः निरधिष्ठान) ब्रह्मा, विष्णु तथा ईश (महेश्वर) नामक सर्वज्ञ, सर्वव्यापी तथा शान्त तीन शक्तियाँ भोग तथा मोक्षरूप फलको देनेवाली हैं। ये शक्तियाँ सर्वेश्वरस्वरूप, सभीके द्वारा वन्दनीय, शाश्वत और अनन्त भोगोंसे सम्पन्न हैं। अद्वितीय अक्षर तत्त्व ही पुरुष, प्रधान और ईश्वररूप है॥ २८-२९॥
उस परमात्मा (अव्यक्त अक्षर-तत्त्व)-में अन्य भी इन्द्र, सूर्य आदि हजारों दिव्य शक्तियाँ हैं। इनकी भी विविध यज्ञोंके द्वारा आराधना की जाती है। इन इन्द्र, सूर्य आदि एक-एक देवका भी ऐसा माहात्म्य है कि इनके सैकड़ों-हजारों अर्थात् अनन्त शरीर हैं और इन शरीरोंमें लोक-कल्याणके लिये अनन्त शक्तियाँ हैं, पर वस्तुतः इन सबका मूल एक ही निर्गुण शक्ति है-॥ ३०-३१॥
४८८ * कूर्मपुराण *
| तां तां शक्तिं समाधाय स्वयं देवो महेश्वरः।<br>करोति देहान् विविधान् ग्रसते चैव लीलया ॥ ३२ ॥<br><br>इज्यते सर्वयज्ञेषु ब्राह्मणैर्वेदवादिभिः।<br>सर्वकामप्रदो रुद्र इत्येषा वैदिकी श्रुतिः ॥ ३३ ॥<br><br>सर्वासामेव शक्तीनां ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।<br>प्राधान्येन स्मृता देवाः शक्तयः परमात्मनः ॥ ३४ ॥<br>आद्यः परस्ताद् भगवान् परमात्मा सनातनः।<br>गीयते सर्वशक्त्यात्मा शूलपाणिर्महेश्वरः ॥ ३५ ॥<br><br>एनमेके वदन्त्यग्निं नारायणमथापरे।<br>इन्द्रमेके परे विश्वान् ब्रह्माणमपरे जगुः ॥ ३६ ॥<br>ब्रह्मविष्ण्वग्निवरुणाः सर्वे देवास्तथर्षयः।<br>एकस्यैवाथ रुद्रस्य भेदास्ते परिकीर्तिताः ॥ ३७ ॥<br><br>यं यं भेदं समाश्रित्य यजन्ति परमेश्वरम्।<br>तत् तद् रूपं समास्थाय प्रददाति फलं शिवः ॥ ३८ ॥<br><br>तस्मादेकतरं भेदं समाश्रित्यापि शाश्वतम्।<br>आराधयन्महादेवं याति तत्परमं पदम् ॥ ३९ ॥<br><br>किन्तु देवं महादेवं सर्वशक्तिं सनातनम्।<br>आराधयेद् वै गिरिशं सगुणं वाथ निर्गुणम् ॥ ४० ॥<br>मया प्रोक्तो हि भवतां योगः प्रागेव निर्गुणः।<br>आरुरुक्षुस्तु सगुणं पूजयेत् परमेश्वरम् ॥ ४१ ॥<br><br>पिनाकिनं त्रिनयनं जटिलं कृत्तवाससम्।<br>पद्मासनस्थं रुक्माभं चिन्तयेद् वैदिकी श्रुतिः ॥ ४२ ॥ | अव्यक्त अक्षर अद्वितीय तत्त्व। उन-उन शक्तियोंका आश्रयण कर महेश्वरदेव स्वयं लीलापूर्वक विविध देहोंकी सृष्टि करते हैं और उनका संहार भी करते हैं। वेदवादी (वेदज्ञ) ब्राह्मणोंके द्वारा समस्त यज्ञोंमें उन (महेश्वर)-का पूजन किया जाता है। ये ही रुद्र हैं तथा सम्पूर्ण कामनाओंको प्रदान करनेवाले हैं—ऐसा वेदका कथन है। परमात्माकी सभी शक्तियोंमें ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश्वर-देव प्रधान शक्तिके रूपमें माने गये हैं॥ ३२—३४ ॥<br>शूलपाणि¹ महेश्वर (कारणब्रह्म-तुरीय तत्त्व) तो आद्य, सबसे परे, भगवान्, परमात्मा, सनातन एवं सर्वशक्त्यात्मा (समस्त शक्तियोंके मूल उद्गम एवं अधिष्ठान)-के रूपमें वेदोंमें वर्णित हैं। इसलिये कुछ लोग इन्हें अग्नि तथा कुछ लोग नारायण कहते हैं। ऐसे ही कोई इन्हें इन्द्र, कोई विश्वेदेव तथा कोई ब्रह्मा कहते हैं॥ ३५-३६ ॥<br>ब्रह्मा, विष्णु, अग्नि, वरुण तथा अन्य सभी देवता और महर्षिगण एक ही रुद्र (महेश्वर)-के विभिन्न स्वरूप कहे गये हैं। मनुष्य इन स्वरूपोंमेंसे जिस भेद (स्वरूप)-का अवलम्बन कर परमेश्वरकी आराधना करते हैं, शिव (महेश्वर) उसी स्वरूपको ग्रहणकर फल प्रदान करते हैं। अतः इनमेंसे किसी एक भी भेद (स्वरूप)-का अवलम्बन कर सनातन महादेवकी आराधना करनेवालेको उस परम (शिव) पदकी प्राप्ति होती है। निष्कर्ष यह है कि सर्वशक्तिसम्पन्न सनातन, देव, गिरिश महादेवकी सगुण अथवा निर्गुण किसी भी रूपमें आराधना अवश्य करनी चाहिये ॥ ३७—४० ॥<br>मैंने आप लोगोंको निर्गुण-योग (निर्बीज समाधि²) पहले ही बता दिया है। सगुणरूप (-की उपासना)-में आरूढ़ होनेकी इच्छा करनेवालेको भी परमेश्वरकी पूजा (आराधना) करनी चाहिये। वेदके कथनके अनुसार पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाले, तीन नेत्रवाले, जटाधारी, चर्माम्बरधारी, पद्मासनमें स्थित तथा स्वर्णिम आभावाले (शंकर)-का ध्यान करना चाहिये॥ ४१-४२ ॥ |
१-महेश्वर कार्यब्रह्म एवं कारणब्रह्म-रूपमें शास्त्रोंमें वर्णित हैं। अव्यक्ततत्त्वकी शक्तिरूपमें जिन महेश्वरकी चर्चा अभी ऊपर की गयी है, वे कार्यब्रह्म हैं। अव्यक्त अक्षर-तत्त्व कारणब्रह्म महेश्वरको समझना चाहिये। इन्हीं कारणब्रह्मको तुरीय (चतुर्थ) अद्वैत या तत्त्व कहा जाता है।
२-'निर्बीज समाधि' साधककी वह अवस्था है, जिसमें कोई भी संस्कार शेष नहीं रहता। इसीलिये इस अवस्थामें किसी भी प्रकारकी चित्तवृत्तिका अस्तित्व नहीं रहता। इसी कारण इस निर्बीज समाधिको कैवल्यावस्था कहते हैं।