भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 485, कुल 506 में से

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पृष्ठ 485
* अध्याय ४१ *४७५
षट्कुलीया ऊचुः<br>भगवन् देवमीशानं भर्गमेकं कपर्दिनम्।<br>केनोपायेन पश्यामो ब्रूहि देवनमस्कृतम्॥ ५ ॥<br><br>ब्रह्मोवाच<br>सत्रं सहस्त्रमासध्वं वाङ्मनोदोषवर्जिताः।<br>देशं च वः प्रवक्ष्यामि यस्मिन् देशे चरिष्यथ॥ ६ ॥<br><br>उक्त्वा मनोमयं चक्रं स सृष्ट्वा तानुवाच ह।<br>क्षिप्तमेतन्मया चक्रमनुव्रजत मा चिरम्।<br>यत्रास्य नेमिः शीर्येत स देशः पुरुषर्षभाः॥ ७ ॥<br>ततो मुमोच तच्चक्रं ते च तत्समनुव्रजन्।<br>तस्य वै व्रजतः क्षिप्रं यत्र नेमिरशीर्यत।<br>नैमिशं तत्स्मृतं नाम्ना पुण्यं सर्वत्र पूजितम्॥ ८ ॥<br><br>सिद्धचारणसंकीर्णं यक्षगन्धर्वसेवितम्।<br>स्थानं भगवतः शम्भोरेतन्नैमिषमुत्तमम्॥ ९ ॥<br><br>अत्र देवाः सगन्धर्वाः सयक्षोरगराक्षसाः।<br>तपस्तप्त्वा पुरा देवा लेभिरे प्रवरान् वरान्॥ १० ॥<br><br>इमं देशं समाश्रित्य षट्कुलीयाः समाहिताः।<br>सत्रेणाराध्य देवेशं दृष्टवन्तो महेश्वरम्॥ ११॥<br><br>अत्र दानं तपस्तप्तं स्नानं जप्यादिकं च यत्।<br>एकैकं पावयेत् पापं सप्तजन्मकृतं द्विजाः॥ १२॥<br><br>अत्र पूर्वं स भगवानृषीणां सत्रमासताम्।<br>प्रोवाच वायुर्ब्रह्माण्डं पुराणं ब्रह्मभाषितम्॥ १३॥<br><br>अत्र देवो महादेवो रुद्राण्या किल विश्वकृत्।<br>रमतेऽद्यापि भगवान् प्रमथैः परिवारितः॥ १४॥<br><br>अत्र प्राणान् परित्यज्य नियमेन द्विजातयः।<br>ब्रह्मलोकं गमिष्यन्ति यत्र गत्वा न जायते॥ १५॥**षट्कुलोत्पन्न ऋषियोंने कहा—**भगवन्! यह बतलायें कि हम किस उपायसे देवताओंद्वारा नमस्कृत, अद्वितीय तेजस्वी कपर्दी ईशानदेवका दर्शन करें॥ ५॥<br><br>**ब्रह्माजी बोले—**आप लोग वाणी तथा मनके दोषोंसे रहित होकर हजार यज्ञविशेष-सत्र सम्पन्न करें। मैं वह देश आप लोगोंको बतलाता हूँ, जहाँ आप यज्ञ करेंगे। ऐसा कहकर उन (ब्रह्मा)-ने एक मनोमय चक्रका निर्माण करके उन (ऋषियों)-से कहा—मेरे द्वारा छोड़े गये इस चक्रका आप लोग अनुगमन करें, विलम्ब न करें। श्रेष्ठ पुरुषो! जहाँ इस (चक्र)-की नेमि शीर्ण होगी (गिरकर टूटेगी) वही स्थान तपस्या एवं यज्ञ करनेका शुभ स्थान होगा॥ ६-७॥<br><br>तब उन्होंने (ब्रह्माने) उस (मनोमय) चक्रको छोड़ा और वे ऋषि उस चक्रके पीछे-पीछे चलने लगे। शीघ्रतापूर्वक जा रहे उस चक्रकी नेमि जहाँ (शीर्ण हुई) गिरी, वह स्थान नैमिश नामसे प्रसिद्ध हुआ और पवित्र तथा सर्वत्र पूजित हुआ। सिद्धों तथा चारणोंसे परिपूर्ण, यक्षों-गन्धर्वोंसे सेवित यह उत्तम नैमिश नामक स्थान भगवान् शम्भुका स्थान है। प्राचीन कालमें यहाँपर तपस्या करके देवताओं, गन्धर्वों, यक्षों, नागों और राक्षसोंने श्रेष्ठ वरोंको प्राप्त किया था॥ ८-१०॥<br><br>(मरीचि, अत्रि, वसिष्ठ, क्रतु, भृगु तथा अंगिरा—इन) छः कुलोंके ऋषियोंने इस देशमें रहते हुए एकाग्रतापूर्वक यज्ञानुष्ठानद्वारा देवेशकी आराधना कर महेश्वरका दर्शन किया था। द्विजो! यहाँ किया गया दान, तप, स्नान तथा जप आदि कोई भी शुभ कर्म अकेला ही सात जन्मोंमें किये पापको नष्ट कर उसे पवित्र बना देता है। प्राचीन कालमें इसी तीर्थमें भगवान् वायुने यज्ञ करनेवाले ऋषियोंको ब्रह्माजीद्वारा कहे गये ब्रह्माण्डपुराणको सुनाया था। आज भी यहाँ विश्वकी सृष्टि करनेवाले भगवान् महादेव प्रमथगणोंसे घिरे रहकर रुद्राणीके साथ रमण करते हैं। (अपनी अन्तिम अवस्थामें) नियमपूर्वक यहाँ निवासकर प्राणोंका परित्याग करनेवाले द्विजाति लोग उस ब्रह्मलोकमें जाते हैं, जहाँ जाकर पुनः जन्म नहीं लेना पड़ता॥ ११-१५॥
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