संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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ततो गच्छेत राजेन्द्र आलिकातीर्थमुत्तमम्।
उपोष्य रजनीमेकां नियतो नियताशनः।
अस्य तीर्थस्य माहात्म्यान्मुच्यते ब्रह्महत्यया॥ ३५॥
राजेन्द्र! वहाँसे उत्तम आलिका-तीर्थमें जाना चाहिये। इस तीर्थका माहात्म्य यह है कि यहाँ एक रात्रि उपवास करके संयत रहते हुए नियमपूर्वक सात्त्विक आहार करनेसे ब्रह्महत्या (-के पाप)-से मुक्ति मिल जाती है॥ ३५॥
एतानि तव संक्षेपात् प्राधान्यात् कथितानि तु।
न शक्या विस्तराद् वक्तुं संख्या तीर्थेषु पाण्डव॥ ३६॥
पाण्डव! संक्षेपमें मैंने प्रधान-प्रधान तीर्थोंको बतलाया। विस्तारपूर्वक तीर्थोंकी संख्याका वर्णन नहीं किया जा सकता॥ ३६॥
एषा पवित्रा विमला नदी त्रैलोक्यविश्रुता।
नर्मदा सरितां श्रेष्ठा महादेवस्य वल्लभा॥ ३७॥
मनसा संस्मरेद्यस्तु नर्मदां वै युधिष्ठिर।
चान्द्रायणशतं साग्रं लभते नात्र संशयः॥ ३८॥
अश्रद्दधानाः पुरुषा नास्तिक्यं घोरमाश्रिताः।
पतन्ति नरके घोरे इत्याह परमेश्वरः॥ ३९॥
नर्मदां सेवते नित्यं स्वयं देवो महेश्वरः।
तेन पुण्या नदी ज्ञेया ब्रह्महत्यापहारिणी॥ ४०॥
यह पवित्र तथा स्वच्छ जलवाली नर्मदा नदी तीनों लोकोंमें विख्यात है। नर्मदा सभी नदियोंमें श्रेष्ठ है और महादेवको अत्यन्त प्रिय है। युधिष्ठिर! जो मनसे भी नर्मदाका स्मरण करता है, वह सौ चान्द्रायण व्रतोंसे भी अधिक फल प्राप्त करता है, इसमें संशय नहीं है। परमेश्वरका यह कहना है कि श्रद्धासे रहित तथा घोर नास्तिकताका आश्रय लेनेवाले पुरुष भीषण नरकमें गिरते हैं (इसलिये ऐसे पुरुषोंको नरकसे बचनेके लिये नर्मदाका दर्शन-सेवन करना चाहिये)। इसी कारण स्वयं देव महेश्वर हम लोगोंको प्रेरणा देनेके लिये नित्य नर्मदाका सेवन करते हैं, अतः इस पवित्र नदीको ब्रह्महत्या-जैसे पापोंको दूर करनेवाली समझना चाहिये (तथा पूर्ण निष्ठाके साथ इसका दर्शन, सेवन अवश्य करना चाहिये)॥ ३७-४०॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे चत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४०॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिभागमें चालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४०॥
एकतालीसवाँ अध्याय
तीर्थमाहात्म्य-प्रकरणमें नैमिषारण्य तथा जयेश्वर-तीर्थकी महिमा, जयेश्वर-तीर्थमें महर्षि शिलादके पुत्र नन्दीकी तपस्या तथा उनके गणाधिपति होनेका आख्यान
सूत उवाच
इदं त्रैलोक्यविख्यातं तीर्थं नैमिशमुत्तमम्।
महादेवप्रियकरं महापातकनाशनम्॥ १॥
महादेवं दिदृक्षूणामृषीणां परमेष्ठिनाम्।
ब्रह्मणा निर्मितं स्थानं तपस्तप्तुं द्विजोत्तमाः॥ २॥
मरीचयोऽत्रयो विप्रा वसिष्ठाः क्रतवस्तथा।
भृगवोऽङ्गिरसः पूर्वा ब्रह्माणं कमलोद्भवम्॥ ३॥
समेत्य सर्ववरदं चतुर्मूर्तिं चतुर्मुखम्।
पृच्छन्ति प्रणिपत्यैनं विश्वकर्माणमच्युतम्॥ ४॥
सूतजीने कहा— तीनों लोकोंमें विख्यात यह उत्तम नैमिष-तीर्थ महादेवको प्रिय लगनेवाला तथा महापातकोंको नष्ट करनेवाला है। द्विजोत्तमो! ब्रह्माने इस नैमिष-तीर्थकी सृष्टि उन परमेष्ठी (ब्रह्मनिष्ठ) ऋषियोंके लिये की है जो महादेवका दर्शन करनेकी इच्छासे तपस्या करना चाहते हैं॥ १-२॥
ब्राह्मणो! प्राचीन कालमें मरीचि, अत्रि, वसिष्ठ, क्रतु, भृगु तथा अंगिराके वंशमें उत्पन्न ऋषियोंने सभी प्रकारका वर देनेवाले, कमलसे उत्पन्न चतुर्मूर्ति, चतुर्मुख, अच्युत, विश्वकर्मा ब्रह्माके पास जाकर प्रणामकर उनसे पूछा—॥ ३-४॥