संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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| * अध्याय ४० * | ४७३ |
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| स्वर्गबिन्दुं ततो गच्छेत् तीर्थं देवनमस्कृतम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् दुर्गतिं नैव गच्छति॥ २२॥<br><br>अप्सरेशं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>क्रीडते नाकलोकस्थो ह्यप्सरोभिः स मोदते॥ २३॥<br>ततो गच्छेत राजेन्द्र भारभूतिमनुत्तमम्।<br>उपोषितोऽर्चयेदीशं रुद्रलोके महीयते।<br>अस्मिंस्तीर्थे मृतो राजन् गाणपत्यमवाप्नुयात्॥ २४॥<br><br>कार्तिके मासि देवेशमर्चयेत् पार्वतीपतिम्।<br>अश्वमेधात् दशगुणं प्रवदन्ति मनीषिणः॥ २५॥<br><br>वृषभं यः प्रयच्छेत तत्र कुन्देन्दुसप्रभम्।<br>वृषयुक्तेन यानेन रुद्रलोकं स गच्छति॥ २६॥<br><br>एतत् तीर्थं समासाद्य यस्तु प्राणान् परित्यजेत्।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा रुद्रलोकं स गच्छति॥ २७॥<br><br>जलप्रवेशं यः कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थे नराधिप।<br>हंसयुक्तेन यानेन स्वर्गलोकं स गच्छति॥ २८॥<br>एरण्ड्या नर्मदायास्तु संगमं लोकविश्रुतम्।<br>तत्र तीर्थं महापुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्॥ २९॥<br><br>उपवासपरो भूत्वा नित्यं व्रतपरायणः।<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र मुच्यते ब्रह्महत्यया॥ ३०॥<br><br>ततो गच्छेत राजेन्द्र नर्मदोदधिसंगमम्।<br>जमदग्निरिति ख्यातः सिद्धो यत्र जनार्दनः॥ ३१॥<br><br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् नर्मदोदधिसंगमे।<br>त्रिगुणं चाश्वमेधस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥ ३२॥<br>ततो गच्छेत राजेन्द्र पिङ्गलेश्वरमुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् रुद्रलोके महीयते॥ ३३॥<br><br>तत्रोपवासं यः कृत्वा पश्येत विमलेश्वरम्।<br>सप्तजन्मकृतं पापं हित्वा याति शिवालयम्॥ ३४॥ | तदुपरान्त देवताओंसे नमस्कृत स्वर्गबिन्दु नामक तीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्यकी दुर्गति नहीं होती। इसके बाद अप्सरेश-तीर्थमें जाकर वहाँ स्नान करना चाहिये। इससे वह स्वर्गलोकमें निवास करते हुए क्रीड़ा करता है और अप्सराओंके साथ आनन्दित होता है॥ २२-२३॥<br><br>राजेन्द्र! तदनन्तर उत्तम भारभूति नामक तीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ उपवास करते हुए ईश्वरकी आराधना करनेसे रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। राजन्! इस तीर्थमें मरनेवाला (शिवलोकमें) गाणपत्य-पद प्राप्त करता है। (यहाँ) कार्तिक मासमें पार्वतीपति देवताओंके ईश शंकरकी पूजा करनी चाहिये। इसका फल मनीषी लोग अश्वमेधके फलसे भी दस गुना अधिक बताते हैं। जो वहाँ कुन्दपुष्प तथा इन्दु (चन्द्रमा)-के समान (श्वेत) वर्णवाले वृषभका दान करता है, वह वृषयुक्त विमानसे रुद्रलोकमें जाता है। इस तीर्थमें पहुँचकर जो प्राणोंका परित्याग करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो विशुद्ध आत्मावाला होकर रुद्रलोकमें जाता है। नराधिप! इस तीर्थमें जो जलमें प्रवेश (-कर प्राणत्याग) करता है, वह हंसयुक्त विमानसे स्वर्गलोक जाता है॥ २४-२८॥<br><br>एरण्डी तथा नर्मदाका संगम विख्यात है। वहाँ सभी पापोंको नष्ट करनेवाला महान् पुण्यप्रद तीर्थ है। राजेन्द्र! वहाँ स्नानकर उपवास करनेवाला तथा नित्य व्रतपरायण रहनेवाला व्यक्ति ब्रह्महत्या (-के पाप)-से मुक्त हो जाता है। राजेन्द्र! तदनन्तर नर्मदा और सागरके संगम-स्थलमें जाना चाहिये। जहाँ जमदग्नि नामसे विख्यात जनार्दनको सिद्धि प्राप्त हुई थी। राजन्! वहाँ नर्मदा तथा सागरके संगममें स्नान करनेसे मनुष्य अश्वमेधके फलका तिगुना फल प्राप्त करता है॥ २९-३२॥<br><br>राजेन्द्र! तदुपरान्त उत्तम पिङ्गलेश्वर तीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान करके मनुष्य रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। वहाँ उपवास करके जो विमलेश्वरका दर्शन करता है, वह सात जन्मोंमें किये पापोंसे मुक्त होकर शिवलोकमें जाता है॥ ३३-३४॥ |