भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 482, कुल 506 में से

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४७२ * कूर्मपुराण *

धौतपापं ततो गच्छेद् धौतं यत्र वृषेण तु।<br>नर्मदायां स्थितं राजन् सर्वपातकनाशनम्।<br>तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा ब्रह्महत्यां व्यपोहति ॥ ९ ॥<br><br>तत्र तीर्थे तु राजेन्द्र प्राणत्यागं करोति यः।<br>चतुर्भुजस्त्रिनेत्रश्च हरतुल्यबलो भवेत् ॥ १० ॥<br><br>वसेत् कल्पायुतं साग्रं शिवतुल्यपराक्रमः।<br>कालेन महता जातः पृथिव्यामेकराड् भवेत् ॥ ११ ॥इसके पश्चात् धौतपाप नामक तीर्थमें जाना चाहिये, जहाँ स्वयं वृष (अर्थात् भगवान् धर्म)-ने अपना (पाप) धोया था। राजन्! सभी पातकोंका नाश करनेवाला वह तीर्थ नर्मदामें स्थित है। उस तीर्थमें स्नानकर मनुष्य ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है। राजेन्द्र! उस तीर्थमें जो प्राणोंका त्याग करता है, वह चार भुजावाला, तीन नेत्रोंवाला और शंकरके समान बलवाला होता है। शिवके समान पराक्रमी होकर वह दस हजार कल्पोंसे भी अधिक समयतक शिवलोकमें निवास करता है और बहुत समयके बाद वह पृथ्वीपर एकच्छत्र सम्राट् बनकर उत्पन्न होता है॥ ९-११॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र हंसतीर्थमनुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् ब्रह्मलोके महीयते ॥ १२ ॥<br><br>ततो गच्छेत राजेन्द्र सिद्धो यत्र जनार्दनः।<br>वराहतीर्थमाख्यातं विष्णुलोकगतिप्रदम् ॥ १३ ॥<br><br>ततो गच्छेत राजेन्द्र चन्द्रतीर्थमनुत्तमम्।<br>पौर्णमास्यां विशेषेण स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र चन्द्रलोके महीयते ॥ १४ ॥<br><br>ततो गच्छेत राजेन्द्र कन्यातीर्थमनुत्तमम्।<br>शुक्लपक्षे तृतीयायां स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र पृथिव्यामेकराड् भवेत् ॥ १५ ॥<br><br>देवतीर्थं ततो गच्छेत् सर्वदेवनमस्कृतम्।<br>तत्र स्नात्वा च राजेन्द्र देवैः सह मोदते ॥ १६ ॥राजेन्द्र! उसके बाद श्रेष्ठ हंस-तीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। राजेन्द्र! वहाँसे विष्णुलोककी गति प्रदान करनेवाले वराहतीर्थ नामसे प्रसिद्ध तीर्थमें जाना चाहिये, जहाँ जनार्दनने सिद्धि प्राप्त की थी। राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ चन्द्रतीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ विशेषरूपसे पौर्णमासीको स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करनेवाला व्यक्ति चन्द्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। राजेन्द्र! इसके पश्चात् अत्युत्तम कन्यातीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ शुक्लपक्षकी तृतीया तिथिको स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करनेसे व्यक्ति पृथ्वीमें एकमात्र सम्राट् होता है। तदनन्तर सभी देवताओंसे वन्दित देवतीर्थमें जाना चाहिये। राजेन्द्र! वहाँ स्नान करनेसे देवताओंके साथ आनन्द (-के अनुभवका अवसर) प्राप्त होता है॥ १२-१६॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र शिखितीर्थमनुत्तमम्।<br>यत् तत्र दीयते दानं सर्वं कोटिगुणं भवेत् ॥ १७ ॥<br><br>ततो गच्छेत राजेन्द्र तीर्थं पैतामहं शुभम्।<br>यत् तत्र क्रियते श्राद्धं सर्वं तदक्षयं भवेत् ॥ १८ ॥<br><br>सावित्रीतीर्थमासाद्य यस्तु प्राणान् परित्यजेत्।<br>विधूय सर्वपापानि ब्रह्मलोके महीयते ॥ १९ ॥<br><br>मनोहरं तु तत्रैव तीर्थं परमशोभनम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् देवैः सह मोदते ॥ २० ॥<br><br>ततो गच्छेत राजेन्द्र मानसं तीर्थमुत्तमम्।<br>स्नात्वा तत्र नरो राजन् रुद्रलोके महीयते ॥ २१ ॥राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ शिखितीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ जो कुछ दान दिया जाता है, वह सब करोड़ गुना फलवाला हो जाता है। राजेन्द्र! शुभ पैतामह तीर्थमें भी जाना चाहिये। वहाँ जो श्राद्ध किया जाता है, वह अक्षय (फलवाला) हो जाता है। सावित्रीतीर्थमें पहुँचकर जो प्राणोंका परित्याग करता है, वह सभी पापोंको धोकर ब्रह्मलोकमें महिमा प्राप्त करता है। वहीं मनोहर नामक परम सुन्दर तीर्थ है। राजन्! वहाँ स्नानकर मनुष्य देवताओंके साथ आनन्द प्राप्त करता है। राजेन्द्र! तदनन्तर उत्तम मानस तीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान करके मनुष्य रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ १७-२१॥
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