भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 481
  • अध्याय ४० * | ४७१ ---|---

काञ्चनेन विमानेन किङ्किणीजालमालिना ।
गत्वा रुद्रपुरं रम्यं रुद्रेण सह मोदते ॥ ९९ ॥
सर्वत्र सर्वदिवसे स्नानं तत्र समाचरेत् ।
पितॄणां तर्पणं कुर्यादश्वमेधफलं लभेत् ॥ १०० ॥ | ऐसा करनेसे किंकिणीके समूहसे अलंकृत सोनेके विमानसे रमणीय रुद्रपुरमें पहुँचने तथा वहाँ रुद्रके साथ आनन्दानुभव करनेका सुअवसर प्राप्त होता है। उस (दशाश्वमेधिक) तीर्थमें सर्वत्र सभी दिनोंमें स्नान करना चाहिये और पितरोंका तर्पण करना चाहिये, इससे अश्वमेधका फल प्राप्त होता है ॥ ९९-१०० ॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें उनतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३९ ॥


चालीसवाँ अध्याय

तीर्थमाहात्म्य-प्रकरणमें नर्मदा तथा उसके समीपवर्ती तीर्थोंकी महिमा, मार्कण्डेय तथा युधिष्ठिरके संवादकी समाप्ति

मार्कण्डेय उवाच

ततो गच्छेत राजेन्द्र भृगुतीर्थमनुत्तमम् ।
तत्र देवो भृगुः पूर्वं रुद्रमाराधयत् पुरा ॥ १ ॥

दर्शनात् तस्य देवस्य सद्यः पापात् प्रमुच्यते ।
एतत् क्षेत्रं सुविपुलं सर्वपापप्रणाशनम् ॥ २ ॥

तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः ।
उपानहोस्तथा युग्मं देयमन्नं सकाञ्चनम् ।
भोजनं च यथाशक्ति तदस्याक्षयमुच्यते ॥ ३ ॥

क्षरन्ति सर्वदानानि यज्ञदानं तपः क्रिया ।
अक्षयं तत् तपस्तप्तं भृगुतीर्थे युधिष्ठिर ॥ ४ ॥

तस्यैव तपसोग्रेण तुष्टेन त्रिपुरारिणा ।
सांनिध्यं तत्र कथितं भृगुतीर्थे युधिष्ठिर ॥ ५ ॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र गौतमेश्वरमुत्तमम् ।
यत्राराध्य त्रिशूलाङ्कं गौतमः सिद्धिमाप्नुयात् ॥ ६ ॥

तत्र स्नात्वा नरो राजन् उपवासपरायणः ।
काञ्चनेन विमानेन ब्रह्मलोके महीयते ॥ ७ ॥

वृषोत्सर्गं ततो गच्छेच्छाश्वतं पदमाप्नुयात् ।
न जानन्ति नरा मूढा विष्णोर्मायाविमोहिताः ॥ ८ ॥


मार्कण्डेयजीने कहा— राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ भृगुतीर्थमें जाना चाहिये। प्राचीन कालमें यहाँ महर्षि भृगुदेवने भगवान् रुद्रकी आराधना की थी। उन देवके दर्शन करनेसे तत्काल पापसे मुक्ति हो जाती है। यह क्षेत्र बहुत बड़ा तथा सभी पापोंको नष्ट करनेवाला है। यहाँ स्नान कर व्यक्ति स्वर्ग जाते हैं और यहाँ मृत्युको प्राप्त होनेवालोंका पुनर्जन्म नहीं होता। यहाँ जूतेका जोड़ा तथा सोनेके साथ अन्नका दान करना चाहिये। यथाशक्ति भोजन भी कराना चाहिये। यह सब अक्षय (फलवाला) कहा गया है। युधिष्ठिर! सभी दान, यज्ञ, तप तथा कर्म नष्ट हो जाते हैं (किंतु) भृगुतीर्थमें किया हुआ तप अक्षय होता है। युधिष्ठिर! उन्हीं (महर्षि भृगु)-की उग्र तपस्यासे प्रसन्न होकर त्रिपुरारि भगवान् शंकर भृगुतीर्थमें सदैव संनिहित रहते हैं, यह शास्त्रोंमें कहा गया है ॥ १–५ ॥

राजेन्द्र! तदनन्तर उत्तम गौतमेश्वर (तीर्थ)-में जाना चाहिये। जहाँ त्रिशूलका चिह्न धारण करनेवाले त्रिशूली (भगवान् शंकर)-की आराधनाकर (महर्षि) गौतमने सिद्धि प्राप्त की थी। राजन्! वहाँ (गौतमेश्वर-तीर्थमें) स्नानकर उपवासरत व्यक्ति सोनेके विमानद्वारा ब्रह्मलोक जाता है तथा वहाँ आदर प्राप्त करता है। तदुपरान्त वृषोत्सर्ग-तीर्थकी यात्रा कर शाश्वत पद प्राप्त करना चाहिये। विष्णुकी मायासे मोहित मूढ़ व्यक्ति इस तीर्थको नहीं जानते ॥ ६–८ ॥