भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 480, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 480

४७० * कूर्मपुराण *


ततो गच्छेत राजेन्द्र कपिलातीर्थमुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ८७॥<br><br>ज्येष्ठमासे तु सम्प्राप्ते चतुर्दश्यां विशेषतः।<br>तत्रोपोष्‍य नरो भक्त्या दद्याद् दीपं घृतेन तु ॥ ८८॥<br><br>घृतेन स्नापयेद् रुद्रं सघृतं श्रीफलं दहेत्।<br>घण्टाभरणसंयुक्तां कपिलां वै प्रदापयेत् ॥ ८९॥<br><br>सर्वाभरणसंयुक्तः सर्वदेवनमस्कृतः।<br>शिवतुल्यबलो भूत्वा शिववत् क्रीडते चिरम् ॥ ९०॥राजेन्द्र ! तदनन्तर उत्तम कपिलातीर्थमें जाना चाहिये। राजन् ! वहाँ स्नानकर व्यक्ति हजार गोदानका फल प्राप्त करता है। ज्येष्ठ मासके आनेपर विशेषरूपसे चतुर्दशी तिथिको वहाँ उपवास कर मनुष्यको भक्तिपूर्वक घृतका दीप-दान करना चाहिये। घृतसे ही रुद्रका अभिषेक करना चाहिये, घृतयुक्त श्रीफलका हवन करना चाहिये और घंटा तथा आभरणोंसे सम्पन्न कपिला गौका दान करना चाहिये। इससे मनुष्य सभी अलंकारोंसे युक्त, सभी देवताओंके लिये वन्दनीय और शिवके समान तुल्य बलवाला होकर चिरकालतक शिवके समान क्रीडा करता है॥ ८७-९०॥
अङ्गारकदिने प्राप्ते चतुर्थ्यां तु विशेषतः।<br>स्नापयित्वा शिवं दद्याद् ब्राह्मणेभ्यस्तु भोजनम् ॥ ९१॥<br><br>सर्वभोगसमायुक्तो विमानैः सार्वकामिकैः।<br>गत्वा शक्रस्य भवनं शक्रेण सह मोदते ॥ ९२॥<br><br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो धनवान् भोगवान् भवेत्।<br>अङ्गारकनवम्यां तु अमावास्यां तथैव च।<br>स्नापयेत् तत्र यत्नेन रूपवान् सुभगो भवेत् ॥ ९३॥विशेषरूपसे मंगलके दिन चतुर्थी पड़नेपर (इस कपिलातीर्थमें) शिवका अभिषेककर ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। ऐसा करनेवाला मनुष्य सभी भोगोंसे समन्वित होकर अपनी इच्छाके अनुसार सर्वत्र अप्रतिहतगति एवं सभी प्रकारकी सुविधाओंसे परिपूर्ण विमानोंके द्वारा इन्द्रके भवनमें जाकर इन्द्रके साथ आनन्दित होता है। स्वर्गसे च्युत होनेपर इस लोकमें भी धनवान् और भोगवान् होता है। अङ्गारक-नवमी (मंगलवारयुक्त नवमी) तथा अमावास्याको भी वहाँ (कपिलातीर्थमें) प्रयत्नपूर्वक अभिषेक करनेसे व्यक्ति रूपवान् तथा सौभाग्यशाली होता है॥ ९१-९३॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र गणेश्वरमनुत्तमम्।<br>श्रावणे मासि सम्प्राप्ते कृष्णपक्षे चतुर्दशी ॥ ९४॥<br><br>स्नातमात्रो नरस्तत्र रुद्रलोके महीयते।<br>पितॄणां तर्पणं कृत्वा मुच्यतेऽसावृणत्रयात् ॥ ९५॥राजेन्द्र ! तदनन्तर उत्तम गणेश्वर (तीर्थ)-में जाना चाहिये। श्रावण मास आनेपर कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है और पितरोंका तर्पण करनेसे तीनों ऋणोंसे मुक्त हो जाता है॥ ९४-९५॥
गङ्गेश्वरसमीपे तु गङ्गावदनमुत्तमम्।<br>अकामो वा सकामो वा तत्र स्नात्वा तु मानवः।<br>आजन्मजनितैः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः ॥ ९६॥गणेश्वर (तीर्थ)-के समीप श्रेष्ठ गङ्गावदन नामक तीर्थ है। वहाँ मनुष्य कामनापूर्वक अथवा निष्कामभावसे स्नान करके जन्मभरके किये गये पापोंसे मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है॥ ९६॥
तस्य वै पश्चिमे देशे समीपे नातिदूरतः।<br>दशाश्वमेधिकं तीर्थं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ ९७॥<br><br>उपोष्‍य रजनीमेकां मासि भाद्रपदे शुभे।<br>अमावस्यां नरः स्नात्वा पूजयेद् वृषभध्वजम् ॥ ९८॥उस (गङ्गावदन)-के पश्चिमी भागमें बहुत दूर नहीं अपितु समीपमें ही तीनों लोकोंमें विख्यात दशाश्वमेधिक नामक तीर्थ है। वहाँ शुभ भाद्रपद मासकी अमावास्याको एक रात्रिका उपवासकर स्नानपूर्वक वृषभध्वजका पूजन करना चाहिये॥ ९७-९८॥