भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 489, कुल 506 में से

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पृष्ठ 489
  • अध्याय ४२ * ४७९
हिमवच्छिखरे रम्ये गङ्गाद्वारे सुशोभने।<br>देव्या सह महादेवो नित्यं शिष्यैश्च संवृतः ॥ १३॥<br><br>तत्र स्नात्वा महादेवं पूजयित्वा वृषध्वजम्।<br>सर्वपापैर्विमुच्येत मृतस्तज्ज्ञानमाप्नुयात् ॥ १४॥<br>अन्यच्च देवदेवस्य स्थानं पुण्यतमं शुभम्।<br>भीमेश्वरमिति ख्यातं गत्वा मुञ्चति पातकम्॥ १५॥<br><br>तथान्यच्चण्डवेगायाः सम्भेदः पापनाशनः।<br>तत्र स्नात्वा च पीत्वा च मुच्यते ब्रह्महत्यया ॥ १६॥<br>सर्वेषामपि चैतेषां तीर्थानां परमा पुरी।<br>नाम्ना वाराणसी दिव्या कोटिकोट्ययुताधिका ॥ १७॥<br><br>तस्याः पुरस्तान्माहात्म्यं भाषितं वो मया त्विह।<br>नान्यत्र लभ्यते मुक्तिर्योगिनाप्येकजन्मना ॥ १८॥<br>एते प्राधान्यतः प्रोक्ता देशाः पापहरा नृणाम्।<br>गत्वा संक्षालयेत् पापं जन्मान्तरशतैः कृतम् ॥ १९॥<br><br>यः स्वधर्मान् परित्यज्य तीर्थसेवां करोति हि।<br>न तस्य फलते तीर्थमिह लोके परत्र च ॥ २०॥<br>प्रायश्चित्ती च विधुरस्तथा पापचरो गृही।<br>प्रकुर्यात् तीर्थसंसेवां ये चान्ये तादृशा जनाः ॥ २१॥<br><br>सहाग्निर्वा सपत्नीको गच्छेत् तीर्थानि यत्नतः।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो यथोक्तां गतिमाप्नुयात् ॥ २२॥<br><br>ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य कुर्याद् वा तीर्थसेवनम्।<br>विधाय वृत्तिं पुत्राणां भार्या तेषु निधाय च ॥ २३॥हिमालयके रमणीय शिखरपर स्थित अत्यन्त सुन्दर गङ्गाद्वारमें शिष्योंसे घिरे हुए महादेव देवीके साथ नित्य निवास करते हैं। वहाँ स्नानकर वृषध्वज महादेवकी पूजा करनेसे सभी पापोंसे मुक्ति हो जाती है और मृत्युके बाद परम ज्ञान प्राप्त होता है॥ १३-१४॥<br><br>देवाधिदेव (शंकर)-का एक दूसरा शुभ तथा पवित्रतम स्थान है जो भीमेश्वर इस नामसे विख्यात है। वहाँ जानेसे व्यक्ति पापसे मुक्त हो जाता है। इसी प्रकार चण्डवेगा नदीका उद्गम-स्थान भी पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ स्नान करने तथा जलका पान करनेसे मनुष्य ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है॥ १५-१६॥<br><br>इन सभी तीर्थोंमें भी श्रेष्ठ तथा दिव्य वाराणसी नामकी पुरी हजारों कोटिगुना अधिक फलप्रदा है। पूर्वमें मैंने आप लोगोंसे उसके माहात्म्यका वर्णन किया था। योगीको भी (वाराणसीके अतिरिक्त) अन्यत्र एक जन्ममें मुक्ति नहीं मिलती॥ १७-१८॥<br><br>मनुष्योंके पापोंको हरनेवाले ये प्रधान-प्रधान देश (तीर्थ) बतलाये गये हैं। यहाँ जाकर सैकड़ों जन्मोंमें किये पापोंका प्रक्षालन करना चाहिये। जो अपने धर्मोंका परित्यागकर तीर्थोंका सेवन करता है, उसके लिये तीर्थ न इस लोकमें फलदायी होते हैं न परलोकमें॥ १९-२०॥<br><br>प्रायश्चित्ती, पत्नीसे रहित विधुर पुरुष तथा जिनके द्वारा पाप हो गया है ऐसे गृहस्थ एवं इसी प्रकारके जो अन्य लोग हैं, उन्हें (पश्चात्तापपूर्वक यथाशास्त्र) तीर्थोंका सेवन करना चाहिये। प्रयत्नपूर्वक अग्नि* अथवा पत्नीके साथ तीर्थोंमें जाना चाहिये। ऐसा करनेसे मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त होकर यथोक्त गति (उत्तम गति) प्राप्त करता है। अथवा तीनों ऋणोंसे मुक्त होनेके बाद पुत्रोंके लिये जीविका-सम्बन्धी वृत्तिकी व्यवस्थाकर और अपनी पत्नीको उन्हें सौंपकर तीर्थका सेवन करना चाहिये॥ २१-२३॥

* अग्निहोत्री वानप्रस्थ-आश्रम स्वीकारकर अपनी अग्नि तथा धर्मपत्नीके साथ तीर्थमें निवास करता है।

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