भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४७८* कूर्मपुराण *

बयालीसवाँ अध्याय

विविध शैव-तीर्थोंके माहात्म्यका निरूपण, तीर्थोंके अधिकारी तथा तीर्थ-माहात्म्यका उपसंहार

| सूत उवाच | सूतजीने कहा— ज्येष्ठेश्वरके समीपमें ही पञ्चनद नामका एक दूसरा श्रेष्ठ तीर्थ है, जो पवित्र तथा सभी पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ तीन रात्रिपर्यन्त उपवासकर महेश्वरकी पूजा करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा विशुद्ध आत्मावाला होकर रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। अमित तेजस्वी शंकरका एक दूसरा श्रेष्ठ तीर्थ है जो महाभैरव नामसे कहा गया है, वह महापातकोंका नाश करनेवाला है। वितस्ता नामक श्रेष्ठ नदी तीर्थोंमें परम तीर्थ है, वह सभी पापोंको हरनेवाली, पवित्र और साक्षात् पार्वतीरूप ही है॥ १-४॥ | | अन्यच्च तीर्थप्रवरं ज्येष्ठेश्वरसमीपतः।<br>नाम्ना पञ्चनदं पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्॥ १ ॥ | | | त्रिरात्रोपोषितस्तत्र पूजयित्वा महेश्वरम्।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा रुद्रलोके महीयते॥ २ ॥ | | | अन्यच्च तीर्थप्रवरं शंकरस्यामितौजसः।<br>महाभैरवमित्युक्तं महापातकनाशनम्॥ ३ ॥ | | | तीर्थानां च परं तीर्थं वितस्ता परमा नदी।<br>सर्वपापहरा पुण्या स्वयमेव गिरीन्द्रजा॥ ४ ॥ | | | तीर्थं पञ्चतपं नाम शम्भोरमिततेजसः।<br>यत्र देवादिदेवेन चक्रार्थं पूजितो भवः॥ ५ ॥ | अमित तेजस्वी शम्भुका पञ्चतप नामका एक तीर्थ है, जहाँ देवोंके आदिदेव (विष्णु)-ने चक्र-प्राप्तिके लिये शंकरकी पूजा की थी। वहाँ (पञ्चनद तीर्थमें) किया गया पिण्डदान आदि कर्म परलोकमें अनन्त फल प्रदान करनेवाला होता है। वहाँ संकल्पपूर्वक नियमसे निवास करते हुए यथासमय प्राण-त्याग करनेवाला ब्रह्मलोकमें महिमा प्राप्त करता है॥ ५-६॥ | | पिण्डदानादिकं तत्र प्रेत्यानन्तफलप्रदम्।<br>मृतस्तत्रापि नियमाद् ब्रह्मलोके महीयते॥ ६ ॥ | | | कायावरोहणं नाम महादेवालयं शुभम्।<br>यत्र माहेश्वरा धर्मा मुनिभिः सम्प्रवर्तिताः॥ ७ ॥ | कायावरोहण नामक महादेवका एक शुभ स्थान (तीर्थ) है, जहाँ मुनियोंने माहेश्वर धर्मोंका प्रवर्तन किया था। वहाँ किया गया श्राद्ध, दान, तप, होम तथा उपवास अक्षय (फल प्रदान करनेवाला) होता है। वहाँ जो प्राण परित्याग करता है, वह रुद्रलोकमें जाता है। एक दूसरा श्रेष्ठ तीर्थ है, जो कन्यातीर्थ इस नामसे विख्यात है। वहाँ जाकर प्राणोंका परित्याग करनेसे शाश्वत लोकोंकी प्राप्ति होती है। जमदग्निके पुत्र अक्लिष्टकर्मा परशुरामका भी एक शुभ तीर्थ है। उस तीर्थ-श्रेष्ठमें स्नान करनेसे हजार गोदानका फल प्राप्त होता है। महाकाल इस नामसे विख्यात तीर्थ तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। वहाँ जाकर प्राणोंका परित्याग करनेसे गाणपत्य-पद प्राप्त होता है। श्रेष्ठ नकुलीश्वर तीर्थ गुह्यस्थानोंमें भी अत्यन्त गुह्य है। वहाँ श्रीमान् भगवान् नकुलीश्वर विराजमान रहते हैं॥ ७-१२॥ | | श्राद्धं दानं तपो होम उपवासस्तथाक्षयः।<br>परित्यजति यः प्राणान् रुद्रलोकं स गच्छति॥ ८ ॥ | | | अन्यच्च तीर्थप्रवरं कन्यातीर्थमिति श्रुतम्।<br>तत्र गत्वा त्यजेत् प्राणाँल्लोकान् प्राप्नोति शाश्वतान्॥ ९ ॥ | | | जामदग्न्यस्य तु शुभं रामस्याक्लिष्टकर्मणः।<br>तत्र स्नात्वा तीर्थवरे गोसहस्रफलं लभेत्॥ १० ॥ | | | महाकालमिति ख्यातं तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।<br>गत्वा प्राणान् परित्यज्य गाणपत्यमवाप्नुयात्॥ ११ ॥ | | | गुह्याद् गुह्यतमं तीर्थं नकुलीश्वरमुत्तमम्।<br>तत्र संनिहितः श्रीमान् भगवान् नकुलीश्वरः॥ १२ ॥ | |