भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४८० | * कूर्मपुराण *


प्रायश्चित्तप्रसङ्गेन तीर्थमाहात्म्यमीरितम्।<br>यः पठेच्छृणुयाद् वापि मुच्यते सर्वपातकैः ॥ २४॥प्रायश्चित्तके प्रसंगवश तीर्थोंके माहात्म्यका वर्णन किया गया। इसे पढ़नेवाला अथवा सुननेवाला भी सभी पातकोंसे मुक्त हो जाता है॥ २४॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें बयालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ४२ ॥


तैंतालीसवाँ अध्याय

चतुर्विध प्रलयका प्रतिपादन, नैमित्तिक प्रलयका विशेष वर्णन, विष्णुद्वारा अपने माहात्म्यका निरूपण

सूत उवाचसूतजीने कहा—
एतदाकर्ण्य विज्ञानं नारायणमुखेरितम्।<br>कूर्मरूपधरं देवं पप्रच्छुर्मुनयः प्रभुम् ॥ १॥नारायणके मुखसे कहे गये इस विशिष्ट ज्ञानको सुनकर मुनियोंने कूर्मरूप धारण करनेवाले प्रभु देवसे पूछा—॥ १॥
मुनय ऊचुःमुनियोंने कहा—
कथिता भवता धर्मा मोक्षज्ञानं सविस्तरम्।<br>लोकानां सर्गविस्तारं वंशमन्वन्तराणि च ॥ २॥(सूतजी!) आपने विस्तारपूर्वक धर्म, मोक्ष, ज्ञान, लोकोंकी सृष्टिके विस्तार, वंश और मन्वन्तरोंको हमें बतलाया। माधव! भूतभव्येश! जैसा आपने पूर्वमें (पुराण-लक्षणके प्रसंगसे प्रतिसर्गके विषयमें) बतलाया है, तदनुसार अब हमें प्राणियोंके प्रतिसर्गके विषयमें बतलायें ॥ २-३॥
प्रतिसर्गमिदानीं नो वक्तुमर्हसि माधव।<br>भूतानां भूतभव्येश यथा पूर्वं त्वयोदितम् ॥ ३॥
सूत उवाचसूतजीने कहा—
श्रुत्वा तेषां तदा वाक्यं भगवान् कूर्मरूपधृक्।<br>व्याजहार महायोगी भूतानां प्रतिसंचरम् ॥ ४॥तब उनके उस वचनको सुनकर कूर्मरूपधारी महायोगी भगवान्‌ने भूतोंके प्रतिसंचर अर्थात् प्रलयका वर्णन किया ॥ ४॥
कूर्म उवाचकूर्म बोले—
नित्यो नैमित्तिकश्चैव प्राकृतात्यन्तिकौ तथा।<br>चतुर्धायं पुराणेऽस्मिन् प्रोच्यते प्रतिसंचरः ॥ ५॥इस पुराणमें नित्य, नैमित्तिक, प्राकृत तथा आत्यन्तिक—इस प्रकारसे चार प्रकारका प्रतिसंचर (प्रलय) कहा गया है। लोकमें यहाँ जो प्राणियोंका नित्य क्षय दिखलायी देता है, उसे मुनियोंने नित्य-प्रलयके नामसे कहा है। कल्पान्तमें ब्रह्मा (की निद्रा)-के निमित्तसे होनेवाले तीनों लोकोंके प्रतिसर्ग—प्रलयको विद्वानोंने (नैमित्तिक प्रलय) कहा है। महत्तत्त्वसे लेकर विशेषपर्यन्त समस्त तत्त्वोंका जो क्षय हो जाता है, उसे कालचिन्तकोंने प्राकृत प्रतिसर्ग कहा है और ज्ञानद्वारा परमात्मामें होनेवाले योगियोंके आत्यन्तिक प्रलयको* कालचिन्तक द्विज आत्यन्तिक प्रतिसर्ग (प्रलय) कहते हैं ॥ ५-९॥
योऽयं संदृश्यते नित्यं लोके भूतक्षयस्त्विह।<br>नित्यः संकीर्त्यते नाम्ना मुनिभिः प्रतिसंचरः ॥ ६॥
ब्राह्मो नैमित्तिको नाम कल्पान्ते यो भविष्यति।<br>त्रैलोक्यस्यास्य कथितः प्रतिसर्गो मनीषिभिः ॥ ७॥
महदाद्यं विशेषान्तं यदा संयाति संक्षयम्।<br>प्राकृतः प्रतिसर्गोऽयं प्रोच्यते कालचिन्तकैः ॥ ८॥
ज्ञानादात्यन्तिकः प्रोक्तो योगिनः परमात्मनि।<br>प्रलयः प्रतिसर्गोऽयं कालचिन्तापरैर्द्विजैः ॥ ९॥

* यहाँ 'प्रलय' का तात्पर्य परमात्मतत्त्वके साथ एकरूपतामें है।