भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • अध्याय ४३ * / ४८१

आत्यन्तिकश्च कथितः प्रलयोऽत्र ससाधनः ।<br>नैमित्तिकमिदानीं वः कथयिष्ये समासतः ॥ १० ॥यहाँ साधनसहित आत्यन्तिक प्रलय अर्थात् मोक्षका वर्णन किया गया है। अब मैं संक्षेपमें आप लोगोंको नैमित्तिक प्रलयके विषयमें बतलाऊँगा ॥ १० ॥
चतुर्युगसहस्रान्ते सम्प्राप्ते प्रतिसंचरे।<br>स्वात्मसंस्थाः प्रजाः कर्तुं प्रतिपेदे प्रजापतिः ॥ ११ ॥एक हजार चतुर्युग (सत्य-त्रेता-द्वापर तथा कलियुग)-के अन्तमें प्रलयकाल उपस्थित होनेपर प्रजापति समस्त प्रजाको आत्मस्थ करनेकी इच्छा करते हैं। इसके बाद सौ वर्षोंतक तीव्र अनावृष्टि होती है, वह भूतों एवं सभी प्राणियोंका विनाश करनेवाली तथा अत्यन्त भयंकर होती है। तदनन्तर भूमिपर जो अल्पसार अर्थात् निर्बल प्राणी होते हैं, सबसे पहले उनका लय होता है और वे भूमिमें मिल जाते हैं। तब सात रश्मियोंवाले रथपर आरूढ़ होकर सूर्य उदित होते हैं। उनकी किरणें असह्य हो जाती हैं, वे अपनी किरणोंद्वारा जल पीने लगते हैं। उनकी वे सातों रश्मियाँ महासमुद्रमें स्थित जलको पीती हैं। उस आहारसे उद्दीप्त होकर वे (सात) रश्मियाँ पुनः सात सूर्य बन जाती हैं। तदनन्तर सूर्यरूप वे सातों रश्मियाँ चारों दिशाओं तथा सम्पूर्ण इस चतुर्लोकको अग्निके समान दग्ध करने लगती हैं ॥ ११–१६ ॥
ततो भवत्यनावृष्टिस्तीव्रा सा शतवार्षिकी।<br>भूतक्षयकरी घोरा सर्वभूतक्षयंकारी ॥ १२ ॥
ततो यान्यल्पसाराणि सत्त्वानि पृथिवीतले।<br>तानि चाग्रे प्रलीयन्ते भूमित्वमुपयान्ति च ॥ १३ ॥
सप्तरश्मिरथो भूत्वा समुत्तिष्ठन् दिवाकरः।<br>असह्यरश्मिर्भवति पिबन्नम्भो गभस्तिभिः ॥ १४ ॥
तस्य ते रश्मयः सप्त पिबन्त्यम्बु महार्णवे।<br>तेनाहारेण ता दीप्ताः सूर्याः सप्त भवन्त्युत ॥ १५ ॥
ततस्ते रश्मयः सप्त सूर्या भूत्वा चतुर्दिशम्।<br>चतुर्लोकमिदं सर्वं दहन्ति शिखिनस्तथा ॥ १६ ॥
व्याप्नुवन्तश्च ते विप्रास्तूर्ध्वं चाधश्च रश्मिभिः।<br>दीप्यन्ते भास्कराः सप्त युगान्ताग्निप्रतापिनः ॥ १७ ॥ब्राह्मणो ! प्रलयकालीन अग्निके तेजसे युक्त वे सातों सूर्य अपनी-अपनी रश्मियोंके द्वारा ऊर्ध्व तथा अधोभागको व्याप्तकर अतिशय उद्दीप्त हो जाते हैं। जलसे प्रदीप्त अनेक सहस्र रश्मियोंवाले वे सूर्य आकाशको आवृत्तकर स्थित रहते हैं और पृथिवीको जलाने लगते हैं। तदनन्तर उनके तेजसे जलती हुई पृथ्वी पर्वतों, नदियों, समुद्रों तथा द्वीपोंके साथ स्नेह (द्रवभाव)-से रहित हो जाती है अर्थात् अत्यन्त सूख जाती है। सतत प्रदीप्त रहनेवाली वे रश्मियाँ ऊपर-नीचे तथा आड़े-तिरछे सभी ओर व्याप्त हो जाती हैं ॥ १७–२० ॥
ते सूर्या वारिणा दीप्ता बहुसाहस्ररश्मयः।<br>खं समावृत्य तिष्ठन्ति निर्दहन्तो वसुंधराम् ॥ १८ ॥
ततस्तेषां प्रतापेन दह्यमाना वसुंधरा।<br>साद्रिनद्यर्णवद्वीपा निस्नेहा समपद्यत ॥ १९ ॥
दीप्ताभिः संतताभिश्च रश्मिभिर्वै समन्ततः।<br>अधश्चोर्ध्वं च लग्नाभिस्तिर्यक् चैव समावृतम् ॥ २० ॥
सूर्याग्निना प्रमृष्टानां संसृष्टानां परस्परम्।<br>एकत्वमुपयातानामेकज्वालं भवत्युत ॥ २१ ॥सूर्यरूप अग्निके द्वारा प्रकृष्टरूपसे शोधित और परस्पर संसृष्ट संसारके समस्त पदार्थ एक ज्वालाके रूपमें एकाकार हो जाते हैं। सभी लोकोंको नष्ट करनेवाली वह सूर्यरूप अग्नि एक मण्डलके रूपमें होकर अपने तेजसे इस सम्पूर्ण चतुर्लोकको दग्ध करने लगती है ॥ २१-२२ ॥
सर्वलोकप्रणाशश्च सोऽग्निर्भूत्वा सुकुण्डली।<br>चतुर्लोकमिदं सर्वं निर्दहत्यात्मतेजसा ॥ २२ ॥