भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४८२* कूर्मपुराण *
ततः प्रलीने सर्वस्मिञ्जङ्गमे स्थावरे तथा।<br>निर्वृक्षा निस्तृणा भूमिः कूर्मपृष्ठा प्रकाशते॥ २३॥तब सम्पूर्ण स्थावर एवं जंगम पदार्थोंके लीन हो जानेपर वृक्षों तथा तृणोंसे रहित भूमि कछुएके पीठके समान दिखलायी देती है। (किरणोंसे) व्याप्त समस्त जगत् अम्बरीष (भड़-भूजेकी कड़ाही)-के सदृश वर्णवाला दिखलायी देता है। उन ज्वालाओंके द्वारा सभी कुछ पूर्णरूपसे प्रज्वलित होने लगता है॥ २३-२४॥
अम्बरीषमिवाभाति सर्वमापूरितं जगत्।<br>सर्वमेव तदर्चिर्भिः पूर्णं जाज्वल्यते पुनः॥ २४॥<br>पाताले यानि सत्त्वानि महोदधिगतानि च।<br>ततस्तानि प्रलीयन्ते भूमित्वमुपयान्ति च॥ २५॥<br><br>द्वीपांश्च पर्वतांश्चैव वर्षाण्यथ महोदधीन्।<br>तान् सर्वान् भस्मसात् कृत्वा सप्तात्मा पावकः प्रभुः॥ २६॥<br><br>समुद्रेभ्यो नदीभ्यश्च पातालेभ्यश्च सर्वशः।<br>पिबन्नपः समिद्धोऽग्निः पृथिवीमाश्रितो ज्वलन्॥ २७॥तदनन्तर पातालमें तथा महासमुद्रोंमें जो प्राणी रहते हैं, उनका लय होता है और वे सभी भूमिके रूपमें परिवर्तित हो जाते हैं। सात (सूर्यों)-के रूपमें प्रदीप्त हो रहे प्रभु पावक (अग्निदेव) उन सभी द्वीपों, पर्वतों, वर्षों तथा महासमुद्रोंको भस्मसात् कर देते हैं। समुद्रों, नदियों तथा पातालोंके सम्पूर्ण जलका शोषण करती हुई प्रदीप्त अग्नि (सूर्यकी ज्वाला) पृथ्वीपर प्रज्वलित होने लगती है अर्थात् पृथ्वीको जलाने लगती है॥ २५-२७॥
ततः संवर्तकः शैलानतिक्रम्य महांस्तथा।<br>लोकान् दहति दीप्तात्मा रुद्रतेजोविजृम्भितः॥ २८॥<br><br>स दग्ध्वा पृथिवीं देवो रसातलमशोषयत्।<br>अधस्तात् पृथिवीं दग्ध्वा दिवमूर्ध्वं दहिष्यति॥ २९॥<br><br>योजनानां शतानीह सहस्राण्ययुतानि च।<br>उत्तिष्ठन्ति शिखास्तस्य वह्नेः संवर्तकस्य तु॥ ३०॥तदनन्तर महान् संवर्तक नामक अग्नि पर्वतोंका अतिक्रमण करते हुए रुद्रके तेजसे पुष्ट होनेके कारण दीप्त आत्मावाला होकर लोकोंको जलाने लगती है। (सम्पूर्ण) पृथ्वीको दग्धकर वे अग्निदेव रसातलको शोषित करते हैं। पृथ्वीके नीचेके भागको जलाकर ऊपरके द्युलोकको जलाने लगते हैं। उस संवर्तक अग्निकी शिखाएँ सैकड़ों, हजारों तथा दस हजार योजन ऊपरतक उठने लगती हैं॥ २८-३०॥
गन्धर्वांश्च पिशाचांश्च सयक्षोरगराक्षसान्।<br>तदा दहत्यसौ दीप्तः कालरुद्रप्रचोदितः॥ ३१॥<br><br>भूर्लोकं च भुवर्लोकं स्वर्लोकं च तथा महः।<br>दहेदशेषं कालाग्निः कालो विश्वतनुः स्वयम्॥ ३२॥<br><br>व्याप्तेष्वेतेषु लोकेषु तिर्यगूर्ध्वमथाग्निना।<br>तत् तेजः समनुप्राप्य कृत्स्नं जगदिदं शनैः।<br>अयोगुडनिभं सर्वं तदा चैकं प्रकाशते॥ ३३॥तब कालरुद्रद्वारा प्रेरित होकर यह उद्दीप्त अग्नि गन्धर्वों, पिशाचों, यक्षों, नागों तथा राक्षसोंको जलाती है। कालाग्निस্বরূপ विश्वात्मा स्वयं काल भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक तथा महर्लोकको सम्पूर्णरूपसे जला देता है। इन लोकोंमें तिरछे तथा ऊँचे सब जगह अग्निके द्वारा व्याप्त कर दिये जानेपर यह सम्पूर्ण जगत् उस तेजसे धीरे-धीरे पूरित होकर (जलते हुए) एक अयःपिण्ड (लोहपिण्ड)-के समान प्रकाशित होने लगता है॥ ३१-३३॥
ततो गजकुलोन्नादास्तडिद्भिः समलंकृताः।<br>उत्तिष्ठन्ति तदा व्योम्नि घोराः संवर्तका घनाः॥ ३४॥तदनन्तर हाथियोंके समूहके समान नाद करनेवाले विद्युत्से अलंकृत संवर्तक नामक भयंकर मेघ आकाशमें प्रकट होते हैं॥ ३४॥
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