संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ४३ * | ४८३ ---|---
| केचिन्नीलोत्पलश्यामाः केचित् कुमुदसंनिभाः ।<br>धूम्रवर्णास्तथा केचित् केचित् पीताः पयोधराः ॥ ३५ ॥<br><br>केचिद् रासभवर्णास्तु लाक्षारसनिभास्तथा ।<br>शङ्खकुन्दनिभाश्चान्ये जात्यञ्जननिभाः परे ॥ ३६ ॥<br><br>मनःशिलाभास्त्वन्ये च कपोतसदृशाः परे ।<br>इन्द्रगोपनिभाः केचिद्धरितालनिभास्तथा ।<br>इन्द्रचापनिभाः केचिदुत्तिष्ठन्ति घना दिवि ॥ ३७ ॥<br>केचित् पर्वतसंकाशाः केचिद् गजकुलोपमाः ।<br>कूटाङ्गारनिभाश्चान्ये केचिन्मीनकुलोद्वहाः ।<br>बहुरूपा घोररूपा घोरस्वरनिनादिनः ॥ ३८ ॥<br><br>तदा जलधराः सर्वे पूरयन्ति नभःस्थलम् ।<br>ततस्ते जलदा घोरा राविणो भास्करात्मजाः ।<br>सप्तधा संवृतात्मानस्तमग्निं शमयन्त्युत ॥ ३९ ॥<br>ततस्ते जलदा वर्षं मुञ्चन्तीह महौघवत् ।<br>सुघोरमशिवं सर्वं नाशयन्ति च पावकम् ॥ ४० ॥<br><br>प्रवृष्टे च तदात्यर्थमम्भसा पूर्यते जगत् ।<br>अद्भिस्तेजोऽभिभूतत्वात् तदग्निः प्रविशत्यपः ॥ ४१ ॥<br>नष्टे चाग्नौ वर्षशतैः पयोदाः क्षयसम्भवाः ।<br>प्लावयन्तोऽथ भुवनं महाजलपरिस्त्रवैः ॥ ४२ ॥<br><br>धाराभिः पूरयन्तीदं चोद्यमानाः स्वयम्भुवा ।<br>अत्यन्तसलिलौघैश्च वेला इव महोदधिः ॥ ४३ ॥<br>साद्रिद्वीपा तथा पृथ्वी जलैः संच्छाद्यते शनैः ।<br>आदित्यरश्मिभिः पीतं जलमभ्रेषु तिष्ठति ।<br>पुनः पतति तद् भूमौ पूर्यन्ते तेन चार्णवाः ॥ ४४ ॥<br><br>ततः समुद्राः स्वां वेलामतिक्रान्तास्तु कृत्स्नशः ।<br>पर्वताश्च विलीयन्ते मही चाप्सु निमज्जति ॥ ४५ ॥ | उन मेघोंमेंसे कुछ नीलकमलके समान श्यामवर्णके, कुछ कुमुदके समान श्वेत वर्णके, कुछ धूम्रवर्णके, कुछ पीतवर्णके, कुछ रासभ (धूसर) वर्णके, कुछ लाक्षारसके समान, कुछ दूसरे शंख तथा कुन्द (पुष्प)-के समान रंगवाले, कुछ जाती पुष्प (चमेली)-के तथा अञ्जन (काजल)-के समान, कुछ मनःशिला (मैनसिल)-के समान रंगवाले और कुछ दूसरे कपोतके समान वर्णवाले, कुछ इन्द्रगोप (बीरबहूटी कीट)-के समान, कुछ हरतालके समान और कुछ इन्द्रधनुषके समान वर्णवाले मेघ आकाशमें प्रकट होते हैं ॥ ३५-३७ ॥<br><br>कुछ मेघ पर्वतके तुल्य, कुछ हाथियोंके समूहके समान, कुछ कूटाङ्गारके समान और कुछ मछलियोंके समूहके आकारके होते हैं। वे मेघ अनेक रूप धारण करनेवाले, भयंकर आकारवाले तथा घोर गर्जना-जैसी ध्वनि करनेवाले होते हैं। उस समय वे सभी बादल आकाशको व्याप्त कर लेते हैं, तदनन्तर भास्करसे उत्पन्न गर्जना करनेवाले वे सात प्रकारके भयंकर बादल एकत्रित होकर उस अग्निको शान्त करते हैं ॥ ३८-३९ ॥<br><br>तदुपरान्त वे मेघ महान् बाढ़के समान जलकी वर्षा करते हैं और अत्यन्त भयंकर, अकल्याणकारी उस सम्पूर्ण अग्निको नष्ट कर देते हैं। अतिशय वृष्टि होनेके कारण जगत् जलसे परिपूर्ण हो जाता है। जलके द्वारा तेज (अग्नि)-के अभिभूत होनेके कारण उस समय वह अग्नि जलमें प्रविष्ट हो जाता है ॥ ४०-४१ ॥<br><br>इस तरह अग्निके शान्त हो जानेपर स्वयम्भू-ब्रह्माके द्वारा प्रेरित मेघ अत्यधिक जलके प्रवाहोंसे समस्त भुवनको आप्लावित करते हुए वैसे ही अपनी जलधाराओंसे इस भुवनको परिपूर्ण कर देते हैं, जैसे समुद्र अत्यधिक जलोंके प्रवाहोंसे अपने तटोंको आप्लावित कर देता है। ये मेघ इतने जलसे भरपूर हैं कि इनका क्षय दिव्य सैकड़ों वर्षोंमें कदाचित् सम्भव है ॥ ४२-४३ ॥<br><br>धीरे-धीरे पर्वतों तथा द्वीपोंवाली पृथ्वी जलसे ढक जाती है और सूर्यकी रश्मियोंद्वारा गृहीत वह जल बादलोंमें स्थित रहता है। पुनः वह जल पृथ्वीपर गिरता है और उससे समुद्र इतने आपूरित हो जाते हैं कि सर्वत्र अपने तटोंका अतिक्रमण कर वे जलमय हो जाते हैं, पर्वत जलमें विलीन हो जाते हैं और पृथ्वी भी जलमें डूब जाती है ॥ ४४-४५ ॥ |