संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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४८४ * कूर्मपुराण *
| तस्मिन्नेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे।<br>योगनिद्रां समास्थाय शेते देवः प्रजापतिः॥ ४६॥ | उस भयंकर एकार्णव (महासमुद्र)-में स्थावर-जंगम सभीके लीन हो जानेपर योगनिद्राका आश्रय ग्रहणकर देव प्रजापति शयन करते हैं॥ ४६॥ |
| चतुर्युगसहस्रान्तं कल्पमाहुर्महर्षयः।<br>वाराहो वर्तते कल्पो यस्य विस्तार ईरितः॥ ४७॥ | महर्षियोंने एक हजार चतुर्युगीका एक कल्प कहा है। अभी जिसका विस्तार बतलाया गया है, वह वाराह कल्प इस समय चल रहा है। ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवात्मक असंख्य कल्प हैं। पुराणोंमें काल-चिन्तक मुनियोंने उनका वर्णन किया है। सात्त्विक (सत्त्वप्रधान) कल्पोंमें हरिका अधिक माहात्म्य होता है। तामस (तमःप्रधान) कल्पोंमें शंकरका और राजस (रजः-प्रधान) कल्पोंमें प्रजापति ब्रह्माका अधिक माहात्म्य होता है। इस समय प्रवर्तमान वाराह कल्प सात्त्विक कल्प है। अन्य भी सात्त्विक कल्प हैं, उनमें मुझे कूर्मभगवान्का आश्रय ग्रहण करना चाहिये॥ ४७–५०॥ |
| असंख्यातास्तथा कल्पा ब्रह्मविष्णुशिवात्मकाः।<br>कथिता हि पुराणेषु मुनिभिः कालचिन्तकैः॥ ४८॥ | |
| सात्त्विकेष्वथ कल्पेषु माहात्म्यमधिकं हरेः।<br>तामसेषु हरस्योक्तं राजसेषु प्रजापतेः॥ ४९॥ | |
| योऽयं प्रवर्तते कल्पो वाराहः सात्त्विको मतः।<br>अन्ये च सात्त्विकाः कल्पा मम तेषु परिग्रहः॥ ५०॥ | |
| ध्यानं तपस्तथा ज्ञानं लब्ध्वा तेष्वेव योगिनः।<br>आराध्य गिरिशं मां च यान्ति तत् परमं पदम्॥ ५१॥ | उन कल्पोंमें योगीजन ध्यान, तप तथा ज्ञान प्राप्तकर उनके द्वारा शंकरकी तथा मेरी आराधना करके परमपदको प्राप्त करते हैं। जगत्के एकार्णव हो जानेपर मायाका अधिष्ठाता मैं सत्त्वका आश्रय ग्रहणकर मायामय योगनिद्रामें स्थित हो जाता हूँ। उस समय जनलोकमें विद्यमान महात्मा, महर्षिगण तपस्या तथा योगरूपी नेत्रोंके द्वारा निद्रालीन कालस्वरूप मेरा दर्शन करते हैं॥ ५१–५३॥ |
| सोऽहं सत्त्वं समास्थाय मायी मायामयीं स्वयम्।<br>एकार्णवे जगत्यस्मिन् योगनिद्रां व्रजामि तु॥ ५२॥ | |
| मां पश्यन्ति महात्मानः सुप्तं कालं महर्षयः।<br>जनलोके वर्तमानास्तपसा योगचक्षुषा॥ ५३॥ | |
| अहं पुराणपुरुषो भूर्भुवः प्रभवो विभुः।<br>सहस्रचरणः श्रीमान् सहस्रांशुः सहस्रदृक्॥ ५४॥ | मैं पुराणपुरुष, भूर्भुवः, प्रभव तथा विभु हूँ, मैं हजारों चरणोंवाला, श्रीसम्पन्न, हजारों किरणोंवाला तथा हजारों नेत्रोंवाला हूँ। मैं ही मन्त्र, अग्नि, ब्राह्मण, गौ, कुश एवं समिधा हूँ और प्रोक्षणी, स्रुव (यज्ञीय पात्र) सोम तथा घृत भी मैं ही हूँ। मैं ही संवर्तक (अग्नि), महान् आत्मा, पवित्र तथा परम यश हूँ। वेद-वेद्य (जिसे जाना जाता है), प्रभु, गोप्ता (रक्षक), गोपति (इन्द्रियों एवं वाणीके स्वामी) और ब्रह्माका मुख (आविर्भावस्थल) भी मैं ही हूँ। मैं अनन्त, तारक, योगी, गति, गतिशीलोंमें श्रेष्ठ, हंस, प्राण, कपिल, विश्वमूर्ति, सनातन, क्षेत्रज्ञ, प्रकृति, काल, जगद्बीज और अमृतरूप हूँ। मैं ही माता, पिता तथा महादेव हूँ, मुझसे अतिरिक्त कुछ भी नहीं है॥ ५४–५८॥ |
| मन्त्रोऽग्निर्ब्राह्मणा गावः कुशाश्च समिधो ह्यहम्।<br>प्रोक्षणी च स्रुवश्चैव सोमो घृतमथास्यहम्॥ ५५॥ | |
| संवर्तको महानात्मा पवित्रं परमं यशः।<br>वेदो वेद्यं प्रभुर्गोप्ता गोपतिर्ब्रह्मणो मुखम्॥ ५६॥ | |
| अनन्तस्तारको योगी गतिर्गतिमतां वरः।<br>हंसः प्राणोऽथ कपिलो विश्वमूर्तिः सनातनः॥ ५७॥ | |
| क्षेत्रज्ञः प्रकृतिः कालो जगद्बीजमथामृतम्।<br>माता पिता महादेवो मत्तो ह्यान्यन्न विद्यते॥ ५८॥ |