भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 495, कुल 506 में से

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  • अध्याय ४४ * ४८५

आदित्यवर्णो भुवनस्य गोप्ता नारायणः पुरुषो योगमूर्तिः। मां पश्यन्ति यतयो योगनिष्ठा ज्ञात्वात्मानममृतत्वं व्रजन्ति॥ ५९॥

मैं आदित्यके समान वर्णवाला, भुवनोंका रक्षक, नारायण पुरुष तथा योगमूर्ति हूँ। योगपरायण यतिजन मेरा दर्शन करते हैं और अपनी आत्माका ज्ञान प्राप्तकर अमृतत्व (मोक्ष)-को प्राप्त करते हैं॥ ५९॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्‌साहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४३॥ इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें तैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४३॥


चौवालीसवाँ अध्याय

प्राकृत प्रलयका वर्णन, शिवके विविध रूपों और विविध शक्तियोंका वर्णन, शिवकी आराधनाकी विधि, मुनियोंद्वारा कूर्मरूपधारी विष्णुकी स्तुति, कूर्मपुराणकी विषयानुक्रमणिकाका वर्णन, कूर्मपुराणकी फलश्रुति तथा इस पुराणकी वक्तृ-श्रोतृपरम्पराका प्रतिपादन, महर्षि व्यास तथा नारायणकी वन्दनाके साथ पुराणकी पूर्णताका कथन

कूर्म उवाच

अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रतिसर्गमनुत्तमम्। प्राकृतं हि समासेन शृणुध्वं गदतो मम॥ १॥

गते परार्द्धद्वितये कालो लोकप्रकालनः। कालाग्निर्भस्मसात् कर्तुं करोति निखिलं मतिम्॥ २॥

स्वात्मन्यात्मानमावेश्य भूत्वा देवो महेश्वरः। दहेदशेषं ब्रह्माण्डं सदेवासुरमानुषम्॥ ३॥

तमाविश्य महादेवो भगवान्नीललोहितः। करोति लोकसंहारं भीषणं रूपमाश्रितः॥ ४॥

प्रविश्य मण्डलं सौरं कृत्वासौ बहुधा पुनः। निर्दहत्यखिलं लोकं सप्तसप्तिस्वरूपधृक्॥ ५॥

स दग्ध्वा सकलं सत्त्वमस्त्रं ब्रह्मशिरो महत्। देवतानां शरीरेषु क्षिपत्यखिलदाहकम्॥ ६॥

दग्धेष्वशेषदेवेषु देवी गिरिवरात्मजा। एका सा साक्षिणी शम्भोस्तिष्ठते वैदिकी श्रुतिः॥ ७॥

**(भगवान्) कूर्मने कहा—**इसके अनन्तर अब मैं उत्तम प्राकृत प्रलयका संक्षेपमें वर्णन करूँगा। उसे आप सब श्रवण करें॥ १॥

द्वितीय* परार्ध (अर्थात् ब्रह्माजीकी परमायु—दिव्य १०० वर्षका समय)-के बीत जानेपर समस्त लोकोंका लय करनेवाला कालरूप कालाग्नि सम्पूर्ण जगत्‌को भस्मसात् करनेका निश्चय करता है। महेश्वर देव अपनी आत्मामें आत्मा (जीवात्मा)-को आविष्टकर देवताओं, असुरों तथा मनुष्योंसे युक्त सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको दग्ध करते हैं। भगवान् नीललोहित महादेव भीषण रूप धारणकर उस अग्निमें प्रविष्ट होकर अर्थात् महाकालरूप होकर लोकका संहार करते हैं। सौर-मण्डलमें प्रविष्ट होकर उसे पुनः अनेक रूपवाला बनाकर सात-सात किरणोंवाले सूर्यरूपधारी वे महेश्वर सम्पूर्ण लोकोंको दग्ध करते हैं॥ २—५॥

समस्त सत्त्व (पदार्थों)-को दग्ध करके वे महेश्वर देवताओंके शरीरपर सभीको जलानेमें समर्थ ब्रह्मशिर नामक महान् अस्त्रको छोड़ते हैं। सम्पूर्ण देवताओंके दग्ध हो जानेपर श्रेष्ठ पर्वत (हिमवान्)-की पुत्री देवी पार्वती अकेली ही साक्षीके रूपमें उन (शिव)-के पास स्थित रहती हैं—ऐसी वैदिकी श्रुति है॥ ६-७॥


* ब्रह्माकी आयु दिव्य सौ वर्षकी है। इस कालको 'पर' कहते हैं। इसका आधा भाग 'परार्ध' होता है। (कूर्म० पूर्वविभाग अ० ५) शब्दकल्पद्रुममें उद्धृत।

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