संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ४८६ | * कूर्मपुराण * |
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| शिरःकपालैर्देवानां कृतस्रग्वरभूषणः।<br>आदित्यचन्द्रादिगणैः पूरयन् व्योममण्डलम्॥ ८ ॥<br>सहस्रनयनो देवः सहस्राकृतिरीश्वरः।<br>सहस्रहस्तचरणः सहस्रार्चिर्महाभुजः॥ ९ ॥<br>दंष्ट्राकरालवदनः प्रदीप्तानललोचनः।<br>त्रिशूली कृत्तिवसनो योगमैश्वरमास्थितः॥ १०॥<br>पीत्वा तत्परमानन्दं प्रभूतममृतं स्वयम्।<br>करोति ताण्डवं देवीमालोक्य परमेश्वरः॥ ११ ॥<br>पीत्वा नृत्तामृतं देवी भर्तुः परममङ्गला।<br>योगमास्थाय देवस्य देहमायाति शूलिनः॥ १२॥<br><br>संत्यक्त्वा ताण्डवरसं स्वेच्छयैव पिनाकधृक्।<br>ज्योतिः स्वभावं भगवान् दग्ध्वा ब्रह्माण्डमण्डलम्॥ १३॥<br><br>संस्थितेष्वथ देवेषु ब्रह्मविष्णुपिनाकिषु।<br>गुणैरशेषैः पृथिवी विलयं याति वारिषु॥ १४॥<br><br>सवारितत्त्वं सगुणं ग्रसते हव्यवाहनः।<br>तेजस्तु गुणसंयुक्तं वायौ संयाति संक्षयम्॥ १५॥<br>आकाशे सगुणो वायुः प्रलयं याति विश्वभृत्।<br>भूतादौ च तथाकाशं लीयते गुणसंयुक्तम्॥ १६ ॥<br><br>इन्द्रियाणि च सर्वाणि तैजसे यान्ति संक्षयम्।<br>वैकारिके देवगणाः प्रलयं यान्ति सत्तमाः॥ १७॥<br><br>वैकारिकस्तैजसश्च भूतादिश्चेति सत्तमाः।<br>त्रिविधोऽयमहंकारो महति प्रलयं व्रजेत्॥ १८॥<br>महान्त्मेभिः सहितं ब्रह्माणमतितेजसम्।<br>अव्यक्तं जगतो योनिः संहरेदेकमव्ययम्॥ १९॥<br><br>एवं संहृत्य भूतानि तत्त्वानि च महेश्वरः।<br>वियोजयति चान्योन्यं प्रधानं पुरुषं परम्॥ २०॥ | देवताओंके मस्तकके कपालसे निर्मित मालाको आभूषणरूपमें धारण करनेवाले, हजारों नेत्रवाले, हजारों आकृतिवाले, हजारों हाथ-पैरवाले, हजारों किरणोंवाले, भीषण दंष्ट्रा (दाढ़)-के कारण भयंकर मुखोंवाले, प्रदीप्त अग्निके समान नेत्रोंवाले, त्रिशूली चर्माम्बरधारी वे देव महेश्वर अनन्त सूर्य एवं चन्द्रके समूहोंसे समस्त आकाशमण्डलको व्याप्तकर ऐश्वर्ययोगमें स्थित हो जाते हैं और भगवती पार्वतीको देखते हुए परमानन्दमय अमृतका पानकर स्वयं ताण्डव नृत्य करते हैं॥ ८-११॥<br><br>पतिके नृत्यरूपी अमृतका पानकर परम कल्याणरूपिणी देवी (पार्वती) योगका आश्रय लेते हुए त्रिशूली शिवके शरीरमें प्रविष्ट हो जाती हैं। ब्रह्माण्डमण्डलको दग्ध करनेके अनन्तर पिनाक धारण करनेवाले भगवान् (शिव) अपनी इच्छासे ही ताण्डव (-के आनन्द)-रसका परित्यागकर ज्योतिःस्वरूप अपने भावमें स्थित हो जाते हैं। ब्रह्मा, विष्णु तथा पिनाकी शिवके इस प्रकार स्थित हो जानेपर अपने सम्पूर्ण गुणोंके साथ पृथ्वी जलमें विलीन हो जाती है। अपने गुणोंसहित उस जल-तत्त्वको हव्यवाहन अग्नि ग्रहण कर लेता है और अपने गुणोंसहित वह तेज (अग्नि) वायुमें विलीन हो जाता है॥ १२-१५॥<br><br>विश्वका भरण-पोषण करनेवाला वायु अपने गुणोंके साथ आकाश (तत्त्व)-में लीन हो जाता है और अपने गुणसहित वह आकाश भूतादि अर्थात् तामस अहंकारमें लीन हो जाता है। सत्तमो! सभी इन्द्रियाँ तैजस अर्थात् राजस अहंकारमें विलीन हो जाती हैं और (इन्द्रियोंके अधिष्ठाता) देवगण वैकारिक अर्थात् सात्त्विक अहंकारमें प्रलीन हो जाते हैं। श्रेष्ठो! वैकारिक, तैजस तथा भूतादि (तामस) नामक तीन प्रकारका अहंकार महत्तत्त्वमें लीन हो जाता है॥ १६-१८॥<br><br>यह महत्तत्त्व पृथ्वीसे अहंकारपर्यन्त समस्त तत्त्वोंका मूल होनेके कारण एक प्रकारसे अमित तेजस्वी ब्रह्मा ही हैं। अतः ब्रह्मारूप तथा अपनेमें पृथ्वी आदि समस्त तत्त्वोंको समाविष्ट कर लेनेवाले इस अद्वितीय महत्तत्त्वका संहार वह प्रकृति कर देती है, जो अव्यक्त है एवं समस्त जगत्का मूल कारण है। इस प्रकार (पञ्च) भूतों तथा तत्त्वोंका संहारकर महेश्वर प्रधान-प्रकृति और पुरुषको परस्पर वियुक्त कर देते हैं॥ १९-२०॥ |