भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • अध्याय ४४ * | ४८७ ---|---

प्रधानपुंसोरजयोरेष संहार ईरितः।
महेश्वरेच्छाजनितो न स्वयं विद्यते लयः॥ २१॥

गुणसाम्यं तदव्यक्तं प्रकृतिः परिगीयते।
प्रधानं जगतो योनिर्मायातत्त्वमचेतनम्॥ २२॥

कूटस्थश्चिन्मयो ह्यात्मा केवलः पञ्चविंशकः।
गीयते मुनिभिः साक्षी महानेकः पितामहः ॥ २३॥

एवं संहारकरणी शक्तिर्माहेश्वरी ध्रुवा।
प्रधानाद्यं विशेषान्तं दहेद् रुद्र इति श्रुतिः॥ २४॥

योगिनामथ सर्वेषां ज्ञानविन्यस्तचेतसाम्।
आत्यन्तिकं चैव लयं विदधातीह शंकरः॥ २५॥

इत्येष भगवान् रुद्रः संहारं कुरुते वशी।
स्थापिका मोहनी शक्तिर्नारायण इति श्रुतिः॥ २६॥

हिरण्यगर्भो भगवान् जगत् सदसदात्मकम्।
सृजेदशेषं प्रकृतेस्तन्मयः पञ्चविंशकः॥ २७॥

सर्वज्ञाः सर्वगाः शान्ताः स्वात्मन्येव व्यवस्थिताः।
शक्तयो ब्रह्मविष्ण्वीशा भुक्तिमुक्तिफलप्रदाः ॥ २८॥

सर्वेश्वराः सर्ववन्द्याः शाश्वतानन्तभोगिनः।
एकमेवाक्षरं तत्त्वं पुंप्रधानेश्वरात्मकम् ॥ २९॥

अन्याश्च शक्तयो दिव्याः सन्ति तत्र सहस्रशः।
इज्यन्ते विविधैर्यज्ञैः शक्रादित्यादयोऽमराः ॥ ३०॥

एकैकस्य सहस्राणि देहानां वै शतानि च।
कथ्यन्ते चैव माहात्म्याच्छक्तिरेकैव निर्गुणा ॥ ३१॥ | इस (प्रकृति-पुरुष वियोगको) ही अनादि प्रकृति और पुरुषका संहार कहा जाता है (क्योंकि सांख्यशास्त्रके अनुसार इन दोनोंके नित्य होनेसे इनका लय कहीं नहीं हो सकता)। यह (वियोगरूप) लय भी महेश्वरकी इच्छासे ही होनेवाला है, स्वयं नहीं हो सकता। गुणोंकी साम्यावस्था ही प्रकृति है और अव्यक्त है। जगत्‌का मूल कारण प्रधान है। वह अचेतन है, इसे मायाके रूपमें समझना चाहिये॥ २१-२२॥

कूटस्थ, अद्वितीय पचीसवाँ तत्त्वरूप आत्मा चिन्मय-चेतन होता है। मुनिगण इसे साक्षी, महान् तथा पितामह कहते हैं। इतनेसे यह स्पष्ट है कि महेश्वरकी शाश्वत शक्ति ही संहार करती है। श्रुतिका भी यही कथन है कि रुद्र प्रधान अर्थात् प्रकृतिसे विशेष अर्थात् स्थूल-भूतपर्यन्त सभी तत्त्वोंको दग्ध करते हैं। ज्ञानपरायण सभी योगियोंका आत्यन्तिक प्रलय भी शंकर ही करते हैं॥ २३-२५॥

इस प्रकार सबको अपने वशमें रखनेवाले ये भगवान् रुद्र ही संहार करते हैं। श्रुतिके अनुसार (जगत्‌की) स्थापना करनेवाली (रुद्रकी) मोहनी शक्तिको ही नारायण कहते हैं। पचीसवें तत्त्व अर्थात् पुरुषस्वरूप भगवान् हिरण्यगर्भ प्रकृतिसे तन्मय (संयुक्त) होकर सम्पूर्ण सत्-असदात्मक जगत्‌की सृष्टि करते हैं॥ २६-२७॥

अपनी आत्मामें ही व्यवस्थित रहनेवाली (अर्थात् स्वयंमें ही अधिष्ठित वस्तुतः निरधिष्ठान) ब्रह्मा, विष्णु तथा ईश (महेश्वर) नामक सर्वज्ञ, सर्वव्यापी तथा शान्त तीन शक्तियाँ भोग तथा मोक्षरूप फलको देनेवाली हैं। ये शक्तियाँ सर्वेश्वरस्वरूप, सभीके द्वारा वन्दनीय, शाश्वत और अनन्त भोगोंसे सम्पन्न हैं। अद्वितीय अक्षर तत्त्व ही पुरुष, प्रधान और ईश्वररूप है॥ २८-२९॥

उस परमात्मा (अव्यक्त अक्षर-तत्त्व)-में अन्य भी इन्द्र, सूर्य आदि हजारों दिव्य शक्तियाँ हैं। इनकी भी विविध यज्ञोंके द्वारा आराधना की जाती है। इन इन्द्र, सूर्य आदि एक-एक देवका भी ऐसा माहात्म्य है कि इनके सैकड़ों-हजारों अर्थात् अनन्त शरीर हैं और इन शरीरोंमें लोक-कल्याणके लिये अनन्त शक्तियाँ हैं, पर वस्तुतः इन सबका मूल एक ही निर्गुण शक्ति है-॥ ३०-३१॥