भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४८८ * कूर्मपुराण *


तां तां शक्तिं समाधाय स्वयं देवो महेश्वरः।<br>करोति देहान् विविधान् ग्रसते चैव लीलया ॥ ३२ ॥<br><br>इज्यते सर्वयज्ञेषु ब्राह्मणैर्वेदवादिभिः।<br>सर्वकामप्रदो रुद्र इत्येषा वैदिकी श्रुतिः ॥ ३३ ॥<br><br>सर्वासामेव शक्तीनां ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।<br>प्राधान्येन स्मृता देवाः शक्तयः परमात्मनः ॥ ३४ ॥<br>आद्यः परस्ताद् भगवान् परमात्मा सनातनः।<br>गीयते सर्वशक्त्यात्मा शूलपाणिर्महेश्वरः ॥ ३५ ॥<br><br>एनमेके वदन्त्यग्निं नारायणमथापरे।<br>इन्द्रमेके परे विश्वान् ब्रह्माणमपरे जगुः ॥ ३६ ॥<br>ब्रह्मविष्ण्वग्निवरुणाः सर्वे देवास्तथर्षयः।<br>एकस्यैवाथ रुद्रस्य भेदास्ते परिकीर्तिताः ॥ ३७ ॥<br><br>यं यं भेदं समाश्रित्य यजन्ति परमेश्वरम्।<br>तत् तद् रूपं समास्थाय प्रददाति फलं शिवः ॥ ३८ ॥<br><br>तस्मादेकतरं भेदं समाश्रित्यापि शाश्वतम्।<br>आराधयन्महादेवं याति तत्परमं पदम् ॥ ३९ ॥<br><br>किन्तु देवं महादेवं सर्वशक्तिं सनातनम्।<br>आराधयेद् वै गिरिशं सगुणं वाथ निर्गुणम् ॥ ४० ॥<br>मया प्रोक्तो हि भवतां योगः प्रागेव निर्गुणः।<br>आरुरुक्षुस्तु सगुणं पूजयेत् परमेश्वरम् ॥ ४१ ॥<br><br>पिनाकिनं त्रिनयनं जटिलं कृत्तवाससम्।<br>पद्मासनस्थं रुक्माभं चिन्तयेद् वैदिकी श्रुतिः ॥ ४२ ॥अव्यक्त अक्षर अद्वितीय तत्त्व। उन-उन शक्तियोंका आश्रयण कर महेश्वरदेव स्वयं लीलापूर्वक विविध देहोंकी सृष्टि करते हैं और उनका संहार भी करते हैं। वेदवादी (वेदज्ञ) ब्राह्मणोंके द्वारा समस्त यज्ञोंमें उन (महेश्वर)-का पूजन किया जाता है। ये ही रुद्र हैं तथा सम्पूर्ण कामनाओंको प्रदान करनेवाले हैं—ऐसा वेदका कथन है। परमात्माकी सभी शक्तियोंमें ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश्वर-देव प्रधान शक्तिके रूपमें माने गये हैं॥ ३२—३४ ॥<br>शूलपाणि¹ महेश्वर (कारणब्रह्म-तुरीय तत्त्व) तो आद्य, सबसे परे, भगवान्, परमात्मा, सनातन एवं सर्वशक्त्यात्मा (समस्त शक्तियोंके मूल उद्गम एवं अधिष्ठान)-के रूपमें वेदोंमें वर्णित हैं। इसलिये कुछ लोग इन्हें अग्नि तथा कुछ लोग नारायण कहते हैं। ऐसे ही कोई इन्हें इन्द्र, कोई विश्वेदेव तथा कोई ब्रह्मा कहते हैं॥ ३५-३६ ॥<br>ब्रह्मा, विष्णु, अग्नि, वरुण तथा अन्य सभी देवता और महर्षिगण एक ही रुद्र (महेश्वर)-के विभिन्न स्वरूप कहे गये हैं। मनुष्य इन स्वरूपोंमेंसे जिस भेद (स्वरूप)-का अवलम्बन कर परमेश्वरकी आराधना करते हैं, शिव (महेश्वर) उसी स्वरूपको ग्रहणकर फल प्रदान करते हैं। अतः इनमेंसे किसी एक भी भेद (स्वरूप)-का अवलम्बन कर सनातन महादेवकी आराधना करनेवालेको उस परम (शिव) पदकी प्राप्ति होती है। निष्कर्ष यह है कि सर्वशक्तिसम्पन्न सनातन, देव, गिरिश महादेवकी सगुण अथवा निर्गुण किसी भी रूपमें आराधना अवश्य करनी चाहिये ॥ ३७—४० ॥<br>मैंने आप लोगोंको निर्गुण-योग (निर्बीज समाधि²) पहले ही बता दिया है। सगुणरूप (-की उपासना)-में आरूढ़ होनेकी इच्छा करनेवालेको भी परमेश्वरकी पूजा (आराधना) करनी चाहिये। वेदके कथनके अनुसार पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाले, तीन नेत्रवाले, जटाधारी, चर्माम्बरधारी, पद्मासनमें स्थित तथा स्वर्णिम आभावाले (शंकर)-का ध्यान करना चाहिये॥ ४१-४२ ॥

१-महेश्वर कार्यब्रह्म एवं कारणब्रह्म-रूपमें शास्त्रोंमें वर्णित हैं। अव्यक्ततत्त्वकी शक्तिरूपमें जिन महेश्वरकी चर्चा अभी ऊपर की गयी है, वे कार्यब्रह्म हैं। अव्यक्त अक्षर-तत्त्व कारणब्रह्म महेश्वरको समझना चाहिये। इन्हीं कारणब्रह्मको तुरीय (चतुर्थ) अद्वैत या तत्त्व कहा जाता है।
२-'निर्बीज समाधि' साधककी वह अवस्था है, जिसमें कोई भी संस्कार शेष नहीं रहता। इसीलिये इस अवस्थामें किसी भी प्रकारकी चित्तवृत्तिका अस्तित्व नहीं रहता। इसी कारण इस निर्बीज समाधिको कैवल्यावस्था कहते हैं।