भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 499
* अध्याय ४४ *४८९
एष योगः समुद्दिष्टः सबीजो मुनिसत्तमाः।<br>तस्मात् सर्वान् परित्यज्य देवान् ब्रह्मपुरोगमान्।<br>आराधयेद् विरूपाक्षमादिमध्यान्तसंस्थितम्॥ ४३ ॥<br><br>भक्तियोगसमायुक्तः स्वधर्मनिरतः शुचिः।<br>तादृशं रूपमास्थाय समायात्यन्तिकं शिवम्॥ ४४॥<br><br>एष योगः समुद्दिष्टः सबीजोऽत्यन्तभावने।<br>यथाविधि प्रकुर्वाणः प्राप्नुयादैश्वरं पदम्॥ ४५ ॥<br>अत्राप्यशक्तोऽथ हरं विष्णुं ब्रह्माणमर्चयेत्।<br>अथ चेदसमर्थः स्यात् तत्रापि मुनिपुंगवाः।<br>ततो वाग्वग्निशक्रादीन् पूजयेद् भक्तिसंयुतः॥ ४६ ॥<br><br>ये चान्ये भावने शुद्धे प्रागुक्ते भवतामिह।<br>अथापि कथितो योगो निर्बीजश्च सबीजकः॥ ४७॥<br><br>ज्ञानं तदुक्तं निर्बीजं पूर्वं हि भवतां मया।<br>विष्णुं रुद्रं विरिञ्चिं च सबीजं भावयेद् बुधः।<br>अथवाग्न्यादिकान् देवांस्तत्परः संयतेन्द्रियः॥ ४८॥<br><br>पूजयेत् पुरुषं विष्णुं चतुर्मूर्तिधरं हरिम्।<br>अनादिनिधनं देवं वासुदेवं सनातनम्॥ ४९॥<br><br>नारायणं जगद्योनिमाकाशं परमं पदम्।<br>तल्लिङ्गधारी नियतं तद्भक्तस्तदपाश्रयः।<br>एष एव विधिर्ब्राह्मे भावने चान्तिके मतः॥ ५०॥मुनिश्रेष्ठो! इस प्रकार इस सबीज* योगका वर्णन किया गया। (इस संक्षिप्त वर्णनसे यह स्पष्ट है कि महेश्वरतत्त्व ही सर्वस्व, परम ध्येय है) इसलिये ब्रह्मा आदि प्रधान सभी देवोंको छोड़कर आदि, मध्य तथा अन्तमें रहनेवाले (शाश्वत तत्त्व) विरूपाक्ष (शंकर)-की आराधना करनी चाहिये। अपने धर्ममें निरत रहनेवाला, पवित्र तथा भक्तियोग-परायण व्यक्ति वैसा ही (शंकरके समान) रूप धारणकर शिवके समीप आता है। अत्यन्त भावना—ध्येयाकार चित्तवृत्तिवाले इस सबीज योगका वर्णन किया गया। इसका यथाविधि अनुष्ठान करता हुआ व्यक्ति ऐश्वर (ईश्वर)-पदको प्राप्त करता है॥ ४३—४५॥<br><br>मुनिश्रेष्ठो! यदि मनुष्य इसमें भी असमर्थ हो तो उसे हर, विष्णु एवं ब्रह्माकी आराधना करनी चाहिये और उसमें भी असमर्थ होनेपर भक्तियुक्त होकर (कार्यब्रह्माकी शक्ति) वायु, अग्नि तथा इन्द्र आदि देवताओंकी पूजा करनी चाहिये। पूर्वमें आप लोगोंको जो दो शुद्ध भावनाएँ बतायी गयी हैं (वे भी कल्याणकर हैं)। साथ ही निर्बीज तथा सबीज योगका भी वर्णन किया गया है (ये भी परम उपादेय हैं)। मैंने पूर्वमें भी यह निर्बीज ज्ञान (योग) आप लोगोंको बताया था। बुद्धिमान् व्यक्तिको सर्वप्रथम सबीज (साकाररूपमें) ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्रकी भावना करनी चाहिये अथवा प्रारम्भमें जितेन्द्रिय होकर अग्नि आदि देवताओंकी तत्परतापूर्वक (इन देवताओंको ही परम ध्येय मानकर) आराधना करनी चाहिये। विष्णुके भक्त एवं विष्णुपरायण पुरुषको वैष्णव चिह्न (शंख-चक्रादि) धारणकर नियमपूर्वक (नारायण, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्धरूप) चार मूर्ति धारण करनेवाले, अनादिनिधन, जगद्योनि, आकाशरूप, परमपदरूप सनातन देव वासुदेव पुरुष विष्णुकी पूजा करनी चाहिये। ब्राह्मी भावना (विष्णुको ही ब्रह्म माननेकी भावना)-में भी यही विधि श्रीविष्णुका सामीप्य प्राप्त करनेके लिये मान्य है॥ ४६—५०॥

* 'सबीज योग' का अर्थ है—सबीज समाधि। वह समाधि सबीज है, जिसमें बीज रहता है। बीजका अर्थ है—ध्येयाकार चित्तवृत्ति। इसका आशय यह है कि स्वयंसे पृथक् ध्येय तत्त्वको समझकर उसका अनुसंधान यदि साधक कर रहा है तो ध्येयाकार चित्तवृत्तिका अस्तित्व रहनेसे साधककी यह समाधि-अवस्था सबीज ही है। (इसे कैवल्यावस्था नहीं कह सकते, क्योंकि चित्तवृत्तिका पृथक् अस्तित्व रहनेसे साधकमें कैवल्य भाव नहीं है।)