संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४९० * कूर्मपुराण *
| इत्येतत् कथितं ज्ञानं भावनासंश्रयं परम्।<br>इन्द्रद्युम्नाय मुनये कथितं यन्मया पुरा॥ ५१ ॥<br><br>अव्यक्तात्मकमवेदं चेतनाचेतनं जगत्।<br>तदीश्वरः परं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्ममयं जगत्॥ ५२ ॥ | इस प्रकार यह पवित्र भावनापर आश्रित परम ज्ञान बतलाया गया। प्राचीन कालमें मैंने इस ज्ञानको इन्द्रद्युम्न मुनिसे कहा था। यह चेतनात्मक एवं अचेतनात्मक जगत् अव्यक्त (अक्षर अद्वितीय तत्त्व महेश्वर)-स्वरूप ही है। वह ईश्वर (महेश्वर) ही परम ब्रह्म है, इसलिये यह जगत् ब्रह्ममय है॥ ५१-५२ ॥ | | सूत उवाच<br>एतावदुक्त्वा भगवान् विरराम जनार्दनः।<br>तुष्टुवुर्मुनयो विष्णुं शक्रेण सह माधवम्॥ ५३ ॥ | सूतजीने कहा—इतना कहकर भगवान् जनार्दन (कूर्म) चुप हो गये। तब इन्द्रके साथ मुनिगण माधव विष्णु (कूर्म)-की स्तुति करने लगे— ॥ ५३ ॥ | | मुनय ऊचुः<br>नमस्ते कूर्मरूपाय विष्णवे परमात्मने।<br>नारायणाय विश्वाय वासुदेवाय ते नमः॥ ५४ ॥<br>नमो नमस्ते कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः।<br>माधवाय नमस्तुभ्यं नमो यज्ञेश्वराय च॥ ५५ ॥<br>सहस्रशिरसे तुभ्यं सहस्राक्षाय ते नमः।<br>नमः सहस्रहस्ताय सहस्रचरणाय च॥ ५६ ॥<br><br>ॐ नमो ज्ञानरूपाय परमात्मस्वरूपिणे।<br>आनन्दाय नमस्तुभ्यं मायातीताय ते नमः॥ ५७ ॥<br><br>नमो गूढशरीराय निर्गुणाय नमोऽस्तु ते।<br>पुरुषाय पुराणाय सत्तामात्रस्वरूपिणे॥ ५८ ॥<br><br>नमः सांख्याय योगाय केवलfilterाय नमोऽस्तु ते।<br>धर्मज्ञानाधिगम्याय निष्कलाय नमो नमः॥ ५९ ॥<br><br>नमोऽस्तु व्योमतत्त्वाय महायोगेश्वराय च।<br>परावराणां प्रभवे वेदवेद्याय ते नमः॥ ६० ॥ | मुनियोंने कहा—कूर्मरूपधारी परमात्मा विष्णुको नमस्कार है। विश्वरूप नारायण वासुदेव! आपको नमस्कार है। कृष्णको बार-बार नमस्कार है। गोविन्दको बारम्बार नमस्कार है। माधव! आपको नमस्कार है। यज्ञेश्वरको नमस्कार है॥ ५४-५५ ॥<br><br>हजारों सिरवाले तथा हजारों नेत्रवाले आपको नमस्कार है। हजारों हाथ तथा हजारों चरणवाले आपको नमस्कार है। प्रणवस्वरूप-ज्ञानरूप परमात्माको नमस्कार है। आनन्दरूप आपको नमस्कार है। आप मायातीतको नमस्कार है। गूढ (रहस्यमय) शरीरवाले आपको नमस्कार है। आप निर्गुणको नमस्कार है। पुराणपुरुष तथा सत्तामात्र स्वरूपवाले आपको नमस्कार है। सांख्य तथा योगरूप आपको नमस्कार है। अद्वितीय (तत्त्वरूप) आपको नमस्कार है। धर्म तथा ज्ञानद्वारा प्राप्त होनेवाले आपको तथा निष्कल आपको बार-बार नमस्कार है। व्योमतत्त्वरूप महायोगेश्वरको नमस्कार है। पर तथा अवर पदार्थोंको उत्पन्न करनेवाले वेदद्वारा वेद्य आपको नमस्कार है॥ ५६-६० ॥ | | नमो बुद्धाय शुद्धाय नमो युक्ताय हेतवे।<br>नमो नमो नमस्तुभ्यं मायिने वेधसे नमः॥ ६१ ॥ | शुद्ध (निराकारस्वरूप) आपको नमस्कार है, बुद्ध (ज्ञानस्वरूप) आपको नमस्कार है। योगयुक्त तथा हेतु (अनन्त प्रपञ्चके मूल कारण)-रूपको नमस्कार है। आपको बार-बार नमस्कार है। मायावी (मायाके नियन्त्रक) वेधा (विश्व-प्रपञ्चके स्रष्टा)-को नमस्कार है॥ ६१ ॥ | | नमोऽस्तु ते वराहाय नारसिंहाय ते नमः।<br>वामनाय नमस्तुभ्यं हृषीकेशाय ते नमः॥ ६२ ॥<br><br>नमोऽस्तु कालरुद्राय कालरूपाय ते नमः।<br>स्वर्गापवर्गदात्रे च नमोऽप्रतिहतात्मने॥ ६३ ॥ | वराहरूप आपको नमस्कार है। आप नरसिंह-रूपधारीको नमस्कार है। वामनरूप आपको नमस्कार है। आप हृषीकेश (इन्द्रियके ईश)-को नमस्कार है। कालरुद्रको नमस्कार है। कालरूप आपको नमस्कार है। स्वर्ग तथा अपवर्ग प्रदान करनेवाले और अप्रतिहत आत्मा (शाश्वत अद्वितीय)-को नमस्कार है॥ ६२-६३ ॥ |