भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय ४४ *४९१
नमो योगाधिगम्याय योगिने योगदायिने।<br>देवानां पतये तुभ्यं देवार्तिशमनाय ते॥ ६४॥योगाधिगम्य, योगी और योगदाताको नमस्कार है। देवताओंके स्वामी तथा देवताओंके कष्टका शमन करनेवाले आपको नमस्कार है॥ ६४॥
भगवंस्त्वत्प्रसादेन सर्वसंसारनाशनम्।<br>अस्माभिर्विदितं ज्ञानं यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते ॥ ६५॥भगवन्! आपकी कृपासे समस्त संसार (भवबन्धन)-का नाश हो जाता है। हमें आपसे वह ज्ञान प्राप्त हुआ है, जिसे जानकर अमृतत्वकी प्राप्ति होती है। हम लोगोंने विविध धर्म, वंश, मन्वन्तर, सर्ग, प्रतिसर्ग तथा इस ब्रह्माण्डके विस्तारके विषयमें आपसे सुना। आप ही सम्पूर्ण जगत्के साक्षी, विश्वरूप और परम नारायण हैं। अनन्तात्मन्! आप ही हम लोगोंकी शरण और गति हैं। आप हमारी रक्षा करें॥ ६५-६७॥
श्रुतास्तु विविधा धर्मा वंशा मन्वन्तराणि च।<br>सर्गश्च प्रतिसर्गश्च ब्रह्माण्डस्यास्य विस्तरः॥ ६६॥
त्वं हि सर्वजगत्साक्षी विश्वो नारायणः परः।<br>त्रातुमर्हस्यनन्तात्मंस्त्वमेव शरणं गतिः॥ ६७॥
सूत उवाचसूतजीने कहा—विप्रो! योग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले उस सम्पूर्ण कूर्मपुराणको मैंने आप लोगोंको बतलाया, जिसे गदाधर (कूर्मभगवान्)-ने कहा था। पहले इस पुराणमें सम्पूर्ण प्राणियोंको मोहित करनेके लिये लक्ष्मीकी उत्पत्ति तथा वासुदेवके साथ उनके संयोगका वर्णन किया गया है। तदनन्तर प्रजापतियोंकी सृष्टि, वर्णोंके धर्मों और उनकी वृत्तियोंका वर्णन तथा धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्षके शुभ लक्षणोंका यथावत् वर्णन किया गया है। इसमें पितामह (ब्रह्मा), विष्णु तथा धीमान् महेश्वरके एकत्व, पृथक्त्व और वैशिष्ट्यका वर्णन हुआ है। भक्तोंके लक्षण तथा सुन्दर सदाचारको कहा गया है। साथ ही वर्णों तथा आश्रमोंके लक्षणोंको शास्त्रानुसार बतलाया गया है॥ ६८-७२॥
एतद् वः कथितं विप्रा योगमोक्षप्रदायकम्।<br>कौर्मं पुराणमखिलं यज्जगाद गदाधरः॥ ६८॥
अस्मिन् पुराणे लक्ष्म्यास्तु सम्भवः कथितः पुरा।<br>मोहायाशेषभूतानां वासुदेवेन योजनम्॥ ६९॥
प्रजापतीनां सर्गस्तु वर्णधर्माश्च वृत्तयः।<br>धर्मार्थकाममोक्षाणां यथावल्लक्षणं शुभम्॥ ७०॥
पितामहस्य विष्णोश्च महेशस्य च धीमतः।<br>एकत्वं च पृथक्त्वं च विशेषश्चोपवर्णितः॥ ७१॥
भक्तानां लक्षणं प्रोक्तं समाचारश्च शोभनः।<br>वर्णाश्रमाणां कथितं यथावदिह लक्षणम्॥ ७२॥
आदिसर्गतस्तः पश्चादण्डावरणसप्तकम्।<br>हिरण्यगर्भसर्गश्च कीर्तितो मुनिपुंगवाः॥ ७३॥तदनन्तर आदिसर्ग पुनः सात आवरणयुक्त ब्रह्माण्डका वर्णन हुआ है। मुनिश्रेष्ठो! फिर हिरण्यगर्भसर्ग कहा गया है। काल-गणनाका विवरण, ईश्वरका माहात्म्य, ब्रह्माका जलमें शयन तथा भगवान्के नामोंकी निरुक्तिका वर्णन हुआ है। (विष्णुद्वारा) वराह-शरीर धारणकर भूमि (पृथ्वी)-के उद्धार करनेका भी इसमें वर्णन हुआ है। तदनन्तर पहले मुख्यसर्ग आदि और पुनः मुनिसर्ग बताया गया है। (इस पुराणमें) रुद्रसर्ग, ऋषिसर्ग, तापससर्ग और तामससर्गसे पहले धर्मका प्रजासर्ग बताया गया है॥ ७३-७६॥
कालसंख्याप्रकथनं माहात्म्यं चेश्वरस्य च।<br>ब्रह्मणः शयनं चाप्सु नामनिर्वचनं तथा॥ ७४॥
वराहवपुषा भूयो भूमेरुद्धरणं पुनः।<br>मुख्यादिसर्गकथनं मुनिसर्गस्तथापरः॥ ७५॥
व्याख्यातो रुद्रसर्गश्च ऋषिसर्गश्च तापसः।<br>धर्मस्य च प्रजासर्गस्तामसात् पूर्वमेव तु॥ ७६॥
ब्रह्मविष्णुविवादः स्यादन्तर्देहप्रवेशनम्।<br>पद्मोद्भवत्वं देवस्य मोहस्तस्य च धीमतः॥ ७७॥ब्रह्मा एवं विष्णुके विवाद और (परस्पर) एक-दूसरेके देहके अन्तर्गत प्रविष्ट होने, ब्रह्माके कमलसे उत्पन्न होने और धीमान् देव (ब्रह्मा)-के मोहका (इस पुराणमें) वर्णन हुआ है॥ ७७॥
दर्शनं च महेशस्य माहात्म्यं विष्णुनेरितम्।<br>दिव्यदृष्टिप्रदानं च ब्रह्मणः परमेष्ठिनः॥ ७८॥तत्पश्चात् (ब्रह्माद्वारा) महेशका दर्शन करने, विष्णु-द्वारा कहे गये उनके माहात्म्य और परमेष्ठी ब्रह्माको दिव्य