भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 502, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 502
४९२* कूर्मपुराण *
संस्तवो देवदेवस्य ब्रह्मणा परमेष्ठिना।<br>प्रसादो गिरिशस्याथ वरदानं तथैव च॥ ७९॥दृष्टि प्रदान करनेका वर्णन हुआ है। परमेष्ठी ब्रह्माद्वारा देवाधिदेव (महेश्वर)-की स्तुति, (प्रसन्न होकर) गिरिशद्वारा अनुग्रह तथा वर प्रदान करनेका भी वर्णन हुआ है। विष्णुके साथ महात्मा शंकरके संवाद, पिनाकीद्वारा वर प्रदान करने और उनके अन्तर्धान होनेका वर्णन हुआ है॥ ७८-८०॥
संवादो विष्णुना सार्धं शंकरस्य महात्मनः।<br>वरदानं तथापूर्वमन्तर्धानं पिनाकिनः॥ ८०॥<br>वधश्च कथितो विप्रा मधुकैटभयोः पुरा।<br>अवतारोऽथ देवस्य ब्रह्मणो नाभिपङ्कजात्॥ ८१॥विप्रो! इसमें प्राचीन कालमें हुए मधुकैटभके वधका तथा देव (विष्णु)-के नाभिकमलसे ब्रह्माके अवतारका वर्णन हुआ है। तदनन्तर विष्णुसे देव ब्रह्माके एकीभावको कहा गया है और ब्रह्माका मोहित होना तदनन्तर हरिसे चेतनाप्राप्तिको बताया गया है॥ ८१-८२॥
एकीभावश्च देवस्य विष्णुना कथितस्ततः।<br>विमोहो ब्रह्मणश्चाथ संज्ञालाभो हरेस्ततः॥ ८२॥<br>तपश्चरणमाख्यातं देवदेवस्य धीमतः।<br>प्रादुर्भावो महेशस्य ललाटात् कथितस्ततः॥ ८३॥तदुपरान्त धीमान् देवाधिदेवकी तपश्चर्याका वर्णन है और फिर उनके (ब्रह्माके) मस्तकसे महेश्वरके प्रादुर्भावका वर्णन किया गया है। रुद्रोंकी सृष्टि करनेपर ब्रह्माके द्वारा उसके प्रतिषेधका वर्णन हुआ है। देवाधिदेव (शंकर)-के ऐश्वर्य एवं ब्रह्माको वरदान और उपदेश देनेका वर्णन हुआ है। इसके पश्चात् रुद्रके अन्तर्धान होने, ब्रह्माकी तपश्चर्या, देवाधिदेवके दर्शन और उनके नर-नारी-शरीर धारण करनेका वर्णन किया गया है॥ ८३-८५॥
रुद्राणां कथिता सृष्टिर्ब्रह्मणः प्रतिषेधनम्।<br>भूतिश्च देवदेवस्य वरदानोपदेशकौ॥ ८४॥
अन्तर्धानं च रुद्रस्य तपश्चर्याण्डजस्य च।<br>दर्शनं देवदेवस्य नरनारीशरीरता॥ ८५॥<br>देव्या विभागकथनं देवदेवात् पिनाकिनः।<br>देव्यास्तु पश्चात् कथितं दक्षपुत्रीत्वमेव च॥ ८६॥देवाधिदेव पिनाकीसे देवी (सती)-के अलगावका कथन हुआ है और फिर देवीका दक्षपुत्रीके रूपमें जन्म लेनेका वर्णन हुआ है। देवीकी हिमवान्‌की पुत्री होना और उनके माहात्म्यका वर्णन किया गया है तथा (उनके) दिव्यरूपके दर्शन और विश्वरूपके दर्शनका वर्णन हुआ है। तदुपरान्त स्वयं पिता हिमालयद्वारा कहे गये (देवीके) सहस्रनाम, महादेवीके द्वारा प्रदत्त उपदेश और वरदानका भी वर्णन हुआ है॥ ८६-८८॥
हिमवद्दुहितृत्वं च देव्या माहात्म्यमेव च।<br>दर्शनं दिव्यरूपस्य वैश्वरूपस्य दर्शनम्॥ ८७॥
नाम्नां सहस्रं कथितं पित्रा हिमवता स्वयम्।<br>उपदेशो महादेव्या वरदानं तथैव च॥ ८८॥<br>भृग्वादीनां प्रजासर्गो राज्ञां वंशस्य विस्तरः।<br>प्राचेतसत्वं दक्षस्य दक्षयज्ञविमर्दनम्॥ ८९॥<br>दधीचस्य च दक्षस्य विवादः कथितस्तदा।<br>ततश्च शापः कथितो मुनीनां मुनिपुंगवाः॥ ९०॥भृगु आदि ऋषियोंका प्रजासर्ग, राजाओंके वंशका विस्तार, दक्षके प्रचेताके पुत्र होने और दक्षयज्ञ-विध्वंसका वर्णन हुआ है। मुनिश्रेष्ठो! तदनन्तर दधीच और दक्षके विवादको बतलाया गया है, फिर मुनियोंके शापका वर्णन हुआ है॥ ८९-९०॥
रुद्रागतिः प्रसादश्च अन्तर्धानं पिनाकिनः।<br>पितामहस्योपदेशः कीर्त्यते रक्षणाय तु॥ ९१॥<br>दक्षस्य च प्रजासर्गः कश्यपस्य महात्मनः।<br>हिरण्यकशिपोर्नाशो हिरण्याक्षवधस्तथा॥ ९२॥तदुपरान्त रुद्रके आगमन एवं अनुग्रह और उन पिनाकी रुद्रके अन्तर्धान होने तथा (दक्षकी) रक्षाके लिये पितामहद्वारा उपदेश करनेका वर्णन हुआ है॥ ९१॥<br>तदुपरान्त दक्षके तथा महात्मा कश्यपसे होनेवाली प्रजासृष्टिका वर्णन है। हिरण्यकशिपुके नष्ट होने तथा हिरण्याक्षके वधका वर्णन हुआ है। इसके बाद देवदारुवनमें निवास करनेवाले मुनियोंकी शापप्राप्तिका कथन है, अन्धकके निग्रह और उसको श्रेष्ठ गाणपत्यपद प्रदान करनेका वर्णन हुआ है॥ ९२-९३॥
ततश्च शापः कथितो देवदारुवनौकसाम्।<br>निग्रहश्चान्धकस्याथ गाणपत्यमनुत्तमम्॥ ९३॥