भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • अध्याय ४४ * | ४९३ ---|--- प्रह्लादनिग्रहश्चाथ बलेः संयमनं ततः।<br>बाणस्य निग्रहश्चाथ प्रसादस्तस्य शूलिनः॥ ९४ ॥<br><br>ऋषीणां वंशविस्तारो राज्ञां वंशाः प्रकीर्तिताः।<br>वसुदेवात् ततो विष्णोरुत्पत्तिः स्वेच्छया हरेः ॥ ९५ ॥<br>दर्शनं चोपमन्योर्वै तपश्चरणमेव च।<br>वरलाभो महादेवं दृष्ट्वा साम्बं त्रिलोचनम्॥ ९६ ॥<br><br>कैलासगमनं चाथ निवासस्तत्र शार्ङ्गिणः।<br>ततश्च कथ्यते भीतिर्द्वारवत्या निवासिनाम् ॥ ९७ ॥<br><br>रक्षणं गरुडेनाथ जित्वा शत्रून् महाबलान्।<br>नारदागमनं चैव यात्रा चैव गरुत्मतः॥ ९८ ॥<br>ततश्च कृष्णागमनं मुनीनामागतिस्ततः।<br>नैत्यकं वासुदेवस्य शिवलिङ्गार्चनं तथा ॥ ९९ ॥<br><br>मार्कण्डेयस्य च मुनेः प्रश्नः प्रोक्तस्ततः परम्।<br>लिङ्गार्चननिमित्तं च लिङ्गस्यापि सलिङ्गिनः ॥ १०० ॥<br>याथात्म्यकथनं चाथ लिङ्गाविर्भाव एव च।<br>ब्रह्मविष्ण्वोस्तथा मध्ये कीर्तितो मुनिपुंगवाः ॥ १०१ ॥<br><br>मोहस्तयोस्तु कथितो गमनं चोर्ध्वतोऽप्यधः।<br>संस्तवो देवदेवस्य प्रसादः परमेष्ठिनः॥ १०२॥<br>अन्तर्धानं च लिङ्गस्य साम्बोत्पत्तिस्ततः परम्।<br>कीर्तिता चानिरुद्धस्य समुत्पत्तिर्द्विजोत्तमाः ॥ १०३ ॥<br><br>कृष्णस्य गमने बुद्धिर्ऋषीणामागतिस्तथा।<br>अनुशासितं च कृष्णेन वरदानं महात्मनः ॥ १०४ ॥<br>गमनं चैव कृष्णस्य पार्थस्यापि च दर्शनम्।<br>कृष्णद्वैपायनस्योक्ता युगधर्माः सनातनाः॥ १०५ ॥<br>अनुग्रहोऽथ पार्थस्य वाराणसीगतिस्ततः।<br>पाराशर्यस्य च मुनेर्व्यासस्याद्भुतकर्मणः॥ १०६ ॥<br>वाराणस्याश्च माहात्म्यं तीर्थानां चैव वर्णनम्।<br>तीर्थयात्रा च व्यासस्य देव्याश्चैवाथ दर्शनम्।<br>उद्वासनं च कथितं वरदानं तथैव च ॥ १०७ ॥ | तदनन्तर प्रह्लादके निग्रह, बलिके बाँधे जाने, त्रिशूली (शंकर)-द्वारा बाणासुरके निग्रह और फिर उसपर कृपा करनेका वर्णन हुआ है। इसके पश्चात् ऋषियोंके वंशका विस्तार तथा राजाओंके वंशका वर्णन हुआ है और फिर स्वेच्छासे वसुदेवके पुत्रके रूपमें हरिविष्णुकी उत्पत्तिका वर्णन है॥ ९४-९५॥<br>उपमन्युका दर्शन करने और तपश्चर्या करनेका वर्णन है। तत्पश्चात् अम्बासहित त्रिलोचन महादेवका दर्शनकर वर प्राप्त करनेका वर्णन हुआ है। तदनन्तर शार्ङ्गी (कृष्ण)-का कैलासपर जाने और वहाँ निवास करनेका वर्णन है फिर द्वारवती-निवासियोंके भयभीत होनेका वर्णन है। इसके बाद महाबलशाली शत्रुओंको जीतकर गरुडके द्वारा (द्वारकावासियोंकी) रक्षा करने, नारद-आगमन और गरुडकी यात्राका वर्णन हुआ है ॥ ९६-९८॥<br>तदनन्तर कृष्णके आगमन, मुनियोंके आने और वासुदेव (विष्णु)-द्वारा नित्य किये जानेवाले शिव-लिङ्गार्चनका वर्णन है। तदुपरान्त मुनि मार्कण्डेयजीद्वारा (लिङ्गके विषयमें) प्रश्न करने तथा (वासुदेवद्वारा) लिङ्गार्चनके प्रयोजन और लिङ्गी (शंकर)-के लिङ्गके स्वरूपका निरूपण हुआ है ॥ ९९-१०० ॥<br>मुनिश्रेष्ठो ! फिर ब्रह्मा तथा विष्णुके मध्य ज्योतिर्लिङ्गके आविर्भाव तथा उसके वास्तविक स्वरूपका वर्णन हुआ है। तदुपरान्त उन दोनोंके मोहित होने तथा (लिङ्गका परिमाण जाननेके लिये) ऊर्ध्वलोक एवं अधोलोकमें जाने, पुनः परमेष्ठी देवाधिदेव (महादेव)-की स्तुति करने और उनके द्वारा अनुग्रह प्रदान करनेका वर्णन हुआ है ॥ १०१-१०२॥<br>द्विजोत्तमो ! तदनन्तर लिङ्गके अन्तर्धान होने और फिर साम्ब तथा अनिरुद्धकी उत्पत्तिका वर्णन हुआ है। तदुपरान्त महात्मा कृष्णका (अपने लोक) जानेका निश्चय, ऋषियोंका (द्वारकामें) आगमन, कृष्णद्वारा उन्हें उपदेश तथा वरदान देनेका वर्णन किया गया है ॥ १०३-१०४॥<br>इसके अनन्तर कृष्णका (स्वधाम) गमन, अर्जुनद्वारा कृष्णद्वैपायनका दर्शन एवं उनके द्वारा कहे गये सनातन युगधर्मोंका वर्णन हुआ है। आगे अर्जुनके ऊपर (व्यासद्वारा) अनुग्रह और पराशरपुत्र अद्भुतकर्मा व्यास मुनिका वाराणसीमें जानेका वर्णन है ॥ १०५-१०६॥<br>तदुपरान्त वाराणसीका माहात्म्य, तीर्थोंका वर्णन, व्यासकी तीर्थयात्रा और देवीके दर्शन करनेका वर्णन है। साथ